वैचारिकी उर्वरता भाग - तीन

 

नेह इंदवार 

बहुविचारित उच्च स्तर के सम्यक शिक्षा नीति से उच्च शिक्षित, प्रशिक्षित, इन्नोवेटिव, स्वस्थ और प्रसन्न देश अपनी एक अलग प्रगतिशील सांस्कृतिक पृष्टभूमि तैयार करते हैं।


प्रगतिशील सांस्कृतिक ढाँचे में जीवित समाज का धर्मजाति, वर्ग संबंधी विचार, अधिक स्मार्ट, संतुलित और व्यवहारिक होता है। वे इन विचारों की क्षणभंगुरता के बारे ठोस विचार रखते हैं।  ऐसे समाज में रोटी, कपड़ा मकान की मूलभूत समस्याओं का निराकरण बहुत जल्दी कर लिया जाता है और सामाजिक दुख और पिछड़ापन को समाप्त कर दिया जाता है।  स्मार्ट् समाज और देश अपने गरीब संसाधन हीन वर्ग को साधन संपन्न बनाने के लिए अपने बजट और संसाधनों तथा वैचारिकी उर्वरता का बहुत बुद्धिमानी पूर्वक नियोजन करता है और अपने लक्ष्य को कम समय में ही प्राप्त कर लेते हैं। सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, चीन, पेट्रोलियम स्रोत से ट्रिलियन अर्थव्यवस्था को प्राप्त किए हुए साउदी अरब, यूनाईटेड अरब एमिरात, कुवैत, जर्डन, इजरायल आदि इसके उदाहरण हैं। ऐसे देशों में भ्रष्टाचार का स्तर बहुत न्यून होता है। वे अपने संसाधनों का पूरे देश की उन्नति के लिए बहुत बुद्धिमत्ता से उपयोग करते  हैं।

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स्मार्ट समाज के पास कुल मानवीय उत्पादन क्षमता से भी अधिक उत्पादन कर लेने का विश्वास और ताकत होती है। उसके पास अपनी प्रगतिशील सोच और उसकी पृष्टभूमि पर आधारित आर्थिक विकास के कल्याणकारी रास्ते से नये मुकाम हासिल करने का विश्वास होता है। ऐसा समाज आर्थिक और मानसिक रूप से खुशहाल होता है। सर्व और सार्वभौमिक शिक्षा नीति को अपनाने वाले देश प्रसन्नता के सूचकांक में आगे होते हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित हैप्पी कंट्री की सूची में फिनलैंड, डेनमार्क. नोर्वे, आईसलैंड, नेदरलैंड, स्विट्जरलैंड, स्वीडेन, न्यूजीलैंड, कनाडा, अस्ट्रिया आदि देश विश्व के अग्रणी प्रसन्न  देश (happiest country in the world) के पद पर आसीन हैं। वहीं 2019 के कुल राष्ट्रीय खुशी के सूचकांक में भारत  का स्थान 140वाँ है। भारत युगांडा, मिश्र, जांबिया, टोगो जैसे अफ्रीकी देशों के साथ खड़ा है। वहीं पड़ोसी देश चीन का स्थान 93वाँ है और भुटान का 95वाँ। नेपाल भी भारत से 40 स्थान आगे है और सूची में उनका स्थान 100वाँ है। इन देशों में रोटी कपड़ा मकान, रोजगार, अवसर, समानता, न्याय सबके लिए उपलब्ध है। भारत में गरीबों के लिए ये अभी भी आकाश कुसुम बनी हुई है या कहें यहाँ की बदहाली योजनाबद्ध ढंग से बनाई हुई है। यहाँ जातिवादी, धर्मवादी, भाषावादी, क्षेत्रवादी सोच से बाहर निकले लोगों की संख्या ऊँगली में गिनने लायक है।

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भारत स्कूली शिक्षा, उच्चतर शिक्षा, प्रति व्यक्ति आय, प्रशिक्षित कार्यबल (Skilled workforce) रोजगार के अवसर, मृत्यु दर, ईमानदारी, समता. न्याय, सार्वजनिक और प्रशासनिक विश्वास, भरोसा आदि हर वैश्विक सूचकांक में निचले स्तर पर होता है। भारत में विकास की नीतियाँ ईमानदारी से नहीं बनाई जाती हैं। यहाँ पिछड़े समाजों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, संपत्ति, अवसर से वंचित करने के षड़यंत्र रचे जाते है। यहाँ शिक्षा, न्याय, शासन, बाजार आदि हर क्षेत्र में जातिवादी, धर्मवादी माफिया राज है। सरकार में शामिल नेता और ब्यूरोक्रेट सभी जातिवादी मानसिकता से संचालित-नियंत्रित होते हैं। किसी सवर्ण की मौत पर एक करोड़ की सहायता और गरीबों की मौत पर दो लाख की मदद की घोषणा यहाँ बड़ी निर्लज्जता, और घटियापन से की जाती है।  जाहिर है कि भारत में वैचारिकी उर्वरता भी अपने निचले स्तर पर ही है। भारत आधुनिक युग में भी मानसिक रूप से वयस्क बनने में असफल रहा है। मीडिया के बौद्धिक समाज में पिछड़ों का प्रवेश निषेध है। मीडिया के कारोबारियों में मानसिक विकलांगता का स्तर क्या है, इसे जानने के लिए कोई गंभीर शोध करने की जरूरत नहीं है। उनकी जातिवादी विकलांग सोच उन्हें बचपन से ही मुक बधिर बना देता है। मीडिया की इज्जत एक वेश्या की इज्जत से भी निम्नस्तर का है। 

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भारत के विराट जनसंख्या अपनी वैचारिकी उर्वरता के आधार पर सार्वजनिक जीवन में आगे नहीं बढ़ता है। उसमें ब्रेक लगाने की कोशिश हर स्तर पर की जाती है। भारत में वैचारिकी उर्वरता की खेती करने की कोई कोशिश कभी नहीं की गई।  बल्कि जनता के मानसिक जीवन के वैचारिकी उर्वरता को स्कूल फेल राजनीतिज्ञगण, आलू-भाजी की तरह बिके हुए मीडिया के साथ मिल कर इधर से उधर घुमाते हैं और करोड़ों लोग बिना अपने दिमाग लगाए भेड़चाल में उन कार्यों को करते हैं। भेड़चाल के पीछे कोई आधार, कारण और कारक नहीं होता है। लेकिन देशवासियों को अपने बेईमान नेताओं के पीछे चलना अच्छा लगता है, क्यों कि वे उनके जाति, धर्म, भाषा, प्रांत और संस्कृति वाले होते हैं। पोषाक और खाने की रूचि जैसे निम्नस्तर की घटिया सोच से  भारत में राजनीति और आर्थिक कार्यकलापों का संचालन होता है।

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जो देश अपने देशवासियों के लिए सर्व और सार्वभौमिक उच्च शिक्षा तक की निशुल्क व्यवस्था करते हैं। वहाँ की जनता उच्चशिक्षित, इन्नोवेटिव, स्मार्ट होती हैं और उनके विचार ठोस धरातल पर खड़े होते हैं  उनके विचारों को विभाजन प्रिय राजनीति के घटिया खेलों से डिगाया नहीं जा सकता है। वे लोकतंत्र जैसे व्यवस्था के सर्वोच्च गुणों को व्यवहार में लाकर अपने विकास की नीतियों का चुनाव बहुत बुद्धिमानी से करते हैं। उच्च शिक्षित, स्वतंत्र मीडिया वाले देश के बुद्धिमान समाज भविष्य के चुनौतियों को बाखूबी समझते हैं। ऐसे देश प्रसन्नचित जनता के उत्पादन के लिए उत्पादन के सभी साधनों को ईमानदारी से लागू करते हैं और धन के वितरण को न्यायपूर्ण बनाते हैं। उनकी न्यायिक व्यवस्था में भयभीत, डरे हुए, भ्रष्ट और नीचले स्तर के लोभी लोग कुर्सियाँ नहीं तोड़ते हैं। भारत में न्याय व्यवस्था धनवान लोगों के यहाँ चाकरी करता है।  

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भारत में विकास की नीतियाँ सभी समुदायों के विकास के लिए ईमानदारी से नहीं बनाई जाती है। बल्कि यहाँ शासक और शासन तंत्र के वैचारिकी उर्वरता को जातिवादी, धर्मवादी चुहा कुतरता रहता है और वे देश को रसातल में ले जाने के लिए बेशर्मी से राष्ट्रीय नीतियों का निर्माण करते हैं। भारत में सरकारें गरीबों के प्रति असंवेदनशील होती है और  दिशाहीन विकास की नीतियों का भी कार्यान्वयन बहुत घटिया ढंग से किया जाता है।

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जो समाज देश के सामने खड़ी चुनौतियों को दिल से नहीं समझता है। वह स्मार्ट, बुद्धिमान और चालाक समाज नहीं होता है। पारंपारिक खुमारी में जीने वाला समाज ऐसा ही होता है। ऐसा समाज कौशलपूर्ण फलदायी रणनीति नहीं बना सकता है और अपने कुल मानव पूँजी को विराट लाभ के लिए निवेश करना नहीं  जानता है। वह समाज हर दृष्टि से पिछड़ेपन का शिकार होता है। ऐसे समाज का भविष्य अंधकारमय होता है। क्योंकि वे पिछड़ेपन, नकारापन, अंधकारपन का अह्वान करते हुए अपनी वैचारिकी उर्वरता को बंजर बनाते हुए उसका इस्तेमाल करते हैं। नेह।

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