कार्तिक ऊराँव

 

कार्तिक ऊराँव का जन्म करौंदा, लिट्टाटोली ग्राम में 29.10.1924 में कार्तिक अमावस्या के दिन एक ऊराँव आदिवासी परिवार में हुआ था। माँ का नाम बिरसो उराँव और पिता का नाम जौरा उराँव था। कार्तिक उराँव का गोत्र मिंज है। करौंदा लिट्टाटोली राँची गुमला मार्ग में गुमला से 8-10 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। कार्तिक उराँव के चार संतान हुए। जयश्री, राजश्री, गीताश्री और तेजप्रकाश उराँव। गीताश्री झारखंड राज्य में शिक्षा मंत्री रह चुकी हैं।

कार्तिक बाबु की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के निकट के खोरा जामटोली के शिक्षा दान केन्द्र में हुई  जहाँ विद्यालय शुल्क / गुरूदक्षिणा के रूप में साल में दो मन (80 केजी) धान जमा करना होता था। यह स्कूल चलाने का ग्रामीण तरीका था।  उनका प्रारंभिक शिक्षक का नाम लुईस मिंज था। बचपन में कार्तिक उराँव बहुत नटखट थे, पेड़ों पर चढ़ना उनका शौक था। शिक्षा दान केन्द्र से तीसरी कक्षा उतीर्ण करने के बाद तेज दिमाग के कार्तिक उराँव का नामांकन 1934 में राजकीय मध्य विद्यालय गुमला के चौथी कक्षा में हुआ।

उन्होंने गुमला के एस. एस. उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण करने के बाद 1942 में पटना साईंस कालेज में आई. एस. सी किया। फिर उन्होंने पटना इंजीनियरिंग कालेज से बी. एस. सी इंजीनियर की परीक्षा पास की। उनकी प्रिय विषय गणित और अंग्रेजी थी। विज्ञान में उनकी रूचि दीवानगी की हद तक थी।

बी.एस.सी इंजीनियरिंग करने के बाद वे 1950 में बिहार सरकार के सिंचाई विभाग, चाईबासा में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए थे। बाद में उनका स्थानांतरण मोतिहारी में इसी पद पर हुआ। इस पद पर वे अप्रैल 1950 से अगस्त 1952 तक रहे।

4 जून 1950 को उनका विवाह थाना घाघरा के ईचा ग्राम निवासी तत्कालीन डिप्टी कलक्टर तेजू भगत की द्वितीय सुपुत्री सुमति उराँव के साथ हुई।

कार्तिक उराँव की दिली इच्छा थी कि वे विदेश जाकर उच्चशिक्षा ग्रहण करे। लेकिन तब उनकी मासिक आमदनी 1000 रूपये थी। इतनी कम राशि से विदेश जाकर पढ़ाई करना असंभव था। उन्होंने केन्द्र सरकार से पत्रकार किया और विदेश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद मांगी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी भेंट कीं। वे अपने शुभचिंतकों, सगे संबंधियों तथा सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मिलकर अपनी इच्छा जाहिर की। सभी गुदड़ी के लाल को पहचानते थे। सभी ने मुक्त हाथ से आर्थिक मदद की। ग्रामीणों ने चाँदी और तांबे के सिक्के देकर सहयोग किए। 1952 में उच्चशिक्षा प्राप्त करने के लिए कार्तिक उराँव इंग्लैंड गए।  

कई कारण से उनका पहले से तय इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय में नामांकन न हो पाया तो वे ग्लासगो इंजिनियरिंग महाविद्यालय में ARCST डिग्री के लिए दाखिला लिया। 1954 में उन्हें कठिन परिश्रम से ARCST की डिग्री मिली। फिर वे ग्लासगो से लंदन लौटे और लंदन विश्वविद्यालय में M. Sc. Engineering के पाठ्यक्रमे में दाखिला लिया। उन्हें लंदन में आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। M.Sc. करते हुए ही उन्होंने ब्रिटिश रेलवे के भूमिगत रेलवे में सितंबर 1955 से मई 1958 तक मैकेनिकल असिस्टेंट तथा सिनियर टेकनिकल असिस्टेंट के पद पर कार्य किया। कुछ दिन वे ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट कमीशन में भी कार्यरत रहे। इंग्लैंड में कई समस्याओं से घिरे होने पर उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को इंग्लैंड बुला लिया। जहाँ उनकी बड़ी बेटी जयश्री का जन्म हुआ।

वे प्रतिदिन सुबह 5 बजे घर से निकल जाया करते थे। ब्रिटिश रेलवे की नौकरी और अपनी M. Sc. Engineering की पढ़ाई के बाद वे शाम को घर लौटते और फिर अध्ययन के लिए पुस्तकालय चले जाते, जहाँ के आधी रात तक पढ़ाई करते।  1955 में उन्हें M. Sc. Engineering की उपाधि मिली। इसके बाद वे लंदन विश्वविद्यालय से ही AMI-Structural Engineering पाठ्यक्रम के लिए दाखिला लिया। इस पढ़ाई के साथ-साथ वे ब्रिटिश एटोमिक पावर विभाग में सिविल इंजीनियर के पद पर कार्य करते रहे। उन्होंने सारी सुख-सुविधाओं को दरकिनार करते हुए नौकरी और पढ़ाई में अपनी सारी ऊर्जा को खपा दिया।

तीन वर्षों के बाद उन्हें AMI-Structural Engineering की उपाधि मिली। उस समय पूरे विश्व में सिर्फ 110 छात्र ही इस परीक्षा में उतीर्ण हो पाए थे। इस डिग्री के बाद उन्होंने AMICE लंदन और MASCE U.S.A. की डिग्री ली। जब वे (सी) चार्टर्ड इंजीनियरिंग के छात्र थे तो उन्होंने 1959 में हिंकले पॉइंट में बनने वाले ब्रिटिश एटोमिक पावर स्टेशन का प्रारूप तैयार किया। अगस्त 1958 से फरवरी 1961 तक वे यू.के. हिंकले पॉइंट न्यूक्लियर पावर स्टेशन के डिजाइन विभाग में ब्रिटिश सरकार के प्रथम भारतीय डिजायनर के रूप में सेवा किया। इस दौरान उन्होंने लिंकन्स इन लंदन में बैरिस्टर की शिक्षा के लिए बार एट लॉ में नामांकन कराया। लेकिन एक वर्ष की पढ़ाई के बाद ही उन्हें कुछ कारणों से पढ़ाई को अधूरा छोड़ कर उन्हें परिवार सहित भारत वापस लौटना पड़ा।

सन् 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जानकारी मिली की लंदन के केन्द्रीय अनुसंधान केन्द्र के डिजायनर एक भारतीय आदिवासी युवक कार्तिक उराँव हैं तो उन्होंने उस युवा आदिवासी इंजीनियर से मुलाकात करने की इच्छा जाहिर की, तो कार्तिक बाबु को उनसे मिलने के लिए भारतीय दूतावास में बुलवाया गया। नेहरू ने उन्हें स्वदेश आकर देश सेवा करने का अनुरोध किया था। इंग्लैंड में उन्हें कई बार रंगभेद का सामना करना पड़ा था। वे अपने देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना भी दिल में रखे हुए थे।

स्वदेश वापसी के बाद कार्तिक उराँव की नियुक्ति मई 1961 को HEC हटिया राँची में वरिष्ठ डिजाईन इंजीनियर (सिविल) के पद पर हुई। कार्तिक उराँव ने कभी भी रूपये पैसे की परवाह नहीं की और अपनी कमाई के अधिकांश भाग को वे समाज के कार्य में लगा देते थे। HEC में कार्य करते हुए उन्हें बहुत जल्दी ज्ञात हो गया था कि उक्त निगम की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर आदिवासी और सदान किसानों की जमीन को लेकर उन्हें उजाड़ा गया है और उन्हें न तो तृतीय न चतुर्थ वर्गीय नौकरी मिली न ही समुचित मुआवजा। उनकी पुर्नवास के लिए भी कुछ विशेष नहीं किया गया। उन्हें ज्ञात हो गया कि विस्थापितों के न्याय के लिए राजनैतिक शक्ति प्राप्त किए बिना कोई दूसरा उपाय नहीं है। उन्हें अपनी उच्च शिक्षा के बदौलत ऊँची नौकरी और ऊँचा ओहदा मिला था। लेकिन उनका मन कभी पद और पैसे के पीछे नहीं गया।

उन्होंने छोटानागपुर में संत विनोबा भावे के भुदान आंदोलन का विरोध किया। उनका कहना था कि दान में दी गई जमीन का सही बंदोबस्त आदिवासी इलाकों में नहीं किया  जा सकेगा और इस आंदोलन से आदिवासी और सदानों की बहुत सारी जमीन दूसरों के कब्जे में चली जाएगी। क्योंकि समाज में शिक्षा की रोशनी कहीं नहीं पहुँची थीं।

HEC में डिप्टी चीफ इंजीनियर ऑफ डिजायन के पद पर रह कर कार्तिक उराँव ने HEC के HMBP भवन, राँची विश्वविद्यालय का पुस्तकालय, गेस्ट हाउस, स्टेडियम, फिरायालाल बाजार भवन, राजेन्द्र मेडिकल कॉलेज भवन आदि का प्रारूप तैयार किया था।

कार्तिक बाबु समाज और देश सेवा में राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका से वाकिफ थे। कार्तिक उराँव ने 1962 में लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ था। लेकिन वे चुनाव हार गए। लेकिन उन्होंने सामाजिक विकास के लिए दुगुणी शक्ति से उर्जा लगाने का निर्णय किया और वे भारत के समस्त सरना आदिवासियों को एकजुट करने में लग गए और राजी पड़हा का पुनर्गठन किया। पड़हा उराँव आदिवासियों का सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक एवं प्रशासनिक संगठन है जो प्राचीन समय से आदिवासी समाज में कार्यरत है। कार्तिक उराँव अपने तीन सहयोगियों डाढ़टोली, डुमरी, गुमला के राजी देवान भीखराम भगत, पोढ़ा गाँव, भण्डरा प्रखण्ड लोहरदगा के राम कुजूर, कुडु प्रखण्ड, लोहरदगा के रति बेलटाना भगत की सहायता से पड़हा समाज के कार्य को पुनर्जीवित कर रहे थे।

1967 में हुए लोकसभा चुनाव में कार्तिक उराँव लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से विजयी रहे। सामाजिक कार्य को गति देने के लिए उन्होंने सन 1967 में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद् की स्थापना की। आखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद् के द्वारा देश भर में तीन कालेज, 33 सेकेंड्री स्कूल, 19 मिडिल और अपर प्राईमरी स्कूल 19 बालकों के होस्टल और 4 बालिकाओं के होस्टल की स्थापना की गई थी। कार्तिक उराँव सामाजिक उत्थान के लिए धर्म और भाषा का संरक्षण, शिक्षा और संगठन तथा आर्थिक विकास को विकास की नींव मानते थे। उन्होंने समाज से नशापान को खत्म करने की जरूरत बताया था।

कार्तिक बाबु को पहली बार 14 जनवरी 1980 को राज्यमंत्री पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन बनाया गया था। फिर उन्हें 09.06.1980 को राज्यमंत्री संचार बनाया गया। उन्हें 1971-77 के लोकसभा के दौरान उपमंत्री का पद का प्रस्ताव दिया गया था। जिसे उन्होंने नम्रता पूर्वक ठुकरा दिया था। इंदिरा गाँधी की तत्कालीन मंत्रिमंडल में कार्तिक बाबु सबसे अधिक उच्चशिक्षित व्यक्ति थे। 

सन् 1967 में कार्तिक उराँव लोहरदगा लोकसभा चुनाव क्षेत्र से पहली बार चतुर्थ लोकसभा के सांसद बने। पंचम लोकसभा में भी वे लोहरदगा लोकसभा चुनाव क्षेत्र से सांसद बने थे। जनवरी 1980 के मध्यावधि चुनाव में वे सासंद बने और वे केन्द्र में राज्यमंत्री का पदभार ग्रहण किया था। 1977 में हुए मध्यावधि चुनाव में वे विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे। कार्तिक उराँव अंग्रेजी भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। उनका स्पष्ट मानना था कि बिना अंग्रेजी के शिक्षित व्यक्ति कुछ विशेष नहीं कर सकते हैं। वे चाहते थे कि हर आदिवासी अंग्रेजी भाषा का गहरा ज्ञान प्राप्त करे और आगे बढ़े।

1962-63 में राँची में सरहुल शोभा यात्रा की शुरूआत उन्हीं के अगुवाई में शुरू हुई थी। 1980 में कार्तिक उराँव ने दिल्ली के तालकोटरा स्टेडियम किदवई नगर में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के तत्वाधान में एक छह दिवसीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया था। जिसमें देश भर से छह हजार से अधिक आदिवासियों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में एक दिन मुख्य अतिथि के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी शामिल हुई थीं। जबकि दूसरे दिन मुख्य अतिथि के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह शामिल हुए थे। इतने बड़े आयोजन के लिए आर्थिक मदद उन संस्थाओं ने कीं,  जिनके भवनों का डिजाइन उन्होंने बिना एक फूटी कौड़ी लिए किया था।

अलग राज्य की लिए कार्तिक बाबु की सोच अन्यों से अलग ही रही थी। उनका मानना था कि आदिवासी समाज अभी इस के लिए तैयार नहीं है। वे प्रशासन चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। इसलिए झारखंड पहले केंद्र शासित प्रदेश बने, जब लोग राज्य संचालन के सिस्टम को भली-भांति समझ जाएँ, तब हम अपना राज्य कायम करें। उन्होंने एकिकृत बिहार में रहते हुए भी एक अलग स्वायत्त शासन की व्यवस्था 'छोटा नागपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी' के रूप कायम करवाने में महत्ती भूमिका निभाया। वे संताल परगना को भी छोटानागपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी में  जोड़ना चाहते थे,  मगर वह संभव नहीं हो पाया।

इस ऑटोनोमश ऑथोरिटी का दफ्तर ऑडरे हाउस रांची में बनाया गया था । उनके प्रयास से बजट में ऐसी व्यवस्था कायम हुई, जो वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर लैप्स होने के बजाय नये बजट में पुरानी राशि को जोड़ा जाता था। उन्होंने देश का पहला मिनी सचिवालय स्थापित करवाया, ताकि स्थानीय स्तर पर ही प्रशासनिक कार्यों का निष्पादन भली-भांति हो सके। कार्तिक बाबु जीवन पर्यन्त छोटा नागपुर डेवलपमेंट ऑथोरिटी' के उपाध्यक्ष रहे। आदिवासी क्षेत्र के किसानों को आधुनिक उच्च तकनीक का लाभ मिले, उन्होंने अपने अथक प्रयास से राँची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना करवाया। उन्होंने इस विश्वविद्यालय का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी से करवाया। संसद में टी एस पी व्यवस्था पारित करवाया। कार्तिक उराँव एक विजनरी नेता थे, जिनका दूरदृष्टि पैमाना बहुत विस्तृत था, आदिवासी समाज के सर्वांगीण सामाजिक विकास और उत्थान के लिए उन्होंने तत्कलीन बिहार राज्य में रहते हुए भी छोटानागपुर क्षेत्र के लिए कांग्रेस पार्टी के भीतर ही एक अलग क्षेत्रीय व्यवस्था की मांग की। उनकी मांग और तर्कों के आधार पर छोटानागपुर क्षेत्रीय कांग्रेस कमिटी का गठन किया गया और उन्हें उसका प्रथम अध्यक्ष बनाया जाना गया। यह उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचायक है।

1980 में एससी एसटी चुनाव आरक्षण  की व्यवस्था समाप्त होने वाली थी। तब उन्होंने संसद में अपनी विद्वाता भरे तर्कों से अगले दस वर्षों तक आरक्षण को बढ़वाने में अग्रणी भूमिका निभाया। जब रांची लौटे तो सीधा आदिवासी हास्टल ,करम टोली पहुंच वहां छात्रों को संदेश दिया कि "खूब मेहनत करो आगे बढ़ो और समाज को भी देखो। अभी तो यह आरक्षण आगे बढ़ गया, आगे क्या होगा यह हमें मालूम नहीं" और इतना कहते हुए वे रो पड़े। शायद उन्हें कहीं से अपने असमय रूखसती का आभास, अपने खराब रहते स्वास्थ्य के कारण भी था।

8 दिसंबंर 1981 की सुबह ग्यारह बजे से पहले ,उनकी जीवन की लड़ी लोकतंत्र के मंदिर पार्लियामेंट हाउस के लाबी में अपने सहयोगी मंत्री स्व भगवत झा आजाद, जिनके साथ उनका  आपस में साढू भाई का रिश्ता था, के साथ हंसी-मजाक करते हुए अचानक हुए, हार्ट अटैक  से नीचे गिर गए । आनन फानन में राममनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया मगर डाक्टर्स की तमाम कोशिशों के बाद भी जीवन की लड़ी नहीं जुड़ पाई।

कार्तिक बाबु की बेटी गीताश्री उराँव बताती हैं कि उनके पिताजी के देहांत के बाद एच एम टी कंपनी ने कार्तिक बाबु के सम्मान में तीन वर्षों तक 'कार्तिक" नाम से घड़ी मार्केट में उतारी थी।  उन्हें आम जनता के साथ-साथ तमाम पक्ष-विपक्ष के राजनीतिज्ञों से लेकर तमाम संस्थाओं का  मान सम्मान हासिल था। स्व. अटल बिहारी वाजपेई जब उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे तो फूट-फूट के रोए कि मैंने अपना भाई को खो दिया है, जबकि उनके बीच कुछ आपसी वैचारिक मतभेद भी थे।

कार्तिक उराँव 1967-68 को डुवार्स के चाय बागानों के दौरे पर आए हुए थे। तब उन्होंने मधु बागान के महादेव मुंसी (उराँव) के घर में एक बैठक की थी और वहीं सभी के साथ रात का सामूहिक भोजन किया था। फिर रात को उन्होंने विनोद बिहारी मोंडल (लाकड़ा) के निवास सताली मंडलपाड़ा बस्ती में विश्राम किया। वे पूरे भारत में बिखरे हुए आदिवासी समाज को एक सूत्र में बाँधना चाहते थे। वे चाहते थे कि सभी आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिले और सभी उच्च शिक्षा ग्रहण करें।

कार्तिक उराँव 5 दिसंबर 1981 को कालचीनी में आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद् के सम्मेलन में आए थे। तब उन्होंने कहा था कि चाय बागानों में हमारे आदिवासी भाई बहन ही कार्य करते हैं। हम सभी मिलकर यदि थोड़े-थोड़े पैसे जमा करें तो हम लोग खुद चाय बागान के मालिक बन सकते हैं। वे बहुत स्वप्नद्रष्टा थे।

कार्तिक उराँव का देहावसन 8 दिसंबर 1981 में दिल्ली में संसद भवन में हो गया था। वे गुमला में एक इंजीनियरिंग कालेज की स्थापना करना चाहते थे, जो उनके असमय निधन से इलाके के लिए एक सपना बन कर रह गया। कार्तिक उराँव चाहते तो विदेश में बस कर विलासितापूर्ण जीवन जी सकते थे। लेकिन उन्होंने आदिवासी समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। जितना भी रूपये पैसे हाथ में आते उसे सामाजिक कार्य और दूसरों की सहायता करने में खर्च कर देते थे। उन्हें भ्रष्टता से सख्त नफरत थी। उन्होंने कभी अपने लिए मकान बनाने के लिए भी कोशिश नहीं की।  जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके बैंक में 100 रूपये भी शेष नहीं था। ऐसे सच्चे नेता और बैरागी व्यक्ति थे कार्तिक उराँव।  नियति ने कार्तिक बाबु को आदिवासी समाज से बहुत जल्दी छीन लिया था। यदि वे कुछ और वर्षों तक जीवित रहते तो‌ उनकी अगुवाई और मार्ग दर्शन में निश्चित रूप से वे समाज के लिए अनेक अभूतपूर्व कार्य करते, क्योंकि वे धुन के पक्के अगुवा थे ।

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आदिवासी महिलाओं के सशक्तिकरण, भूमि और जंगल के मुद्दों को संबोधित करने, गरीबी और आदिवासियों के एकीकरण के क्षेत्र में आदिवासी समुदाय को मजबूत करने के लिए कार्तिक उराँव ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

रायनंद साहु द्वारा लिखित "आदिवासी धर्म एवं संस्कृति के अग्रदूत कार्तिक उराँव" के अनुसार कार्तिक उराँव की उपलब्धियाँ निम्मलिखित है –

सदस्य

  1. सिनेट, राँची विश्वविद्यालय राँची, 1962-1970 तक

  2. सिंडिकेट, राँची विश्वविद्यालय राँची, 1967-1973 तक

  3. राँची इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट, 1963-1965 तक

  4. ट्राइबल कल्चर बोर्ड बिहार पटना, 1963-1965 तक

  5. एडवाइजर बोर्ड, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, 1966-1970 तक

  6. राष्ट्रीय भाषा परिषद् बिहार पटना, 1968-1975 तक

  7. स्टेट ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी बिहार, 1968-1970 तक

  8. इस्टीमेटर्स कमिटी लोकसभा, 1968-1970 तक

  9. कौंसिल ऑफ दी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन भारत सरकार, 1967-1970 तक

  10. जोनल रेलवे यूजर्स कन्सलटेटिव कमिटी दक्षिण पूर्वी रेलवे, 1967-1972 तक

  11. ज्वाईंट कमिटी ऑन शिड्यूल्ड कास्ट एण्ड शिड्यूल्ड ट्राइब्स आर्डर एमेंडमेंट बिल 1967, जुलाई 1067 से नवंबर 1969 तक

  12. नेशनल रेलवे यूजर्स कन्सल्टेटिव कमिटी, 1970-1971 तक

  13. हैंडीक्रफ्ट बोर्ड, 1968-1969 तक

  14. प्राइमिनिस्टर कमिटी ऑन प्लानिंग, 1968- 1970 तक

  15. पार्लियमेंटारी कमिटी ऑन दी वेलफेयर ऑफ शिड्यूल्ड कास्ट एण्ड शिड्यूल्ड ट्राइब्स, 1973-1975 तक

  16. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी इंडस्ट्रियल डेवलेपमेंट एण्ड कंपनी अफेयर्स 1968 -1970 तक

  17. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी मिनिट्री ऑफ स्टील एण्ड हेवी इंजीनियरिंग, 1968-1970 तक

  18. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी मिनिस्ट्री ऑफ वर्कर्स हाउसिंग एण्ड अर्बन डेवलेपमेंट, 1969-1970 तक

  19. कंस्लटेटिव कमिटी ऑफ दी मिनिस्ट्री ऑफ दी एज्युकेशन एण्ड यूथ सर्विस, 1969-1970 तक

  20. बोर्ड्स ऑफ गवर्नर्स बिड़ला इंस्टटिट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मेसरा, राँची 1970-1976

संयोजक

  1. कंस्लटेटिव कमिटी, प्लानिंग कमिशन, 1969-1970

  2. यचिका समिति बिहार विधान सभा, अक्तूबर 1979 से जून 1980 तक

  3. निदेशक बिहार स्मॉल स्केल इंडस्ट्री कॉरपोरेशन लिमिटेड, 1962 -1968

  4. डिप्टी चेयरमैन छोटानागपुर संथाल परगाना ऑटोनोमस डेवलॉपमेंट ऑथोरिटी, फरवरी 1972- 1977 तक

  5. चेयरमैन इंडियन लाह डेवलॉपमेंट कौंसिल मिनिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर, भारत सरकार, 1972-1977 तक

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