नेह अर्जुन इंदवार
मैं जैसे सोचता हूँ, जरूरी नहीं कि आप भी वैसे ही सोचें।
आप जैसे सोचते हैं जरूरी नहीं कि आपके परिवार के अन्य सदस्य और आपके पड़ोसी भी एक्जैट्क्ली वैसा ही सोचें।
आपकी आँखें चीजों को जिस कोण और दृष्टिकोण से देखती हैं, वैसा मैं नहीं देख पाता। मेरा "अंदाज" आपके "अंदाज" का जिगरी दोस्त बनने में हमेशा फिस्सड्डी रहा है। आपके अंदाज़-ए-बयाँ पर इतिहास बन जाता है और मेरे बयान पर कोई "चेहरा-किताब" में पोस्ट तक नहीं होते।
जाहिर है कि आपकी मानसिक दुनिया और मेरी सोच की दुनिया में दिन और रात का फर्क है। यही फर्क हमारे सपने, सपनों के संसार और अनुभव की दुनिया में भी हमेशा मौजूद रहता है। हर सपने के अपने ईंट और पत्थर और सिमेंट होते हैं। जब ये मिल कर सपने को हकीकत में बदल देते हैं, तो सपनों का वह महल वैसा ही नहीं होता है, जैसे आपके दिमागी ईंट और पत्थरों से बनने वाला महल हो सकता है। जाहिर है कि सोच और सपने के कतरे-कतरे में भी अंतर होता है और हर सपनों के अपने आकार-प्रकार होते हैं। सोच और चिंतन में इतने डायमेंशन यानी आयाम होते हैं कि हर डायमेंशन दूसरे से अलग होते हैं। कोई भी दो रंग या रूप एक नहीं जैसे नहीं होते हैं। हम दोनों कितना भी बैठें साथ और अपनी-अपनी सोच को एक दूसरे के ढाँचे में बिठाने की कोशिश करें। लेकिन जैसे दुपहिया साइकिल का पहिया रॉल्स रॉयस में फिट नहीं हो सकता है, वैसे ही तुम्हारे बुगाटी कार से मेरी पैदल चाल कभी आगे नहीं निकल सकती है। भले ही हम दोनों अपने वाहन की सर्वोच्च गति पर चलने की कोशिश करें।
इसका यह मतलब भी नहीं कि बुगाटी के सामने मेरी चाल बेकार है या वजूदहीन है। भई मेरी चाल का अपना स्वतंत्र वजूद तो मौजूद है ही न इस पृथ्वी में ! जाहिर है कि तुम्हारे वजूद की महानता के सामने मेरी वजूद जरूर क्षुद्र है, मगर अस्तित्वहीन तो नहीं न है। तुम्हारी सोच एक सोच ही तो है, वह पत्थर पर लिखी जीवन की अंतिम सत्य तो नहीं। भई जीवन में सबसे बड़ी चीज़ चिंतन प्रक्रिया से निकली वैचारिक सिद्धांत जरूर है, लेकिन जीवन से बड़ी तो नहीं। जी हाँ, सांसों के डोर से बंधी जीवन ही संसार में सबसे बड़ी चीज़ होती है। कोई भी इंसान अपनी सांसों को न तो रेहन रख सकता है और न किसी कीमत पर दूसरे को बेच कर जीवन में मुनाफा कमा सकता है। जीवन में कई विचार जरूर महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन वे इतने महत्व नहीं होते हैं, कि किसी के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो।
हर विचार का अपना जीवन होता है। किसी दिन कहीं नमालूम सी जगह में उसका जन्म होता है। ठीक वैसे ही जैसे कहीं किसी महात्मा या नॉबल प्राईज विजेता का जन्म होता है, लेकिन उसे तब कोई भी नहीं जानता है कि यही भविष्य में फलना व्यक्ति बनेगा। वैसे ही विचारों के जन्म के समय भी कोई नहीं जानता है कि वह विचार दुनिया में कोई क्रांति भी करने में सक्षम बनेगा। जी हाँ, कभी वह बहुत नन्हा सा होता है। फिर वह खाते पीत स्वस्थ रहते हुए खेलते हुए जवान होता है। जवानी में वह बहुत बलशाली हो सकता है। हो सकता है कि वह अपने बल के बल पर इलाके या दुनिया के किसी इलाके का मालिक बन गया हो, या हो सकता है पूरी दुनिया का सबसे अधिक स्वीकार्य विचार बन गया हो, उसे वैश्विक विचार का खिताब भी मिल गया हो और वह बहुत सफल कहा गया हो। जाहिर है कि विचारों के बंधन से जीवन के बंधन को बाँधना, उसे जीवन का ही दूसरा नाम देना बुद्धिमानी का निशानी नहीं है।
लेकिन दोस्त दुनिया में जितने इंसान हैं उतने ही विचार भी है। संसार में उन्हें फलने फूलने का अवसर भी मिलता है। जाहिर है कि कोई विचार चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, उसकी प्रतिक्रिया या प्रतिस्पर्धा में दूसरे विचार भी करोड़ों दिमाग में बादलों की तरह उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। हो सकती है वह पुराने शक्तिशाली विचारों से भी अधिक शक्तिशाली बन कर मानव समाज को मानसिक क्रांति करने के लिए मजबूर कर दे। इसलिए एक विचार को पकड़ कर इतना इतराना किस बात की ?
विचारों की दुनिया भी अजीब होती है। यह रोज बनती है और रोज बिगड़ती है। अधितर विचार और विचारधारा अलग-अलग जानकारियों और शिक्षा पर आधारित होती है। जो शिक्षा एक समय बहुत उम्दा जान पड़ती है, वही समयांतर के बाद बेकार समझ ली जाती है। जानकारी और समय जैसे ही बदलती है, विचार भी बदल जाता है। कोई जानी प्यारा विचार, जानी दुश्मन विचार बन जाता है और कोई नफरती कीड़ा से मनरूबा और दिलरुबा। विचार परिवर्तन की दुनिया में तैरते रहते हैं और ऋतुओं की तरह परिवर्तनशील हो जाते हैं। विचारों की दुनिया में वफ़ा और बेवफ़ा का कोई झमेला भी नहीं है।
कल तक जो दिल के नजदीक रहते थे। वे आज चाईनीज माल हो गए। और हम जो कभी क्रिकेटटर हुआ करते थे, विचार से बॉलीबाल के खिलाड़ी बन गए हैं।
विचारों से उन्हें प्यार इतना,
कि वे दुश्मन बन बैठे हैं यार के।
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