नेह इंदवार
वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के भूगर्भ में निरंतर हलचल चलते रहती है। हर रोज कई दर्जन बहुत कम शक्ति के भूकंप आते रहते हैं। महीनों में कभी कभार धरती हिलती हैं और कभी-कभार दशकों या सदियों में बड़े भूकंप आते हैं और पुराने चीजों को तहस-नहस कर डालते हैं।
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इंसानी समाज में भी कमोबेश ऐसा ही होता है। समाज के गर्भ में रोज हजारों प्रकार की हलचलें होती रहती हैं। इसका असर कहीं होता है तो कहीं बिल्कुल नहीं।
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देश की आजादी के पूर्व सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर समाज में बहुत अधिक हलचल नहीं हुआ करती थीं। ग्रामीण समाज अपने क्षेत्रीय अस्मिता के साथ शांतिमय कृषि आधारित जीवन जीता था। समाज के एकीकरण में या तो समुदाय या जाति या धर्म केन्द्रीय तत्व हुआ करता था।
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लेकिन भारत की आजादी के बाद हलचलों की बाढ़ ही आ गईं। नयी औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण, सार्वभौमिक शिक्षा, सरकारी रोजगार, यातायात तथा अन्य प्रसारवादी संसाधनों का विस्तार से, हलचलहीन बंद समाज धीरे-धीरे खुलने लगे और उसके साथ नये विचार भी समाज में प्रवेश करने लगे।
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कई दशक पूर्व तक समाज परिवार केन्द्रित हुआ करता था, हर कार्य में परिवार और समाज ही केन्द्रीय भूमिका निभाता था। शिक्षा, रोजगार, सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यकलाप, शादी-विवाह,खुशियाँ गम, मृत्यु आदि शु्द्ध पारिवारिक और सामाजिक कार्यकलाप हुआ करता था।
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लेकिन देश की आजादी के बाद राजनैतिक और सामाजिक जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हुए। शिक्षा,रोजगार, संपत्ति का बँटवारा,लव मैरिज-कोर्ट मैरिज, बीमार व्यक्ति की तामीरदारी सरकारी अस्पतालों और एश्योरेंस के माध्यम से सरकारी और गैर-सामाजिक हो गए। यहाँ तक कि मृत्यु का क्रियाक्रम भी अब तो बाजार की एजेंसियाँ करने लगी हैं।
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शहरों में आज ऐसा कोई समाज नहीं रहता है, जो गाँवों में समाज बनने के तत्वों के संयोजन से बना हुआ होता है। शहरों में कमोबेश सुसंगठित समाज नहीं होता है, बल्कि सुविधाओं के जाल में बुना हुआ जनसंख्या का झूँड़ होता है। शहरी समाज सुविधाओं का उपभोग करने वाला एक ऐसा समूह होता है, जिसमें Sense of belonging का सर्वथा अभाव होता है। शहर मनोविज्ञानिक रूप से एक खंडहर होता है और तमाम शहरी सुख, सुविधा पैसों पर आधारित होते हैं।
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शहरों में बसे आदिवासी और दलित समाज का आधार या तो धर्म है या जान पहचान के क्षेत्रीय-भाषाई आधार। समुदाय, जाति, संस्कृति, भाषा आदि आज द्वितीय श्रेणी के ऐसे तत्व बन गए हैं, जो कभी-कभार सामाजिक गुम्फन तत्व (stickiness) के काम आते हैं।
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दूसरे कई समाज के मामले पर, वित्तीय स्थिति और कार्य वर्ग (एक ही तरह के कार्य करने वाले लोगों का समूह) आदि मुख्य समाज संगठक तत्व बन गए हैं। कहने का मतलब है कि गाँव में युगों से जहाँ एक होमोजेनियस समाज का वजूद हुआ करता था, वैसा समाज शहरों में नहीं है।
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अंग्रेजों के समय और उसके बाद देश के आजादी के कुछ समय तक सरकार सिर्फ सार्वजनिक मुद्दों पर कार्य करने वाली एजेंसी हुआ करती थी। उसे गाँव समाज से कमोबेश कुछ लेना देना नहीं हुआ करता था। लेकिन शनै-शनै सरकारी कानून के हाथ बेतहाशा लम्बे होने लगे और यह समाज और परिवार की सीमा को तोड़ कर असंगठित समाजों के सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों को भी प्रभावित करने लगा है। याद रखें जहाँ कहीं परिवार और समाज समाप्त होता है, वहीं से सरकारी नियम कायदे शुरू हो जाते हैं।
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आजादी के कुछ दशक बाद बने कानूनों ने समाज और परिवार की भूमिका में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया और वह हर नागरिक के लिए क्या कर्तव्य और अधिकार होने चाहिए, उस पर वह बेरहम बॉस की भूमिका में आ गया है। सामाजिक और पारिवारिक भूमिका को खत्म करके अपने लक्ष्योंं को कानून के डंडे पर कार्यन्वित करना शुरू कर दिया। आज बच्चे की शिक्षा, बच्चों की शादी की आयु, संपत्ति का बँटवारा, उसका रजिस्ट्रेशन, आय-व्यय और कर देयता आदि मामले में आप कानून का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। भले ही परिवार और समाज का सोच कितना भी अलग क्यों न हो।
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आज का भारतीय इंसान एक पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति से अधिक देश के कानूनों से बंधा एक इंसानी नागरिक है। पारिवार और समाज और उसके तमाम भूमिकाओं को सीमांकित करते हुए कानून हर व्यक्ति के अधिकार को सामाजिक और पारिवारिक से बदल कर व्यक्तिगत अधिकार में बदल दिया है। नये-नये कानूनों के द्वारा इसे और भी मजबूत किया जाएगा, क्योंकि परिवार और समाज की प्रभावी भूमिका नगण्य होने लगी है।
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आज एक वयस्क व्यक्ति अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए, अपने सुख और स्वार्थ के खातिर परिवार और सामाज की उपेक्षा कर सकता है। यदि व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वलंबित हो तो उसे परिवार और समाज की कोई परवाह नहीं हो सकती है। शहरों में हर परिवार, दुकानदार या कोई भी व्यक्ति अपने घर के चार दीवारी के बाहर सरकारी कानूनों से बंधा हुआ होता है। उसकी सुरक्षा, उनकी स्वतंत्रता की जिम्मेदारी परिवार नहीं उठाता है, बल्कि घर के बाहर वह सरकारी कार्य-व्यापार (affairs) कानून और व्यवस्था का अंग हो जाता है।
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आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक-आत्मविश्वास उस व्यक्ति से अलग होता है, जो खुद आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होता है। लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति बौद्धिक रूप से आत्मनिर्भर न हो तो वह क्या कर बैठेगा, इसका अंदाजा किसी को भी नहीं होता है। व्यक्तिगत आबाध आजादी भी कभी-कभी व्यक्ति और समाज के लिए जी का जंजाल बन जाता है।
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जो समाज खुद विभिन्न आधारों पर छिन्न-भिन्न रहता है, उसके सदस्य उतने ही परालंबित होते हैं। व्यक्ति को दिशा निर्देश देने में ऐसे समाज अक्षम होते हैं। सांस्कृतिक रूप से ऐसे समाज का एकीकरण तत्व कमजोर होता है और उसके ऐसे सदस्य जो बौद्धिक रूप से चेतनाशील नहीं होते हैं,वे व्यक्तिगत मामलों में अपने सामाजिक और पारिवारिक नियमों से अधिक सरकारी नियमों के नजदीक होते हैं। सरकारी नियम कायदे दैनिक जीवन में निष्क्रिय होते हैं, और वे व्यक्ति के सर्वोच्च कल्याण के लिए उचित और नैतिक सलाह देने में सर्वथा असमर्थ होते हैं। लेकिन कानून समाज के ऐसे सदस्य के जीवन में सक्रिय रूप से भी अधिक नजदीक होते हैं। जो अपनी कानूनी प्रक्रिया से सुरक्षा देने से अधिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से अधिक परिशानी दे सकते हैं और उत्पीड़न कर सकते हैं। कानून यहां दुधारी तलवार बन जाती है। सुरक्षा भी देती है लेकिन घायल भी करती है।
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देश में व्यक्ति, आज तक, न तो पूरी तरह सरकारी नागरिक बन सका है और न ही वह पूरी तरह से गैर-पारिवारिक और गैर-सामाजिक बन सका है। भारत में तमाम समाज एक संधि काल से गुजर रहे हैं। तमाम समाज न तो पूर्ण शिक्षित, आधुनिक प्रगतिशील विचारों से सुसज्जित और आर्थिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र बन सका है और न ही दूसरी ओर सरकार नागिरक का हर पल ख्याल रखने वाला सुख-दुख का पक्का अभिभावक बन पाया है। यहाँ व्यक्तिगत आजादी को यूरोपीय आजाद समाज तक पहुँचने में कम से और दो सौ साल लगेंगे। भारतीय उत्तर आधुनिक काल यूरोप के जागरण काल से आगे नहीं बढ़ पाया है।
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व्यक्तिगत ख्वाहिशें, सुख, स्वार्थ आदि कुछ ऐसे विषय हैं जो निरंतर बदलते रहते हैं। आयु विशेष में वह सिर चढ़ कर बोलता है। वहीं पारिवारिक ख्वाहिशें, सुख, दुख, स्वार्थ, कल्याण, प्रगतिशीलता के विषय रोज और निरंतर बदलने वाले विषय नहीं होते हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताएँ हमेशा अलग-अलग होते हैं। व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सुख के लिए समाज को बदलने का आदेश नहीं दे सकता है और न ही पारिवार अन्य दूसरे सदस्यों की कीमत पर, किसी एक सदस्य को मनमानी करने की छूट दे सकती है। प्राचीन काल में विद्रोही सदस्य अपने विद्रोह से समाज और परिवार को तिलांजली दे कर साधु, सैनिक आदि बन जाते थे, क्योंकि अपने समाज का विद्रोही दूसरे समाज का सक्रिय खुशमिज़ाज सदस्य नहीं बन पाते थे। हर समाज में दूसरे समाज के सदस्यों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के अपने कारण विद्यामान हैं और उन कारणों को रातों रात किसी दो चार सदस्यों के सुख, स्वार्थ और कल्याण के नाम बदलते नहीं देखा गया है। विद्रोह मानवीय स्वभाव है और इसे समाज का मुख्य धारा नहीं माना जाता है। इसे हमेशा अपवाद की श्रेणी में रखा गया है।
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आजादी के बाद समाज का हर तबका का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है। बाजारवाद ने व्यक्तिवाद को हवा दिया। देश में जनसंख्या अधिक है और संसाधन कम ऐसे में व्यक्तिवाद के मनोविज्ञान को काम में लगा कर तेजी से बदलते महौल में संसाधनों को हड़पने का भी एक नया लेकिन गैर कानूनी आंदोलन भी शुरू हो गया। पूँजीवाद की दुनिया में इसे क्रोनी कैपिटलइज्म कहा गया है। जबकि सामाजिक मामले में इसे ठगी, चालाकी और भ्रमित कार्य कहा गया है। यह आंदोलन शुद्ध व्यक्तिवाद के आधार पर काम करता है। लेकिन जहाँ कहीं परिवार और समाज की सोच, विचारधारा, जागरूकता, चेतनाशीलता अपने शबाब पर होता है, वहाँ यह औंधेमुँह गिरता है। जर, जोरू और जमीन की लूट कोई नयी बात नहीं है। इसके तह में जाने के लिए इतिहास पढ़ने की जरूरत भी नहीं है।
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आज का आदिवासी समाज और पचास-सौ वर्ष पूर्व के आदिवासी समाज में भारी अंतर है। शिक्षा, आरक्षण, आय, सम्पत्ति, सम्पन्नता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नयी सोच के आंदोलन ने एक नये आदिवासी समाज का गठन किया है। सुख, खुशी और स्वार्थ के सारी इच्छाओं को पूर्ण करने की ख्वाहिशें भी समाज में भीतर-भीतर, उसी तरह से मचलने लगी हैं, जैसे पृथ्वी के अंदरूनी क्षेत्रों में ज्वलामुखी के माध्यम से बाहर आने के लिए भूगर्भीय शक्तियाँ मचाया करती हैं। लेकिन यह कम शक्तिशाली होने के कारण अपने सीमित एरिया को छोड़कर और कहीं प्रभाव नहीं डालती है।
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लेकिन समाज में कब कोई बड़ी भूकंप आ जाए, इसे कोई नहीं जानता है। लेकिन यह तय है कि जब बड़े भूकंप आते हैं तो वह अनेक पुराने इमारतों को गिरा कर तहस नहस कर डालते हैं। लेकिन जापान में अब भूकंपरोधी इमारतें ही बनती है। वहाँ दूसरे गैर-भूकंपरोधी इमारतों के लिए कोई जगह नहीं होती है। जाहिर है कि इमारतों के लिए भूकंपरोधी तकनीकी का विकास किया जा सकता है, लेकिन जीवन और विचार निरंतर चलायमान होते हैं और यहाँ कोई रोधी, अवरोधी तकनीकी काम नहीं करते हैं। विचारों में कंपन ही विचारों का जीवन है।
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