पूँजीवादी व्यवस्था में स्वावलंबी समाज

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नेह अर्जुन इंदवार


पूँजीवादी व्यवस्था में स्वालंबित समाज को पसंद नहीं किया जाता है। साईकिल से चलने वाले लोगों को न पूँजीपति  पसंद करते हैं, न व्यापारी और न सरकार न सत्ताधारी वर्ग। इसी तरह ग्रामीण और आदिवासी समाज को भी पूँजीवादी मानसिकता वाले पसंद नहीं करते हैं। क्योंकि ये समाज 70 प्रतिशत स्वालंबित होते हैं। स्वालंबित समाज में जिंस और सेवा (goods and service)   की मांग और पूर्ति हमेशा मंदी में रहती हैं और रूपये के सर्कुलेशन मंदी के चपेट में रहता है। सरकार और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की नीतियां स्वावलंबित समाज को परावलंबित समाज में बदलने के हर चाल को चलती रहती हैं। इसके लिए पूँजीवादी नीतियां लोगों के व्यक्तिवादी और सामाजिक सोच, चिंतन, दृष्टिकोण, लोकव्यवहार को लगातार  बदलने के लिए सरकारी नीतियों, मीडिया, साहित्य आदि के द्वारा प्रभावित करने की कोशिशें करते रहती हैं।

आधुनिक समाज आज परावलंबित होकर सरकार और पूँजीवादी नीतियों की गुलाम बन चुका है। अर्थ व्यवस्था ही नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जिंदगी भी पूँजीवाद के मुट्ठी में कैद है।   जिंदगी के सबसे अहम हवा, पानी, भोजन और आवास में से सिर्फ हवा पर ही सरकार और पूँजीवाद का कब्जा होना रह गया है। बाकी सारी चीजों पर आज का समाज पूरी तरह आधुनिक शासक वर्ग या पूँजीवाद के गिरफ्त में कैद हो चुका है। जिस दिन पानी, बिजली, गैस, यातायात, बाजार आदि बंद हो जाता है। उस दिन आधुनिक परावलंबित समाज इन नीतियों के कैद में अचल होकर बंद हो जाता है।  समाज किसी भी प्रकार से इनके गिरफ्त से आजाद नहीं हो सकता है।

दुनिया के शहरी और आधुनिक आबादी पूरी तरह इन्हीं नीतियों के कारण परावलंबित हो चुका है। आंदोलन, दंगा, फसाद, युद्ध आदि से पूँजीवाद पर आधारित व्यवस्था मरनासन्न हो जाता है। इसे बचाए रखने के लिए सरकार और पूँजीपति कठोर, ह्रदयहीन होकर अपनी पूरी शक्ति से समाज और व्यक्तियों पर पिल पड़ते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में किसी भी व्यवधान से रूपयों में कैद भूगतान का मूल्य सरकार और पूँजीपतियों की ओर एकतरफा रूप से दौड़ते हुए रूक जाता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में रूपये में कैद भुगतान की शक्ति हमेशा पूँजीपति और सरकार की ओर ही बरसात में आए हुए बाढ़ की तरह उमड़ घुमड़ कर दौड़ती हुई जाती है। इसीलिए जिस स्वालंबित समाज और व्यवस्था से पैसे में कैद मूल्य समाज के भीतर ही लोकतांत्रिक रूप से रह जाता है, उसे आधुनिक सरकार और पूँजीपति पसंद नहीं करते हैं। पूँजीवाद में सरकार और पूँजपतियों के बीच पति पत्नी का संबंध होता है।

पति पत्नी के इस  अमूर्त गठजोर संबंध को समझने के लिए सरकार की कार्य प्रणाली को समझने की जरूरत है। इसे एक छोटा सा उदाहरण के द्वारा समझने का प्रयास करें। पश्चिम बंगाल और असम के चाय मजदूरों के पास अपने घर के जमीन का अधिकार नहीं है। वे पिछले 15 वर्षों से इसकी माँग कर रहे हैं। लेकिन सत्ताधारी वर्ग अर्थात् सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रहे हैं। उन्हें न्याय देने के लिए सरकार को कोई चिंता नहीं हुई।  लेकिन दो तीन पूँजीपतियों ने सरकार से अनुरोध किया कि चाय बागानों को टूरिज्म के लिए अनुमति देना चाहिए। बस इतना कहना था कि ममता सरकार ने फट से 2013 में पाँच एकड़ के टी टूरिज्म की नीति लेकर आई। लेकिन दस पंद्रह पूँजीपति इससे खुश नहीं हुए तो फिर इसी नीति के स्कोप को बढ़ा कर 150 एकड़ कर दिया।  सिर्फ एक चिट्टी आया और नया कानून बन गया। उधर, दो करोड़ के लोगों की आवाज़ भी कोई काम न कर पाया।

एक ओर दो करोड़ जनता संविधान कानून, मानव अधिकार, नागरिक अधिकार, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर 15 वर्षों से अपने घर की जमीन के लिए आंदोलनरत हैं। हड़ताल बंद करके अपनी आवाज़ सरकार तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन सरकार नज़र टेढी करके बैठी है। वहीं दूसरी ओर चार पाँ पूँजीपति एक दो चिट्ठी सरकार को लिखते हैं और सरकार तुरंत फूरंत कई कानून बना देती है और उन कानून को सफल करने के लिए 500 करोड़ रूपये से चा सुंदरी घर बनाने की घोषणा कर देती है। तो दोस्तों यही है पति पत्नी का रिश्ता या पूँजी और सत्ताधारी तत्वों का अपवित्र गठजोड़। यह गठजोड़ ही शोषण की नीतियाँ बनाता है और जनता को परावलंबित करने के लिए कार्य करता है। परावलंबित समाज अपनी स्वालंबित साधनों से वंचित हो जाता है और पूँजीवाद द्वारा स्थापित साधनों का मोहताज हो जाता है।

साईकिल सवार व्यक्ति से सरकार और पूँजीपतियों को बहुत कम फायदा मिलता है। लेकिन गाड़ी सवार लोगों से सरकार और पूँजीपतियों को पेट्रोल, पूर्जे, इन्श्योरेंस, टैक्स आदि से लगातार फायदा मिलता है। इन्हें स्वालंबित व्यक्ति और समाज से बहुत कम फायदा मिलता है। पूँजीपतियों, नेताओं और बाबुओं को स्वावलंबित लोगों से फायदा नहीं मिलता है।

ग्रामीण जीवन में स्वावलंबन के क्या-क्या कारण हैं और वे कैसे बाजारवाद के शोषण से बचाता है। इस पर ग्रामीण और विशेषकर आदिवासी समाज को चिंतन करने की जरूरत है। बिजली, पानी, भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में कैसे स्वावलंबित हो सकते हैं। इस पर चिंतन करके उस पर उपाय करने से रूपयों में कैद मूल्यों का सरकार और पूँजीपतियों की ओर दौड़ने की क्रिया को रोका जा सकता है। मुख्य बात है अपने सीमित संसाधनों के द्वारा  स्वतंत्र और स्वावलंबन जीवन जीना। ग्रामीण समाज में टैक्स और आर्थिक शोषण से बचने के अनेक उपाय किए जा सकते हैं।


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