पश्चिम बंगाल सरकार ने 12 जुलाई, 2024 तक भूमि एवं भूमि सुधार विभाग के 384 अधिकारियों और 15 जुलाई तक 72 और राजस्व अधिकारियों के तबादले का आदेश दिया है। इसके अलावा भी सरकार ने बुधवार को जारी एक अधिसूचना में सरकार ने 34 अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे के आरोपों पर अपनी नाराजगी व्यक्त करने के कुछ सप्ताह बाद यह बड़ा फेरबदल किया गया है। हाल के दिनों में, उनके कार्यालय को ऐसी शिकायतें मिली थीं, जिनमें से कुछ का दावा है कि भूमि के चरित्र में भी बदलाव किया गया है।
मुख्यमंत्री की सख्त टिप्पणी के बाद, कोलकाता में सरकारी विभागों ने अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया था, जिसमें कई दर्जन फुटपाथों से अवैध कब्जों को हटाया गया। मुख्यमंत्री ने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की वकालत की थी और प्रशासन को ‘ऐसी जमीन को मुक्त कराने’ के लिए तत्काल कदम उठाने का निर्देश दिया था। उन्होंने दावा किया था कि कोलकाता और उसके आस-पास के इलाकों में जमीन पर अतिक्रमण की समस्या बनी हुई है। राज्य सचिवालय में विभागीय सचिवों, जिलाधिकारियों, महापौरों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ हुई बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘कुछ लोग बाहर से आकर यहां रहने लगे हैं और कुछ दिनों बाद इलाके में छोटी-छोटी दुकानें भी लग गई हैं। जनप्रतिनिधि चुप हैं। पुलिस भी कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।’
पश्चिम बंगाल में आदिवासी (एसटी) की भूमि को पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955, अनुसूचित क्षेत्र (विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह) भूमि हस्तांतरण विनियमन, 1956 आदि अधिनियमों और नियमों के तहत गैर-एसटी व्यक्तियों को बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। इन अधिनियम में उचित प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध लगाने वाले विशिष्ट प्रावधान शामिल हैं। इन विनियमनों का उद्देश्य आदिवासी भूमि और अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा करना है, बिना उचित प्रक्रिया और अनुमति के आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगाना। ये कानूनी ढाँचे आदिवासी समुदायों के हितों और भूमि अधिकारों की रक्षा करने, यह सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं कि उनकी भूमि समुदाय के भीतर बनी रहे और गैर-आदिवासी संस्थाओं द्वारा शोषण को रोका जाए।
लेकिन पश्चिम बंगाल में विशेष कर सिलीगुड़ी महकमा, अलिपुरद्वार और जलपाईगुड़ी जिलों में भारी संख्या में आदिवासी जमीनों को सरकारी अधिकारियों की मिली भगत से स्थानांतरण किए गए हैं। इस बारे भी मुख्यमंत्री ने कई बार सार्वजनिक रूप से बयान जारी किया था, लेकिन उक्त मामलों में इतने बड़े स्तर पर कोई कार्रवाई कभी नहीं की गई। अलिपुरद्वार के प्रसिद्ध जंगलों के पास विकसित हो रहे जगहों में आदिवासियों की जमीन को कानूनी रूप से कब्जे करके बाहरी व्यक्तियों द्वारा बड़ी संख्या में सैलानी होटल वगैरह बनाए जा रहे हैं। अधिकतर जमीन को 99 वर्ष के लीज के नाम पर बाहरी व्यक्तियों को हस्तांतरित किए जा रहे हैं। इसके अलावा भी कालचीनी, मदारीहाट, माल, नागराकाटा आदि जगहों में बड़े पैमाने पर आदिवासी जमीन हस्तांतरित किए जा रहे हैं। सिलीगुड़ी के चम्पामरी तो कभी आदिवासी गाँव ही हुआ करता था। लेकिन आज वहाँ गिनती के आदिवासी रह गए हैं।
कई आदिवासी जमीन को एसटी सर्टिफिकेट के नाम पर दूसरे समुदाय के लोग गरीब और जरूरतमंद आदिवासियों से खरीद कर फिर उसे ऊंचे दाम पर दूसरे समुदाय को बेच देते हैं। अनेक बिल्डिंग, दुकानें, छोटे कारोबार आदि आदिवासी भूमि पर किसी आदिवासी के नाम पर जमीन हासिल करके बनाया गया है। जाँच करने पर ऐसी जमीन आदिवासी के नाम पर दिखाया जाता है। लेकिन उस पर कब्जा किसी गैर आदिवासी का होता है और गैर आदिवासी ही उस जमीन से आर्थिक लाभ लेता है। ऐसे मामलों पर भी सरकार को नये नियम बना कर कार्रवाई करनी चाहिए।
आदिवासी जमीन के गैर कानूनी हस्तांतरण पर आदिवासी समाज की चुप्पी भी इसके लिए जिम्मेदार है। पीड़ित व्यक्ति आदिवासी संगठनों से मदद की अपेक्षा करते हैं, लेकिन आरोप लगाए गए हैं कि कई आदिवासी संगठन के पदाधिकारी खुद जमीन दलाली में शामिल पाए गए हैं। ऐसे मामलों में यह जरूरी है कि राज्य मशीनरी के ऊँचे स्थानों में जमीन संबंधी शिकायतें दर्ज की जाएँ और इसे सार्वजनिक भी किया जाए। यदि स्थानीय राज्य मशीनरी या आदिवासी संगठन जमीन के अवैध कब्जे या स्थानांतरण पर कोई कार्रवाई नहीं करती है तो ऐसे मामले को The National Commission for Scheduled Tribes, 6th Floor, B-Wing, Loknayak Bhavan, Khan Market, New Delhi - 110003, Toll Free No: 1800-11-0747, Email: ncst@nic.in में भी रेफर किए जा सकते है। आदिवासी समाज से संबंधी शिकायतों पर कोर्ट के अलावा देश में सर्वोच्च रूप से करने के लिए नेशनल कमिशन फॉर शिड्यूल्ड ट्राईब एक उचित मंच है।
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