डॉ निर्मल मिंज एक शिक्षाविद् और कुड़ुख भाषा के अग्रदूत विद्वान थे। उनका जन्म चैनपुर गुमला में हुआ था और उनकी आरंभिक शिक्षा भी चैनपुर गुमला, झारखंड में हुई थी। बाद में उन्होंने पटना से कालेज की पढ़ाई की और सेमिनरी यूनिवर्सिटी ऑफ मिनिसोटा से पीएचडी की डिग्री ली। वे छोटानागपुर और असम के गोस्नर इवेंजेलिकल लूथरन चर्च (जीईएलसी) से संबद्ध थे और उनके बिशप थे। वे रांची विश्वविद्यालय से संबद्ध गोस्सनर कॉलेज, राँची के संस्थापक प्राचार्य थे। उनका पूरा जीवन ही मसीही कलीसिया और आदिवासी समाज की सेवा में समर्पित था।
कुड़ुख, उरांव भाषा के विकास के लिए वे जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। उनके योगदान के लिए उन्हें 2017 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरुस्कार प्रदान किया गया। उनकी शिक्षा दीक्षा चैनपुर, गुमला, पटना यूनिवर्सिटी, सेरामपुर यूनिवर्सिटी, अमेरिका के लूथर सेमिनरी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनिसोटा में हुई। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो से पीएचडी हासिल किया था। बिशप डॉ निर्मल मिंज का पूरा जीवन मसीही कलीसिया और समाज की सेवा के लिए समर्पित था। झारखंड की जनता उन्हें शिक्षा जगत, साहित्य-संस्कृति के अध्येता के रूप में पहचानता है

, जबकि डॉ निर्मल मिंज कुडुख भाषा के अग्रणी विद्वानों में गिने जाते हैं और 1971 में उनके द्वारा स्थापित गोस्सनर कालेज राँची में सर्वप्रथम कुड़ुख सहित झारखंड के आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई इसी कॉलेज में शुरू की। एक कुड़ुख भाषी होने के कारण डॉ मिंज ने स्वयं कुड़ुख साहित्य और शैक्षणिक विकास में अग्रणी भूमिका निभाया। भाषा पढ़ाई शुरू करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। वे एक उत्कृष्ट विचारक और बुद्धिजीवी थे। उनके प्रयास से रांची यूनिवर्सिटी में भी इन भाषाओं की पढ़ाई शुरू हुई. वे यंग मेंस एसोसिएशन रांची के प्रथम प्रेसिडेंट थे और विकास मैत्री संस्था के निर्माण में अहम् भूमिका निभाई। 1980 में वे नॉर्थ वेस्टर्न गोस्सनर एवंजेलिकल लुथेरॉन कलीसिया के प्रथम बिशप बने। छोटानागपुर के मसीही कलीसिया में मांदर जैसे आदिवासी वाद्य यंत्र का प्रथम उपयोग का श्रेय बिशप डॉ निर्मल मिंज के साहसी और प्रासंगिक मसीही वैज्ञानिक सोच को जाता है। 5 मई 2021 को डॉ निर्मल मिंज का देहांत डिबडीह राँची में हो गया था।
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