गरीब अंधे को चाहिए दो आँखें

                                       नेह इंदवार

प्रश्न 1. अंधे को क्या चाहिए ? उत्तर - दो आँखें।

प्रश्न 2. एक नेता को क्या चाहिए ? उत्तर - नेता बने रहने के लिए वोट चाहिए।

किसी के पास दो आँखें हैं, लेकिन वह किसी अंधे के हजारों बार मिमिया कर मांगने पर भी दो आँखें  नहीं देता है। बल्कि वह अंधे के आँखों में काजल लगा देता है।

अंधे के बार-बार मांगने पर वह कभी उसे नया शर्ट पहना देता है, कभी उसके हाथों में अंगुठी पहना देता है, कभी वह अंधे को चप्पल पहना देता है, अधिक मांगने पर वह अधे को कोर्ट और पैंट पहना देता है और ऊपर से एक टाई भी पहना देता है। अंधे के और अधिक चिल्ला कर मांगने पर वह अंधे को एक आईना दे देता है।

जिनके पास दो आँखें हैं और जिसे अंधे पर लगा देने पर अंधा सामान्य दृष्टि वाला बन जाएगा। उसे सारी दुनिया दिखाई देने लगेगी और वह विकलांग नहीं रह जाएगा। लेकिन जिस आदमी के अलमारी में आँखें रखी हुई है, वह आदमी अंधे को किसी भी तरह से आँखें नहीं देता है और दुनिया को बताते रहता है कि देखो मैं कितना दयावान हूँ, एक अंधे को शर्ट, अंगुठी, चप्पल, कोर्ट-पैंट-टाई, आईना देता हूँ और इसका देखभाल करता हूँ। वह लोगों के सामने अपने को दयावान और परोपकारी का रूप दिखाने के लिए अंधे को सहारा देने के लिए एक नौकर रख देता है। दुनिया कहती है कि देखो ! देखो ! वह आदमी कितना दयालु, परोपकारी और दयावान है कि उसने एक अँधे को सहारा देने के लिए एक नौकर तक रख दिया है। है कोई ऐसा दयालु आदमी ?? 

पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के हाथों में अंधे (चाय मजदूरों) के लिए दो आँखें (न्यूनतम मजदूरी, आवास पट्टा) है। लेकिन वह उन्हें दो आँखें न दे कर कभी किसी महापुरूष के नाम पर छुट्टी दे देती है तो कभी किसी परब पर सवेतन अवकाश। सरकार  पूरे देश और प्रदेश को मिलने वाला राशन दे देती है। बच्चों को साईकिल दे देती है, स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों को कन्यश्री के पैसे दे देती है। कभी कहीं जरूरी होता  है तो कोई प्राईमरी या हाई स्कूल दे देता है। कभी किसी जाति और समुदाय को कोई सामुदायिक विकास बोर्ड देकर कुछ पैसे दे देती है। जिन्हें युगों से गरीब बना कर रखा हुआ है, उन्हें पेंशन के नाम पर कुछ पैसे दे देती है। 

वह फालतू के अनेक चीजें देती है और कहती है देखो मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या सुविधा दे रखा है ? 

राशन, साईकिल, स्कूली बच्चों और कन्या बच्चों को पैसे, पंचायत को आबंटन आदि देश के अधिकतर या सभी प्रदेशों में मिलते हैं, उसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल सरकार भी देती है।  लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी कहती है मैंने तुम्हें अमका-ढिकाना दे दिया है। तुम्हारे कुछ लोगों को मैंने जिला स्तर के नेता बना दिया है। कुछ लोगों को शहरों के प्रशासनिक बोर्ड में शामिल कर दिया है,  इसलिए तुम मुझे अपना सारा वोट दे दो।

मजदूर कहता है कि सरकार मैं एक अंधा (गरीब, अनपढ़) हूँ, मुझे तुम दो आँखें (न्यूनतम मजदूरी और पट्टा) दे दो, मैं हमेशा के लिए तुम्हारा गुलाम बन जाऊँगा, लेकिन माँ-मनुष्य-माटी की यह सरकार इन दो मांगों की बात आने पर सरकार अपना चेहरे को किसी और दिशा में मोड देती है, जैसे कि उन्होंने इस संबंध में कोई बात सुनी ही नहीं है। वह गलती से लोकसभा के चुनाव के समय तीन बार (सुभाषिनी बागान,  टियाबोन, चालसा और कुमारग्राम में) बगानियारों को उनके घर के जमीन का पट्टा देने का ऐलान कर दिया था। लेकिन बाद में अपनी भूल महसुस करके विधानसभा चुनाव में इस मुद्दों पर अपने मुँह को जोर से बंद कर दिया। बाप रे! ऐसी गलती फिर न करूँ मैं । 

राज्य सरकार किसी भी कीमत पर दोनों को देने के लिए राजी नहीं है। उनके मन में बागान मालिकों के लिए जितनी लगाव है, उसका एक तिनका भी चाय मजदूरों के लिए नहीं है। .सरकार मजदूरों को अंधा ही बनाए कर रखना चाहती है, क्योंकि मजदूरों को आँखे मिल जाएगी तो वह सामर्थवान हो जाएगें, उनका अपना मनपसंद और अपने आर्थिक सामर्थ से बनने वाला अपना घर और पुरखों का जमीन होगा, वे अपने बच्चों को अच्छी और ऊँची शिक्षा देने में समर्थ होंगे और वे उन्नति के शिखर पर पहुँच जाएँगे। ऐसे सामर्थवान मजदूर एक सामर्थवान भारतीय नागरिक बन जाएँगे, और वे चाय मालिकों के चंगुल से बच कर निकल जाएँगे और धाँगर (गुलामी) की जिंदगी से आजाद हो जाएँगे। उन्हें आजादी किसी भी कीमत पर नहीं देनी है, इसीलिए उन्हें अंधे ही बना रहना देना है।

अब मजदूर क्या करेंगे ? मजदूरों का भी अपना कर्तव्य होगा -- वे नेताओं का खूब नाचते हुए स्वागत करेंगे, उनका जयजयकार करेंगे, उन्हें अपने साथ नृत्य कराएँगे, उन्हें फूल माला पहनाएँगे, उन्हें अपना घर और इलाके में बार-बार स्वागत करेंगे, नेता के मिटिंग में भारी संख्या में जाएँगे, उनका दिया हुआ मुर्गा भात खाएँगे, दारू पीएँगे, लेकिन कभी भी भूल कर भी अपना #अमूल्य_वोट_नहीं देंगे। जिस तरह माँ मनुष्य की सरकार दो आँखें नहीं देती है वैसे ही मजदूर भी अपना वोट नहीं देंगे। भले वोट प्राप्त करने के लिए कितने भी बगानियारों को बड़े-बड़े पद देकर वोट की जुगाड़ करवाएँगे। 

जरा सोचिए ऐसे नेता का क्या होगा, जिन्हें कोई वोट ही नहीं देगा। उसकी नेतागिरी और सत्ता तो हाथ से निकल ही जाएगी न। लेन-देन तो बराबर की चीजों में होती है। सौ रूपये देकर 10 रूपये का सामान लेकर कौन लगातार बेवकूफ बनते रहेगा ? 

यदि नेता को वोट चाहिए तो अंधे (मजदूर) को भी दो आँखें चाहिए।

यह एक सीधी सी बात है, इसे यदि कोई नेता न समझे तो समझ जाईए कि वह नेता वास्तविक रूप में बोका मनुष्य है।

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