तीन धर्मों का स्थापत्य एवं मूर्ति कला

डा. अंकित जयसवाल

 पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त पुराने वस्तुओं में मूर्तियाँ और चिन्हों को लेकर अक्सर धार्मिक विवाद देखने को मिलता है। आज हम इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्राचीन हिन्दू(ब्राह्मण धर्म), बौद्ध एवं जैन धर्म को पुरातत्व और कला की दृष्टि से उनकी प्राचीनता और इन तीनों धर्मों को स्थापत्य एवं मूर्ति कला के अंतर्गत इनकी आपसी समानता को देखेंगे।


भारत में हड़प्पा सभ्यता से ही पत्थरों पर बड़ी संरचना और उन पर उत्कृष्ट कला देखने को मिलती है। ऐसा साक्ष्य पहली बार धौलावीरा से मिला है(हड़प्पा सभ्यता के भी पहले के सैंकड़ों स्टोनएज़ वाले गुफा चित्र पर अलग से लेख है, जिसमें भीमबेटका और मिर्जापुर के चित्र बहुत महत्वपूर्ण हैं)। 


हड़प्पा सभ्यता से अनेक पशु, पक्षी, और मानव आकृतियां भी मिली हैं, सम्भवतः जिनका हड़प्पाई लोगों के धार्मिक-उपासना से संबंध था। उसके लगभग 2000 वर्षों के बाद मौर्यकाल से दुबारा पत्थर पर कला का विकसित रूप देखने को मिलता है,इन 2000 सालों में कलाकारों ने अपने कला को नित नए आयाम देने का कार्य किया होगा लेकिन उनकी कला पत्थर के जगह काठ(लकड़ी) पर शुरू हो गईं(कुछ पत्थरों पर भी मिल जाती हैं) इसलिये समय के साथ ये नष्ट हो गईं जिससे पुरातात्विक खुदाई में ये नहीं मिलीं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण पाटलिपुत्र के बुलंदीबाग और रामपुर नाम के जगहों पर देखने को मिलते हैं। 


बुलंदीबाग से लकड़ी के बने रथ का पहिया मिला है जिसका रिम लोहे का है। 1912 में D V स्पूनर ने कुम्रहार(पटना) की खुदाई से शतरंज के बोर्ड के आधार पर व्यवस्थित 72 स्तम्भों को खोजा जो चुनार के पत्थरों से बनाये गए थे और उनकी सतह पर भी अशोक के स्तम्भलेखों जैसा चमक और पालिश थी। स्तम्भों की इस संरचना को प्राचीन साहित्य में वर्णित चन्द्रगुप्त_मौर्य का राजमहल माना जाता है, जिसके छत को लकड़ी के ऊपर ईंट और चुने का प्लास्टर से बनाया गया,फर्श और सीढ़ियां लकड़ी के बने थे। 


इसके बाद अशोक के पत्थर के बने स्तम्भों का समय आता है जिस पर बनी मूर्तियाँ उसके धम्म सन्देश का प्रचार करतीं हैं। अशोक के स्तम्भों पर कमल या घण्टा, हँस,बैल,हाथी,घोड़ा,सिंह,चक्र आदि मूर्तियाँ बनाई गईं हैं जिनका सीधा संबंध बौद्ध मान्यताओं से है लेकिन इन प्रतीकों का इनसे कहीं व्यापक और गहरा सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र है क्योंकि अशोक कई मामलों में बुद्ध से भी एक कदम आगे निकल जाता है, जैसे बुद्ध का कथन है; "राजनीतिक हिंसा हिंसा नहीं होती", लेकिन अशोक के अनुसार "राजनीतिक हिंसा भी धर्म विरुद्ध है"। 


एक बात और कि पाली किसी भी शिलालेख की भाषा नहीं है, न तो अशोक की और न ही किसी और के शिलालेख में ही। प्राकृत के बाद संस्कृत और दक्षिण में तमिल के साथ कन्नड़ और तेलगू आदि भाषाएँ शिलालेखों में मिलती हैं।


सबसे महत्वपूर्ण बात है कि बौद्ध होते हुए भी अशोक के धम्म में बौद्ध धर्म के चार_आर्य_सत्य और अष्टांगिक_मार्ग की बात नहीं कि गयी है जबकि निर्वाण के बदले स्वर्ग की बात की गई है। इसीलिए कुछ विद्वानों ने अशोक के धम्म को सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति और उसका एक नया अविष्कार माना है। कुछ इसी प्रकार हम अकबर को भी देख सकते हैं; सुलह-कुल नीति के अंतर्गत। 


मतलब साफ है कि तत्कालीन दोनों शासकों ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और राज्य में सामान्य स्थिति बनाये रखने के लिए धर्म की जगह एक सही आचरण वाले नीति का प्रचार किया जिसमें उनका व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता तो था ही, साथ ही उनके बहुसंख्यक प्रजा का धार्मिक उदार बातें शामिल थीं। बाकी इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध था। ध्यान देने लायक बात है कि अशोक के स्तम्भ प्रतीकों की आकृतियां हिन्दू और जैन धर्म की परम्पराओं में भी हैं। मौर्यकाल से ही चट्टानों को काटकर स्थापत्य-गुफा निर्माण का युग प्रारम्भ होता है जो कि उसके पहले काष्ठ-स्थापत्यकला(लकड़ियों से बनी आवासीय संरचनाएँ) के रूप में विद्यमान थीं। 


स्तूप  बुद्धकाल के पहले से प्रचलित थे क्योंकि पाली ग्रंथ महापरिनिर्वाणसूत्र में यह उल्लेख मिलता है कि बुद्ध के पहले भी चक्रवर्ती सम्राटों के अवशेषों पर स्तूप बनाये जाते थे इसलिये प्रारम्भिक दौर में स्तूपों को बौद्ध परम्परा का अनिवार्य तत्व नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में भी स्तूप शब्द मिट्टी के ढेर(थुहा बनाकर पूजने से)से सम्बंधित है, और अगर बात जैन धर्म के स्तुप की करें तो पहली सदी से ही मथुरा के कंकाली टीला से जैन स्तूप मिलते हैं लेकिन प्रमुख रूप से स्तूप बौद्ध कला के अभिन्न हिस्सा रहे हैं।


 बौद्ध धर्म ने स्तूपों को अपनाकर उसे उपासना का केंद्र बनाया और अशोक ने स्तूप निर्माण की प्रथा को लोकप्रिय बनाया। मौर्यकाल में पहली बार एक समृद्धशाली लोककथाओं का भी अस्तित्व पुरातात्विक खुदाई में सामने आता है जब पटना ,मथुरा और अन्य स्थानों से पत्थरों की तरासी गई अनेक विशालकाय मानवीय आकृतियों पाई गईं, जिनको यक्ष और यक्षी के नाम से जाना जाता है(इसके पहले के भी मिट्टी की बहुत सी मूर्तियाँ मिली हैं लेकिन उनमें वैसी सुंदरता नहीं है)।


ये यक्ष-यक्षियाँ, नाग-नागी हमारे लोकधर्म का प्रतिनिधित्व करतें हैं जिनकी उपासना हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में आज भी प्रचलित हैं। परखम से मिले यक्ष प्रतिमा( पहली/दूसरी सदी ई0पू0) , लोहानीपुर से मिला नग्न यक्ष प्रतिमा और दीदारगंज से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा इनमें प्रमुख हैं। परखम(मथुरा) से मिले यक्ष प्रतिमा पर लेख मिलता है जिसके आधार पर इसे मणिभद्र यक्ष नाम दिया गया। विभिन्न अभिलेखों और ग्रन्थों में इनका उल्लेख व्यापारियों और यात्रियों के रक्षक देवता के रूप में हुआ है। परखम गाँव में आज भी जखईया_मेला(यक्ष मेला) माघ महीने में लगता है जहाँ मंदिर में इस मूल यक्ष प्रतिमा की जगह एक नए वैकल्पिक कामचलाऊ प्रतिमा को रखा गया है। 


पुरातात्विक साक्ष्यों में मौर्यकाल से शुरू हुयी बुद्ध की पूजा उनके प्रतीक चिन्हों से होती आ रही है लेकिन

भारतीय उपमहाद्वीप के पूजा-आराधना के प्राचीनतम देवस्थान या मंदिर, खाली जगह अथवा वृक्ष को घेरकर बनाये गए स्थान थे, जो आज भी लोकसंस्कृति का हिस्सा हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीनतम देवस्थान यक्ष-यक्षी और नाग-नागी की स्थापना वाले मंदिर ही हैं इसमें अब कोई विवाद नहीं।


 आनंद कुमारस्वामी ने काफी प्रभावशाली ढंग से यह सिद्ध किया है कि भक्ति की धारा जिससे आज तमाम भारतीय धर्म जाने जाते हैं इसका स्वभाविक स्रोत यही यक्ष-यक्षी, नाग-नागी और मातृदेवीयों की भक्तिपूर्ण उपासना रही है जो कि भारतीय जनमानस में पाषाणकाल से ही चली आ रही है(इसके भरपूर पुरातात्विक सबूत मौजूद हैं)। इन्होंने यह भी तर्क दिया कि यक्ष-यक्षियों की उपासना में प्रारंभ से ही मंदिर पूजा और उपासना पद्धति का विकास सामान्य जनता में हो चुका था।


 यक्षों की पूजा, प्रजनन क्षमता में वृद्धि, वृक्ष, वन,जल,और एकांत से जुड़ी हैं(आज भी हर गाँव का अपना एक ग्रामदेवता होता है जो इसी से संबंधित है, और हिन्दू धर्म में ही ये शामिल कर ली गईं हैं क्योंकि हिन्दू-ब्राह्मण धर्म मे आत्मसात करने की प्रकिया बेहद सरल है)। हिन्दू ,बौद्ध और जैन ग्रन्थों में अधिकाँश यक्ष और यक्षी दानवी और डराने वाले चरित्रों के रूप में दिखलाए गए हैं जो कि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि इनका अस्तित्व इन तीनों प्रभावशाली धर्मों के बहुत पहले जनमानस में बहुत लोकप्रिय था। 


ये यक्षी की प्रतिमाएं ही हैं जिन्हें शालभंजिका के नाम से जाना जाता है, जो सबसे अधिक प्राचीन भरहुत और साँची बौद्ध कला से होते हुए जैन और हिन्दू मूर्ति-स्थापत्य कला में अपना स्थान बनाती हैं। बुद्ध की माया देवी का अंकन भी एक यक्षी या शालभंजिका जैसा ही दिखता है(बुद्ध की माँ माया देवी किस प्राचीन मातृदेवी की विशेषताओं को अपनाकर बनाई गईं इसपे अलग से लम्बा लेख आप मेरा प्रोफाईल खोलके पढ़ सकते हैं)।


 बाद में प्रभुत्वशाली धार्मिक परम्पराओं में इनको शामिल कर इनके अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया गया। इन्हीं यक्ष-यक्षीयों के मूर्तियों से प्रेरणा लेकर लगभग पहली सदी ई0पू0 से मथुरा_एवं_गांधार_कला के अंतर्गत पहली बार बुद्ध मूर्तियों और ब्राह्मण एवं जैन मूर्तियों का बनना बड़े स्तर पर शुरू हुआ(इसके पहले इनका कोई आर्कियोलॉजिकल सबूत नहीं मिलते)। इन यक्षियों की मूर्तियों के देखा-देखी ही हिन्दू धर्म में लक्ष्मी, बौद्ध धर्म मे तारा और जैन धर्म मे चक्रेश्वरी देवी की अवधारणा को विकसित किया गया, ऐसी कई देवियों के पीछे यूनानी और पारसी देवियों का भी प्रभाव देखा जा सकता है जैसे पहली सदी के कुछ पहले पारसी नाना देवी का देवी दुर्गा के रूप में सम्मिलन। यूरोपीय विद्वानों के गांधार कला के विपरीत भारतीय प्राचीन कला मर्मज्ञ वासुदेव शरण अग्रवाल ने बहुत ही तार्किक ढंग से यह सिद्ध किया है कि सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण मथुरा कला के अंतर्गत किया गया।


बाकी इन प्रभुत्वशाली धर्मों ने जो लोकपरम्परा की मूर्तियों का आत्मसातीकरण किया है उसे मैं "हड़पने" जैसा शब्द नहीं दूँगा जैसा कि आजकल धार्मिक विद्वेष के कारण खुद को प्राचीन साबित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।


सच्चाई इसमें भी है कि लोकपरम्परा की भक्तिधारा और विदेशी कला से प्रभावित होकर ही प्रभुत्वशाली धर्मों में बुद्ध मूर्तियाँ सबसे पहले और अधिक मात्रा में बनीं क्योंकि तत्कालीन समय में बौद्ध धर्म का प्रसार और लोकप्रियता अपने चरम पर था। 

बौद्ध धर्म में इसी मूर्तियों और जटिल-पूजा विधानों ने आगे चलकर बौद्ध धर्म को बुद्ध के विचारों से दूर किया, जो भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म के पतन के कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण है।


कभी लॉक डाउन के फुर्सत में लिखा था आप भी फुर्सत निकाल के पढ़ सकते हैं। साभार -फेसबुक। 

बदलता समाज और कमजोर होते रिश्ते

नेह इंदवार


 वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के भूगर्भ में निरंतर हलचल चलते रहती है। हर रोज कई दर्जन बहुत कम शक्ति के भूकंप आते रहते हैं। महीनों में कभी कभार धरती हिलती हैं और कभी-कभार दशकों या सदियों में बड़े भूकंप आते हैं और पुराने चीजों को तहस-नहस कर डालते हैं।

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इंसानी समाज में  भी कमोबेश ऐसा ही होता है। समाज के गर्भ में रोज हजारों प्रकार की हलचलें होती रहती हैं। इसका असर कहीं होता है तो कहीं बिल्कुल नहीं।

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देश की आजादी के पूर्व सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर समाज में बहुत अधिक हलचल नहीं हुआ करती थीं। ग्रामीण समाज अपने क्षेत्रीय अस्मिता के साथ शांतिमय कृषि आधारित जीवन जीता था। समाज के एकीकरण में या तो समुदाय या जाति या धर्म केन्द्रीय तत्व हुआ करता था। 

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लेकिन भारत की आजादी के बाद हलचलों की बाढ़ ही आ गईं। नयी औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण, सार्वभौमिक शिक्षा, सरकारी रोजगार, यातायात तथा अन्य प्रसारवादी संसाधनों का विस्तार से, हलचलहीन बंद समाज धीरे-धीरे  खुलने लगे और उसके साथ नये विचार भी समाज में प्रवेश करने लगे। 

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कई दशक पूर्व तक समाज परिवार केन्द्रित हुआ करता था, हर कार्य में परिवार और समाज ही केन्द्रीय भूमिका निभाता था। शिक्षा, रोजगार, सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यकलाप, शादी-विवाह,खुशियाँ गम, मृत्यु आदि शु्द्ध पारिवारिक और सामाजिक कार्यकलाप  हुआ करता था। 

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लेकिन देश की आजादी के बाद राजनैतिक और सामाजिक जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हुए। शिक्षा,रोजगार, संपत्ति का बँटवारा,लव मैरिज-कोर्ट मैरिज, बीमार व्यक्ति की तामीरदारी सरकारी अस्पतालों और एश्योरेंस के माध्यम से सरकारी और गैर-सामाजिक हो गए। यहाँ तक कि मृत्यु का क्रियाक्रम भी अब तो बाजार की एजेंसियाँ करने लगी हैं। 

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शहरों में आज ऐसा कोई समाज नहीं रहता है, जो गाँवों में समाज बनने के तत्वों के  संयोजन से बना हुआ होता है। शहरों में कमोबेश सुसंगठित समाज नहीं होता है, बल्कि सुविधाओं के जाल में बुना हुआ जनसंख्या का झूँड़ होता है। शहरी समाज सुविधाओं का उपभोग करने वाला एक ऐसा समूह होता है, जिसमें Sense of belonging का सर्वथा अभाव होता है। शहर मनोविज्ञानिक रूप से एक खंडहर होता है और तमाम शहरी सुख, सुविधा पैसों पर आधारित होते हैं।  

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शहरों में बसे आदिवासी और दलित समाज का आधार या तो धर्म है या जान पहचान के क्षेत्रीय-भाषाई आधार। समुदाय, जाति, संस्कृति, भाषा आदि आज द्वितीय श्रेणी के  ऐसे तत्व बन गए हैं, जो कभी-कभार  सामाजिक गुम्फन तत्व (stickiness) के काम आते हैं। 

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दूसरे कई समाज के मामले पर, वित्तीय स्थिति और कार्य वर्ग (एक ही तरह के कार्य करने वाले लोगों का समूह) आदि मुख्य समाज संगठक तत्व  बन गए  हैं।  कहने का मतलब है कि गाँव में युगों से जहाँ एक होमोजेनियस समाज का वजूद हुआ  करता था, वैसा समाज शहरों में नहीं है। 

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अंग्रेजों के समय और उसके बाद देश के आजादी के कुछ समय तक सरकार सिर्फ सार्वजनिक मुद्दों पर कार्य करने वाली एजेंसी हुआ करती थी। उसे गाँव समाज से कमोबेश कुछ लेना देना नहीं हुआ करता था।  लेकिन शनै-शनै सरकारी कानून के हाथ बेतहाशा लम्बे होने लगे और यह समाज और परिवार की सीमा को तोड़ कर असंगठित समाजों के सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों को भी प्रभावित करने लगा है। याद रखें जहाँ कहीं परिवार और समाज समाप्त होता है, वहीं से सरकारी नियम कायदे शुरू हो जाते हैं। 

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आजादी के कुछ दशक बाद बने कानूनों ने समाज और परिवार की भूमिका में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया और वह हर नागरिक के लिए क्या कर्तव्य और अधिकार होने चाहिए, उस पर वह बेरहम बॉस की भूमिका में आ गया है।  सामाजिक और पारिवारिक भूमिका को खत्म करके अपने लक्ष्योंं को कानून के डंडे पर कार्यन्वित करना शुरू कर दिया। आज बच्चे की शिक्षा, बच्चों की शादी की आयु, संपत्ति का बँटवारा, उसका रजिस्ट्रेशन, आय-व्यय और कर देयता आदि मामले में आप कानून का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। भले ही परिवार और समाज का सोच कितना भी अलग क्यों न हो। 

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आज का भारतीय इंसान एक पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति से अधिक देश के कानूनों से बंधा एक इंसानी नागरिक है। पारिवार और समाज और उसके तमाम भूमिकाओं को सीमांकित करते हुए कानून हर व्यक्ति के अधिकार को सामाजिक और पारिवारिक से बदल कर व्यक्तिगत अधिकार में बदल दिया है। नये-नये कानूनों के द्वारा इसे और भी मजबूत किया जाएगा, क्योंकि परिवार और समाज की प्रभावी भूमिका नगण्य होने लगी है। 

आज एक वयस्क व्यक्ति अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए, अपने सुख और स्वार्थ के खातिर परिवार और सामाज की उपेक्षा कर सकता है। यदि व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वलंबित हो तो उसे परिवार और समाज की कोई परवाह नहीं हो सकती है। शहरों में हर परिवार, दुकानदार या कोई भी व्यक्ति अपने घर के चार दीवारी के बाहर सरकारी कानूनों से बंधा हुआ होता है। उसकी सुरक्षा, उनकी स्वतंत्रता की जिम्मेदारी परिवार नहीं उठाता है, बल्कि घर के बाहर वह सरकारी कार्य-व्यापार (affairs) कानून और व्यवस्था का अंग हो जाता है। 

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आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक-आत्मविश्वास उस व्यक्ति से अलग होता है, जो खुद आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होता है। लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति बौद्धिक रूप से आत्मनिर्भर न हो तो वह क्या कर बैठेगा, इसका अंदाजा किसी को भी नहीं होता है। व्यक्तिगत आबाध आजादी भी कभी-कभी व्यक्ति और समाज  के लिए जी का जंजाल बन जाता है।  

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जो समाज खुद विभिन्न आधारों पर छिन्न-भिन्न रहता है, उसके सदस्य उतने ही परालंबित होते हैं। व्यक्ति को दिशा निर्देश देने में ऐसे समाज अक्षम होते हैं। सांस्कृतिक रूप से ऐसे समाज का एकीकरण तत्व कमजोर होता है और उसके ऐसे सदस्य जो बौद्धिक रूप से चेतनाशील नहीं होते हैं,वे व्यक्तिगत मामलों में अपने सामाजिक और पारिवारिक नियमों से अधिक सरकारी नियमों के नजदीक होते हैं। सरकारी नियम कायदे दैनिक जीवन में निष्क्रिय होते हैं, और वे व्यक्ति के सर्वोच्च कल्याण के लिए उचित और नैतिक सलाह देने में सर्वथा असमर्थ होते हैं।  लेकिन कानून  समाज के ऐसे सदस्य के जीवन में सक्रिय रूप से भी अधिक नजदीक होते हैं। जो अपनी कानूनी प्रक्रिया से सुरक्षा देने से अधिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से अधिक परिशानी दे सकते हैं और उत्पीड़न कर सकते हैं। कानून यहां दुधारी तलवार बन जाती है। सुरक्षा भी देती है लेकिन घायल भी करती है।  

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देश में व्यक्ति, आज तक, न तो पूरी तरह सरकारी नागरिक बन सका है और न ही वह पूरी तरह से गैर-पारिवारिक और गैर-सामाजिक बन सका है। भारत में तमाम समाज एक संधि काल से गुजर रहे हैं। तमाम समाज न तो पूर्ण शिक्षित, आधुनिक प्रगतिशील विचारों से सुसज्जित और आर्थिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र बन सका है और न ही दूसरी ओर सरकार नागिरक का हर पल ख्याल रखने वाला सुख-दुख का पक्का अभिभावक बन पाया है। यहाँ व्यक्तिगत आजादी को यूरोपीय आजाद समाज तक पहुँचने में कम से और दो सौ साल लगेंगे। भारतीय उत्तर आधुनिक काल यूरोप के जागरण काल से आगे नहीं बढ़ पाया है। 

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व्यक्तिगत ख्वाहिशें, सुख, स्वार्थ आदि कुछ ऐसे विषय हैं जो निरंतर बदलते रहते हैं। आयु विशेष में वह सिर चढ़ कर बोलता है।   वहीं पारिवारिक ख्वाहिशें, सुख, दुख, स्वार्थ, कल्याण, प्रगतिशीलता के विषय रोज और निरंतर बदलने वाले विषय नहीं होते हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताएँ हमेशा अलग-अलग होते हैं। व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सुख के लिए समाज को बदलने का आदेश नहीं दे सकता है और न ही पारिवार अन्य दूसरे सदस्यों की कीमत पर, किसी एक सदस्य को मनमानी करने की छूट दे सकती है। प्राचीन काल में विद्रोही सदस्य अपने विद्रोह से समाज और परिवार को तिलांजली दे कर साधु, सैनिक आदि बन जाते थे, क्योंकि अपने समाज का विद्रोही दूसरे समाज का सक्रिय खुशमिज़ाज सदस्य नहीं बन पाते थे। हर समाज में दूसरे समाज के सदस्यों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के अपने कारण विद्यामान हैं और उन कारणों को रातों रात किसी दो चार सदस्यों के सुख, स्वार्थ और कल्याण के नाम बदलते नहीं देखा गया है।  विद्रोह मानवीय स्वभाव है और इसे समाज का मुख्य धारा नहीं माना जाता है। इसे हमेशा अपवाद की श्रेणी में रखा गया है।    

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आजादी के बाद समाज का हर तबका का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है। बाजारवाद ने व्यक्तिवाद को हवा दिया। देश में जनसंख्या अधिक है और संसाधन कम ऐसे में व्यक्तिवाद के मनोविज्ञान को काम में लगा कर तेजी से बदलते महौल में संसाधनों को हड़पने का भी एक नया लेकिन गैर कानूनी  आंदोलन भी शुरू हो गया। पूँजीवाद की दुनिया में इसे क्रोनी कैपिटलइज्म कहा गया है। जबकि सामाजिक मामले में इसे ठगी, चालाकी और भ्रमित कार्य कहा गया है।  यह आंदोलन शुद्ध व्यक्तिवाद के आधार पर काम करता है। लेकिन जहाँ कहीं परिवार और समाज की सोच, विचारधारा, जागरूकता, चेतनाशीलता अपने शबाब पर होता है, वहाँ यह औंधेमुँह गिरता है। जर, जोरू और  जमीन की लूट कोई नयी बात नहीं है। इसके तह में जाने के लिए इतिहास पढ़ने की जरूरत भी नहीं है।

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आज का आदिवासी समाज और पचास वर्ष पूर्व के आदिवासी समाज में भारी अंतर है।  शिक्षा, आरक्षण, आय, सम्पत्ति, सम्पन्नता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नयी सोच के आंदोलन  ने एक नये आदिवासी समाज का गठन किया है।  सुख, खुशी और स्वार्थ के सारी इच्छाओं को पूर्ण करने की ख्वाहिशें भी समाज में भीतर-भीतर,  उसी तरह से मचलने लगी हैं,  जैसे पृथ्वी के अंदरूनी क्षेत्रों में ज्वलामुखी के माध्यम से बाहर आने के लिए भूगर्भीय शक्तियाँ मचाया करती हैं। लेकिन यह कम शक्तिशाली होने के कारण अपने सीमित एरिया को छोड़कर और कहीं प्रभाव नहीं डालती है।

लेकिन समाज में कब कोई बड़ी भूकंप आ जाए, इसे कोई नहीं जानता है। लेकिन यह तय है कि जब बड़े भूकंप आते हैं तो वह अनेक पुराने इमारतों को गिरा कर तहस नहस कर डालते हैं। लेकिन जापान में अब भूकंपरोधी इमारतें ही बनती है। वहाँ दूसरे गैर-भूकंपरोधी इमारतों के लिए कोई जगह नहीं होती है।

निरंग पझरा के लेख

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