सत्य खबरों से वंचित जनता

नेह अर्जुन इंदवार  

देश दुनिया में बहुत सी ऐसी परिवर्तन आ रहे हैं, जिसके बारे आम इंसान को पता ही नहीं चलता है। अखबार पढ़ने वालों तक भी अनेक सूचनाएँ और खबरें पहुँच  नहीं पाती है। 


विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 180 देशों में गिरकर 161 पर आ गया है। मतलब साफ है भारत की मीडिया में कोई स्वतंत्रता नहीं है, और अखबार जितनी खबरें  छापती हैं, उनसे अधिक खबरों को छुपाती हैं। भारतीय मीडिया में सरकार के कामकाज की  तुलनात्मक, विश्लेषणात्मक खबरें बहुत कम अखबारों में छपती हैं। मीडिया कर्मी सरकार और सत्ताधारियों से कोई असहज सवाल नहीं करता। लेकिन विपक्षी पार्टियों के नेताओं से यह सवाल जरूर करता है कि आप देश के विकास के लिए क्या कर रहे हैं ? आप आम कैसे खाते हैं ? जैसे सवाल प्रधानमंत्री से पूछे जाते हैं और वाहियात रूप से उसे मीडिया का आमूक न्यूज बनाया जाता है।  मीडियाकर्मी किसी सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, किसी भ्रष्ट, जनताद्रोही, व्यवस्थाद्रोही, देशद्रोही माफिया, देश को लूटने वाले, जनता को ठगने वाले पूँजीपति या पूँजीपतियों के गठजोड़ आदि के लिए काम करते हैं और वे उनके अनुकूल अपने अखबार का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय मीडिया देश लूट कर विदेश भागने वालों का काफी पीछा नहीं करते। लेकिन विदेशी धरती पर बिना मतलब के रंगीनी कार्यक्रमों को अपने न्यूज का प्रमुख ख़बर बनाते हैं।  दुनिया में जिन देशों में प्रेस स्वतंत्रता अपने चरम अवस्था में है, वहाँ किसी भी तरह के गलत कार्यों का भंडाफोड़ चंद दिनों में ही हो जाता है और वहाँ गलत कार्य करने वालों को सार्वजनिक जीवन से सन्यास लेना होता है और वे जेल के कोठरियों की शोभा बढ़ाते हैं। लेकिन भारत में भ्रष्ट व्यक्तियों को जेल के बदले न्यायालयों से बेल आसानी से मिल जाते हैं, और जनता ऐसे व्यक्तियों को अपने वोट से उन्हें सिर आँखों पर बिठाती है। 


भारत में सूचनाएँ किसी खास उद्देश्य के लिए दी जाती है या छुपायी जाती है। जाहिर है कि जनता तक खबरें पहुँच नहीं पाती हैं। किसी प्रमुख मंदिर से खरबों के सोना गायब हो जाने के खबरों में किसी कसूरवार की पड़ताल तक भारतीय मीडिया  नहीं करती है। 


क्लाईमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन की मार  पूरी पृथ्वी पर पड़ रही है। भारत के कई क्षेत्रों में दिन का तापमान 47 डिग्री तक होने लग गए। हर जगह तीन चार डिग्री तापमान बढ़ गया है और इसकी सबसे अधिक मार गरीबों  को ही होती है। पहले 40 डिग्री की गर्मी में लू से मरने वालों की खबरें रोज आती थीं, लेकिन अब 47-48 की गर्मी से मरने वालों की कोई खबरें नहीं आती हैं। सर्दी के बारे भी अखबारों में खबरें गायब रहती हैं। भूख, बीमारी से होने वाले मौतों की खबरों को दबा दी जाती हैं। इससे सरकारों और लूट मचाते नेताओं की बदनामी होती है। लोग बजट, खर्च, आय-व्यय और सरकारी मशीनरी की बदहाली पर सवाल पूछना शुरू कर देते हैं। ऐसी खबरों से न्यायालय भी सक्रिय हो उठता है। ये नेताओं के लिए सिरदर्द- मगजमारी का विषय बन जाता  है और माफियातंत्र राज्य में  लूटतंत्र के बारे बातें होने लगती है। इसलिए भ्रष्ट और गुलाम-चापलूस मीडिया इन खबरों को सिरे से गायब कर देता है। 


भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन यहाँ कृषि फसलों के माध्यम से फैले लूटतंत्र पर बहुत कम बातें होती हैं। जो फसल किसान 10 रूपये में बाजार में आपूर्ति करता है, उसे क्रेता 50 रूपये में खरीदता है। बीच के 40 रूपये कौन बिना हाथ उठाए कमा लेता है, इस पर सरकारें कभी कोई चर्चा आयोजित नहीं करता है। जो कपड़े कारखाने में बीच रूपये मीटर बन कर निकलता है, वह कपड़ा अंतिम ग्राहक के पास 1000 रूपये में पहुँचता है, इस विषय पर भी जनता को कोई खबर नहीं पहुँचााय जाता है। 


पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के भयावाह नतीजा आ रहे हैं। फसलों पर जलवायु की मार पड़ेगी तो वह सोने के दाम पर आम जनता तक पहुँचेगी। जो चावल पाँच साल पूर्व 25 रूपये में मिला करता था, आज 60-70 रूपये प्रति केजी मिल रहा है। अगले पाँच साल में यह 120 रूपये प्रति केजी मिलने लगेगा। दाल कभी 80 रूपये केजी बिकता था, आज वह 180-200 रूपये में मिल रहा है। 80 रूपये का दाल 200 रूपये में बिक रहा है। लेकिन पाँच साल पूर्व जो चाय श्रमिक 167 रूपये पा रहे थे, आज भी 232 रूपये ही पा रहे हैं। खाद्य पदार्थों के दाम  में 100-150% की बढ़ोतरी हो गई है, वहीं मजदूरों के मजदूरी में 20% की बढ़ोतरी हुई है। जाहिर है कि उनकी जीवन स्तर में पहले की अपेक्षा और भी कमी हुई है। वे अधिक गरीब हो रहे हैं और स्थिति अधिक भयावह बन रही है। चाय मजदूरों की कोई खबरें कभी किसी अखबार के पहले पन्ने में नहीं आएगी और न कोई संसदीय समिति चाय बागानों की हालत को जानने के लिए आपके गाँव घर आएगी। त्रिपक्षीय वेतन समझौतों में सरकार के अफसर भी हस्ताक्षर करते हैं, लेकिन मजदूरों को फ्रिंज बेनेफिट्स से वंचित करने वालों चाय बागान मालिकों पर वे कोई कार्रवाई नहीं करते हैं। खरबों रूपये की इस लूट पर सरकारी सहमति कहीं छुपी हुई नहीं है। 


भयावाह स्थितियों की सामना करने के लिए चाय मजदूरों को खुद अपने स्तर पर कार्य करना  होगा। अब बारिश का मौसम आ ही गया है। वे इस बारिश में अपने घर में ऐसे फलों और सब्जियों के पेड़ पौधे लगाएँ, जिनसे उन्हें अगले दस बीस साल तक फल और सब्जियाँ प्राप्त होते रहे हैं और वे इनपर होने वाले खर्च को बचा पाएँ। वे मुर्गी जरूर पालें और अपने बच्चों को अंडे और देसी मुर्गी खिला पाएँ। यदि आप घर में मशरूम उगा सकते हैं तो उसे भी उगाना सीखें। यदि आपके पास खेत-खलिहान हैं तो उन पर ऐसे कुछ पेड़ जरूर लगाएँ जो लम्बे समय तक आपको फल, फूल दें या जिन्हें बेच कर आप दस पन्द्रह साल के बाद 10-20 लाख रूपये कमा सकें। बिजली के दाम बेतहासा बढ़ने वाली है, यदि आप दस पन्द्रह परिवार मिल कर पाँच दस हजार रूपये प्रति परिवार जमा करके सौर ऊर्जा वाले सोलार पैनल सामूहिक रूप से एक जगह पर लगाएँगे तो इससे बिजली की लूटंत बाजार से आप बच सकते हैं। शादी विवाह, जन्मदिन पार्टी में खर्च कम करें। मोबाईल वगैरह में अधिक खर्च न करें। जिंदगी में यदि कम पैसों का प्रबंधन आप सही तरीके से कर लेंगे तो जिंदगी बड़े आराम से चल जाएगी। संसाधनों का बेहतर प्रबंधन ही पारिवारिक प्रबंधन है। 


विचारों में विविधता

नेह अर्जुन इंदवार  

मैं जैसे सोचता हूँ, जरूरी नहीं कि आप भी वैसे ही सोचें। 

आप जैसे सोचते हैं जरूरी नहीं कि आपके परिवार के अन्य सदस्य और आपके पड़ोसी भी एक्जैट्क्ली वैसा ही सोचें। 

आपकी आँखें चीजों को जिस कोण और दृष्टिकोण से देखती हैं, वैसा मैं नहीं देख पाता। मेरा "अंदाज" आपके "अंदाज" का जिगरी दोस्त बनने में हमेशा फिस्सड्डी रहा है। आपके अंदाज़-ए-बयाँ पर इतिहास बन जाता है और मेरे बयान पर कोई "चेहरा-किताब" में पोस्ट तक नहीं होते।

जाहिर है कि आपकी मानसिक दुनिया और मेरी सोच की दुनिया में दिन और रात का फर्क है। यही फर्क हमारे सपने, सपनों के संसार और अनुभव की दुनिया में भी हमेशा मौजूद रहता है। हर सपने के अपने ईंट और पत्थर और सिमेंट होते हैं। जब ये मिल कर सपने को हकीकत में बदल देते हैं, तो सपनों का वह महल वैसा ही नहीं होता है, जैसे आपके दिमागी ईंट और पत्थरों से बनने वाला महल हो सकता है। जाहिर है कि सोच और सपने के कतरे-कतरे में भी अंतर होता है और हर सपनों के अपने आकार-प्रकार होते हैं। सोच और चिंतन में इतने डायमेंशन यानी आयाम होते हैं कि हर डायमेंशन दूसरे से अलग होते हैं। कोई भी दो रंग या रूप एक नहीं जैसे नहीं होते हैं।  हम दोनों कितना भी बैठें साथ और अपनी-अपनी सोच को एक दूसरे के ढाँचे में बिठाने की कोशिश करें। लेकिन जैसे दुपहिया साइकिल का पहिया रॉल्स रॉयस में फिट नहीं हो सकता है, वैसे ही तुम्हारे  बुगाटी कार से मेरी पैदल चाल कभी आगे नहीं निकल सकती है। भले ही हम दोनों अपने वाहन की सर्वोच्च गति पर चलने की कोशिश करें।

इसका यह मतलब भी नहीं कि बुगाटी के सामने मेरी चाल बेकार है या वजूदहीन है। भई मेरी चाल का अपना स्वतंत्र वजूद तो मौजूद है ही न इस पृथ्वी में !  जाहिर है कि तुम्हारे वजूद की महानता के सामने मेरी वजूद जरूर क्षुद्र है, मगर अस्तित्वहीन तो नहीं न है। तुम्हारी सोच एक सोच ही तो है, वह पत्थर पर लिखी जीवन की अंतिम सत्य तो नहीं।  भई जीवन में सबसे बड़ी चीज़ चिंतन प्रक्रिया से निकली वैचारिक सिद्धांत जरूर है, लेकिन जीवन से बड़ी तो नहीं। जी हाँ, सांसों के डोर से बंधी जीवन ही संसार में सबसे बड़ी चीज़ होती है। कोई भी इंसान अपनी सांसों को न तो रेहन रख सकता है और न किसी कीमत पर दूसरे को बेच कर जीवन में मुनाफा कमा सकता है। जीवन में कई विचार जरूर महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन वे इतने महत्व नहीं होते हैं, कि किसी के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो। 😑 

हर विचार का अपना जीवन होता है। किसी दिन कहीं नमालूम सी जगह में उसका जन्म होता है। ठीक वैसे ही जैसे कहीं किसी महात्मा या नॉबल प्राईज विजेता का जन्म होता है, लेकिन उसे तब कोई भी नहीं जानता है कि यही भविष्य में फलना व्यक्ति बनेगा। वैसे ही विचारों के जन्म के समय भी कोई नहीं जानता है कि वह विचार दुनिया में कोई क्रांति भी करने में सक्षम बनेगा। जी हाँ, कभी वह बहुत नन्हा सा होता है। फिर वह खाते पीत स्वस्थ रहते हुए खेलते हुए जवान होता है। जवानी में वह बहुत बलशाली हो सकता है। हो सकता है कि वह अपने बल के बल पर इलाके या दुनिया के किसी इलाके का मालिक बन गया हो, या हो सकता है पूरी दुनिया का सबसे अधिक स्वीकार्य विचार बन गया हो, उसे वैश्विक विचार का खिताब भी मिल गया हो और वह बहुत सफल कहा गया हो। जाहिर है कि विचारों के बंधन से जीवन के बंधन को बाँधना, उसे जीवन का ही दूसरा नाम देना बुद्धिमानी का निशानी नहीं है। 

लेकिन दोस्त दुनिया में जितने इंसान हैं उतने ही विचार भी है। संसार में उन्हें फलने फूलने का अवसर भी मिलता है। जाहिर है कि कोई विचार चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, उसकी प्रतिक्रिया या प्रतिस्पर्धा में दूसरे विचार भी करोड़ों दिमाग में बादलों की तरह उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। हो सकती है वह पुराने शक्तिशाली विचारों से भी अधिक शक्तिशाली बन कर मानव समाज को मानसिक क्रांति करने के लिए मजबूर कर दे। इसलिए एक विचार को पकड़ कर इतना इतराना किस बात की ? 

विचारों की दुनिया भी अजीब होती है। यह रोज बनती है और रोज बिगड़ती है। अधितर विचार और विचारधारा अलग-अलग जानकारियों और शिक्षा पर आधारित होती है। जो शिक्षा एक समय बहुत उम्दा जान पड़ती है, वही समयांतर के बाद बेकार समझ ली जाती है।  जानकारी और समय जैसे ही बदलती है, विचार भी बदल जाता है। कोई जानी प्यारा विचार, जानी दुश्मन विचार बन जाता है और कोई नफरती कीड़ा से मनरूबा और  दिलरुबा। विचार परिवर्तन की दुनिया में तैरते रहते हैं और ऋतुओं की तरह परिवर्तनशील हो जाते हैं। विचारों की दुनिया में वफ़ा और बेवफ़ा का कोई झमेला भी नहीं है। 

कल तक जो दिल के नजदीक रहते थे। वे आज चाईनीज माल हो गए। और हम जो कभी क्रिकेटटर हुआ करते थे, विचार से बॉलीबाल के खिलाड़ी बन गए हैं।

विचारों से उन्हें प्यार इतना,

कि वे दुश्मन बन बैठे हैं यार के।


कमजोर की बीवी पूरे गाँव की भौजी।

नेह अर्जुन इंदवार

कमजोर आदिवासी का "अधिकार और सम्मान" सबकी भौजी।

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अजीब स्थिति है ।

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राजनीति के मैदान में वेश्यगिरी कर रही राजनैतिक पार्टियाँ

आदिवासी अधिकार, सम्मान की नीलामी करने की आवाज देती हैं और  आदिवासी अपना वजूद और सम्मान के बचाव के लिए मारा-मारा फिरता है।

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तब गली कुच्चा, गाँव-खोईर में कुकुरमुत्तों की तरह बनाए गए संगठन सक्रिय हो जाते हैं और फिर बैठकों की एक अंतहीन छितरे-बिखरे कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं। सभी अपने-अपने "क्रांतिकारी संघर्ष" की घोषणा करते हैं और हर तरफ बीस-पच्चीस लोग वजूद बचाने झंडे लेकर निकल जाते हैं।

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परिणाम क्या होता है? कुकुरमुत्ते संगठनों के बच्चेनुमा चित्कार को कोई भी गंभीरता से लेता नहीं है। गरजते बादल बारिश करते नहीं।

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बाप रे ! गिनती करने बैठो तो आदिवासी संगठनों और नेताओं की संख्या गिनने के लिए दर्जन भर कलम की स्याही भी कम पड़ जाए।

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मुद्दई इन नजारों को देख अपनी हँसी रोक नहीं पाते हैं। सभी आदिवासियों को उलझाने के लिए नये पासे फेंकते हैं, क्योंकि आदिवासी उलझता ही रहता है। उनकी उलझन साफ दिखती है। कोई भी उनको अफरा तफरी में धकेल सकता है। वह हर बार नये-नये फंदे में आसानी से फंसता है।

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आदिवासी अधिकार सबकी भौजी क्यों है तुरंत समझ में आ जाती है।

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आखिर क्यों आदिवासी दिमाग में यह बात नहीं आती है कि जो कुछ करना है पूरे राज्य के लिए सिर्फ एक ही सामाजिक संगठन काम करे, (राजनीति संगठन नहीं)  सबकी एक आवाज हो  किसी भी मुद्दे पर एक साथ हाथ उठे, एक साथ गिरे और सम्पूर्ण समाज की सारी ताकतों का एक साथ उपयोग किया जाए। वह जिसे समर्थन करे वही चुनाव लड़े बाकी कोई नहीं।

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जब-जब छोटे संगठन केन्द्रीय संगठन बना कर लड़ाई किए हैं वे विजयी रहे हैं। तमाम कम्युनिष्ट पार्टी वाममोर्चा नहीं बनाते तो वे केरल और बंगाल में लम्बे काल तक सत्ताधारी नहीं बने रहते। आरएसएस तमाम हिन्दू संगठनों को एकक्षत्र मार्गदर्शन करता है। एकता में बल है, यह क्यों समझ में नहीं आता है।

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अपने स्वार्थ के लिए नेता बनने की ख्वाहिशें विशाल नदी बनाने की जगह चारों तरफ गंदी नाले ही बनाती हैं। सबकी फवड़ें अलग-अलग सिर्फ कुछ घंटे ही खुदाई कर सकती है। स्वेज और पानामा नहर यूँ ही नहीं बना है दोस्तों। आईए सभी एक विराट संगठन बनाने के लिए सोचें, काम करें।

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सभी संगठन एक दिन एक साथ बैठे, नेताओं की एक प्रेजिडियम बने मतलब दस-बीस नेताओं की एक केन्द्रीय कमेटी बने। नियम शर्तें बने और सभी उसका कठोर पालन करें। लिखित रूप में, गुप्त मतदान के अनुसार निर्णय ले और सिर्फ प्रवक्ता ही बाहर बातें करें। कोई भी नेता विराट एकता का एकक्षत्र नेता बनने की कोशिश न करें और जो इस मुहिम में शामिल न हो, अलग राजनीति करे उन्हें आदिवासी रीतिपूर्वक समाज से बहिष्कृत किया जाए।

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सभी इलाकों, विधानसभा, लोकसभा के लिए गाँव से शहर तक मिल कर सिर्फ एक-एक उम्मीदवार का चयन  करें। सर्व सम्मति से चुने गए उम्मीदवार का विरोध एक भी आदिवासी न करे और यदि कोई करने का दुस्साहस करे तो उसकी क्या सजा होगी यह भी मुकर्रर करे।

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देश के सारे आदिवासी राज्यों. इलाकों में एक ही सामाजिक आंदोलन हो, नेताओं का चुनाव एक समयसीमा (छह महीना या एक वर्ष)  के लिए किया जाए और अगले बैठक में सबकी नेतृत्व क्षमता, ईमानदारी, समर्पण की कठोर समीक्षा किया जाए और कमजोर नेतृत्व को हटा दिया जाए। प्रेजिडियम के नीचे हर प्रकार के एक्सपर्ट समितियाँ काम करे और सभी स्तर पर कारपोरेट प्रबंधन संस्कृति को फ्लो किया जाए।

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हर शाख पर उल्लु बैठे हों तो जाने गुलिस्तान का हाल क्या होगा, कहावत को पूरी तरह बदल दें।

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नेता बनने की महत्वकांक्षा के कारण अलग ठपली बजाने वालों को जनता एक तय तारीख के बाद सरेआम नंगा करे, उन्हें समाज से पूरी तरह बहिष्कार किया जाए और एक भी आदिवासी ऐसे लोगों के साथ न रहे,  यह पहली जरूरत है।  जय आदिवासी, अजय आदिवासी। नेह।


पूँजीवादी व्यवस्था में स्वावलंबी समाज

 Public

नेह अर्जुन इंदवार


पूँजीवादी व्यवस्था में स्वालंबित समाज को पसंद नहीं किया जाता है। साईकिल से चलने वाले लोगों को न पूँजीपति  पसंद करते हैं, न व्यापारी और न सरकार न सत्ताधारी वर्ग। इसी तरह ग्रामीण और आदिवासी समाज को भी पूँजीवादी मानसिकता वाले पसंद नहीं करते हैं। क्योंकि ये समाज 70 प्रतिशत स्वालंबित होते हैं। स्वालंबित समाज में जिंस और सेवा (goods and service)   की मांग और पूर्ति हमेशा मंदी में रहती हैं और रूपये के सर्कुलेशन मंदी के चपेट में रहता है। सरकार और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की नीतियां स्वावलंबित समाज को परावलंबित समाज में बदलने के हर चाल को चलती रहती हैं। इसके लिए पूँजीवादी नीतियां लोगों के व्यक्तिवादी और सामाजिक सोच, चिंतन, दृष्टिकोण, लोकव्यवहार को लगातार  बदलने के लिए सरकारी नीतियों, मीडिया, साहित्य आदि के द्वारा प्रभावित करने की कोशिशें करते रहती हैं।

आधुनिक समाज आज परावलंबित होकर सरकार और पूँजीवादी नीतियों की गुलाम बन चुका है। अर्थ व्यवस्था ही नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जिंदगी भी पूँजीवाद के मुट्ठी में कैद है।   जिंदगी के सबसे अहम हवा, पानी, भोजन और आवास में से सिर्फ हवा पर ही सरकार और पूँजीवाद का कब्जा होना रह गया है। बाकी सारी चीजों पर आज का समाज पूरी तरह आधुनिक शासक वर्ग या पूँजीवाद के गिरफ्त में कैद हो चुका है। जिस दिन पानी, बिजली, गैस, यातायात, बाजार आदि बंद हो जाता है। उस दिन आधुनिक परावलंबित समाज इन नीतियों के कैद में अचल होकर बंद हो जाता है।  समाज किसी भी प्रकार से इनके गिरफ्त से आजाद नहीं हो सकता है।

दुनिया के शहरी और आधुनिक आबादी पूरी तरह इन्हीं नीतियों के कारण परावलंबित हो चुका है। आंदोलन, दंगा, फसाद, युद्ध आदि से पूँजीवाद पर आधारित व्यवस्था मरनासन्न हो जाता है। इसे बचाए रखने के लिए सरकार और पूँजीपति कठोर, ह्रदयहीन होकर अपनी पूरी शक्ति से समाज और व्यक्तियों पर पिल पड़ते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में किसी भी व्यवधान से रूपयों में कैद भूगतान का मूल्य सरकार और पूँजीपतियों की ओर एकतरफा रूप से दौड़ते हुए रूक जाता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में रूपये में कैद भुगतान की शक्ति हमेशा पूँजीपति और सरकार की ओर ही बरसात में आए हुए बाढ़ की तरह उमड़ घुमड़ कर दौड़ती हुई जाती है। इसीलिए जिस स्वालंबित समाज और व्यवस्था से पैसे में कैद मूल्य समाज के भीतर ही लोकतांत्रिक रूप से रह जाता है, उसे आधुनिक सरकार और पूँजीपति पसंद नहीं करते हैं। पूँजीवाद में सरकार और पूँजपतियों के बीच पति पत्नी का संबंध होता है।

पति पत्नी के इस  अमूर्त गठजोर संबंध को समझने के लिए सरकार की कार्य प्रणाली को समझने की जरूरत है। इसे एक छोटा सा उदाहरण के द्वारा समझने का प्रयास करें। पश्चिम बंगाल और असम के चाय मजदूरों के पास अपने घर के जमीन का अधिकार नहीं है। वे पिछले 15 वर्षों से इसकी माँग कर रहे हैं। लेकिन सत्ताधारी वर्ग अर्थात् सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रहे हैं। उन्हें न्याय देने के लिए सरकार को कोई चिंता नहीं हुई।  लेकिन दो तीन पूँजीपतियों ने सरकार से अनुरोध किया कि चाय बागानों को टूरिज्म के लिए अनुमति देना चाहिए। बस इतना कहना था कि ममता सरकार ने फट से 2013 में पाँच एकड़ के टी टूरिज्म की नीति लेकर आई। लेकिन दस पंद्रह पूँजीपति इससे खुश नहीं हुए तो फिर इसी नीति के स्कोप को बढ़ा कर 150 एकड़ कर दिया।  सिर्फ एक चिट्टी आया और नया कानून बन गया। उधर, दो करोड़ के लोगों की आवाज़ भी कोई काम न कर पाया।

एक ओर दो करोड़ जनता संविधान कानून, मानव अधिकार, नागरिक अधिकार, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर 15 वर्षों से अपने घर की जमीन के लिए आंदोलनरत हैं। हड़ताल बंद करके अपनी आवाज़ सरकार तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन सरकार नज़र टेढी करके बैठी है। वहीं दूसरी ओर चार पाँ पूँजीपति एक दो चिट्ठी सरकार को लिखते हैं और सरकार तुरंत फूरंत कई कानून बना देती है और उन कानून को सफल करने के लिए 500 करोड़ रूपये से चा सुंदरी घर बनाने की घोषणा कर देती है। तो दोस्तों यही है पति पत्नी का रिश्ता या पूँजी और सत्ताधारी तत्वों का अपवित्र गठजोड़। यह गठजोड़ ही शोषण की नीतियाँ बनाता है और जनता को परावलंबित करने के लिए कार्य करता है। परावलंबित समाज अपनी स्वालंबित साधनों से वंचित हो जाता है और पूँजीवाद द्वारा स्थापित साधनों का मोहताज हो जाता है।

साईकिल सवार व्यक्ति से सरकार और पूँजीपतियों को बहुत कम फायदा मिलता है। लेकिन गाड़ी सवार लोगों से सरकार और पूँजीपतियों को पेट्रोल, पूर्जे, इन्श्योरेंस, टैक्स आदि से लगातार फायदा मिलता है। इन्हें स्वालंबित व्यक्ति और समाज से बहुत कम फायदा मिलता है। पूँजीपतियों, नेताओं और बाबुओं को स्वावलंबित लोगों से फायदा नहीं मिलता है।

ग्रामीण जीवन में स्वावलंबन के क्या-क्या कारण हैं और वे कैसे बाजारवाद के शोषण से बचाता है। इस पर ग्रामीण और विशेषकर आदिवासी समाज को चिंतन करने की जरूरत है। बिजली, पानी, भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में कैसे स्वावलंबित हो सकते हैं। इस पर चिंतन करके उस पर उपाय करने से रूपयों में कैद मूल्यों का सरकार और पूँजीपतियों की ओर दौड़ने की क्रिया को रोका जा सकता है। मुख्य बात है अपने सीमित संसाधनों के द्वारा  स्वतंत्र और स्वावलंबन जीवन जीना। ग्रामीण समाज में टैक्स और आर्थिक शोषण से बचने के अनेक उपाय किए जा सकते हैं।


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यूरोप का पुनर्जागरण European renaissance काल

 नेह अर्जुन इंदवार 

यूरोप का पुनर्जागरण काल विश्व क्लासिक बौद्धिक विकास और नए विचारों के उद्गम का टर्निंग प्वाइंट था ।

किसी भी समाज या सामाजिक समूहों के लिए ऐसी टर्निंग प्वाइंट युगांतरकारी होता है। दुनिया में मौलिक वैचारिक क्रांति ही सभ्यता के विकास की आधारशिला धूरी साबित होती रही है।

जो समाज वैचारिकी रूप से परिपक्व हो जाता है। वह अपनी बौद्धिकता के बल पर स्वयं विकसित हो जाता है।

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यूरोप में पुनर्जागरण काल के पूर्व के काल को (अंध) विश्वास का युग कहा गया है।  क्योंकि यूरोप में निरंकुश राजा और निरंकुश सामंती व्यवस्था थी, जिसमें आम जनता के वजूद का कोई महत्व नहीं था।  सत्ताधारी शक्तियों और धार्मिक पदाधिकारियों की बौद्धिकता और विचार ही अग्रगति मानी जाती थी। आम जनत को धर्म के नाम पर जो कुछ बताया जाता था,  उसे पत्थर पर लिखी अटल सत्य मानना पड़ता था। दिल से नहीं मानने वालों को भी बाहरी और  प्रगटी रूप में मानने का अनिवार्य अभिनय करना होता था। तर्क के लिए कोई गुँजाइश नहीं थी। सार्वजनिक वाद-विवाद और चर्चा का तो प्रदुर्भाव भी नहीं हुआ था। शासक का स्वार्थ और धर्म का हित में कोई अंतर नहीं था। शासक और धर्म एक दूसरे में गड्मगड़ थे।  शासक के हित की लड़ाई को धर्म की लड़ाई मान ली जाती थी।  धर्म की लड़ाई जिसे क्रूसेड कहा गया, में कृषक वर्ग की आहुतियां दी गईं ।

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लेकिन पुनर्जागरण काल का प्रदुर्भाव ने (अंध)-विश्वास युग को खत्म कर दिया। हस्तलिखित बाईबिल को पहले सिर्फ धर्माधिकारी ही पढ़ते थे। आम जनता को उसे छूने का भी अधिकार नहीं था। प्रोटेस्टैंट आंदोलन और  प्रिंटिग मशीन के विकास ने उसे हजारों में मुद्रित करने के राह बना दिए। आमलोग भी बाईबिल पढ़ने लगे। 14वीं सदी से ईटली प्रायद्वीप के नगर राष्ट्रो से शुरू हुई कला, वस्तुकला, साहित्य, गणित, संगीत, दर्शन, राजनीति, धर्म और विज्ञान में आए विकसित विचारों और दक्षता ने 17वीं सदी तक यूरोप का कायापलट ही कर दिया। शिक्षा, समता और मानवाधिकार के विचारों ने जनता को तर्कशक्ति से लैस कर दिया। वे धर्म के नाम पर बताए जाने वाले बातों पर ठोस रूप से बहस और तर्क करने लगे। नये विचारों ने राजशाही, सामंतवाद की जगह गणतंत्र, लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समता को प्राथमिकता दिया। 4 सौ सालों में पूरा यूरोप बदल गया और धर्म के नाम पर जनता को गाय बैल की तरह हाँकना बंद हो गया।

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विचारों में आए क्रांतिकारी बदलाव ने विकसित यूरोप का निर्माण किया। आज वहाँ धर्म व्यक्तिगत रूचि की बात रह गई है।

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लेकिन यहाँ भारत में यूरोप की तरह पुनर्जागरण काल का प्रदुर्भाव नहीं हुआ है। देश स्वाधीन हुआ। लेकिन जनता के व्यवहार और विचारों में स्वाधीनता नहीं आ पायी। भारत में वंचित वर्ग और समुदायों को योजनाबद्ध ढंग से मुकम्मल शिक्षा से वंचित किया जाता रहा। भारत में जनता वैचारिकी रूप से तर्कशील और स्वाधीन न होने पाए इसके लिए निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने के लिए बहुत बृहद् स्तर पर षड़यंत्र रचे जाते हैं।

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धर्म के नाम पर कुड़ा कर्कट विचारों को परंपरा, पर्व त्यौहार, कर्मकांड, धार्मिक कार्यकलापों के नाम पर परोसा जाता है। लेकिन विज्ञान और तर्क के माध्यम से धार्मिक कट्टरपंथी के विरोध को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप लगा कर वैचारिकी विकास को रोकने के षड़यंत्र रचे जाते हैं।

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धर्म के नाम पर हजारों कार्यक्रम करके लोगों की तार्किकता को कुंद किया जाता है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध सभी धर्म वाले जनता को अपनी मुट्ठी में रखने के लिए बहुत सारी योजनाएँ बनाते रहते हैं। धार्मिक समूहों और उनके धार्मिक संगठनों के मध्य निरंतर भयानक प्रतिस्पर्धा चलते रहते हैं।

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धार्मिक षड़यंत्रों को कामयाब बनाने के लिए खरबों रूपये  व्यय किए जाते हैं। लॉबिस्ट तैयार किए जाते हैं। कर्मचारी रखे जाते हैं। देश की बहुलतावादी विचारों को खत्म करने के लिए, छोटे सामाजिक समूहों के वजूद और उनकी अलग दार्शनिक स्वतंत्र मूल्यों और सांस्कृतिक थातियों को नष्ट करने के लिए अनेक षड़यंत्र रचे जाते हैं। संवैधानिक रूप से जिन नकरात्मक व्यवहार और मूल्यों को खत्म कर दिए गए हैं, उन्हें सामाजिक और धार्मिक मुखौटों के माध्यम से पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करने की पूरजोर कोशिशें अब भी जारी है।

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आज का भारत यूरोप या पश्चिम दुनिया से दो-तीन सौ साल पीछे हैं। भारत में मानसिक विकास और चिंतन का वर्तमान स्तर यूरोपीय पुनर्जागरण काल के सदृष्य है। वैचारिकी विकास हो रहा है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया और जनसंचार के साधनों पर कुछ खास वर्ग और समुदाय का कब्जा है। वहाँ वंचितों का प्रवेश अघोषित रूप से निषिध है। वैचारिकी विकास की धारा हाशिए की धारा बनी हुई है। मुख्य धारा के मीडिया के द्वारा आम जनता को मानसिक और भावनात्मक रूप से पिछड़े बनाने की विराट कोशिशें भी अनवरत जारी है। यूरोप में ऐसी नकरात्मक अमानवीय कोशिशें नहीं हुई थी।

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इसलिए भारत में धर्म के बारे लोगों को वैज्ञानिक ढंग से शिक्षित करने की जरूरत बहुत मह्त्वपूर्ण बन कर सामने आया है। दलित और आदिवासी समाज के मामले में यह सर्वोच्च जरूरी बन गया है। हिंदू, मुसलमान और ईसाई बने जनता को धर्म के नाम पर कट्टर धार्मिक बनाने के लिए लाखों कार्यक्रम किए  जाते हैं। आम दलित और आदिवासी उसे समझ नहीं पाता है। आदिवासी पर्वो, त्यौहारों के दिन किसी न किसी हिन्दू त्यौहार का होना, आदिवासी दिवस, पर्व त्यौहारों के दिन किसी न किसी बंद, हड़ताल, आंदोलन की घोषणा, चर्च चलित स्कूलों में आदिवासी ईसाई युवा वर्ग के लिए धार्मिक कक्षाओं, प्रशिक्षण के कार्यक्रम का आयोजन आदि यूँ ही नहीं होते हैं। इसके पीछे इन समुदायों के रीति रिवाजों, साँस्कृतिक और दार्शनिक मूल्यों से युवाओं को अलग थलग करने, उसे महत्वहीन बनाने, उनके सामाजिक प्रभाव को कम करने के प्रयास के रूप में देखना चाहिए।

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भारत में शोषित समुदाय और वर्ग कला, वस्तुकला, साहित्य, गणित, संगीत, दर्शन, राजनीति, धर्म और विज्ञान की मौलिक विचारों से भी वंचित है। वे इन विषयों के पीछे छिपे विशाल उर्जा से भी ठीक से परिचित नहीं है। स्वाधीन भारत में तमाम उपलब्ध अवसरों के बावजूद भी उनके पिछड़ेपन को इन विषयों के संदर्भ में भी समझने की जरुरत है। इक्का दुक्का व्यक्तिगत सफलता से पिछड़े समाजों की खुशी से बौराए भावनाओं को देखकर यही लगता है कि वे उर्जावान विषयों के ऊर्जा को सामूहिक रूप से व्यवहार करने के वैचारिकी क्षमताओं पर भी विचार करने में नाकाम हैं।

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इतिहास को पढ़ कर याद करने से बेहतर है कि आम जनता उसके आत्माओं से वार्ता करे। हर व्यक्ति स्वयं अध्ययनशील बने और खुद को एक स्वतंत्र  विचारवान व्यक्ति बनाएँ। हर व्यक्ति, साहित्य, दर्शन, इतिहास और वैज्ञानिक विकास का अध्ययन करे।  भारतीय पिछड़े समाजों में फिजिकल डिवलेपमेंट से अधिक क्रिटिकल इंटेक्चुवल डिवलेपमेंट की जरूरत अधिक है। यूरोपीय पुनर्जागरण की आत्मा से हर दलित, पिछड़ी और वंचित वर्ग को एक बार जरूर भेंट करना चाहिए। नेह।


वैचारिकी उर्वरता भाग - तीन

 

नेह इंदवार 

बहुविचारित उच्च स्तर के सम्यक शिक्षा नीति से उच्च शिक्षित, प्रशिक्षित, इन्नोवेटिव, स्वस्थ और प्रसन्न देश अपनी एक अलग प्रगतिशील सांस्कृतिक पृष्टभूमि तैयार करते हैं।


प्रगतिशील सांस्कृतिक ढाँचे में जीवित समाज का धर्मजाति, वर्ग संबंधी विचार, अधिक स्मार्ट, संतुलित और व्यवहारिक होता है। वे इन विचारों की क्षणभंगुरता के बारे ठोस विचार रखते हैं।  ऐसे समाज में रोटी, कपड़ा मकान की मूलभूत समस्याओं का निराकरण बहुत जल्दी कर लिया जाता है और सामाजिक दुख और पिछड़ापन को समाप्त कर दिया जाता है।  स्मार्ट् समाज और देश अपने गरीब संसाधन हीन वर्ग को साधन संपन्न बनाने के लिए अपने बजट और संसाधनों तथा वैचारिकी उर्वरता का बहुत बुद्धिमानी पूर्वक नियोजन करता है और अपने लक्ष्य को कम समय में ही प्राप्त कर लेते हैं। सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, चीन, पेट्रोलियम स्रोत से ट्रिलियन अर्थव्यवस्था को प्राप्त किए हुए साउदी अरब, यूनाईटेड अरब एमिरात, कुवैत, जर्डन, इजरायल आदि इसके उदाहरण हैं। ऐसे देशों में भ्रष्टाचार का स्तर बहुत न्यून होता है। वे अपने संसाधनों का पूरे देश की उन्नति के लिए बहुत बुद्धिमत्ता से उपयोग करते  हैं।

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स्मार्ट समाज के पास कुल मानवीय उत्पादन क्षमता से भी अधिक उत्पादन कर लेने का विश्वास और ताकत होती है। उसके पास अपनी प्रगतिशील सोच और उसकी पृष्टभूमि पर आधारित आर्थिक विकास के कल्याणकारी रास्ते से नये मुकाम हासिल करने का विश्वास होता है। ऐसा समाज आर्थिक और मानसिक रूप से खुशहाल होता है। सर्व और सार्वभौमिक शिक्षा नीति को अपनाने वाले देश प्रसन्नता के सूचकांक में आगे होते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित हैप्पी कंट्री की सूची में फिनलैंड, डेनमार्क. नोर्वे, आईसलैंड, नेदरलैंड, स्विट्जरलैंड, स्वीडेन, न्यूजीलैंड, कनाडा, अस्ट्रिया आदि देश विश्व के अग्रणी प्रसन्न  देश (happiest country in the world) के पद पर आसीन हैं। वहीं 2019 के कुल राष्ट्रीय खुशी के सूचकांक में भारत  का स्थान 140वाँ है। भारत युगांडा, मिश्र, जांबिया, टोगो जैसे अफ्रीकी देशों के साथ खड़ा है। वहीं पड़ोसी देश चीन का स्थान 93वाँ है और भुटान का 95वाँ। नेपाल भी भारत से 40 स्थान आगे है और सूची में उनका स्थान 100वाँ है। इन देशों में रोटी कपड़ा मकान, रोजगार, अवसर, समानता, न्याय सबके लिए उपलब्ध है। भारत में गरीबों के लिए ये अभी भी आकाश कुसुम बनी हुई है या कहें यहाँ की बदहाली योजनाबद्ध ढंग से बनाई हुई है। यहाँ जातिवादी, धर्मवादी, भाषावादी, क्षेत्रवादी सोच से बाहर निकले लोगों की संख्या ऊँगली में गिनने लायक है।

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भारत स्कूली शिक्षा, उच्चतर शिक्षा, प्रति व्यक्ति आय, प्रशिक्षित कार्यबल (Skilled workforce) रोजगार के अवसर, मृत्यु दर, ईमानदारी, समता. न्याय, सार्वजनिक और प्रशासनिक विश्वास, भरोसा आदि हर वैश्विक सूचकांक में निचले स्तर पर होता है। भारत में विकास की नीतियाँ ईमानदारी से नहीं बनाई जाती हैं। यहाँ पिछड़े समाजों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, संपत्ति, अवसर से वंचित करने के षड़यंत्र रचे जाते है। यहाँ शिक्षा, न्याय, शासन, बाजार आदि हर क्षेत्र में जातिवादी, धर्मवादी माफिया राज है। सरकार में शामिल नेता और ब्यूरोक्रेट सभी जातिवादी मानसिकता से संचालित-नियंत्रित होते हैं। किसी सवर्ण की मौत पर एक करोड़ की सहायता और गरीबों की मौत पर दो लाख की मदद की घोषणा यहाँ बड़ी निर्लज्जता, और घटियापन से की जाती है।  जाहिर है कि भारत में वैचारिकी उर्वरता भी अपने निचले स्तर पर ही है। भारत आधुनिक युग में भी मानसिक रूप से वयस्क बनने में असफल रहा है। मीडिया के बौद्धिक समाज में पिछड़ों का प्रवेश निषेध है। मीडिया के कारोबारियों में मानसिक विकलांगता का स्तर क्या है, इसे जानने के लिए कोई गंभीर शोध करने की जरूरत नहीं है। उनकी जातिवादी विकलांग सोच उन्हें बचपन से ही मुक बधिर बना देता है। मीडिया की इज्जत एक वेश्या की इज्जत से भी निम्नस्तर का है। 

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भारत के विराट जनसंख्या अपनी वैचारिकी उर्वरता के आधार पर सार्वजनिक जीवन में आगे नहीं बढ़ता है। उसमें ब्रेक लगाने की कोशिश हर स्तर पर की जाती है। भारत में वैचारिकी उर्वरता की खेती करने की कोई कोशिश कभी नहीं की गई।  बल्कि जनता के मानसिक जीवन के वैचारिकी उर्वरता को स्कूल फेल राजनीतिज्ञगण, आलू-भाजी की तरह बिके हुए मीडिया के साथ मिल कर इधर से उधर घुमाते हैं और करोड़ों लोग बिना अपने दिमाग लगाए भेड़चाल में उन कार्यों को करते हैं। भेड़चाल के पीछे कोई आधार, कारण और कारक नहीं होता है। लेकिन देशवासियों को अपने बेईमान नेताओं के पीछे चलना अच्छा लगता है, क्यों कि वे उनके जाति, धर्म, भाषा, प्रांत और संस्कृति वाले होते हैं। पोषाक और खाने की रूचि जैसे निम्नस्तर की घटिया सोच से  भारत में राजनीति और आर्थिक कार्यकलापों का संचालन होता है।

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जो देश अपने देशवासियों के लिए सर्व और सार्वभौमिक उच्च शिक्षा तक की निशुल्क व्यवस्था करते हैं। वहाँ की जनता उच्चशिक्षित, इन्नोवेटिव, स्मार्ट होती हैं और उनके विचार ठोस धरातल पर खड़े होते हैं  उनके विचारों को विभाजन प्रिय राजनीति के घटिया खेलों से डिगाया नहीं जा सकता है। वे लोकतंत्र जैसे व्यवस्था के सर्वोच्च गुणों को व्यवहार में लाकर अपने विकास की नीतियों का चुनाव बहुत बुद्धिमानी से करते हैं। उच्च शिक्षित, स्वतंत्र मीडिया वाले देश के बुद्धिमान समाज भविष्य के चुनौतियों को बाखूबी समझते हैं। ऐसे देश प्रसन्नचित जनता के उत्पादन के लिए उत्पादन के सभी साधनों को ईमानदारी से लागू करते हैं और धन के वितरण को न्यायपूर्ण बनाते हैं। उनकी न्यायिक व्यवस्था में भयभीत, डरे हुए, भ्रष्ट और नीचले स्तर के लोभी लोग कुर्सियाँ नहीं तोड़ते हैं। भारत में न्याय व्यवस्था धनवान लोगों के यहाँ चाकरी करता है।  

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भारत में विकास की नीतियाँ सभी समुदायों के विकास के लिए ईमानदारी से नहीं बनाई जाती है। बल्कि यहाँ शासक और शासन तंत्र के वैचारिकी उर्वरता को जातिवादी, धर्मवादी चुहा कुतरता रहता है और वे देश को रसातल में ले जाने के लिए बेशर्मी से राष्ट्रीय नीतियों का निर्माण करते हैं। भारत में सरकारें गरीबों के प्रति असंवेदनशील होती है और  दिशाहीन विकास की नीतियों का भी कार्यान्वयन बहुत घटिया ढंग से किया जाता है।

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जो समाज देश के सामने खड़ी चुनौतियों को दिल से नहीं समझता है। वह स्मार्ट, बुद्धिमान और चालाक समाज नहीं होता है। पारंपारिक खुमारी में जीने वाला समाज ऐसा ही होता है। ऐसा समाज कौशलपूर्ण फलदायी रणनीति नहीं बना सकता है और अपने कुल मानव पूँजी को विराट लाभ के लिए निवेश करना नहीं  जानता है। वह समाज हर दृष्टि से पिछड़ेपन का शिकार होता है। ऐसे समाज का भविष्य अंधकारमय होता है। क्योंकि वे पिछड़ेपन, नकारापन, अंधकारपन का अह्वान करते हुए अपनी वैचारिकी उर्वरता को बंजर बनाते हुए उसका इस्तेमाल करते हैं। नेह।

वैचारिकी_उर्वरता भाग- दो

नेह अर्जुन इंदवार 

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देश आजाद होने के बाद भारत में हर क्षेत्र में लंगड़े घोड़े की तरह त्रुटिपूर्ण  नीतियों को सरकारी स्तर पर अपनाया गया।  शिक्षा के क्षेत्र में जानबुझ कर जातिवादी  भेदभाव की लचर सरकारी और प्राईवेट नीतियों को अपनाया गया, ताकि देश के तथाकथित पिछड़ी जातियाँ, शिक्षा के सम्यक लाभ से वंचित रहें लेकिन प्राचीन काल से धन-सम्पदा से संचित वर्ग प्राईवेट स्कूलों के माध्यम से उच्च वर्ग के तमाम लाभों से सराबोर होते रहें। इस तरह की नीतियों ने देश का बहुत नुकसान किया। देश के पिछड़ेपन का यह प्रमुख कारण रहा है। देश कितना पिछड़ा है इसे अनुमान लगाने के लिए कोविड के दौरान यातायात बंदी से जुझ रहे 1500 किलोमीटर भूखे प्यासे मजबूर होकर पैदल चलते गरीब मजदूरों को देख लीजिए। पूरी दुनिया और इतिहास में इतनी लोमहर्षक दृष्य और कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आज भी शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में पिछड़े समाजों को उच्च पदों पर पहुँचने से रोकने की संगठित और ठोस कोशिश की जाती है। आज भारत की साक्षर दर 74 प्रतिशत है। वहीं भारत से एक साल बाद में स्वतंत्र हुए चीन में 97% साक्षरता की दर है। जातिवादी दृष्टिकोण को सामने रख कर इसका विश्लेषण किया जाए तो बहुसंख्यक पिछड़ी जातियों की सहभागिता एक प्रतिशत से भी कम है। उनकी वैचारिकी उर्वरता से देश को वंचित करने की  नीति कितनी घटिया और धत् कर्म था। उस पर एक किताब लिखी जा सकती है।

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भारत में स्नातक शिक्षा प्राप्त जनसंख्या 8.15% प्रतिशत है। औपचारिक रूप से कुशल श्रमिकों का भारत में अनुपात कुल कार्यबल का 4.69% है, जबकि चीन में 24%, ब्रिटेन में 68%, जर्मनी में 75%, जापान में 80% और दक्षिण कोरिया में 96% है। (स्रोत-फाइनेन्सियल टाईम्स 19 मार्च 19)। भारत में आरक्षण की नीति को अपनाने के बावजूद कुशल श्रमिकों के कार्यबल में पिछड़े समाज की सहभागिता 0.05 से अधिक नहीं है। आरक्षण की नीति भी लॉटरी में महज कुछ व्यक्तियों को मिलने वाली प्राईज की तरह का है। जबकि लक्ष्य पूरी जनसंख्या को एक समयसीमा के भीतर स्कील्ड ग्रेज्युएट बनाने की होनी चाहिए थी। भारत अपने राष्ट्रीय बजट का सिर्फ 3% ही शिक्षा के लिए आबंटित करता है। शिक्षा बजट आबंटित करने में 197 देशों में भारत का नम्बर 149वाँ है। अर्थात् दुनिया के सबसे कमजोर 48 देशों से ऊपर भारत का स्थान है। छोटे से देश क्यूबा, माक्रोनेशिया, मार्शल आयलैंड, किरीबाती अपने बजट का 12% धन शिक्षा के लिए व्यय करते हैं। वहीं डेनमार्क, नार्वे, आइसलैंड, स्वीट्जरलैंड, फिनलैंड, भुटान, ट्यूनिशिया, उज्बेकिस्तान, ब्राजिल, दक्षिण अफ्रीका आदि देश अपने बजट के 6% से अधिक का प्रावधान शिक्षा के लिए करते हैं। अर्जेंटीना,ऑस्ट्रिया, ब्राज़ील, डेनमार्क, मिस्र, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आइसलैंड, केन्या, लक्समबर्गं, मलेशियामोरक्को, नॉर्वे, पनामापोलैंड, स्कॉटलैंड, स्लोवेनिया, स्पेन, स्वीडन, तुर्की, उरुग्वे आदि देशों में कमोबेश विश्वविद्यालय तक की शिक्षा पूरी तरह निशुल्क है। शिक्षा और प्रशिक्षण ही किसी देश को महान बनाता है। भारत में गरीब वर्ग को निराक्षर, अर्द्धशिक्षित, साधनहीन, साधन-स्रोतहीन बनाने की राष्ट्रीय नीति कार्य करती है। इसी नीति के तहत कालेजों विश्वविद्यालयों की शिक्षा को महंगा बनाया जा रहा है। आरक्षण से संचालित नौकरियों के प्रमुख स्रोत सार्वजनिक उद्योगों को या तो निजी क्षेत्रों को बेचा जा रहा है या उन्हें निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा न कर पाने लायक अक्षम बनाया जा रहा है। 2023 के एक आंकड़ा के अनुसार केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के क्षेत्र में 16 लाख नौकरियों को खत्म किया गया और आरक्षण के माध्यम से सरकारी नौकरियों में प्रवेश कर रहे पिछड़े समाज को साधन-सम्पन्न होने से रोका गया।   "भारत विश्वगुरू" है वाक्य बोल कर बेवकूफ बनाने की एक परंपरा बनाई गई है। जबकि भारत आय और रोजगार के साधन के मामले में अफ्रीकी देशों से भी नीचे का स्थान रखता है। 

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भारत न सिर्फ अपने बजट का तीन प्रतिशत ही शिक्षा में खर्च करता है, बल्कि शिक्षा और मानव संसाधन के विकास की देखरेख के लिए 12वीं पास अनुभवहीन, प्रशिक्षणहीन व्यक्ति को मानव संसाधन मंत्री भी नियुक्त करता है और पूरा देश चुप रहता है। जबकि भारत रक्षा क्षेत्र में अपने बजट का 2.4% खर्च करता है और रक्षा के सबसे अधिक खर्च करने वाले देशों में भारत का स्थान 6वाँ है। रक्षा बजट से खरीदे गए अधिकांश साजो सामान कभी व्यवहार में नहीं आएँगे, यह सत्ताधारी ही नहीं, बल्कि आम आदमी भी जानता है। रक्षा क्षेत्र में हर सरकार खूब व्यय करती है, क्योंकि उसमें भ्रष्टाचार के बहुत अवसर होते हैं। यहाँ मीडिया की क्या भूमिका हो सकती है। इस पर चिंतन करें। भारत में मीडिया के बुद्धिजीवी सब्जी की तरह टके सेर बिकते हैं। विश्व मीडिया रैंकिंग में भारत का स्थान 162 है। अर्थात् मीडिया की स्वतंत्रता के मामले पर बहुत खराब स्थिति है।  

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उपरोक्त सभी आंकड़े संबंधित वैश्विक अध्ययन संस्थानों से ली गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में शैक्षिक दर, स्नातक तक की शिक्षा दर और प्रशिक्षित कार्यबल दूसरे देशों की अपेक्षा बहुत कम है। लेकिन इस अपेक्षाकृत कम दर में भी भारत ने अनेक क्षेत्रों में कामयाबी का झंडा गड़ा है। जरा चिंतन कीजिए कि यदि भारत में शिक्षा के क्षेत्र में 10% व्यय किया जाता। तमाम जनता को उच्चशिक्षा लेने का मौका दिया जाता, तो आज भारत शिक्षा, प्रशिक्षा, इन्नोवेशन, नये उच्च तकनीकी के विकास और उत्पादन में कहाँ होता ? डॉलर के मुकाबले रूपये की कीमत अधिक होती।  भारत को अत्यंत उच्च संभावना वाला देश यूँ ही नहीं कहा जाता है।

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लेकिन भारत में एक पर्याप्त शिक्षा प्रणाली का निर्माण भी नहीं हो सका। यह धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, सामाजिक, आर्थिक और भाषा मतभेदों की एक अबुझ पहेली बना हुआ है। भारत में 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं। वहीं प्राथमिक स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयीन शिक्षा तक में जातिवादी भेदभाव स्थायी घर बना कर रह रहा है। सरकार चाहती है कि गरीब अंग्रेजी, गणित, विज्ञान न पढ़े। गरीबों के लिए इनकी शिक्षा जानबुझ कर महंगी की जाती है। जाहिर है कि भारत में शिक्षा की असली भावना का उदय प्राचीन काल से ही नहीं हुआ था, न ही आजादी के बाद भेदभाव की भावना लोप हो सका। इसका सीधा असल देश के गैर सवर्ण समाज को भुगतना पड़ रहा है। उच्चतर शिक्षा में पिछड़े गैर स्वर्ण वर्ग को महज 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी भी मयस्सर नहीं है। सरकार की मंशा कभी भी उन्हें सशक्त करने की नहीं रही। क्योंकि नीतियों का निर्माण और कार्यान्वयन जातिवादी मानसिकता का हमेशा शिकार रहा है। देश में मंदबुद्धि और नीचता कहाँ नहीं है? याद रखे उर्वरता से रहित बंजर दिमाग भावशुन्य रहता है।

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सार्वभौमिक शिक्षा, स्वतंत्र सोच और वैचारिक-खुले समाज में बौद्धिक शक्तियाँ समाज को उत्तरोत्तर उन्नतशील और शक्तिशाली बनाता है। जिस समाज में सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को नजरांदाज और हतोत्साहित किया जाता है। वह समाज अंततः बौद्धिक रूप से अपने मानव संसाधन के सर्वोत्तम उपयोग से वंचित हो जाता है। मानव संसाधन के शिक्षा और स्वास्थ्य पर ही हर समाज और राष्ट्र का भविष्य टिका होता है। विश्व के जिन देशों ने अपने मानव पूँजी के विकास के लिए अपने बजट के एक बड़े भाग का निवेश किया, वह देश अपने विशाल जनसंख्या के बौद्धिक विकास का फसल काटा है। भारत से एक साल बाद आजाद हुआ चीन में जातिवादी भावना की अनुपस्थिति ने मानव पूँजी और तकनीकी इन्नोवेशन में इतनी बड़ी छलांग लगाया कि आज दुनिया का बाजार चीनी उत्पादन से अटा पड़ा हुआ है। भारत के अधिकतर परिवार के आय का एक हिस्सा मोबाईल के रास्ते चीन में जाता है। इलेक्ट्रोनिक सामान के मामले पर भारत चीन का वास्तविक उपनिवेश है। लेकिन मीडिया इस बात को छिपाता है।

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धार्मिक और पारंपारिक भव्यता का प्रदर्शन करते खर्चीली संस्कृतियाँ, परिवार और समाज पर हमेशा आर्थिक दबाव का सृजन करता है ? फैशन और आधुनिकी की भावना भी आम आमदानी से भविष्य की रणनीति को संभालते परिवार पर आर्थिक दबाव बनाए रखता है। यह परिवार के युवा वर्ग के दिमाग को हैक करता है, और गैर जरूरी सामानों पर व्यय करवाता है। बाजार, परिवार के आय के एक बड़े हिस्से को अपनी ओर खींचने का, सारा तामझाम करता है। आधुनिक, स्मार्ट और विकसित दिखने की चाहत, परिवार, समाज के उर्जा, समय और पैसों को बहुत बर्बाद करता है, और आर्थिक नींव को कमजोर करता है? विकासशील समाज का गैर जरूरी सामग्री परबिना दिमाग लगाए होने वाला व्यय बेवकूफी कहलाता है।

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परिवार, समाज की तरह, राष्ट्र राज्य के रूप में भी सरकार कैसे बेवकुफियाँ करतीं रहती हैं ? सरकार (राजनीतिज्ञों का एक छोटा समूह) ऐतिहासिक रूप से, लोकमत के माध्यम से मिले सुअवसर के समय, ऊर्जा, संसाधनों को बेवकुफियों में व्यय करके नष्ट करता हैऔर इतिहास में बगडोर संभालने वाले बेवकूफ शासक के रूप में अपना नाम दर्ज करता है? गैर जरूरी खर्च करके, कैसे कोई शासक, समाज और राष्ट्र को विकास के सड़क पर पीछे की ओर ले चलता है और दूसरे राष्ट्र के मुकाबले राष्ट्र को धीमी गति के हाईवे (Slow highway) पर ले चलता है ? मंदिर, मूर्ति, मस्जिद, मुसलमान, पाकिस्तान, गाय, मूत्र, मांस आदि भारतीय नेताओं के बेवकुफियों का वर्तमान आईना है। भविष्य में ठगी के नये नारे आएंगे। वैचारिकी बंजरता यह करने के लिए मजबूर करता है।  नये वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में यह बात निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका है कि जो शासक, शासन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करता है, वह वास्तव में ऐतिहासिक रूप से बेवकूफ होता है।

राष्ट्र की असली सम्पदा उच्च शिक्षित संतुलित दिमाग वाले स्वस्थ लोग होते हैं न कि किसी धर्म और संस्कृति से लिपटे लोग। लेखन जारी है...नेह।

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