नेह इंदवार
फेसबुक में रोज नये सदस्य जुड़ते जाते हैं। लेकिन फेसबुक से गायब होने वाले सदस्यों की संख्या भी कम नहीं है।
दो तीन साल पूर्व जो सदस्य अत्यधिक रूप से सक्रिय रहते थे, वे अब कभी कभार दिखाई देते हैं। कई तो पूरी तरह से फेसबुक से गायब हो गए हैं। उनका न तो कोई अपडेट मिलता है और न कोई पोस्ट। इसीलिए कभी-कभार सवाल उठता है, कहाँ गए वे लोग ?
2011-12 सालों में नियमित पोस्ट डालने वाले, कमेंट करने वाले अनेक लोग फेसबुक में सिरे से गायब है?
फेसबुक एक आधुनिक संचार माध्यम है। यहाँ विचारों के लाखों मंच है। राजनेता, मंत्री, उद्योगपति, फिल्म, टेलिविजन और अन्य क्षेत्रों के गणमण्य व्यक्ति अखबारों, खबरिया चैनलों के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करते रहते हैं और उन्हें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए किसी माध्यम की तलाश नहीं रहती है। ऐसे लोगों को पब्लिक रिलेसन्स मैनेजर उनके जनसंपर्क को गढ़ने, सुदृष्ट करने और उनके विचारों को उनके हितसाधन के लिए उपयोग या दूरूपयोग करने के लिए प्लानिंग करते रहते हैं। वे अपने सार्वजनिक पदों के कारण सहज ही अपने विचार मीडिया में संचारित कर लेते हैं।
लेकिन ओर्कुट, फेसबुक, ट्यूटर, ह्वाट्एप, गुगल +, टम्बर, इंस्टाग्राम, क्यू क्यू, वीचाट् आदि सोशल साईट के पूर्व आम जनता के लिए अपनी बात रखने के लिए कोई मंच उपलब्ध नहीं था। आम जनता तथाकथित मुख्य धारा के मीडिया के द्वारा परोसे जाने वाले सामग्री को पढ़ने के लिए अभिशप्त थे।
इंटरनेट टेक्नोलॉजी के आगमन के बाद दुनिया बहुत बदल चुकी है।
पूरी दुनिया में आर्थिक और सामाजिक रूप से शोषित और वंचित तबका अभिजात वर्ग के मुट्ठी में कैद संचार एकाधिकार से भी शोषित और वंचित था। विचारों की अभिव्यक्ति की दुनिया में इंटरनेट टेक्नोलॉजी ने तथाकथित अभिजात वर्ग के संचार साधनों की एकाधिकार को तोड़ दिया है।
वंचितों शोषितों के हित और सार्वजनिक कल्याण और उससे संबंधित नीतियों और उनके कार्यान्वयन को, कभी भी न तो प्रमुखता से संचार साधन या मीडिया में स्थान मिलता था, न ही उनकी कमियों, त्रुटियों और उसमें उपस्थित भयानक फासले और शुन्यता पर ही कोई सार्थक बहस, विमर्श या चर्चा होता था। सब कुछ एक तरफा नदी की तरह बहाव का मामला था।
जनसंचार और मीडिया के तमाम साधन कुछ मुट्ठी भर अभिजात वर्ग के हाथों में सिमटा हुआ था और वे उसे अपने हित के उपकरण के रूप में मनमाने ढंग से चलाते थे। आम जनता विशेष कर पिछड़े, दबे कुचले लोगों की कोई आवाज़ कभी मुकम्मल ढंग से राष्ट्रीय मीडिया में सुनाई नहीं देती थी। भारतीय मीडिया तो सवर्ण समाज के वर्चस्व और हित की लड़ाई में युद्धक तोप और मिसाईल ही बना था।
लेकिन नये जमाने के सोशल साईटों ने स्थिति को उलट कर रख दिया है। आज तथाकथित राष्ट्रीय खबरें देने वाले लोग बेनकाब होते जा रहे हैं। आम जनता रोज जान रही है कि मीडिया के क्षेत्र में कौन भेड़िया है और कौन बकरी ? आज खबरों के स्रोत खुद आम जनता है और वही खबरों के विश्लेषक भी। सस्ती चाईनिज मोबाईल ने गाँव के घिसु और माधो को भी आज संवाददाता और खरबनवीस बना दिया है। अभिजात वर्ग अपने जिस काले चरित्र को हमेशा छुपा कर रखता था, वह आज उजाले में बदसूरती का प्रतीक बन गया है। उसकी बदसूरती से सारा देश और संसार परिचित हो रहा है और वह उसे लानत, मलानत भेजने में जरा भी नहीं हिचकिचाती है। आज सोशल साईट्स गरीब, वंचित और हाशिये के समाज का मजबूत हथियार बन गया है।
लेकिन हर सिक्के की तरह ही सोशल मीडिया के भी दो पहलू है। जिन्हें सिक्के के दोनों पहलूओं को ध्यान से देखने की आदत नहीं है, वह एक ही पहलू को देखकर उसके सिक्के होने की बात को मान लेता है। लेकिन जो पारखी होते हैं वे न सिर्फ सिक्के के दोनों पहलूओं को ध्यान से देखते हैं बल्कि सिक्के के दोनों पहलूओं में लिखे ईबारतों को भी पढ़ते हैं और बाजार में सिक्के की सही कीमत का अंदाजा भी लगा लेते हैं।
सोशल साईट ने नये-नये अंदाज में नये-नये शब्द भी दिया है। “व्हाट्सएप विश्वविद्यालय” शब्द भी यहीं से जन्म लिया है। सीधे-सादे लोग इस शब्द को व्हाट्सएप से जोड़कर देखते हैं। लेकिन चालाक लोग वाक्यों के बीच के अर्थ को समझने के लिए इस शब्द का प्रयोग करते हैं।
फेसबुक सिर्फ दोस्तों, रिश्तोदारों या नेताओं का ही मंच नहीं है। मुख्यतः यह वैकल्पिक विचारों का मंच के रूप में उभर कर आया है। यहाँ घाघ नेताओं के शून्यता से घिरे विचारों से भी मुलाकात होती है तो आम लोगों के आम जीवन से सरोकार रखने वाले गहरे विचार भी आदमी को विचारोंतेजक बना देते है।
फेसबुक में ऐसे लोग बहुत सक्रिय हो जाते हैं, जिन्हें विचारों की दुनिया में रमना पसंद होता है। वहीं ऐसे लोग फेसबुक से गायब भी हो जाते हैं, जिन्हें विचारों की दुनिया से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं है और जो अपने जन्मदिन का केक और कुछ यादगार फोटो को शेयर करना ही फेसबुक की उपयोगिता मानते हैं। जिन्हें उपयोगितावाद के बारे कुछ भी नहीं मालूम वे चीजों के उपयोगी होने या नहीं होने पर बहुत जल्दी अपनी राय बना भी नहीं पाते हैं।
व्यापार की दुनिया सोशल साईट्स को मुनाफा बनाने का एक बना बनाया बाजार मानता है। वहीं विचारों और संस्कृतियों के माध्यम से अपने राजनैतिक साम्राज्य को विस्तार देने वाले इसे एक जगह इकट्ठे श्रोताओं का समूह मानते हैं। वोटरों के दिमाग को उलट-पलट करने का यह उत्तम उपकरण बन गया है। चुनावी रणनीतिकारों के लिए फेसबुस एक चुनावी रैली बन जाता है।

दूसरी ओर वंचित और शोषितों के लिए चिंतन करने वाले इसे अभिजात और सामंती मानसिकता से जीवन जीने वाले वर्ग के अमानवीय स्वार्थों से मुकाबला करने का रणक्षेत्र के रूप में देखते हैं। बौद्धिक विकास करने, विचारों को पढ़ने, विचारों की गहरी चालों को समझने, नेटवर्क बनाने, सरसरी अध्ययन करने आदि तमाम किस्मों का विश्वविद्यालय वर्तमान के सोशल साईट्स ही हैं। ज्ञान के सागर में निरंतर बदलते पहलुओं, उनकी सीमा, तर्कों और उनकी औचित्य आदि को गहरे रूप से जाँचने का भी यह एक ज्ञानमंच है। जो सोशल साईट्स से बोर होकर यहाँ से गायब हो जाते हैं, उन्हें अपने दृष्टिकोण पर आत्मचिंतन जरूर करना चाहिए।
गायब होते लोगों से फेसबुक जैसे सोशल साईट यही कहता है “ जो विचारों की लड़ाई से डर गया, समझो वह बौद्धिक रूप से मर गया।" नेह।
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