प्रखर आदिवासी बुद्धिजीवी और सामाजिक अगुवा डॉ रामदयाल मुण्डा जी का जन्म तमाड़ ब्लॉक के दिउड़ी गाँव में 23 अगस्त 1939 में हुआ था। वे सही मायने में एक देशज बुद्धिजीवी और सांस्कृतिक धरती पुत्र थे। झारखंड राज्य के सृजन की व्यावहारिक अवधारणा को आमजन तक पहुँचाने में उनकी अग्रणी भूमिका रही है। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 2010 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। एक भारतीय विद्वान और क्षेत्रीय संगीत विशेषज्ञ के रूप में, उन्हें २००७ में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा (1947-1953) अमलेसा लूथरन मिशन स्कूल तमाड़ में हुई थी। मैट्रिक तक की शिक्षा उन्होंने खूंटी हाई स्कूल, खूंटी से प्राप्त की और मानव विज्ञान में स्नातकोतर की डिग्री राँची विश्वविद्यालय से हासिल की। बाद में उच्चतर शिक्षा अध्ययन और शोध के लिए अमेरिका के शिकागो चले गए। वहीं से उन्होंने दक्षिण एशियाई भाषा एवं संस्कृति विभाग में शोध और अध्ययन (1968-1971) का कार्य किये। शोध अध्ययन के बाद अमेरिका के ही मिनिसोटा विश्वविद्यालय के साउथ एशियाई अध्ययन विभाग में 1981 तक एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में अध्यापन का कार्य किया। भारत लौटने के बाद मुण्डा जी सामाजिक और शैक्षिक आंदोलन से जुड़ गए और वे 1985 में राँची विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice Chancellor) बने। जिनेवा में indigenous (आदिवासी) मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र कार्य समूह में और न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के indigenous मुद्दों के मंच में वे एक नीति निर्माता थे। एक बड़े लेखक के रूप में, उनके पास विभिन्न आदिवासी मुद्दों, सामाजिक-राजनीतिक विषयों, भाषा विज्ञान, संगीत और कला से संबंधित 53 प्रकाशन हैं। वे संसद में राज्य सभा के सदस्य भी थे।
डॉ मुंडा की जीवन यात्रा
1960 के दशक में उन्होंने एक छात्र और नर्तक के रूप में संगीतकारों की एक मंडली बनायी।
1977-78 में अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज से फेलोशिप किया।
1980 के दशक में शिकागो में एक छात्र और मिनेसोटा विश्वविद्यालय में शिक्षक के रूप में डॉ मुंडा ने दक्षिण एशियाई लोक कलाकारों और भारतीय छात्रों के साथ प्रशंसनीय प्रदर्शन किया।
1981 में रांची विश्विविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग रांची विश्वविद्यालय से जुड़े।
1983 में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी कैनबरा में विजिटिंग प्रोफेसर बने।
1985-86 में रांची विश्वविद्यालय के उप-कुलपति रहे।
1986-88 में रांची विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
1987 में सोवियत संघ में हुए भारत महोत्सव में मुंडा पाइका नृत्य दल के साथ भारतीय सांस्कृतिक दल का नेतृत्व किया।
1988 में अंतरराष्ट्रीय संगीत कार्यशाला में शामिल हुए।
1988 में आदिवासी कार्यदल राष्ट्रसंघ जेनेवा गये।
1988 से 91 तक भारतीय मानव वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया।
1989 में फिलीपिंस, चीन और जापान का दौरा किया।
1989-1995 में झारखंड विषयक समिति, भारत सरकार के सदस्य रहे।
1990 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति आकलन समिति के सदस्य रहे।
1991 से 1998 तक झारखंड पीपुल्स पार्टी के प्रमुख अध्यक्ष रहे।
1996 में सिराक्यूज विश्वविद्यालय न्यूयार्क से जुड़े।
1997-2008 तक भारतीय आदिवासी संगम के प्रमुख अध्यक्ष और संरक्षक सलाहकार रहे।
1997 में ही वह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सलाहकार समिति सदस्य बनाये गये।
1998 में केंद्रीय वित्त मंत्रालय के फाइनांस कमेटी के सदस्य बने।
2010 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किये गये।
2010 मार्च में राज्यसभा सदस्य मनोनीत किये गये।

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