कमजोर की बीवी पूरे गाँव की भौजी।

नेह अर्जुन इंदवार

कमजोर आदिवासी का "अधिकार और सम्मान" सबकी भौजी।

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अजीब स्थिति है ।

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राजनीति के मैदान में वेश्यगिरी कर रही राजनैतिक पार्टियाँ

आदिवासी अधिकार, सम्मान की नीलामी करने की आवाज देती हैं और  आदिवासी अपना वजूद और सम्मान के बचाव के लिए मारा-मारा फिरता है।

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तब गली कुच्चा, गाँव-खोईर में कुकुरमुत्तों की तरह बनाए गए संगठन सक्रिय हो जाते हैं और फिर बैठकों की एक अंतहीन छितरे-बिखरे कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं। सभी अपने-अपने "क्रांतिकारी संघर्ष" की घोषणा करते हैं और हर तरफ बीस-पच्चीस लोग वजूद बचाने झंडे लेकर निकल जाते हैं।

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परिणाम क्या होता है? कुकुरमुत्ते संगठनों के बच्चेनुमा चित्कार को कोई भी गंभीरता से लेता नहीं है। गरजते बादल बारिश करते नहीं।

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बाप रे ! गिनती करने बैठो तो आदिवासी संगठनों और नेताओं की संख्या गिनने के लिए दर्जन भर कलम की स्याही भी कम पड़ जाए।

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मुद्दई इन नजारों को देख अपनी हँसी रोक नहीं पाते हैं। सभी आदिवासियों को उलझाने के लिए नये पासे फेंकते हैं, क्योंकि आदिवासी उलझता ही रहता है। उनकी उलझन साफ दिखती है। कोई भी उनको अफरा तफरी में धकेल सकता है। वह हर बार नये-नये फंदे में आसानी से फंसता है।

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आदिवासी अधिकार सबकी भौजी क्यों है तुरंत समझ में आ जाती है।

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आखिर क्यों आदिवासी दिमाग में यह बात नहीं आती है कि जो कुछ करना है पूरे राज्य के लिए सिर्फ एक ही सामाजिक संगठन काम करे, (राजनीति संगठन नहीं)  सबकी एक आवाज हो  किसी भी मुद्दे पर एक साथ हाथ उठे, एक साथ गिरे और सम्पूर्ण समाज की सारी ताकतों का एक साथ उपयोग किया जाए। वह जिसे समर्थन करे वही चुनाव लड़े बाकी कोई नहीं।

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जब-जब छोटे संगठन केन्द्रीय संगठन बना कर लड़ाई किए हैं वे विजयी रहे हैं। तमाम कम्युनिष्ट पार्टी वाममोर्चा नहीं बनाते तो वे केरल और बंगाल में लम्बे काल तक सत्ताधारी नहीं बने रहते। आरएसएस तमाम हिन्दू संगठनों को एकक्षत्र मार्गदर्शन करता है। एकता में बल है, यह क्यों समझ में नहीं आता है।

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अपने स्वार्थ के लिए नेता बनने की ख्वाहिशें विशाल नदी बनाने की जगह चारों तरफ गंदी नाले ही बनाती हैं। सबकी फवड़ें अलग-अलग सिर्फ कुछ घंटे ही खुदाई कर सकती है। स्वेज और पानामा नहर यूँ ही नहीं बना है दोस्तों। आईए सभी एक विराट संगठन बनाने के लिए सोचें, काम करें।

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सभी संगठन एक दिन एक साथ बैठे, नेताओं की एक प्रेजिडियम बने मतलब दस-बीस नेताओं की एक केन्द्रीय कमेटी बने। नियम शर्तें बने और सभी उसका कठोर पालन करें। लिखित रूप में, गुप्त मतदान के अनुसार निर्णय ले और सिर्फ प्रवक्ता ही बाहर बातें करें। कोई भी नेता विराट एकता का एकक्षत्र नेता बनने की कोशिश न करें और जो इस मुहिम में शामिल न हो, अलग राजनीति करे उन्हें आदिवासी रीतिपूर्वक समाज से बहिष्कृत किया जाए।

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सभी इलाकों, विधानसभा, लोकसभा के लिए गाँव से शहर तक मिल कर सिर्फ एक-एक उम्मीदवार का चयन  करें। सर्व सम्मति से चुने गए उम्मीदवार का विरोध एक भी आदिवासी न करे और यदि कोई करने का दुस्साहस करे तो उसकी क्या सजा होगी यह भी मुकर्रर करे।

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देश के सारे आदिवासी राज्यों. इलाकों में एक ही सामाजिक आंदोलन हो, नेताओं का चुनाव एक समयसीमा (छह महीना या एक वर्ष)  के लिए किया जाए और अगले बैठक में सबकी नेतृत्व क्षमता, ईमानदारी, समर्पण की कठोर समीक्षा किया जाए और कमजोर नेतृत्व को हटा दिया जाए। प्रेजिडियम के नीचे हर प्रकार के एक्सपर्ट समितियाँ काम करे और सभी स्तर पर कारपोरेट प्रबंधन संस्कृति को फ्लो किया जाए।

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हर शाख पर उल्लु बैठे हों तो जाने गुलिस्तान का हाल क्या होगा, कहावत को पूरी तरह बदल दें।

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नेता बनने की महत्वकांक्षा के कारण अलग ठपली बजाने वालों को जनता एक तय तारीख के बाद सरेआम नंगा करे, उन्हें समाज से पूरी तरह बहिष्कार किया जाए और एक भी आदिवासी ऐसे लोगों के साथ न रहे,  यह पहली जरूरत है।  जय आदिवासी, अजय आदिवासी। नेह।


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