नेह अर्जुन इंदवार
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देश आजाद होने के बाद भारत में हर क्षेत्र में लंगड़े घोड़े की तरह त्रुटिपूर्ण नीतियों को सरकारी स्तर पर अपनाया गया। शिक्षा के क्षेत्र में जानबुझ कर जातिवादी भेदभाव की लचर सरकारी और प्राईवेट नीतियों को अपनाया गया, ताकि देश के तथाकथित पिछड़ी जातियाँ, शिक्षा के सम्यक लाभ से वंचित रहें लेकिन प्राचीन काल से धन-सम्पदा से संचित वर्ग प्राईवेट स्कूलों के माध्यम से उच्च वर्ग के तमाम लाभों से सराबोर होते रहें। इस तरह की नीतियों ने देश का बहुत नुकसान किया। देश के पिछड़ेपन का यह प्रमुख कारण रहा है। देश कितना पिछड़ा है इसे अनुमान लगाने के लिए कोविड के दौरान यातायात बंदी से जुझ रहे 1500 किलोमीटर भूखे प्यासे मजबूर होकर पैदल चलते गरीब मजदूरों को देख लीजिए। पूरी दुनिया और इतिहास में इतनी लोमहर्षक दृष्य और कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आज भी शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में पिछड़े समाजों को उच्च पदों पर पहुँचने से रोकने की संगठित और ठोस कोशिश की जाती है। आज भारत की साक्षर दर 74 प्रतिशत है। वहीं भारत से एक साल बाद में स्वतंत्र हुए चीन में 97% साक्षरता की दर है। जातिवादी दृष्टिकोण को सामने रख कर इसका विश्लेषण किया जाए तो बहुसंख्यक पिछड़ी जातियों की सहभागिता एक प्रतिशत से भी कम है। उनकी वैचारिकी उर्वरता से देश को वंचित करने की नीति कितनी घटिया और धत् कर्म था। उस पर एक किताब लिखी जा सकती है।
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भारत में स्नातक शिक्षा प्राप्त जनसंख्या 8.15% प्रतिशत है। औपचारिक रूप से कुशल श्रमिकों का भारत में अनुपात कुल कार्यबल का 4.69% है, जबकि चीन में 24%, ब्रिटेन में 68%, जर्मनी में 75%, जापान में 80% और दक्षिण कोरिया में 96% है। (स्रोत-फाइनेन्सियल टाईम्स 19 मार्च 19)। भारत में आरक्षण की नीति को अपनाने के बावजूद कुशल श्रमिकों के कार्यबल में पिछड़े समाज की सहभागिता 0.05 से अधिक नहीं है। आरक्षण की नीति भी लॉटरी में महज कुछ व्यक्तियों को मिलने वाली प्राईज की तरह का है। जबकि लक्ष्य पूरी जनसंख्या को एक समयसीमा के भीतर स्कील्ड ग्रेज्युएट बनाने की होनी चाहिए थी। भारत अपने राष्ट्रीय बजट का सिर्फ 3% ही शिक्षा के लिए आबंटित करता है। शिक्षा बजट आबंटित करने में 197 देशों में भारत का नम्बर 149वाँ है। अर्थात् दुनिया के सबसे कमजोर 48 देशों से ऊपर भारत का स्थान है। छोटे से देश क्यूबा, माक्रोनेशिया, मार्शल आयलैंड, किरीबाती अपने बजट का 12% धन शिक्षा के लिए व्यय करते हैं। वहीं डेनमार्क, नार्वे, आइसलैंड, स्वीट्जरलैंड, फिनलैंड, भुटान, ट्यूनिशिया, उज्बेकिस्तान, ब्राजिल, दक्षिण अफ्रीका आदि देश अपने बजट के 6% से अधिक का प्रावधान शिक्षा के लिए करते हैं। अर्जेंटीना,ऑस्ट्रिया, ब्राज़ील, डेनमार्क, मिस्र, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आइसलैंड, केन्या, लक्समबर्गं, मलेशिया, मोरक्को, नॉर्वे, पनामा, पोलैंड, स्कॉटलैंड, स्लोवेनिया, स्पेन, स्वीडन, तुर्की, उरुग्वे आदि देशों में कमोबेश विश्वविद्यालय तक की शिक्षा पूरी तरह निशुल्क है। शिक्षा और प्रशिक्षण ही किसी देश को महान बनाता है। भारत में गरीब वर्ग को निराक्षर, अर्द्धशिक्षित, साधनहीन, साधन-स्रोतहीन बनाने की राष्ट्रीय नीति कार्य करती है। इसी नीति के तहत कालेजों विश्वविद्यालयों की शिक्षा को महंगा बनाया जा रहा है। आरक्षण से संचालित नौकरियों के प्रमुख स्रोत सार्वजनिक उद्योगों को या तो निजी क्षेत्रों को बेचा जा रहा है या उन्हें निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा न कर पाने लायक अक्षम बनाया जा रहा है। 2023 के एक आंकड़ा के अनुसार केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के क्षेत्र में 16 लाख नौकरियों को खत्म किया गया और आरक्षण के माध्यम से सरकारी नौकरियों में प्रवेश कर रहे पिछड़े समाज को साधन-सम्पन्न होने से रोका गया। "भारत विश्वगुरू" है वाक्य बोल कर बेवकूफ बनाने की एक परंपरा बनाई गई है। जबकि भारत आय और रोजगार के साधन के मामले में अफ्रीकी देशों से भी नीचे का स्थान रखता है।
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भारत न सिर्फ अपने बजट का तीन प्रतिशत ही शिक्षा में खर्च करता है, बल्कि शिक्षा और मानव संसाधन के विकास की देखरेख के
लिए 12वीं पास अनुभवहीन, प्रशिक्षणहीन व्यक्ति को मानव संसाधन मंत्री भी नियुक्त करता है और पूरा
देश चुप रहता है। जबकि भारत रक्षा क्षेत्र में अपने बजट का 2.4% खर्च करता है और रक्षा के सबसे अधिक खर्च करने वाले
देशों में भारत का स्थान 6वाँ है। रक्षा बजट से खरीदे गए अधिकांश साजो सामान
कभी व्यवहार में नहीं आएँगे, यह सत्ताधारी ही
नहीं, बल्कि आम आदमी भी जानता है। रक्षा क्षेत्र में हर
सरकार खूब व्यय करती है,
क्योंकि उसमें भ्रष्टाचार के बहुत अवसर होते
हैं। यहाँ मीडिया की क्या भूमिका हो सकती है। इस पर चिंतन करें। भारत में मीडिया
के बुद्धिजीवी सब्जी की तरह टके सेर बिकते हैं। विश्व मीडिया रैंकिंग में भारत का स्थान 162 है। अर्थात् मीडिया की स्वतंत्रता के मामले पर बहुत खराब स्थिति है।
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उपरोक्त सभी आंकड़े संबंधित वैश्विक अध्ययन संस्थानों से ली गई है। ये
आंकड़े बताते हैं कि भारत में शैक्षिक दर, स्नातक
तक की शिक्षा दर और प्रशिक्षित कार्यबल दूसरे देशों की अपेक्षा बहुत कम है। लेकिन
इस अपेक्षाकृत कम दर में भी भारत ने अनेक क्षेत्रों में कामयाबी का झंडा गड़ा है।
जरा चिंतन कीजिए कि यदि भारत में शिक्षा के क्षेत्र में 10% व्यय किया जाता। तमाम जनता को उच्चशिक्षा लेने का
मौका दिया जाता,
तो आज भारत शिक्षा, प्रशिक्षा, इन्नोवेशन, नये उच्च तकनीकी के विकास और उत्पादन में कहाँ होता ? डॉलर के मुकाबले रूपये की कीमत अधिक होती। भारत को अत्यंत उच्च संभावना वाला देश यूँ ही नहीं
कहा जाता है।
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लेकिन भारत में एक पर्याप्त शिक्षा प्रणाली का निर्माण भी नहीं हो सका। यह
धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, सामाजिक, आर्थिक और भाषा मतभेदों की एक अबुझ पहेली बना हुआ
है। भारत में 50
प्रतिशत से अधिक बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा भी
पूरी नहीं कर पाते हैं। वहीं प्राथमिक स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयीन शिक्षा तक
में जातिवादी भेदभाव स्थायी घर बना कर रह रहा है। सरकार चाहती है कि गरीब अंग्रेजी, गणित, विज्ञान
न पढ़े। गरीबों के लिए इनकी शिक्षा जानबुझ कर महंगी की जाती है। जाहिर है कि भारत
में शिक्षा की असली भावना का उदय प्राचीन काल से ही नहीं हुआ था, न ही आजादी के बाद भेदभाव की भावना लोप हो सका। इसका
सीधा असल देश के गैर सवर्ण समाज को भुगतना पड़ रहा है। उच्चतर शिक्षा में पिछड़े
गैर स्वर्ण वर्ग को महज 10
प्रतिशत की हिस्सेदारी भी मयस्सर नहीं है।
सरकार की मंशा कभी भी उन्हें सशक्त करने की नहीं रही। क्योंकि नीतियों का निर्माण
और कार्यान्वयन जातिवादी मानसिकता का हमेशा शिकार रहा है। देश में मंदबुद्धि और
नीचता कहाँ नहीं है?
याद रखे उर्वरता से रहित बंजर दिमाग भावशुन्य
रहता है।
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सार्वभौमिक शिक्षा,
स्वतंत्र सोच और वैचारिक-खुले समाज में
बौद्धिक शक्तियाँ समाज को उत्तरोत्तर उन्नतशील और शक्तिशाली बनाता है। जिस समाज
में सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को नजरांदाज और हतोत्साहित किया जाता है। वह
समाज अंततः बौद्धिक रूप से अपने मानव संसाधन के सर्वोत्तम उपयोग से वंचित हो जाता
है। मानव संसाधन के शिक्षा और स्वास्थ्य पर ही हर समाज और राष्ट्र का भविष्य टिका
होता है। विश्व के जिन देशों ने अपने मानव पूँजी के विकास के लिए अपने बजट के एक
बड़े भाग का निवेश किया,
वह देश अपने विशाल जनसंख्या के बौद्धिक विकास
का फसल काटा है। भारत से एक साल बाद आजाद हुआ चीन में जातिवादी भावना की
अनुपस्थिति ने मानव पूँजी और तकनीकी इन्नोवेशन में इतनी बड़ी छलांग लगाया कि आज
दुनिया का बाजार चीनी उत्पादन से अटा पड़ा हुआ है। भारत के अधिकतर परिवार के आय का
एक हिस्सा मोबाईल के रास्ते चीन में जाता है। इलेक्ट्रोनिक सामान के मामले पर भारत
चीन का वास्तविक उपनिवेश है। लेकिन मीडिया इस बात को छिपाता है।
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धार्मिक और पारंपारिक भव्यता का प्रदर्शन करते खर्चीली संस्कृतियाँ, परिवार और समाज पर हमेशा आर्थिक दबाव का सृजन करता
है ? फैशन और आधुनिकी की भावना भी आम आमदानी से भविष्य की
रणनीति को संभालते परिवार पर आर्थिक दबाव बनाए रखता है। यह परिवार के युवा वर्ग के
दिमाग को हैक करता है,
और गैर जरूरी सामानों पर व्यय करवाता है।
बाजार, परिवार के आय के एक बड़े हिस्से को अपनी ओर खींचने
का, सारा तामझाम करता है। आधुनिक, स्मार्ट और विकसित दिखने की चाहत, परिवार, समाज
के उर्जा, समय और पैसों को बहुत बर्बाद करता है, और आर्थिक नींव को कमजोर करता है? विकासशील समाज का गैर जरूरी सामग्री पर, बिना दिमाग लगाए होने वाला व्यय बेवकूफी कहलाता है।
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परिवार,
समाज की तरह, राष्ट्र राज्य के रूप में भी सरकार कैसे बेवकुफियाँ करतीं रहती हैं ? सरकार (राजनीतिज्ञों का एक छोटा समूह) ऐतिहासिक रूप
से, लोकमत के माध्यम से मिले सुअवसर के समय, ऊर्जा, संसाधनों
को बेवकुफियों में व्यय करके नष्ट करता है, और इतिहास में बगडोर संभालने वाले बेवकूफ शासक के रूप में अपना नाम दर्ज
करता है? गैर जरूरी खर्च करके, कैसे कोई शासक,
समाज और राष्ट्र को विकास के सड़क पर पीछे की
ओर ले चलता है और दूसरे राष्ट्र के मुकाबले राष्ट्र को धीमी गति के हाईवे (Slow highway) पर ले चलता है ? मंदिर, मूर्ति, मस्जिद, मुसलमान, पाकिस्तान, गाय, मूत्र, मांस आदि भारतीय नेताओं के बेवकुफियों का वर्तमान
आईना है। भविष्य में ठगी के नये नारे आएंगे। वैचारिकी बंजरता यह करने के लिए मजबूर
करता है।
नये वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में यह बात
निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका है कि जो शासक, शासन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करता है, वह वास्तव में ऐतिहासिक रूप से बेवकूफ होता है।
राष्ट्र की असली सम्पदा उच्च शिक्षित संतुलित दिमाग वाले स्वस्थ लोग होते
हैं न कि किसी धर्म और संस्कृति से लिपटे लोग। लेखन जारी है...नेह।
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