डॉ निर्मल मिंज

 डॉ निर्मल मिंज एक शिक्षाविद् और कुड़ुख भाषा के अग्रदूत विद्वान थे। उनका जन्म चैनपुर गुमला में हुआ था और उनकी आरंभिक शिक्षा भी चैनपुर गुमला, झारखंड में हुई थी। बाद में उन्होंने पटना से कालेज की पढ़ाई की और सेमिनरी यूनिवर्सिटी ऑफ मिनिसोटा से पीएचडी की डिग्री ली। वे छोटानागपुर और असम के गोस्नर इवेंजेलिकल लूथरन चर्च (जीईएलसी)  से संबद्ध थे और उनके बिशप थे। वे  रांची विश्वविद्यालय से संबद्ध गोस्सनर कॉलेज, राँची के संस्थापक प्राचार्य थे।  उनका पूरा जीवन ही मसीही कलीसिया और आदिवासी समाज की सेवा में समर्पित था।

कुड़ुख, उरांव भाषा के विकास के लिए वे जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। उनके योगदान के लिए उन्हें 2017 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरुस्कार प्रदान किया गया। उनकी शिक्षा दीक्षा चैनपुर, गुमला, पटना यूनिवर्सिटी, सेरामपुर यूनिवर्सिटी, अमेरिका के लूथर सेमिनरी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनिसोटा में हुई।  उन्होंने  यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो से पीएचडी हासिल किया था। बिशप डॉ निर्मल मिंज का पूरा जीवन मसीही कलीसिया और समाज की सेवा के लिए समर्पित था। झारखंड की जनता उन्हें शिक्षा जगत, साहित्य-संस्कृति के अध्येता के रूप में पहचानता है

, जबकि डॉ निर्मल मिंज कुडुख भाषा के अग्रणी विद्वानों में गिने जाते हैं और 1971 में उनके द्वारा स्थापित गोस्सनर कालेज राँची में सर्वप्रथम कुड़ुख सहित झारखंड के आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई इसी कॉलेज में शुरू की। एक कुड़ुख भाषी होने  के कारण डॉ मिंज ने स्वयं कुड़ुख साहित्य और शैक्षणिक विकास में अग्रणी भूमिका निभाया।  भाषा  पढ़ाई शुरू करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। वे एक उत्कृष्ट विचारक और बुद्धिजीवी थे। उनके प्रयास से रांची यूनिवर्सिटी में भी इन भाषाओं की पढ़ाई शुरू हुई. वे यंग मेंस एसोसिएशन रांची के प्रथम प्रेसिडेंट थे और विकास मैत्री संस्था के निर्माण में अहम् भूमिका निभाई। 1980 में वे नॉर्थ वेस्टर्न गोस्सनर एवंजेलिकल लुथेरॉन कलीसिया के प्रथम बिशप बने।  छोटानागपुर के मसीही कलीसिया में मांदर जैसे आदिवासी वाद्य यंत्र का प्रथम उपयोग का श्रेय बिशप डॉ निर्मल मिंज के साहसी और प्रासंगिक मसीही वैज्ञानिक सोच को जाता है। 5 मई 2021 को डॉ निर्मल मिंज का देहांत डिबडीह राँची में हो गया था।

 

 

 

गुमला के पुटो तिलसीरी में तैयार है कुड़ुख अंग्रेजी स्कूल

नेह अ. इंदवार,

गुमला जिला (झारखंड) के घाघरा प्रखंड के पुटो स्थिति तिलसिरी ग्राम में तैयार हो गया है कुड़ुख अंग्रेजी स्कूल। स्कूल का निर्माण लिटीवीर फाउण्डेशन फॉर एज्युकेशन, एग्रीकल्चर, तिलसीरी, घाघरा द्वारा किया गया है। तिलसीरी गाँव में स्थिति इस स्कूल के लिए स्व. जहाँजिया ऊराँव, तिलसीरी के परिवार ने करीबन 8 एकड़ जमीन दान में दिया है। इसके अलावा भी स्कूल के पास के गैर मजुरवा जमीन स्कूल के लिए उपलब्ध है। जिसके लिए ग्राम सभा की अनुमति मिल गई है। स्कूल का परिदर्शन शिक्षा विभाग के द्वारा कर लिया गया है। लेकिन कोविड के कारण स्कूल चालू नहीं किया जा सका है।

पुटो क्षेत्र में बनने वाला इस कुड़ुख-अंग्रेजी स्कूल के मूल निर्माण अवधारणा में कुड़ुख अंग्रेजी में ग्रेज्युएशन तक शिक्षा प्रदान करने की है। इसके साथ ही हॉस्टल और आध्यापकों के लिए क्वार्टर बनाने का प्लान भी शामिल है। फिलहाल कार्यालय और कक्षाओं के संचालन के लिए 7 कमरे की व्यवस्था हो गई है।

फाउण्डेश की स्थापना और स्कूल निर्माण में मुख्य भूमिका निभाने वाले  राजेन्द्र भगत, मूल रूप से तिलसीरी अम्बाटोली के रहने वाले भूतपूर्व बैंकर हैं। बैंक से स्वेच्छा सेवानिवृत्ति लेने के पश्चात उन्होंंने कुड़ुख भाषा के संरक्षण और विकास के लिए एक स्कूल खोलने का निश्चय किया। स्कूल के निर्माण और अन्य कार्यों में सहायता करने के लिए तिलसीरी गाँव के शिक्षा प्रेमी स्व. जहाँजिया ऊराँव के परिवार ने आगे बढ़ कर जमीन दान देने का फैसला किया। स्कूल निर्माण में ग्राम और क्षेत्र के निवासियों की सामूहिक भागीदारी रही है।  अधिकांश वित्तीय सहभागिता श्री राजेन्द्र भगत ने खुद की है।  सिसई, बिशुनपुर, भण्डरा आदि क्षेत्र से जुड़ा हुआ पुटो, गुमला जिले के घाघरा प्रखंड का एक दूर-दराज क्षेत्र है। यहाँ 99% ऊराँव समुदाय के लोग निवास करते हैं और 90% लोग कुड़ुख भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

हाल ही में प्रकाशित कुड़ुख शब्दकोश के रचयिता स्व. विजय कुमार ऊराँव जी का पैत्रिक गाँव तिलसीरी ही है। लेखक और कवि महादेव टोप्पो जी के साथ तिलसीरी गाँव के दौरे के दौरान मुझे स्व. विजय कुमार ऊराँव जी के मकान में जाने और उनके भतीजे श्री रवि ऊराँव और परिवार से मिलने का मौका भी मिला। तिलसीरी एक प्रगतिशील गाँव है और यहाँ स्पोर्टस् और शिक्षा का बहुत महत्व है। यहाँ के युवाओं ने अपने सामूहिक श्रमदान और प्रयास से एक फूटबॉल और हॉकी का  सुंदर और उपयोगी मैदान  बनाया है। गाँव में आम सहित अनेक अन्य फसलों के लिए बगीचे लगाए गए हैं और खेती-बारी के लिए परंपरागत बैल, भैंस सहित टैक्टर का भी उपयोग बहुतायत रूप से किए जाते हैं।

यहाँ  के घरोंं में बिजली के कनेक्शन उपलब्ध है, लेकिन बिजली की आपूर्ति  अननियमित है। आवागमन के लिए रोड बने हैं, लेकिन उसका संरक्षण और रखरखाव ठीक से किया जाना चाहिए। कोयल नदी पर पुल बने हुए हैं। पास के सामुदायिक जंगल की संरक्षण और देखभाल करने की जरूरत है।  दूर-दराज के क्षेत्र होने के कारण यहाँ सौर ऊर्जा अधिक भरोसेमंद साबित हो सकता है। यहाँ वन रोपन और दुधारू पशुओं के पालन की आपार संभावना है।  क्षेत्र का दौरा करने और तमाम शिक्षित जनों से मिल कर यह  एहसास हुआ कि निकट भविष्य में कुड़ुख अंग्रेजी स्कूल क्षेत्र और कुड़ुख भाषा के शिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कुड़ुख अंग्रेजी स्कूल के क्लास में लेखक कवि महादोव टोप्पो और स्कूल के निर्माता राजेन्द्र भगत

 

 

विचारों की जिंदगी में आती रहती हैं हलचल

 नेह इंदवार 

वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के भूगर्भ में निरंतर हलचल चलते रहती है। हर रोज कई दर्जन बहुत कम शक्ति के भूकंप आते रहते हैं। महीनों में कभी कभार धरती हिलती हैं और कभी-कभार दशकों या सदियों में बड़े भूकंप आते हैं और पुराने चीजों को तहस-नहस कर डालते हैं।

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इंसानी समाज में भी कमोबेश ऐसा ही होता है। समाज के गर्भ में रोज हजारों प्रकार की हलचलें होती रहती हैं। इसका असर कहीं होता है तो कहीं बिल्कुल नहीं।
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देश की आजादी के पूर्व सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर समाज में बहुत अधिक हलचल नहीं हुआ करती थीं। ग्रामीण समाज अपने क्षेत्रीय अस्मिता के साथ शांतिमय कृषि आधारित जीवन जीता था। समाज के एकीकरण में या तो समुदाय या जाति या धर्म केन्द्रीय तत्व हुआ करता था।
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लेकिन भारत की आजादी के बाद हलचलों की बाढ़ ही आ गईं। नयी औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण, सार्वभौमिक शिक्षा, सरकारी रोजगार, यातायात तथा अन्य प्रसारवादी संसाधनों का विस्तार से, हलचलहीन बंद समाज धीरे-धीरे खुलने लगे और उसके साथ नये विचार भी समाज में प्रवेश करने लगे।
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कई दशक पूर्व तक समाज परिवार केन्द्रित हुआ करता था, हर कार्य में परिवार और समाज ही केन्द्रीय भूमिका निभाता था। शिक्षा, रोजगार, सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यकलाप, शादी-विवाह,खुशियाँ गम, मृत्यु आदि शु्द्ध पारिवारिक और सामाजिक कार्यकलाप हुआ करता था।
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लेकिन देश की आजादी के बाद राजनैतिक और सामाजिक जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हुए। शिक्षा,रोजगार, संपत्ति का बँटवारा,लव मैरिज-कोर्ट मैरिज, बीमार व्यक्ति की तामीरदारी सरकारी अस्पतालों और एश्योरेंस के माध्यम से सरकारी और गैर-सामाजिक हो गए। यहाँ तक कि मृत्यु का क्रियाक्रम भी अब तो बाजार की एजेंसियाँ करने लगी हैं।
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शहरों में आज ऐसा कोई समाज नहीं रहता है, जो गाँवों में समाज बनने के तत्वों के संयोजन से बना हुआ होता है। शहरों में कमोबेश सुसंगठित समाज नहीं होता है, बल्कि सुविधाओं के जाल में बुना हुआ जनसंख्या का झूँड़ होता है। शहरी समाज सुविधाओं का उपभोग करने वाला एक ऐसा समूह होता है, जिसमें Sense of belonging का सर्वथा अभाव होता है। शहर मनोविज्ञानिक रूप से एक खंडहर होता है और तमाम शहरी सुख, सुविधा पैसों पर आधारित होते हैं।
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शहरों में बसे आदिवासी और दलित समाज का आधार या तो धर्म है या जान पहचान के क्षेत्रीय-भाषाई आधार। समुदाय, जाति, संस्कृति, भाषा आदि आज द्वितीय श्रेणी के ऐसे तत्व बन गए हैं, जो कभी-कभार सामाजिक गुम्फन तत्व (stickiness) के काम आते हैं।
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दूसरे कई समाज के मामले पर, वित्तीय स्थिति और कार्य वर्ग (एक ही तरह के कार्य करने वाले लोगों का समूह) आदि मुख्य समाज संगठक तत्व बन गए हैं। कहने का मतलब है कि गाँव में युगों से जहाँ एक होमोजेनियस समाज का वजूद हुआ करता था, वैसा समाज शहरों में नहीं है।
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अंग्रेजों के समय और उसके बाद देश के आजादी के कुछ समय तक सरकार सिर्फ सार्वजनिक मुद्दों पर कार्य करने वाली एजेंसी हुआ करती थी। उसे गाँव समाज से कमोबेश कुछ लेना देना नहीं हुआ करता था। लेकिन शनै-शनै सरकारी कानून के हाथ बेतहाशा लम्बे होने लगे और यह समाज और परिवार की सीमा को तोड़ कर असंगठित समाजों के सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों को भी प्रभावित करने लगा है। याद रखें जहाँ कहीं परिवार और समाज समाप्त होता है, वहीं से सरकारी नियम कायदे शुरू हो जाते हैं।
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आजादी के कुछ दशक बाद बने कानूनों ने समाज और परिवार की भूमिका में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया और वह हर नागरिक के लिए क्या कर्तव्य और अधिकार होने चाहिए, उस पर वह बेरहम बॉस की भूमिका में आ गया है। सामाजिक और पारिवारिक भूमिका को खत्म करके अपने लक्ष्योंं को कानून के डंडे पर कार्यन्वित करना शुरू कर दिया। आज बच्चे की शिक्षा, बच्चों की शादी की आयु, संपत्ति का बँटवारा, उसका रजिस्ट्रेशन, आय-व्यय और कर देयता आदि मामले में आप कानून का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। भले ही परिवार और समाज का सोच कितना भी अलग क्यों न हो।
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आज का भारतीय इंसान एक पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति से अधिक देश के कानूनों से बंधा एक इंसानी नागरिक है। पारिवार और समाज और उसके तमाम भूमिकाओं को सीमांकित करते हुए कानून हर व्यक्ति के अधिकार को सामाजिक और पारिवारिक से बदल कर व्यक्तिगत अधिकार में बदल दिया है। नये-नये कानूनों के द्वारा इसे और भी मजबूत किया जाएगा, क्योंकि परिवार और समाज की प्रभावी भूमिका नगण्य होने लगी है।
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आज एक वयस्क व्यक्ति अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए, अपने सुख और स्वार्थ के खातिर परिवार और सामाज की उपेक्षा कर सकता है। यदि व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वलंबित हो तो उसे परिवार और समाज की कोई परवाह नहीं हो सकती है। शहरों में हर परिवार, दुकानदार या कोई भी व्यक्ति अपने घर के चार दीवारी के बाहर सरकारी कानूनों से बंधा हुआ होता है। उसकी सुरक्षा, उनकी स्वतंत्रता की जिम्मेदारी परिवार नहीं उठाता है, बल्कि घर के बाहर वह सरकारी कार्य-व्यापार (affairs) कानून और व्यवस्था का अंग हो जाता है।
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आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक-आत्मविश्वास उस व्यक्ति से अलग होता है, जो खुद आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होता है। लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति बौद्धिक रूप से आत्मनिर्भर न हो तो वह क्या कर बैठेगा, इसका अंदाजा किसी को भी नहीं होता है। व्यक्तिगत आबाध आजादी भी कभी-कभी व्यक्ति और समाज के लिए जी का जंजाल बन जाता है।
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जो समाज खुद विभिन्न आधारों पर छिन्न-भिन्न रहता है, उसके सदस्य उतने ही परालंबित होते हैं। व्यक्ति को दिशा निर्देश देने में ऐसे समाज अक्षम होते हैं। सांस्कृतिक रूप से ऐसे समाज का एकीकरण तत्व कमजोर होता है और उसके ऐसे सदस्य जो बौद्धिक रूप से चेतनाशील नहीं होते हैं,वे व्यक्तिगत मामलों में अपने सामाजिक और पारिवारिक नियमों से अधिक सरकारी नियमों के नजदीक होते हैं। सरकारी नियम कायदे दैनिक जीवन में निष्क्रिय होते हैं, और वे व्यक्ति के सर्वोच्च कल्याण के लिए उचित और नैतिक सलाह देने में सर्वथा असमर्थ होते हैं। लेकिन कानून समाज के ऐसे सदस्य के जीवन में सक्रिय रूप से भी अधिक नजदीक होते हैं। जो अपनी कानूनी प्रक्रिया से सुरक्षा देने से अधिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से अधिक परिशानी दे सकते हैं और उत्पीड़न कर सकते हैं। कानून यहां दुधारी तलवार बन जाती है। सुरक्षा भी देती है लेकिन घायल भी करती है।
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देश में व्यक्ति, आज तक, न तो पूरी तरह सरकारी नागरिक बन सका है और न ही वह पूरी तरह से गैर-पारिवारिक और गैर-सामाजिक बन सका है। भारत में तमाम समाज एक संधि काल से गुजर रहे हैं। तमाम समाज न तो पूर्ण शिक्षित, आधुनिक प्रगतिशील विचारों से सुसज्जित और आर्थिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र बन सका है और न ही दूसरी ओर सरकार नागिरक का हर पल ख्याल रखने वाला सुख-दुख का पक्का अभिभावक बन पाया है। यहाँ व्यक्तिगत आजादी को यूरोपीय आजाद समाज तक पहुँचने में कम से और दो सौ साल लगेंगे। भारतीय उत्तर आधुनिक काल यूरोप के जागरण काल से आगे नहीं बढ़ पाया है।
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व्यक्तिगत ख्वाहिशें, सुख, स्वार्थ आदि कुछ ऐसे विषय हैं जो निरंतर बदलते रहते हैं। आयु विशेष में वह सिर चढ़ कर बोलता है। वहीं पारिवारिक ख्वाहिशें, सुख, दुख, स्वार्थ, कल्याण, प्रगतिशीलता के विषय रोज और निरंतर बदलने वाले विषय नहीं होते हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताएँ हमेशा अलग-अलग होते हैं। व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सुख के लिए समाज को बदलने का आदेश नहीं दे सकता है और न ही पारिवार अन्य दूसरे सदस्यों की कीमत पर, किसी एक सदस्य को मनमानी करने की छूट दे सकती है। प्राचीन काल में विद्रोही सदस्य अपने विद्रोह से समाज और परिवार को तिलांजली दे कर साधु, सैनिक आदि बन जाते थे, क्योंकि अपने समाज का विद्रोही दूसरे समाज का सक्रिय खुशमिज़ाज सदस्य नहीं बन पाते थे। हर समाज में दूसरे समाज के सदस्यों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के अपने कारण विद्यामान हैं और उन कारणों को रातों रात किसी दो चार सदस्यों के सुख, स्वार्थ और कल्याण के नाम बदलते नहीं देखा गया है। विद्रोह मानवीय स्वभाव है और इसे समाज का मुख्य धारा नहीं माना जाता है। इसे हमेशा अपवाद की श्रेणी में रखा गया है।
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आजादी के बाद समाज का हर तबका का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है। बाजारवाद ने व्यक्तिवाद को हवा दिया। देश में जनसंख्या अधिक है और संसाधन कम ऐसे में व्यक्तिवाद के मनोविज्ञान को काम में लगा कर तेजी से बदलते महौल में संसाधनों को हड़पने का भी एक नया लेकिन गैर कानूनी आंदोलन भी शुरू हो गया। पूँजीवाद की दुनिया में इसे क्रोनी कैपिटलइज्म कहा गया है। जबकि सामाजिक मामले में इसे ठगी, चालाकी और भ्रमित कार्य कहा गया है। यह आंदोलन शुद्ध व्यक्तिवाद के आधार पर काम करता है। लेकिन जहाँ कहीं परिवार और समाज की सोच, विचारधारा, जागरूकता, चेतनाशीलता अपने शबाब पर होता है, वहाँ यह औंधेमुँह गिरता है। जर, जोरू और जमीन की लूट कोई नयी बात नहीं है। इसके तह में जाने के लिए इतिहास पढ़ने की जरूरत भी नहीं है।
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आज का आदिवासी समाज और पचास-सौ वर्ष पूर्व के आदिवासी समाज में भारी अंतर है। शिक्षा, आरक्षण, आय, सम्पत्ति, सम्पन्नता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नयी सोच के आंदोलन ने एक नये आदिवासी समाज का गठन किया है। सुख, खुशी और स्वार्थ के सारी इच्छाओं को पूर्ण करने की ख्वाहिशें भी समाज में भीतर-भीतर, उसी तरह से मचलने लगी हैं, जैसे पृथ्वी के अंदरूनी क्षेत्रों में ज्वलामुखी के माध्यम से बाहर आने के लिए भूगर्भीय शक्तियाँ मचाया करती हैं। लेकिन यह कम शक्तिशाली होने के कारण अपने सीमित एरिया को छोड़कर और कहीं प्रभाव नहीं डालती है।
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लेकिन समाज में कब कोई बड़ी भूकंप आ जाए, इसे कोई नहीं जानता है। लेकिन यह तय है कि जब बड़े भूकंप आते हैं तो वह अनेक पुराने इमारतों को गिरा कर तहस नहस कर डालते हैं। लेकिन जापान में अब भूकंपरोधी इमारतें ही बनती है। वहाँ दूसरे गैर-भूकंपरोधी इमारतों के लिए कोई जगह नहीं होती है। जाहिर है कि इमारतों के लिए भूकंपरोधी तकनीकी का विकास किया जा सकता है, लेकिन जीवन और विचार निरंतर चलायमान होते हैं और यहाँ कोई रोधी, अवरोधी तकनीकी काम नहीं करते हैं। विचारों में कंपन ही विचारों का जीवन है।

गरीब अंधे को चाहिए दो आँखें

                                       नेह इंदवार

प्रश्न 1. अंधे को क्या चाहिए ? उत्तर - दो आँखें।

प्रश्न 2. एक नेता को क्या चाहिए ? उत्तर - नेता बने रहने के लिए वोट चाहिए।

किसी के पास दो आँखें हैं, लेकिन वह किसी अंधे के हजारों बार मिमिया कर मांगने पर भी दो आँखें  नहीं देता है। बल्कि वह अंधे के आँखों में काजल लगा देता है।

अंधे के बार-बार मांगने पर वह कभी उसे नया शर्ट पहना देता है, कभी उसके हाथों में अंगुठी पहना देता है, कभी वह अंधे को चप्पल पहना देता है, अधिक मांगने पर वह अधे को कोर्ट और पैंट पहना देता है और ऊपर से एक टाई भी पहना देता है। अंधे के और अधिक चिल्ला कर मांगने पर वह अंधे को एक आईना दे देता है।

जिनके पास दो आँखें हैं और जिसे अंधे पर लगा देने पर अंधा सामान्य दृष्टि वाला बन जाएगा। उसे सारी दुनिया दिखाई देने लगेगी और वह विकलांग नहीं रह जाएगा। लेकिन जिस आदमी के अलमारी में आँखें रखी हुई है, वह आदमी अंधे को किसी भी तरह से आँखें नहीं देता है और दुनिया को बताते रहता है कि देखो मैं कितना दयावान हूँ, एक अंधे को शर्ट, अंगुठी, चप्पल, कोर्ट-पैंट-टाई, आईना देता हूँ और इसका देखभाल करता हूँ। वह लोगों के सामने अपने को दयावान और परोपकारी का रूप दिखाने के लिए अंधे को सहारा देने के लिए एक नौकर रख देता है। दुनिया कहती है कि देखो ! देखो ! वह आदमी कितना दयालु, परोपकारी और दयावान है कि उसने एक अँधे को सहारा देने के लिए एक नौकर तक रख दिया है। है कोई ऐसा दयालु आदमी ?? 

पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के हाथों में अंधे (चाय मजदूरों) के लिए दो आँखें (न्यूनतम मजदूरी, आवास पट्टा) है। लेकिन वह उन्हें दो आँखें न दे कर कभी किसी महापुरूष के नाम पर छुट्टी दे देती है तो कभी किसी परब पर सवेतन अवकाश। सरकार  पूरे देश और प्रदेश को मिलने वाला राशन दे देती है। बच्चों को साईकिल दे देती है, स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों को कन्यश्री के पैसे दे देती है। कभी कहीं जरूरी होता  है तो कोई प्राईमरी या हाई स्कूल दे देता है। कभी किसी जाति और समुदाय को कोई सामुदायिक विकास बोर्ड देकर कुछ पैसे दे देती है। जिन्हें युगों से गरीब बना कर रखा हुआ है, उन्हें पेंशन के नाम पर कुछ पैसे दे देती है। 

वह फालतू के अनेक चीजें देती है और कहती है देखो मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या सुविधा दे रखा है ? 

राशन, साईकिल, स्कूली बच्चों और कन्या बच्चों को पैसे, पंचायत को आबंटन आदि देश के अधिकतर या सभी प्रदेशों में मिलते हैं, उसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल सरकार भी देती है।  लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी कहती है मैंने तुम्हें अमका-ढिकाना दे दिया है। तुम्हारे कुछ लोगों को मैंने जिला स्तर के नेता बना दिया है। कुछ लोगों को शहरों के प्रशासनिक बोर्ड में शामिल कर दिया है,  इसलिए तुम मुझे अपना सारा वोट दे दो।

मजदूर कहता है कि सरकार मैं एक अंधा (गरीब, अनपढ़) हूँ, मुझे तुम दो आँखें (न्यूनतम मजदूरी और पट्टा) दे दो, मैं हमेशा के लिए तुम्हारा गुलाम बन जाऊँगा, लेकिन माँ-मनुष्य-माटी की यह सरकार इन दो मांगों की बात आने पर सरकार अपना चेहरे को किसी और दिशा में मोड देती है, जैसे कि उन्होंने इस संबंध में कोई बात सुनी ही नहीं है। वह गलती से लोकसभा के चुनाव के समय तीन बार (सुभाषिनी बागान,  टियाबोन, चालसा और कुमारग्राम में) बगानियारों को उनके घर के जमीन का पट्टा देने का ऐलान कर दिया था। लेकिन बाद में अपनी भूल महसुस करके विधानसभा चुनाव में इस मुद्दों पर अपने मुँह को जोर से बंद कर दिया। बाप रे! ऐसी गलती फिर न करूँ मैं । 

राज्य सरकार किसी भी कीमत पर दोनों को देने के लिए राजी नहीं है। उनके मन में बागान मालिकों के लिए जितनी लगाव है, उसका एक तिनका भी चाय मजदूरों के लिए नहीं है। .सरकार मजदूरों को अंधा ही बनाए कर रखना चाहती है, क्योंकि मजदूरों को आँखे मिल जाएगी तो वह सामर्थवान हो जाएगें, उनका अपना मनपसंद और अपने आर्थिक सामर्थ से बनने वाला अपना घर और पुरखों का जमीन होगा, वे अपने बच्चों को अच्छी और ऊँची शिक्षा देने में समर्थ होंगे और वे उन्नति के शिखर पर पहुँच जाएँगे। ऐसे सामर्थवान मजदूर एक सामर्थवान भारतीय नागरिक बन जाएँगे, और वे चाय मालिकों के चंगुल से बच कर निकल जाएँगे और धाँगर (गुलामी) की जिंदगी से आजाद हो जाएँगे। उन्हें आजादी किसी भी कीमत पर नहीं देनी है, इसीलिए उन्हें अंधे ही बना रहना देना है।

अब मजदूर क्या करेंगे ? मजदूरों का भी अपना कर्तव्य होगा -- वे नेताओं का खूब नाचते हुए स्वागत करेंगे, उनका जयजयकार करेंगे, उन्हें अपने साथ नृत्य कराएँगे, उन्हें फूल माला पहनाएँगे, उन्हें अपना घर और इलाके में बार-बार स्वागत करेंगे, नेता के मिटिंग में भारी संख्या में जाएँगे, उनका दिया हुआ मुर्गा भात खाएँगे, दारू पीएँगे, लेकिन कभी भी भूल कर भी अपना #अमूल्य_वोट_नहीं देंगे। जिस तरह माँ मनुष्य की सरकार दो आँखें नहीं देती है वैसे ही मजदूर भी अपना वोट नहीं देंगे। भले वोट प्राप्त करने के लिए कितने भी बगानियारों को बड़े-बड़े पद देकर वोट की जुगाड़ करवाएँगे। 

जरा सोचिए ऐसे नेता का क्या होगा, जिन्हें कोई वोट ही नहीं देगा। उसकी नेतागिरी और सत्ता तो हाथ से निकल ही जाएगी न। लेन-देन तो बराबर की चीजों में होती है। सौ रूपये देकर 10 रूपये का सामान लेकर कौन लगातार बेवकूफ बनते रहेगा ? 

यदि नेता को वोट चाहिए तो अंधे (मजदूर) को भी दो आँखें चाहिए।

यह एक सीधी सी बात है, इसे यदि कोई नेता न समझे तो समझ जाईए कि वह नेता वास्तविक रूप में बोका मनुष्य है।

कहाँ चले गए वे लोग

 

नेह इंदवार

फेसबुक में रोज नये सदस्य जुड़ते जाते हैं।  लेकिन फेसबुक से गायब होने वाले सदस्यों की संख्या भी कम नहीं है।

दो तीन साल पूर्व जो सदस्य अत्यधिक रूप से सक्रिय रहते थे, वे अब कभी कभार दिखाई देते हैं। कई तो पूरी तरह से फेसबुक से गायब हो गए हैं। उनका न तो कोई अपडेट मिलता है और न कोई पोस्ट। इसीलिए कभी-कभार सवाल उठता है, कहाँ गए वे लोग ?

2011-12 सालों में नियमित पोस्ट डालने वाले, कमेंट करने वाले अनेक लोग फेसबुक में सिरे से गायब है?

फेसबुक एक आधुनिक संचार माध्यम है। यहाँ विचारों के लाखों मंच है। राजनेता, मंत्री, उद्योगपति, फिल्म, टेलिविजन और अन्य क्षेत्रों के गणमण्य व्यक्ति अखबारों, खबरिया चैनलों के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करते रहते हैं और उन्हें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए किसी माध्यम की तलाश नहीं रहती है। ऐसे लोगों को पब्लिक रिलेसन्स मैनेजर उनके जनसंपर्क को गढ़ने, सुदृष्ट करने और उनके विचारों को उनके हितसाधन के लिए उपयोग या दूरूपयोग करने के लिए प्लानिंग करते रहते हैं। वे अपने सार्वजनिक पदों के कारण सहज ही अपने विचार मीडिया में संचारित कर लेते हैं।

लेकिन ओर्कुट, फेसबुक, ट्यूटर, ह्वाट्एप, गुगल +, टम्बर, इंस्टाग्राम, क्यू क्यू, वीचाट् आदि सोशल साईट के पूर्व आम जनता के लिए अपनी बात रखने के लिए कोई मंच उपलब्ध नहीं था। आम जनता तथाकथित मुख्य धारा के मीडिया के द्वारा परोसे जाने वाले सामग्री को पढ़ने के लिए अभिशप्त थे। 

इंटरनेट टेक्नोलॉजी के आगमन के बाद दुनिया बहुत बदल चुकी है।

पूरी दुनिया में आर्थिक और सामाजिक रूप से शोषित और वंचित तबका अभिजात वर्ग के मुट्ठी में कैद संचार एकाधिकार से भी शोषित और वंचित था। विचारों की अभिव्यक्ति की दुनिया में इंटरनेट टेक्नोलॉजी ने तथाकथित अभिजात वर्ग के संचार साधनों की एकाधिकार को तोड़ दिया है। 

वंचितों शोषितों के हित और सार्वजनिक कल्याण और उससे संबंधित नीतियों और उनके कार्यान्वयन को, कभी भी न तो प्रमुखता से संचार साधन या मीडिया में स्थान मिलता था, न ही उनकी कमियों, त्रुटियों और उसमें उपस्थित भयानक फासले और शुन्यता पर ही कोई सार्थक बहस, विमर्श या चर्चा होता था। सब कुछ एक तरफा नदी की तरह बहाव का मामला था। 

जनसंचार और मीडिया के तमाम साधन कुछ मुट्ठी भर अभिजात वर्ग के हाथों में सिमटा हुआ था और वे उसे अपने हित के उपकरण के रूप में मनमाने ढंग से चलाते थे। आम जनता विशेष कर पिछड़े, दबे कुचले लोगों की कोई आवाज़ कभी मुकम्मल ढंग से राष्ट्रीय मीडिया में सुनाई नहीं देती थी। भारतीय मीडिया तो सवर्ण समाज के वर्चस्व और हित की लड़ाई में युद्धक तोप और मिसाईल ही बना था। 

लेकिन नये जमाने के सोशल साईटों ने स्थिति को उलट कर रख दिया है। आज तथाकथित राष्ट्रीय खबरें देने वाले लोग बेनकाब होते जा रहे हैं। आम जनता रोज जान रही है कि मीडिया के क्षेत्र में कौन भेड़िया है और कौन बकरी ? आज खबरों के स्रोत खुद आम जनता है और वही खबरों के विश्लेषक भी। सस्ती चाईनिज मोबाईल ने गाँव के घिसु और माधो को भी आज संवाददाता और खरबनवीस बना दिया है। अभिजात वर्ग अपने जिस काले चरित्र को हमेशा छुपा कर रखता था, वह आज उजाले में बदसूरती का प्रतीक बन गया है। उसकी बदसूरती से सारा देश और संसार परिचित हो रहा है और वह उसे लानत, मलानत भेजने में जरा भी नहीं हिचकिचाती है। आज सोशल साईट्स गरीब, वंचित और हाशिये के समाज का मजबूत हथियार बन गया है।

लेकिन हर सिक्के की तरह ही सोशल मीडिया के भी दो पहलू है। जिन्हें सिक्के के दोनों पहलूओं को ध्यान से देखने की आदत नहीं है, वह एक ही पहलू को देखकर उसके सिक्के होने की बात को मान लेता है। लेकिन जो पारखी होते हैं वे न सिर्फ सिक्के के दोनों पहलूओं को ध्यान से देखते हैं बल्कि सिक्के के दोनों पहलूओं में लिखे ईबारतों को भी पढ़ते हैं और बाजार में सिक्के की सही कीमत का अंदाजा भी लगा लेते हैं।

सोशल साईट ने नये-नये अंदाज में नये-नये शब्द भी दिया है। “व्हाट्सएप विश्वविद्यालय” शब्द भी यहीं से जन्म लिया है। सीधे-सादे लोग इस शब्द को व्हाट्सएप से जोड़कर देखते हैं। लेकिन चालाक लोग वाक्यों के बीच के अर्थ को समझने के लिए इस शब्द का प्रयोग करते हैं।

फेसबुक सिर्फ दोस्तों, रिश्तोदारों या नेताओं का ही मंच नहीं है। मुख्यतः यह वैकल्पिक विचारों का मंच के रूप में उभर कर आया है। यहाँ घाघ नेताओं के शून्यता से घिरे विचारों से भी मुलाकात होती है तो आम लोगों के आम जीवन से सरोकार रखने वाले गहरे विचार भी आदमी को विचारोंतेजक बना देते है।

फेसबुक में ऐसे लोग बहुत सक्रिय हो जाते हैं, जिन्हें विचारों की दुनिया में रमना पसंद होता है। वहीं ऐसे लोग फेसबुक से गायब भी हो जाते हैं, जिन्हें विचारों की दुनिया से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं है और जो अपने जन्मदिन का केक और कुछ यादगार फोटो को शेयर करना ही फेसबुक की उपयोगिता मानते हैं। जिन्हें उपयोगितावाद के बारे कुछ भी नहीं मालूम वे चीजों के उपयोगी होने या नहीं होने पर बहुत जल्दी अपनी राय बना भी नहीं पाते हैं।

व्यापार की दुनिया सोशल साईट्स को मुनाफा बनाने का एक बना बनाया बाजार मानता है। वहीं विचारों और संस्कृतियों के माध्यम से अपने राजनैतिक साम्राज्य को विस्तार देने वाले इसे एक जगह इकट्ठे श्रोताओं का समूह मानते हैं। वोटरों के दिमाग को उलट-पलट करने का यह उत्तम उपकरण बन गया है। चुनावी रणनीतिकारों के लिए फेसबुस एक चुनावी रैली बन जाता है। 

दूसरी ओर वंचित और शोषितों के लिए चिंतन करने वाले इसे अभिजात और सामंती मानसिकता से जीवन जीने वाले वर्ग के अमानवीय स्वार्थों से मुकाबला करने का रणक्षेत्र के रूप में देखते हैं। बौद्धिक विकास करने, विचारों को पढ़ने, विचारों की गहरी चालों को समझने, नेटवर्क बनाने, सरसरी अध्ययन करने आदि तमाम किस्मों का विश्वविद्यालय वर्तमान के सोशल साईट्स ही हैं। ज्ञान के सागर में निरंतर बदलते पहलुओं, उनकी सीमा, तर्कों और उनकी औचित्य आदि को गहरे रूप से जाँचने का भी यह एक ज्ञानमंच है।  जो सोशल साईट्स से बोर होकर यहाँ से गायब हो जाते हैं, उन्हें अपने दृष्टिकोण पर आत्मचिंतन जरूर करना चाहिए।

गायब होते लोगों से फेसबुक जैसे सोशल साईट यही कहता है “ जो विचारों की लड़ाई से डर गया, समझो वह बौद्धिक रूप से मर गया।" नेह। 

 

मनोविज्ञान से व्यक्तित्व विकास

 

नेह इंदवार

आमतौर से यह माना जाता है कि मनोविज्ञान विशेषज्ञों का विषय है। हालांकि पेशेवर रूप से इसे सार्वजनिक प्रैक्टिस करने के लिए क्वालिफाईड विशेषज्ञों को ही अनुमति दी जाती है। लेकिन आम लोग भी मनोविज्ञान का सामान्य अध्ययन करके इसे अपने जीवन में रोज़मर्रा के कार्यों में प्रयोग कर सकते हैं। यह वास्तविक है कि मनोविज्ञान विषय के अध्ययन अध्यापन के युगों पहले से ही दैनिक व्यवहार में इसे प्रयोग में लाया जाता रहा है।

मनोविज्ञान की जानकारी जीवन को खुश-नुमा बनाने, समस्याओं को हल करने, अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव लाने, कठिन परिस्थितियों को संभालने, अपरिचित लोगों से स्थायी संबंध बनाने के पूर्व उनकी मानसिकता, सोच और जीवन दृष्टि को समझने आदि हजारों कार्य के लिए बहुत काम के सिद्ध होते हैं। मनोविज्ञान की जानकारी व्यक्ति के नज़रिए, सोच, कार्य, लक्ष्य, आदत आदि को बहुत प्रभावित करता है।

यह गलतियाँ करने से व्यक्ति को बचाता है और लोगों को सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सोच, व्यवहार के स्तर पर हजारों तरह के कार्य अपरोक्ष या परोक्ष करता है। मनोविज्ञान की सामान्य जानकारी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के काम में भी बखूबी काम में आता है। जीवन के लिए तय उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति में मनोविज्ञान की जानकारी बहुत सहायक होते हैं।

मनोविज्ञान में दक्ष व्यक्ति इसका प्रयोग करते हुए अपनी बातों में परिस्थितियों के अनुसार प्रभाव उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। उनकी बातों में गुंथे हुए शब्दों और वाक्यों में चमत्कार होते हैं। वे किसी व्यक्ति के दिमाग के अंदरूनी हिस्से में पहुँच कर सोच और आदत को बदलने की शक्ति से युक्त भाषा और वाक्य बोलने में दक्ष होते हैं और व्यक्ति को लक्षित करके खास उद्देश्यों के लिए बोले गए शब्द अपने काम कर जाते हैं। यह व्यक्ति के खोए हुए आत्मविश्वास को लौटा सकता है, उनमें नयी जोश और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं तथा व्यक्ति के सहज सोच और चिंतन धारा और स्वास्थ्य  को बदल सकते हैं। सटीक तरीके से कहे गए प्रशंसा के बोल अक्सर जादुई असर करते हैं। 

गुरू शिष्य परंपरा में गुरू के द्वारा सैकड़ों शिष्यों में से चुने गए खास शिष्य को विशिष्ट मुद्रा और अवसर में यह कहना कि “आप ईश्वर के चुने हुए खास साहसी और आध्यात्मिक व्यक्ति हैं”, नये शिष्य को ह्रदय के अंदर तक प्रभावित करता है। ये शब्द शिष्य को खसम-खास होने का एहसास कराता है। उसे खास लक्षित विचार-खांचे में ढालने के लिए काफी होता है। किसी नये रंगरूट को सेना के बड़े अधिकारी जब यह कहता है कि “रंगरूट तुम्हें हमने नहीं चुना, बल्कि चार हजारों लोगों के बीच से तुम्हारी योग्यता ने ही तुम्हें चुना है।“ “तुम्हें ईश्वर ने सेना में अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देने के लिए चुना है, तुम्हारा जन्म ही देश की सेवा करने के लिए हुआ है।“ इतना सुनने के बाद नये रंग-रूट की आत्मा सेना के प्रति नतमस्तक और समर्पित हो जाता है। व्यक्ति के दिल-दिमाग को लक्ष्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कराने में मनोविज्ञान युगों से सफल रहा है। 

“तुम्हे हजारों में चुना गया है”  या “तुम खुद ईश्वर के द्वारा चुने गए हो” आदि वाक्य विशेष प्लान और उद्देश्य के तहत बोला जाता है। नये रंगरूट यह सुन कर कुप्पा हो जाता है कि “उन्हें ही यहाँ प्रवेश करने की इजाज़त मिली है,” “दूसरे दो हजार अयोग्य लोगों को नहीं।“ यह वाक्य किसी को विशेष व्यक्ति या विशेष होने के मान सम्मान का एहसास कराने के लिए काफी होता है। किसी ग्रुप के सामान्य सदस्यों में से किसी विशेष सदस्य को बड़ी ज़िम्मेदारी देने या पदोन्नति देने के लिए भी ऐसे ही वाक्यों से व्यक्ति को प्रेरित किया जाता है। ऐसे शब्दों में बड़ी जादुई शक्ति होती हैं। यह व्यक्ति के दिमाग में जादू की फूलझड़ी बन कर आतीशबाजी करती हैं। ऐसे शब्द किसी नये बंदे के दिमाग से अवांछित चिंतन या सोच-शंका को बाहर निकालने और संगठन या संस्थान के प्रति नये समर्पित चिंतन या सोच को सिंचित करने का एक नयाब तरीका है। यह सब मनोविज्ञान के तहत व्यक्ति में परिवर्तन करने के लिए प्रयोग किया जाता है। किसी की योग्यता, क्षमता, विशेषता को नपे तुले शब्दों में विशेष परिस्थिति और अंदाज में व्यक्त करने से व्यक्ति की कार्य-क्षमता, योग्यता का न सिर्फ सम्मान होता है, बल्कि इससे उसके वैयक्तिक गुणों को मान्यता भी मिलता है। सम्मान और मान्यता व्यक्ति के गुणों को बढ़ाने में अधिकतर मामले में सफल होते हैं। गुणों को पुरस्कृत करने का सबसे बड़ा लक्ष्य यही होता है। किसी संगठन के युवाओं को प्रशिक्षित करने के क्रम में यह एक अनिवार्य तत्व के रूप में कार्य करता है।  

अक्सर नयी कमसीन दुल्हन को घर की अंत-रंग और विश्वासी सदस्या बनाने के लिए भी ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। जब घर के अंदरूनी और महत्वपूर्ण प्रबंधन ढाँचे में नयी दुल्हन को शामिल करना होता है तो, घर के बड़े बुजुर्ग द्वारा उन्हें घर की चाबी के गुच्छे थमाया जाता है और उन्हें घर की मालकिन का पद दिया जाता है, ताकि वह समर्पित, उत्तरदायी, समझदार, विश्वासी बने और अपने को घर का अभिन्न हिस्सा समझे और तदनुसार उत्तरदायित्व का निर्वहन करे।

चाबी के गुच्छे किसी अल्हड़ कम-सीन युवती को घर के अभिभावक होने का एहसास कराता है और उनके असावधानी भरे बिनव्याही व्यवहार से उन्हें भावनात्मक रूप से अलग कर देता है। ज़िम्मेदारी की ऐसी भावना को द्विगुण करने के लिए  दामाद को ससुराल में घनिष्ठ सदस्य बनाने के लिए भी इसी तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। दामाद का ससुराल के साथ मानसिक और भावनात्मक संबंध बना कर लड़की के घर वाले बेटी की दाम्पात्य भविष्य को अधिक सुदृढ़ करते हैं। मनोविज्ञान का यह पहलू युगों से समाज में प्रयोग में लाया जाता रहा है।  

दुनिया के अनेक समाजों, संगठनों या सिक्रेट सोसायटियों में बाहरी सदस्यों को अंदरूनी सदस्य बनाने के लिए खास तरीके से पेय दिया जाता है या खास तरीके से खाना खिलाया जाता है या फिर उन्हें घर-संगठन के महत्वपूर्ण क़ागज़ात या संदूक या आभूषण या चाबी या पद थमाया जाता है या फिर घर के कनिष्ठों की देखभाल और कल्याण की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी जाती है। नई जिम्मेदारियाँ देते हुए मनोविज्ञान से रंजित वाक्यों का व्यवहार किया जाता है। ये सारे व्यवहार मनोविज्ञान के सिद्ध चाशनी से सने हुए होते हैं। 

धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या प्रशासनिक रूप से स्वीकृत ऐसे सैकड़ों संस्कार या परंपराएँ होती हैं, जो सदियों से कामयाब और उपयोगी सिद्ध हो चुकी रहती हैं। धार्मिक रूप से स्वीकृत परंपरा और विश्वास मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत प्रभावी होते हैं। बचपन में डाली गई धार्मिक आदतें व्यक्ति के जीवन से चाह कर भी सहज रूप से ज़ुदा नहीं होते हैं। जिन्हें धार्मिक रूप से अहले सुबह ब्रह्मा मुहुर्त में उठकर स्नान करने की आदत लगी होती है, वह आदत कालांतर में दिमाग के अंदरूनी भाग का अभिन्न हिस्सा बन जाती है और व्यक्ति किसी कारण-वश कभी अहले सुबह नहीं जाग कर स्नान नहीं कर पाता है, तो उनके दिमाग में इसके लिए पश्चाताप की भावना तक घर कर जाती है।

यदि कोई  बचपन से मंगलवार को किसी मंदिर विशेष में जाता है और किसी मंगलवार को वह उस मंदिर-विशेष में नहीं जा पाता है और उन्हें उन्ही देवता के किसी दूसरे मंदिर में जाना पड़ता है, तो भी उनके दिमाग में गहरे रूप से अंकित अपनी आदत के पूर्ण नहीं होने के लिए उनकी भावनाएँ कचोटती रहती है। पश्चाताप और कचोटने की भावना दिमाग के स्वास्थ्य कार्यप्रणाली में बस कर दिमागी को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने लगता है। पाप-पुण्य के विचार भी इसी तरह दिमाग को प्रभावित करता है।  

आमतौर से आदत को लोग बहुत सामान्य ढंग से लेते हैं। लेकिन आदत जीवन की डोर को किसी खास लहज़े में बाँध कर उन्हें उन लहज़ों का ग़ुलाम बना देता है, इन बातों से वे अनजान होते हैं। कई लोग आदत की वजह से सभी से सभी व्यक्ति के सामने एक ही तरह से पेश आते हैं और सभी परिस्थितियों में भी एक ही तरीके से बात और व्यवहार करते हैं। जबकि हर परिस्थिति और स्थान किसी खास तरह के बातचीत और व्यवहार की प्रत्याशा करता है। घर और कार्यालय के बातचीत, बोलने के ढंग, भाषा, व्यवहार, उठने, बैठने, प्रत्युतर देने, कार्य करने के ढंग एक तरह से कभी नहीं हो सकते हैं। मनोविज्ञान का ज्ञान इन मामलों में बहुत मददगार साबित होता है।  

आदत हर आदमी को किसी खास तरीके से एक अलग व्यक्ति बनाता है। हर व्यक्ति खास होता है। हर व्यक्ति की सोच, आदत और व्यवहार किसी खास सांचे में ढली हुई होती है। कोई आदत व्यक्ति को फायदा पहुँचाता है, वहीं कोई आदत आदमी के लिए मुश्किलें भी लाता है। जल्दी उठना, जल्दी सोना, देर से जागना देर से सोना हर बार फ़ायदेमंद नहीं होते हैं। 

हर व्यक्ति, संस्थान या संगठन जीवन में आगे बढ़ना चाहता है। प्रगति की आकांक्षा जीवन सोच का मूल आधार  है। प्रगति, विकास और सुख की वृद्धि ही सारे संसार के कार्य-व्यवहार का लक्ष्य होता है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कुछ खास प्रकार के दक्षता, क्षमता, गुणों के साथ इन्हें प्राप्त करने लायक कार्यकारी योजना की जरूरत होती है। वांछित क्षमताओं, लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मनोवैज्ञानिक ज्ञान के सहारे खास तरह की आदत विकसित की जा सकती है, या प्लांट की जा सकती है, जो लम्बे काल में कार्य सिद्धि के लिए फ़ायदेमंद होते हैं। मनोविज्ञान ऐसी आदतों को त्यागने में सहायक होते हैं जो लाभदायक नहीं होते हैं।

पूरी जिंदगी व्यक्ति अपने मन के सहारे जीता है। यदि मन के विज्ञान से वह वाक़िफ़ हो जाए तो तन मन और जीवन-धन सभी का सभ्यक,  सुचारु और कारगर  प्रबंधन किया जा सकता है। नेह। 

कार्तिक ऊराँव

 

कार्तिक ऊराँव का जन्म करौंदा, लिट्टाटोली ग्राम में 29.10.1924 में कार्तिक अमावस्या के दिन एक ऊराँव आदिवासी परिवार में हुआ था। माँ का नाम बिरसो उराँव और पिता का नाम जौरा उराँव था। कार्तिक उराँव का गोत्र मिंज है। करौंदा लिट्टाटोली राँची गुमला मार्ग में गुमला से 8-10 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। कार्तिक उराँव के चार संतान हुए। जयश्री, राजश्री, गीताश्री और तेजप्रकाश उराँव। गीताश्री झारखंड राज्य में शिक्षा मंत्री रह चुकी हैं।

कार्तिक बाबु की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के निकट के खोरा जामटोली के शिक्षा दान केन्द्र में हुई  जहाँ विद्यालय शुल्क / गुरूदक्षिणा के रूप में साल में दो मन (80 केजी) धान जमा करना होता था। यह स्कूल चलाने का ग्रामीण तरीका था।  उनका प्रारंभिक शिक्षक का नाम लुईस मिंज था। बचपन में कार्तिक उराँव बहुत नटखट थे, पेड़ों पर चढ़ना उनका शौक था। शिक्षा दान केन्द्र से तीसरी कक्षा उतीर्ण करने के बाद तेज दिमाग के कार्तिक उराँव का नामांकन 1934 में राजकीय मध्य विद्यालय गुमला के चौथी कक्षा में हुआ।

उन्होंने गुमला के एस. एस. उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण करने के बाद 1942 में पटना साईंस कालेज में आई. एस. सी किया। फिर उन्होंने पटना इंजीनियरिंग कालेज से बी. एस. सी इंजीनियर की परीक्षा पास की। उनकी प्रिय विषय गणित और अंग्रेजी थी। विज्ञान में उनकी रूचि दीवानगी की हद तक थी।

बी.एस.सी इंजीनियरिंग करने के बाद वे 1950 में बिहार सरकार के सिंचाई विभाग, चाईबासा में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए थे। बाद में उनका स्थानांतरण मोतिहारी में इसी पद पर हुआ। इस पद पर वे अप्रैल 1950 से अगस्त 1952 तक रहे।

4 जून 1950 को उनका विवाह थाना घाघरा के ईचा ग्राम निवासी तत्कालीन डिप्टी कलक्टर तेजू भगत की द्वितीय सुपुत्री सुमति उराँव के साथ हुई।

कार्तिक उराँव की दिली इच्छा थी कि वे विदेश जाकर उच्चशिक्षा ग्रहण करे। लेकिन तब उनकी मासिक आमदनी 1000 रूपये थी। इतनी कम राशि से विदेश जाकर पढ़ाई करना असंभव था। उन्होंने केन्द्र सरकार से पत्रकार किया और विदेश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद मांगी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी भेंट कीं। वे अपने शुभचिंतकों, सगे संबंधियों तथा सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मिलकर अपनी इच्छा जाहिर की। सभी गुदड़ी के लाल को पहचानते थे। सभी ने मुक्त हाथ से आर्थिक मदद की। ग्रामीणों ने चाँदी और तांबे के सिक्के देकर सहयोग किए। 1952 में उच्चशिक्षा प्राप्त करने के लिए कार्तिक उराँव इंग्लैंड गए।  

कई कारण से उनका पहले से तय इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय में नामांकन न हो पाया तो वे ग्लासगो इंजिनियरिंग महाविद्यालय में ARCST डिग्री के लिए दाखिला लिया। 1954 में उन्हें कठिन परिश्रम से ARCST की डिग्री मिली। फिर वे ग्लासगो से लंदन लौटे और लंदन विश्वविद्यालय में M. Sc. Engineering के पाठ्यक्रमे में दाखिला लिया। उन्हें लंदन में आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। M.Sc. करते हुए ही उन्होंने ब्रिटिश रेलवे के भूमिगत रेलवे में सितंबर 1955 से मई 1958 तक मैकेनिकल असिस्टेंट तथा सिनियर टेकनिकल असिस्टेंट के पद पर कार्य किया। कुछ दिन वे ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट कमीशन में भी कार्यरत रहे। इंग्लैंड में कई समस्याओं से घिरे होने पर उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को इंग्लैंड बुला लिया। जहाँ उनकी बड़ी बेटी जयश्री का जन्म हुआ।

वे प्रतिदिन सुबह 5 बजे घर से निकल जाया करते थे। ब्रिटिश रेलवे की नौकरी और अपनी M. Sc. Engineering की पढ़ाई के बाद वे शाम को घर लौटते और फिर अध्ययन के लिए पुस्तकालय चले जाते, जहाँ के आधी रात तक पढ़ाई करते।  1955 में उन्हें M. Sc. Engineering की उपाधि मिली। इसके बाद वे लंदन विश्वविद्यालय से ही AMI-Structural Engineering पाठ्यक्रम के लिए दाखिला लिया। इस पढ़ाई के साथ-साथ वे ब्रिटिश एटोमिक पावर विभाग में सिविल इंजीनियर के पद पर कार्य करते रहे। उन्होंने सारी सुख-सुविधाओं को दरकिनार करते हुए नौकरी और पढ़ाई में अपनी सारी ऊर्जा को खपा दिया।

तीन वर्षों के बाद उन्हें AMI-Structural Engineering की उपाधि मिली। उस समय पूरे विश्व में सिर्फ 110 छात्र ही इस परीक्षा में उतीर्ण हो पाए थे। इस डिग्री के बाद उन्होंने AMICE लंदन और MASCE U.S.A. की डिग्री ली। जब वे (सी) चार्टर्ड इंजीनियरिंग के छात्र थे तो उन्होंने 1959 में हिंकले पॉइंट में बनने वाले ब्रिटिश एटोमिक पावर स्टेशन का प्रारूप तैयार किया। अगस्त 1958 से फरवरी 1961 तक वे यू.के. हिंकले पॉइंट न्यूक्लियर पावर स्टेशन के डिजाइन विभाग में ब्रिटिश सरकार के प्रथम भारतीय डिजायनर के रूप में सेवा किया। इस दौरान उन्होंने लिंकन्स इन लंदन में बैरिस्टर की शिक्षा के लिए बार एट लॉ में नामांकन कराया। लेकिन एक वर्ष की पढ़ाई के बाद ही उन्हें कुछ कारणों से पढ़ाई को अधूरा छोड़ कर उन्हें परिवार सहित भारत वापस लौटना पड़ा।

सन् 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जानकारी मिली की लंदन के केन्द्रीय अनुसंधान केन्द्र के डिजायनर एक भारतीय आदिवासी युवक कार्तिक उराँव हैं तो उन्होंने उस युवा आदिवासी इंजीनियर से मुलाकात करने की इच्छा जाहिर की, तो कार्तिक बाबु को उनसे मिलने के लिए भारतीय दूतावास में बुलवाया गया। नेहरू ने उन्हें स्वदेश आकर देश सेवा करने का अनुरोध किया था। इंग्लैंड में उन्हें कई बार रंगभेद का सामना करना पड़ा था। वे अपने देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना भी दिल में रखे हुए थे।

स्वदेश वापसी के बाद कार्तिक उराँव की नियुक्ति मई 1961 को HEC हटिया राँची में वरिष्ठ डिजाईन इंजीनियर (सिविल) के पद पर हुई। कार्तिक उराँव ने कभी भी रूपये पैसे की परवाह नहीं की और अपनी कमाई के अधिकांश भाग को वे समाज के कार्य में लगा देते थे। HEC में कार्य करते हुए उन्हें बहुत जल्दी ज्ञात हो गया था कि उक्त निगम की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर आदिवासी और सदान किसानों की जमीन को लेकर उन्हें उजाड़ा गया है और उन्हें न तो तृतीय न चतुर्थ वर्गीय नौकरी मिली न ही समुचित मुआवजा। उनकी पुर्नवास के लिए भी कुछ विशेष नहीं किया गया। उन्हें ज्ञात हो गया कि विस्थापितों के न्याय के लिए राजनैतिक शक्ति प्राप्त किए बिना कोई दूसरा उपाय नहीं है। उन्हें अपनी उच्च शिक्षा के बदौलत ऊँची नौकरी और ऊँचा ओहदा मिला था। लेकिन उनका मन कभी पद और पैसे के पीछे नहीं गया।

उन्होंने छोटानागपुर में संत विनोबा भावे के भुदान आंदोलन का विरोध किया। उनका कहना था कि दान में दी गई जमीन का सही बंदोबस्त आदिवासी इलाकों में नहीं किया  जा सकेगा और इस आंदोलन से आदिवासी और सदानों की बहुत सारी जमीन दूसरों के कब्जे में चली जाएगी। क्योंकि समाज में शिक्षा की रोशनी कहीं नहीं पहुँची थीं।

HEC में डिप्टी चीफ इंजीनियर ऑफ डिजायन के पद पर रह कर कार्तिक उराँव ने HEC के HMBP भवन, राँची विश्वविद्यालय का पुस्तकालय, गेस्ट हाउस, स्टेडियम, फिरायालाल बाजार भवन, राजेन्द्र मेडिकल कॉलेज भवन आदि का प्रारूप तैयार किया था।

कार्तिक बाबु समाज और देश सेवा में राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका से वाकिफ थे। कार्तिक उराँव ने 1962 में लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ था। लेकिन वे चुनाव हार गए। लेकिन उन्होंने सामाजिक विकास के लिए दुगुणी शक्ति से उर्जा लगाने का निर्णय किया और वे भारत के समस्त सरना आदिवासियों को एकजुट करने में लग गए और राजी पड़हा का पुनर्गठन किया। पड़हा उराँव आदिवासियों का सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक एवं प्रशासनिक संगठन है जो प्राचीन समय से आदिवासी समाज में कार्यरत है। कार्तिक उराँव अपने तीन सहयोगियों डाढ़टोली, डुमरी, गुमला के राजी देवान भीखराम भगत, पोढ़ा गाँव, भण्डरा प्रखण्ड लोहरदगा के राम कुजूर, कुडु प्रखण्ड, लोहरदगा के रति बेलटाना भगत की सहायता से पड़हा समाज के कार्य को पुनर्जीवित कर रहे थे।

1967 में हुए लोकसभा चुनाव में कार्तिक उराँव लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से विजयी रहे। सामाजिक कार्य को गति देने के लिए उन्होंने सन 1967 में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद् की स्थापना की। आखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद् के द्वारा देश भर में तीन कालेज, 33 सेकेंड्री स्कूल, 19 मिडिल और अपर प्राईमरी स्कूल 19 बालकों के होस्टल और 4 बालिकाओं के होस्टल की स्थापना की गई थी। कार्तिक उराँव सामाजिक उत्थान के लिए धर्म और भाषा का संरक्षण, शिक्षा और संगठन तथा आर्थिक विकास को विकास की नींव मानते थे। उन्होंने समाज से नशापान को खत्म करने की जरूरत बताया था।

कार्तिक बाबु को पहली बार 14 जनवरी 1980 को राज्यमंत्री पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन बनाया गया था। फिर उन्हें 09.06.1980 को राज्यमंत्री संचार बनाया गया। उन्हें 1971-77 के लोकसभा के दौरान उपमंत्री का पद का प्रस्ताव दिया गया था। जिसे उन्होंने नम्रता पूर्वक ठुकरा दिया था। इंदिरा गाँधी की तत्कालीन मंत्रिमंडल में कार्तिक बाबु सबसे अधिक उच्चशिक्षित व्यक्ति थे। 

सन् 1967 में कार्तिक उराँव लोहरदगा लोकसभा चुनाव क्षेत्र से पहली बार चतुर्थ लोकसभा के सांसद बने। पंचम लोकसभा में भी वे लोहरदगा लोकसभा चुनाव क्षेत्र से सांसद बने थे। जनवरी 1980 के मध्यावधि चुनाव में वे सासंद बने और वे केन्द्र में राज्यमंत्री का पदभार ग्रहण किया था। 1977 में हुए मध्यावधि चुनाव में वे विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे। कार्तिक उराँव अंग्रेजी भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। उनका स्पष्ट मानना था कि बिना अंग्रेजी के शिक्षित व्यक्ति कुछ विशेष नहीं कर सकते हैं। वे चाहते थे कि हर आदिवासी अंग्रेजी भाषा का गहरा ज्ञान प्राप्त करे और आगे बढ़े।

1962-63 में राँची में सरहुल शोभा यात्रा की शुरूआत उन्हीं के अगुवाई में शुरू हुई थी। 1980 में कार्तिक उराँव ने दिल्ली के तालकोटरा स्टेडियम किदवई नगर में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के तत्वाधान में एक छह दिवसीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया था। जिसमें देश भर से छह हजार से अधिक आदिवासियों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में एक दिन मुख्य अतिथि के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी शामिल हुई थीं। जबकि दूसरे दिन मुख्य अतिथि के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह शामिल हुए थे। इतने बड़े आयोजन के लिए आर्थिक मदद उन संस्थाओं ने कीं,  जिनके भवनों का डिजाइन उन्होंने बिना एक फूटी कौड़ी लिए किया था।

अलग राज्य की लिए कार्तिक बाबु की सोच अन्यों से अलग ही रही थी। उनका मानना था कि आदिवासी समाज अभी इस के लिए तैयार नहीं है। वे प्रशासन चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। इसलिए झारखंड पहले केंद्र शासित प्रदेश बने, जब लोग राज्य संचालन के सिस्टम को भली-भांति समझ जाएँ, तब हम अपना राज्य कायम करें। उन्होंने एकिकृत बिहार में रहते हुए भी एक अलग स्वायत्त शासन की व्यवस्था 'छोटा नागपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी' के रूप कायम करवाने में महत्ती भूमिका निभाया। वे संताल परगना को भी छोटानागपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी में  जोड़ना चाहते थे,  मगर वह संभव नहीं हो पाया।

इस ऑटोनोमश ऑथोरिटी का दफ्तर ऑडरे हाउस रांची में बनाया गया था । उनके प्रयास से बजट में ऐसी व्यवस्था कायम हुई, जो वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर लैप्स होने के बजाय नये बजट में पुरानी राशि को जोड़ा जाता था। उन्होंने देश का पहला मिनी सचिवालय स्थापित करवाया, ताकि स्थानीय स्तर पर ही प्रशासनिक कार्यों का निष्पादन भली-भांति हो सके। कार्तिक बाबु जीवन पर्यन्त छोटा नागपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी' के उपाध्यक्ष रहे। आदिवासी क्षेत्र के किसानों को आधुनिक उच्च तकनीक का लाभ मिले, उन्होंने अपने अथक प्रयास से राँची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना करवाया। उन्होंने इस विश्वविद्यालय का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी से करवाया। संसद में टी एस पी व्यवस्था पारित करवाया। कार्तिक उराँव एक विजनरी नेता थे, जिनका दूरदृष्टि पैमाना बहुत विस्तृत था, आदिवासी समाज के सर्वांगीण सामाजिक विकास और उत्थान के लिए उन्होंने तत्कलीन बिहार राज्य में रहते हुए भी छोटानागपुर क्षेत्र के लिए कांग्रेस पार्टी के भीतर ही एक अलग क्षेत्रीय व्यवस्था की मांग की। उनकी मांग और तर्कों के आधार पर छोटानागपुर क्षेत्रीय कांग्रेस कमिटी का गठन किया गया और उन्हें उसका प्रथम अध्यक्ष बनाया जाना गया। यह उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचायक है।

1980 में एससी एसटी चुनाव आरक्षण  की व्यवस्था समाप्त होने वाली थी। तब उन्होंने संसद में अपनी विद्वाता भरे तर्कों से अगले दस वर्षों तक आरक्षण को बढ़वाने में अग्रणी भूमिका निभाया। जब रांची लौटे तो सीधा आदिवासी हास्टल ,करम टोली पहुंच वहां छात्रों को संदेश दिया कि "खूब मेहनत करो आगे बढ़ो और समाज को भी देखो। अभी तो यह आरक्षण आगे बढ़ गया, आगे क्या होगा यह हमें मालूम नहीं" और इतना कहते हुए वे रो पड़े। शायद उन्हें कहीं से अपने असमय रूखसती का आभास, अपने खराब रहते स्वास्थ्य के कारण भी था।

8 दिसंबंर 1981 की सुबह ग्यारह बजे से पहले ,उनकी जीवन की लड़ी लोकतंत्र के मंदिर पार्लियामेंट हाउस के लाबी में अपने सहयोगी मंत्री स्व भगवत झा आजाद, जिनके साथ उनका  आपस में साढू भाई का रिश्ता था, के साथ हंसी-मजाक करते हुए अचानक हुए, हार्ट अटैक  से नीचे गिर गए । आनन फानन में राममनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया मगर डाक्टर्स की तमाम कोशिशों के बाद भी जीवन की लड़ी नहीं जुड़ पाई।

कार्तिक बाबु की बेटी गीताश्री उराँव बताती हैं कि उनके पिताजी के देहांत के बाद एच एम टी कंपनी ने कार्तिक बाबु के सम्मान में तीन वर्षों तक 'कार्तिक" नाम से घड़ी मार्केट में उतारी थी।  उन्हें आम जनता के साथ-साथ तमाम पक्ष-विपक्ष के राजनीतिज्ञों से लेकर तमाम संस्थाओं का  मान सम्मान हासिल था। स्व. अटल बिहारी वाजपेई जब उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे तो फूट-फूट के रोए कि मैंने अपना भाई को खो दिया है, जबकि उनके बीच कुछ आपसी वैचारिक मतभेद भी थे।

कार्तिक उराँव 1967-68 को डुवार्स के चाय बागानों के दौरे पर आए हुए थे। तब उन्होंने मधु बागान के महादेव मुंसी (उराँव) के घर में एक बैठक की थी और वहीं सभी के साथ रात का सामूहिक भोजन किया था। फिर रात को उन्होंने विनोद बिहारी मोंडल (लाकड़ा) के निवास सताली मंडलपाड़ा बस्ती में विश्राम किया। वे पूरे भारत में बिखरे हुए आदिवासी समाज को एक सूत्र में बाँधना चाहते थे। वे चाहते थे कि सभी आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिले और सभी उच्च शिक्षा ग्रहण करें।

कार्तिक उराँव 5 दिसंबर 1981 को कालचीनी में आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद् के सम्मेलन में आए थे। तब उन्होंने कहा था कि चाय बागानों में हमारे आदिवासी भाई बहन ही कार्य करते हैं। हम सभी मिलकर यदि थोड़े-थोड़े पैसे जमा करें तो हम लोग खुद चाय बागान के मालिक बन सकते हैं। वे बहुत स्वप्नद्रष्टा थे।

कार्तिक उराँव का देहावसन 8 दिसंबर 1981 में दिल्ली में संसद भवन में हो गया था। वे गुमला में एक इंजीनियरिंग कालेज की स्थापना करना चाहते थे, जो उनके असमय निधन से इलाके के लिए एक सपना बन कर रह गया। कार्तिक उराँव चाहते तो विदेश में बस कर विलासितापूर्ण जीवन जी सकते थे। लेकिन उन्होंने आदिवासी समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। जितना भी रूपये पैसे हाथ में आते उसे सामाजिक कार्य और दूसरों की सहायता करने में खर्च कर देते थे। उन्हें भ्रष्टता से सख्त नफरत थी। उन्होंने कभी अपने लिए मकान बनाने के लिए भी कोशिश नहीं की।  जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके बैंक में 100 रूपये भी शेष नहीं था। ऐसे सच्चे नेता और बैरागी व्यक्ति थे कार्तिक उराँव।  नियति ने कार्तिक बाबु को आदिवासी समाज से बहुत जल्दी छीन लिया था। यदि वे कुछ और वर्षों तक जीवित रहते तो‌ उनकी अगुवाई और मार्ग दर्शन में निश्चित रूप से वे समाज के लिए अनेक अभूतपूर्व कार्य करते, क्योंकि वे धुन के पक्के अगुवा थे ।

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आदिवासी महिलाओं के सशक्तिकरण, भूमि और जंगल के मुद्दों को संबोधित करने, गरीबी और आदिवासियों के एकीकरण के क्षेत्र में आदिवासी समुदाय को मजबूत करने के लिए कार्तिक उराँव ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

रायनंद साहु द्वारा लिखित "आदिवासी धर्म एवं संस्कृति के अग्रदूत कार्तिक उराँव" के अनुसार कार्तिक उराँव की उपलब्धियाँ निम्मलिखित है –

सदस्य

  1. सिनेट, राँची विश्वविद्यालय राँची, 1962-1970 तक

  2. सिंडिकेट, राँची विश्वविद्यालय राँची, 1967-1973 तक

  3. राँची इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट, 1963-1965 तक

  4. ट्राइबल कल्चर बोर्ड बिहार पटना, 1963-1965 तक

  5. एडवाइजर बोर्ड, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, 1966-1970 तक

  6. राष्ट्रीय भाषा परिषद् बिहार पटना, 1968-1975 तक

  7. स्टेट ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी बिहार, 1968-1970 तक

  8. इस्टीमेटर्स कमिटी लोकसभा, 1968-1970 तक

  9. कौंसिल ऑफ दी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन भारत सरकार, 1967-1970 तक

  10. जोनल रेलवे यूजर्स कन्सलटेटिव कमिटी दक्षिण पूर्वी रेलवे, 1967-1972 तक

  11. ज्वाईंट कमिटी ऑन शिड्यूल्ड कास्ट एण्ड शिड्यूल्ड ट्राइब्स आर्डर एमेंडमेंट बिल 1967, जुलाई 1067 से नवंबर 1969 तक

  12. नेशनल रेलवे यूजर्स कन्सल्टेटिव कमिटी, 1970-1971 तक

  13. हैंडीक्रफ्ट बोर्ड, 1968-1969 तक

  14. प्राइमिनिस्टर कमिटी ऑन प्लानिंग, 1968- 1970 तक

  15. पार्लियमेंटारी कमिटी ऑन दी वेलफेयर ऑफ शिड्यूल्ड कास्ट एण्ड शिड्यूल्ड ट्राइब्स, 1973-1975 तक

  16. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी इंडस्ट्रियल डेवलेपमेंट एण्ड कंपनी अफेयर्स 1968 -1970 तक

  17. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी मिनिट्री ऑफ स्टील एण्ड हेवी इंजीनियरिंग, 1968-1970 तक

  18. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी मिनिस्ट्री ऑफ वर्कर्स हाउसिंग एण्ड अर्बन डेवलेपमेंट, 1969-1970 तक

  19. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी मिनिस्ट्री ऑफ दी एज्युकेशन एण्ड यूथ सर्विस, 1969-1970 तक

  20. बोर्ड्स ऑफ गवर्नर्स बिड़ला इंस्टटिट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मेसरा, राँची 1970-1976

संयोजक

  1. कंस्लटेटिव कमिटी, प्लानिंग कमिशन, 1969-1970

  2. यचिका समिति बिहार विधान सभा, अक्तूबर 1979 से जून 1980 तक

  3. निदेशक बिहार स्मॉल स्केल इंडस्ट्री कॉरपोरेशन लिमिटेड, 1962 -1968

  4. डिप्टी चेयरमैन छोटानागपुर संथाल परगाना ऑटोनोमस डेवलॉपमेंट ऑथोरिटी, फरवरी 1972- 1977 तक

  5. चेयरमैन इंडियन लाह डेवलॉपमेंट कौंसिल मिनिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर, भारत सरकार, 1972-1977 तक

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