चेंगमारी उच्च विद्यालय का संस्थापक बुधु भगत


चेंगमारी (नागराकाटा) उच्च विद्यालय के संस्थापक बुधु भगत के बारे उनके पोता धीरज भगत का एक संस्मरण।

यूँ तो समाज के लिए अमूल्य योगदान देने वाले महापुरुषों की जीवनी लिख पाना बहुत कठिन कार्य होता है। छोटा पोता होने के कारण मैं तब बहुत छोटा था और बातों को मैं समझ नहीं पाता था।  फिर भी मुझे मेरे दादाजी स्वर्गीय बुधु भगत उरांव की कुछ बातें अब भी याद है। परिवार के बड़ों से सुनी बातों के अनुसार तथा अपनी याददाश्त के आधार पर, हिसरी  चटवाग, पलामू से चेंगमारी चाय बागान, डुवार्स तक का उनका सफर कुछ ऐसा रहा था। 

उनका संक्षिप्त परिचय -

नाम - बुधु भगत उरांव। पिता- स्वर्गीय साधो भगत (उराँव), जन्म - 2 अक्टूबर 1898 

जन्म स्थान- हिसरी चटवाग चंदवा, महकमा पलामू जिला रांची (तत्कालीन बिहार)  (वर्तमान- झारखंड), स्वर्गवास-  7 नवंबर 1987 चेंगमारी बागान, नागराकाटा, डुवार्स। 

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान चाय की खेती के लिए झारखंड छत्तीसगढ़ उड़ीसा आदि जगहों से  आदिवासियों को मजदूरी करने के लिए असम सहित पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में भी लाए जाते थे। बीसवीं सदी के कई दशकों तक डुवार्स इलाके को भूटान या "भोटांग रइज" के नाम से ही हमारे पुरखे जानते थे। मजदूरों को टोली बना कर लाया जाता था। तब मेरे दादाजी की उम्र 12-13 वर्ष थी। मेरी दादी जी भी उन्हीं मजदूरों की टोली में छुपकर चेंगमारी चाय बागान आए थे। क्योंकि छोटे बच्चों को चाय बागान में नहीं लाया जाता था। दादाजी कहते थे, उन दिनों मजदूरीों को बहुत कठिन कार्य करने पड़ते थे। उन्हें चाय बागान से कोई सुविधा प्राप्त नहीं होती थी और चारों ओर फैले भीषण जंगल और झाड़ियों के कारण मच्छर काटने से  बुखार और अन्य बीमारी जल्दी पकड़ लेता था, लेकिन इलाज की कोई उचित व्यवस्था नहीं होती थी। न बागान घर देता था न अन्य कोई सुविधा। तब दादाजी की उम्र कम होने के कारण उन्हें एक बंगाली बाबू के यहां नौकर के रूप में काम करने के लिए रखा गया। उनके काम की लगन और निष्ठा को देखते हुए धीरे-धीरे मैनेजर साहब उनकी पदोन्नति करते गए।  प्रथम  उन्हें चाय बागान के दफ्तरी का काम मिला।  फिर वे चपरासी बने एवं 1938 में उन्हें बागान का मुंशी बना दिया  गया था।  

मुंशी होने के कारण उनका संपर्क मैनेजर से बढ़ता गया। मुंशी के रूप में कुलियों (मजदूरों) के साथ भी उनका प्रगाढ़ संबंध होता था। उनकी दशा बहुत सोचनीय हुआ करती थी।  दादाजी जी को चाय बागान में कार्यरत कुलियों की सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को देख कर बहुत दुख होता था। वे मन ही मन रोया करते थे कि हमारे समाज को कैसे शिक्षित करूँ,  ताकि उनके बच्चे भी चाय बना के बाबू या सरकारी मुलाजिम बन सकें। 

एक बात दादाजी हमेशा कहा करते थे कि आपके पैर में अगर कीचड़ लगा हो तो उसे कीचड़ पानी से न धोएँ, अपितु साफ पानी से धोंएँ। कहने का तात्पर्य है कि अशिक्षा के अंधकार को शिक्षा की ज्योति जला कर ही दूर की जा सकती है। इसी सोच के साथ चाय बागान के मजदूरों के बच्चों को शिक्षा देने के इरादे से उन्होंने मैनेजर महोदय से 1939 ईस्वी में 1 प्राथमिक विद्यालय खुलवाने का आग्रह किया और उसी वर्ष 1939 में  8 कमरे का एक पक्का मकान बनवाया गया। विद्यालय की स्थापना की गई।  चाय बागान के तत्कालीन मैनेजर श्रीमान ए. वी. बिशप ने श्री राम आशीष झा को प्रधानाध्यापक नियुक्त किया। मेरे लिए यह एक गर्व की बात है कि आज मैं  (उनका पोता) उसी आठ कमरे वाले प्राथमिक विद्यालय का एक शिक्षक हूँ।  

प्राथमिक विद्यालय की स्थापना के कुछ वर्ष बाद दादाजी ने फिर से मैनेजर के सहयोग से जूनियर हाई स्कूल के लिए चाय बागान मालिक निडिम टी कंपनी से अनुरोध किया और चाय बागान के 11.33 एकड़ जमीन का सर्वेक्षण किया गया और सर्वेक्षित जमीन पर जुनियर हाईस्कूल का सपना भी साकार हुआ।  

पश्चिम बंगाल सरकार के शिक्षा विभाग के डायरेक्टर से अनुरोध करके मिडिल स्कूल की मंजूरी भी ली गई। मिडिल स्कूल के लिए विद्यालय भवन बनकर तैयार हुआ और किसी चक्रवर्ती महाशय को प्रधान अध्यापक की नियुक्ति मिली। 

विद्यालय की प्रथम मैनेजिंग कमेटी कुछ इस प्रकार थी

 प्रेसिडेंट -- श्री ए. वी. बिशप 

उप प्रेसिडेंट --  श्री बुधु भगत 

सेक्रेटरी -- श्री बाबुराम भगत।

सह सेक्रेटरी - श्री रवि राय चौधरी

सदस्य -

श्री एस. सी बोस 

श्री चंद्रभूषण ठाकुर 

श्री महावीर भगत

श्री बलिराम भगत

श्री बरियार हाँसदा

 सन 1952 में डब्लू. आर. राबिन्सन जब बागान के नए मैनेजर बनकर आए तब उन्हें स्कूल मैनेजिंग कमेटी का प्रेसिडेंट बनाया गया। शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में दादाजी के प्रयास लगातार जारी रहा। इसी के साथ-साथ आदिवासी समाज में समाज सेवक के रूप में उनकी पहचान बढ़ने लगी। पूरे डुवार्स तराई के आदिवासी युवा युवतियाँ चेंगमारी  चाय बागान में मिडिल हाई स्कूल तक पढ़ाई करके शिक्षित होने लगे। उन दिनों मिडिल स्कूल की शिक्षा का भी बहुत महत्व था और मिडिल स्कूल पास लोगों की समाज में अच्छी खासी इज्ज़त की जाती थी। 

1957 ईस्वी के प्रथम विधानसभा चुनाव में दादाजी ने नागराकाटा, माल, मटेली क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी से उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े एवं अपनी लोकप्रियता के कारण भारी मतों से विजयी हुए। वे लगातार तीन बार चुनाव में जीत हासिल किए। जलपाईगुड़ी के विधायक एवं तत्कालीन गृह एवं विकास मंत्री श्री खगेंद्र नाथ दास गुप्ता के सामने दादाजी ने चेंगमारी मिडिल स्कूल को हाई स्कूल में अपग्रेड करने का प्रस्ताव रखा और वे मान गए। इस तरह एक बंगाली बाबू के घर नौकर का काम से लेकर विधानसभा विद्यालय विधायक तक दादाजी ने अपने समाज के हित में काम किया। 

चेंगमारी जैसे चाय बागान में जाने के लिए चेंगमारी रेलवे स्टेशन पर  N R RAILWAY  को अनुरोध करके स्टॉपेज बनवाएं ताकि वहां से साधारण जनता मनुष्य अपने गंतव्य स्थान तक आ जा सके। इसके साथ-साथ  ग्रासमोड़ में एक हेलीपैड बनवाने में भी एमएलए के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। यहाँ पर आपातकालीन स्थिति में हेलीकॉप्टर लैंडिंग और टेक ऑफ की सुविधा मिली। 1952 में स्थापित उच्च विद्यालय में आदिवासी एवं गैर आदिवासी छात्रों के लिए छात्रावास की व्यवस्था की गई थी।

उम्र हो जाने पर अपने कार्य से अवकाश ग्रहण करके दादाजी खेती-बारी के कामों में अपना समय व्यतीत करने लगे थे। अपने अंतिम दिनों में दादाजी को सांस की तकलीफ और बलगम बनने की शिकायत हुई थी। 89 वर्ष की उम्र में दादा जी का स्वर्गवास हो गया।  दादी जी अपने पीछे दो संतान श्री सीता राम भगत और श्री हेमराज भगत को छोड़ गए। दादा जी के निधन पर पश्चिम बंगाल के विधानसभा शोक प्रस्ताव पारित किया गया था और उसकी प्रति बड़े बाबूजी के पास भेजा गया था।

मेरे दादाजी बुधु भगत जी की जयंती हर वर्ष विद्यालय प्रांगण में मनाया जाता है। उनकी जन्म जयंती पर प्रत्येक वर्ष चेंगमारी टी. ई. हाई स्कूल के प्रांगण में स्थापित मूर्ति पर माल्यार्पण किया जाता है और डुवार्स में शिक्षा की ज्योति जलाने के लिए उन्हें नमन करके  याद किया जाता है और उन्हें धन्यवाद दिया जाता है।



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