सत्य खबरों से वंचित जनता

नेह अर्जुन इंदवार  

देश दुनिया में बहुत सी ऐसी परिवर्तन आ रहे हैं, जिसके बारे आम इंसान को पता ही नहीं चलता है। अखबार पढ़ने वालों तक भी अनेक सूचनाएँ और खबरें पहुँच  नहीं पाती है। 


विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 180 देशों में गिरकर 161 पर आ गया है। मतलब साफ है भारत की मीडिया में कोई स्वतंत्रता नहीं है, और अखबार जितनी खबरें  छापती हैं, उनसे अधिक खबरों को छुपाती हैं। भारतीय मीडिया में सरकार के कामकाज की  तुलनात्मक, विश्लेषणात्मक खबरें बहुत कम अखबारों में छपती हैं। मीडिया कर्मी सरकार और सत्ताधारियों से कोई असहज सवाल नहीं करता। लेकिन विपक्षी पार्टियों के नेताओं से यह सवाल जरूर करता है कि आप देश के विकास के लिए क्या कर रहे हैं ? आप आम कैसे खाते हैं ? जैसे सवाल प्रधानमंत्री से पूछे जाते हैं और वाहियात रूप से उसे मीडिया का आमूक न्यूज बनाया जाता है।  मीडियाकर्मी किसी सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, किसी भ्रष्ट, जनताद्रोही, व्यवस्थाद्रोही, देशद्रोही माफिया, देश को लूटने वाले, जनता को ठगने वाले पूँजीपति या पूँजीपतियों के गठजोड़ आदि के लिए काम करते हैं और वे उनके अनुकूल अपने अखबार का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय मीडिया देश लूट कर विदेश भागने वालों का काफी पीछा नहीं करते। लेकिन विदेशी धरती पर बिना मतलब के रंगीनी कार्यक्रमों को अपने न्यूज का प्रमुख ख़बर बनाते हैं।  दुनिया में जिन देशों में प्रेस स्वतंत्रता अपने चरम अवस्था में है, वहाँ किसी भी तरह के गलत कार्यों का भंडाफोड़ चंद दिनों में ही हो जाता है और वहाँ गलत कार्य करने वालों को सार्वजनिक जीवन से सन्यास लेना होता है और वे जेल के कोठरियों की शोभा बढ़ाते हैं। लेकिन भारत में भ्रष्ट व्यक्तियों को जेल के बदले न्यायालयों से बेल आसानी से मिल जाते हैं, और जनता ऐसे व्यक्तियों को अपने वोट से उन्हें सिर आँखों पर बिठाती है। 


भारत में सूचनाएँ किसी खास उद्देश्य के लिए दी जाती है या छुपायी जाती है। जाहिर है कि जनता तक खबरें पहुँच नहीं पाती हैं। किसी प्रमुख मंदिर से खरबों के सोना गायब हो जाने के खबरों में किसी कसूरवार की पड़ताल तक भारतीय मीडिया  नहीं करती है। 


क्लाईमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन की मार  पूरी पृथ्वी पर पड़ रही है। भारत के कई क्षेत्रों में दिन का तापमान 47 डिग्री तक होने लग गए। हर जगह तीन चार डिग्री तापमान बढ़ गया है और इसकी सबसे अधिक मार गरीबों  को ही होती है। पहले 40 डिग्री की गर्मी में लू से मरने वालों की खबरें रोज आती थीं, लेकिन अब 47-48 की गर्मी से मरने वालों की कोई खबरें नहीं आती हैं। सर्दी के बारे भी अखबारों में खबरें गायब रहती हैं। भूख, बीमारी से होने वाले मौतों की खबरों को दबा दी जाती हैं। इससे सरकारों और लूट मचाते नेताओं की बदनामी होती है। लोग बजट, खर्च, आय-व्यय और सरकारी मशीनरी की बदहाली पर सवाल पूछना शुरू कर देते हैं। ऐसी खबरों से न्यायालय भी सक्रिय हो उठता है। ये नेताओं के लिए सिरदर्द- मगजमारी का विषय बन जाता  है और माफियातंत्र राज्य में  लूटतंत्र के बारे बातें होने लगती है। इसलिए भ्रष्ट और गुलाम-चापलूस मीडिया इन खबरों को सिरे से गायब कर देता है। 


भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन यहाँ कृषि फसलों के माध्यम से फैले लूटतंत्र पर बहुत कम बातें होती हैं। जो फसल किसान 10 रूपये में बाजार में आपूर्ति करता है, उसे क्रेता 50 रूपये में खरीदता है। बीच के 40 रूपये कौन बिना हाथ उठाए कमा लेता है, इस पर सरकारें कभी कोई चर्चा आयोजित नहीं करता है। जो कपड़े कारखाने में बीच रूपये मीटर बन कर निकलता है, वह कपड़ा अंतिम ग्राहक के पास 1000 रूपये में पहुँचता है, इस विषय पर भी जनता को कोई खबर नहीं पहुँचााय जाता है। 


पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के भयावाह नतीजा आ रहे हैं। फसलों पर जलवायु की मार पड़ेगी तो वह सोने के दाम पर आम जनता तक पहुँचेगी। जो चावल पाँच साल पूर्व 25 रूपये में मिला करता था, आज 60-70 रूपये प्रति केजी मिल रहा है। अगले पाँच साल में यह 120 रूपये प्रति केजी मिलने लगेगा। दाल कभी 80 रूपये केजी बिकता था, आज वह 180-200 रूपये में मिल रहा है। 80 रूपये का दाल 200 रूपये में बिक रहा है। लेकिन पाँच साल पूर्व जो चाय श्रमिक 167 रूपये पा रहे थे, आज भी 232 रूपये ही पा रहे हैं। खाद्य पदार्थों के दाम  में 100-150% की बढ़ोतरी हो गई है, वहीं मजदूरों के मजदूरी में 20% की बढ़ोतरी हुई है। जाहिर है कि उनकी जीवन स्तर में पहले की अपेक्षा और भी कमी हुई है। वे अधिक गरीब हो रहे हैं और स्थिति अधिक भयावह बन रही है। चाय मजदूरों की कोई खबरें कभी किसी अखबार के पहले पन्ने में नहीं आएगी और न कोई संसदीय समिति चाय बागानों की हालत को जानने के लिए आपके गाँव घर आएगी। त्रिपक्षीय वेतन समझौतों में सरकार के अफसर भी हस्ताक्षर करते हैं, लेकिन मजदूरों को फ्रिंज बेनेफिट्स से वंचित करने वालों चाय बागान मालिकों पर वे कोई कार्रवाई नहीं करते हैं। खरबों रूपये की इस लूट पर सरकारी सहमति कहीं छुपी हुई नहीं है। 


भयावाह स्थितियों की सामना करने के लिए चाय मजदूरों को खुद अपने स्तर पर कार्य करना  होगा। अब बारिश का मौसम आ ही गया है। वे इस बारिश में अपने घर में ऐसे फलों और सब्जियों के पेड़ पौधे लगाएँ, जिनसे उन्हें अगले दस बीस साल तक फल और सब्जियाँ प्राप्त होते रहे हैं और वे इनपर होने वाले खर्च को बचा पाएँ। वे मुर्गी जरूर पालें और अपने बच्चों को अंडे और देसी मुर्गी खिला पाएँ। यदि आप घर में मशरूम उगा सकते हैं तो उसे भी उगाना सीखें। यदि आपके पास खेत-खलिहान हैं तो उन पर ऐसे कुछ पेड़ जरूर लगाएँ जो लम्बे समय तक आपको फल, फूल दें या जिन्हें बेच कर आप दस पन्द्रह साल के बाद 10-20 लाख रूपये कमा सकें। बिजली के दाम बेतहासा बढ़ने वाली है, यदि आप दस पन्द्रह परिवार मिल कर पाँच दस हजार रूपये प्रति परिवार जमा करके सौर ऊर्जा वाले सोलार पैनल सामूहिक रूप से एक जगह पर लगाएँगे तो इससे बिजली की लूटंत बाजार से आप बच सकते हैं। शादी विवाह, जन्मदिन पार्टी में खर्च कम करें। मोबाईल वगैरह में अधिक खर्च न करें। जिंदगी में यदि कम पैसों का प्रबंधन आप सही तरीके से कर लेंगे तो जिंदगी बड़े आराम से चल जाएगी। संसाधनों का बेहतर प्रबंधन ही पारिवारिक प्रबंधन है। 


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