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यूरोप का पुनर्जागरण European renaissance काल

 नेह अर्जुन इंदवार 

यूरोप का पुनर्जागरण काल विश्व क्लासिक बौद्धिक विकास और नए विचारों के उद्गम का टर्निंग प्वाइंट था ।

किसी भी समाज या सामाजिक समूहों के लिए ऐसी टर्निंग प्वाइंट युगांतरकारी होता है। दुनिया में मौलिक वैचारिक क्रांति ही सभ्यता के विकास की आधारशिला धूरी साबित होती रही है।

जो समाज वैचारिकी रूप से परिपक्व हो जाता है। वह अपनी बौद्धिकता के बल पर स्वयं विकसित हो जाता है।

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यूरोप में पुनर्जागरण काल के पूर्व के काल को (अंध) विश्वास का युग कहा गया है।  क्योंकि यूरोप में निरंकुश राजा और निरंकुश सामंती व्यवस्था थी, जिसमें आम जनता के वजूद का कोई महत्व नहीं था।  सत्ताधारी शक्तियों और धार्मिक पदाधिकारियों की बौद्धिकता और विचार ही अग्रगति मानी जाती थी। आम जनत को धर्म के नाम पर जो कुछ बताया जाता था,  उसे पत्थर पर लिखी अटल सत्य मानना पड़ता था। दिल से नहीं मानने वालों को भी बाहरी और  प्रगटी रूप में मानने का अनिवार्य अभिनय करना होता था। तर्क के लिए कोई गुँजाइश नहीं थी। सार्वजनिक वाद-विवाद और चर्चा का तो प्रदुर्भाव भी नहीं हुआ था। शासक का स्वार्थ और धर्म का हित में कोई अंतर नहीं था। शासक और धर्म एक दूसरे में गड्मगड़ थे।  शासक के हित की लड़ाई को धर्म की लड़ाई मान ली जाती थी।  धर्म की लड़ाई जिसे क्रूसेड कहा गया, में कृषक वर्ग की आहुतियां दी गईं ।

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लेकिन पुनर्जागरण काल का प्रदुर्भाव ने (अंध)-विश्वास युग को खत्म कर दिया। हस्तलिखित बाईबिल को पहले सिर्फ धर्माधिकारी ही पढ़ते थे। आम जनता को उसे छूने का भी अधिकार नहीं था। प्रोटेस्टैंट आंदोलन और  प्रिंटिग मशीन के विकास ने उसे हजारों में मुद्रित करने के राह बना दिए। आमलोग भी बाईबिल पढ़ने लगे। 14वीं सदी से ईटली प्रायद्वीप के नगर राष्ट्रो से शुरू हुई कला, वस्तुकला, साहित्य, गणित, संगीत, दर्शन, राजनीति, धर्म और विज्ञान में आए विकसित विचारों और दक्षता ने 17वीं सदी तक यूरोप का कायापलट ही कर दिया। शिक्षा, समता और मानवाधिकार के विचारों ने जनता को तर्कशक्ति से लैस कर दिया। वे धर्म के नाम पर बताए जाने वाले बातों पर ठोस रूप से बहस और तर्क करने लगे। नये विचारों ने राजशाही, सामंतवाद की जगह गणतंत्र, लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समता को प्राथमिकता दिया। 4 सौ सालों में पूरा यूरोप बदल गया और धर्म के नाम पर जनता को गाय बैल की तरह हाँकना बंद हो गया।

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विचारों में आए क्रांतिकारी बदलाव ने विकसित यूरोप का निर्माण किया। आज वहाँ धर्म व्यक्तिगत रूचि की बात रह गई है।

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लेकिन यहाँ भारत में यूरोप की तरह पुनर्जागरण काल का प्रदुर्भाव नहीं हुआ है। देश स्वाधीन हुआ। लेकिन जनता के व्यवहार और विचारों में स्वाधीनता नहीं आ पायी। भारत में वंचित वर्ग और समुदायों को योजनाबद्ध ढंग से मुकम्मल शिक्षा से वंचित किया जाता रहा। भारत में जनता वैचारिकी रूप से तर्कशील और स्वाधीन न होने पाए इसके लिए निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने के लिए बहुत बृहद् स्तर पर षड़यंत्र रचे जाते हैं।

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धर्म के नाम पर कुड़ा कर्कट विचारों को परंपरा, पर्व त्यौहार, कर्मकांड, धार्मिक कार्यकलापों के नाम पर परोसा जाता है। लेकिन विज्ञान और तर्क के माध्यम से धार्मिक कट्टरपंथी के विरोध को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप लगा कर वैचारिकी विकास को रोकने के षड़यंत्र रचे जाते हैं।

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धर्म के नाम पर हजारों कार्यक्रम करके लोगों की तार्किकता को कुंद किया जाता है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध सभी धर्म वाले जनता को अपनी मुट्ठी में रखने के लिए बहुत सारी योजनाएँ बनाते रहते हैं। धार्मिक समूहों और उनके धार्मिक संगठनों के मध्य निरंतर भयानक प्रतिस्पर्धा चलते रहते हैं।

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धार्मिक षड़यंत्रों को कामयाब बनाने के लिए खरबों रूपये  व्यय किए जाते हैं। लॉबिस्ट तैयार किए जाते हैं। कर्मचारी रखे जाते हैं। देश की बहुलतावादी विचारों को खत्म करने के लिए, छोटे सामाजिक समूहों के वजूद और उनकी अलग दार्शनिक स्वतंत्र मूल्यों और सांस्कृतिक थातियों को नष्ट करने के लिए अनेक षड़यंत्र रचे जाते हैं। संवैधानिक रूप से जिन नकरात्मक व्यवहार और मूल्यों को खत्म कर दिए गए हैं, उन्हें सामाजिक और धार्मिक मुखौटों के माध्यम से पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करने की पूरजोर कोशिशें अब भी जारी है।

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आज का भारत यूरोप या पश्चिम दुनिया से दो-तीन सौ साल पीछे हैं। भारत में मानसिक विकास और चिंतन का वर्तमान स्तर यूरोपीय पुनर्जागरण काल के सदृष्य है। वैचारिकी विकास हो रहा है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया और जनसंचार के साधनों पर कुछ खास वर्ग और समुदाय का कब्जा है। वहाँ वंचितों का प्रवेश अघोषित रूप से निषिध है। वैचारिकी विकास की धारा हाशिए की धारा बनी हुई है। मुख्य धारा के मीडिया के द्वारा आम जनता को मानसिक और भावनात्मक रूप से पिछड़े बनाने की विराट कोशिशें भी अनवरत जारी है। यूरोप में ऐसी नकरात्मक अमानवीय कोशिशें नहीं हुई थी।

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इसलिए भारत में धर्म के बारे लोगों को वैज्ञानिक ढंग से शिक्षित करने की जरूरत बहुत मह्त्वपूर्ण बन कर सामने आया है। दलित और आदिवासी समाज के मामले में यह सर्वोच्च जरूरी बन गया है। हिंदू, मुसलमान और ईसाई बने जनता को धर्म के नाम पर कट्टर धार्मिक बनाने के लिए लाखों कार्यक्रम किए  जाते हैं। आम दलित और आदिवासी उसे समझ नहीं पाता है। आदिवासी पर्वो, त्यौहारों के दिन किसी न किसी हिन्दू त्यौहार का होना, आदिवासी दिवस, पर्व त्यौहारों के दिन किसी न किसी बंद, हड़ताल, आंदोलन की घोषणा, चर्च चलित स्कूलों में आदिवासी ईसाई युवा वर्ग के लिए धार्मिक कक्षाओं, प्रशिक्षण के कार्यक्रम का आयोजन आदि यूँ ही नहीं होते हैं। इसके पीछे इन समुदायों के रीति रिवाजों, साँस्कृतिक और दार्शनिक मूल्यों से युवाओं को अलग थलग करने, उसे महत्वहीन बनाने, उनके सामाजिक प्रभाव को कम करने के प्रयास के रूप में देखना चाहिए।

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भारत में शोषित समुदाय और वर्ग कला, वस्तुकला, साहित्य, गणित, संगीत, दर्शन, राजनीति, धर्म और विज्ञान की मौलिक विचारों से भी वंचित है। वे इन विषयों के पीछे छिपे विशाल उर्जा से भी ठीक से परिचित नहीं है। स्वाधीन भारत में तमाम उपलब्ध अवसरों के बावजूद भी उनके पिछड़ेपन को इन विषयों के संदर्भ में भी समझने की जरुरत है। इक्का दुक्का व्यक्तिगत सफलता से पिछड़े समाजों की खुशी से बौराए भावनाओं को देखकर यही लगता है कि वे उर्जावान विषयों के ऊर्जा को सामूहिक रूप से व्यवहार करने के वैचारिकी क्षमताओं पर भी विचार करने में नाकाम हैं।

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इतिहास को पढ़ कर याद करने से बेहतर है कि आम जनता उसके आत्माओं से वार्ता करे। हर व्यक्ति स्वयं अध्ययनशील बने और खुद को एक स्वतंत्र  विचारवान व्यक्ति बनाएँ। हर व्यक्ति, साहित्य, दर्शन, इतिहास और वैज्ञानिक विकास का अध्ययन करे।  भारतीय पिछड़े समाजों में फिजिकल डिवलेपमेंट से अधिक क्रिटिकल इंटेक्चुवल डिवलेपमेंट की जरूरत अधिक है। यूरोपीय पुनर्जागरण की आत्मा से हर दलित, पिछड़ी और वंचित वर्ग को एक बार जरूर भेंट करना चाहिए। नेह।


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