नेह इंदवार
सन् 1609 ईस्वी में गैलीलियो गैलीली (1564-1642) के दूरबीन के अविष्कार के पूर्व पूरा ब्रह्माण्ड मानव के नंगी आंखों से दिखने वाली सीमा तक ही सीमित था। तब ब्राह्मांड का मतलब था, सूरज, चाँद, टिमटिमाते तारे और दिन का नीला आकाश। मानवीय आंखों ने तब कोई गैलेक्सी नहीं देखा। न तो अपना वाला Milky way गैलेक्सी को देखा न पड़ोसी Andromeda गैलेक्सी को देखा। ब्लैकहोल की बातें तो बहुत दूर की बात थीं।
रात में दिखने वाले Milky way को अधिकतर सभ्यताओं में आकाशीय नदी कहा जाता था। भारत में इसे आकाशगंगा कहा गया। गैलीलियो ने ही प्रथम बार 1610 में Milky way को देखा और बताया कि यह कोई नदी नहीं है, बल्कि खरबों तारों का समूह है। यहाँ तक कि रोज छोटे बड़े रूप में पृथ्वी से टकराने वाले उल्कापिंड, ठोस और गैसीय ग्रहों (Jupiter, Saturn, Uranus and Neptune.) के बारे में भी कोई निश्चित बात नहीं कही गई। ग्रह ठोस (पृथ्वी, मंगल, शुक्र ग्रह) और गैसीय (बृहस्पति, शनि यूरेनस) होते हैं, यह बात बहुत दिनों के बाद पता चला।
आकाश के खरबों चमकते तारों के बीच अपनी स्थिति तेजी से बदलने के कारण प्राचीन काल से ही आकाश में नौ ग्रह होने की बात कही जाती रही थी। लेकिन सौरमंडल में 8 ग्रह हैं, प्लूटो को वैज्ञानिकों ने 2006 में ही ग्रह से पदच्यूत करके बौना ग्रह के पद पर बैठा दिए हैं। नौ ग्रह के स्वरूप (आकार- प्रकार) के बारे किसी भी सभ्यता को किंचित भी कोई जानकारी नहीं थी। किसी भी धार्मिक किताबों में इसके बारे कहीं कोई विवरण उपलब्ध नहीं है।
कहते हैं जहाँ न जाए रवि, वहाँ जाए कवि। अर्थात् कवि की कल्पनाएँ सूरज की रोशनी से भी तीक्ष्ण और तेज होता है। लेकिन प्राचीन और मध्य काल के किसी भी कवि की कल्पना ब्लैक होल तक न पहुँचा। न ही गैलेक्सी के मध्य में खरबों सूरज के पदार्थ को अपने भीतर समाए Sagittarius A तक किसी कवि या धार्मिक किताबों के किसी लेखक की दृष्टि और कल्पना गयी। यदि धार्मिक किताबों का निर्माण लेखन और उत्पादन हर धर्म के ईश्वर ही किए होते तो इन बातों की कोई जिक्र तो कहीं होती।
यह
स्पष्ट हो गया है कि नंगी आंखों की सीमा के आगे मानवीय कल्पनाएं ठोस रूप में काम
करने में फेल हो जाया करती हैं। विज्ञान के रहस्यों के बारे प्रचण्ड मानवीय मेधा भी मशीनोॆ की सहायता के बिना भौतिक शोध या चिंतन करने में फिसड्डी था। जब धर्मो का उत्पादन
हुआ तब भौतिकी शोधयोग्य उपकरणों की बातें कल्पनातीत थीं। प्राचीन दुनिया में हर
विषय में सोच-चिंतन की सीमा अत्यंत सीमित थी। तब चिंतन का आकार प्रकार ही संकीर्ण,
बौना और पूरी तरह स्थानीय था। लेकिन दुनिया और अंतरिक्ष की हर बात की अंतिम सच्चाई को जान लेने का घमंड और शेखी बघारने की
कला अत्यंत विकसित थी।
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हर
बात की अंतिम सच्चाई के ज्ञान से वाकिफ होने का घमंडी-चिंतन और उस पर टिकी
विचारधारा के कारण ही दुनिया के तमाम समाजों में पृथ्वी को यूनिवर्स का केन्द्र
बिन्दु माना जाता था। धर्म गुरू, राजे महाराजे और ताकतवर, प्रभावशाली लोग भोले भाले अनपढ़ और
तर्कशक्ति से अन्जान जनता के बीच स्वंय को दुनिया और ब्रह्मांड के सबसे
शक्तिमान राजा-महाराजा या ब्रह्मांडलीय-धर्म ब्रह्मांडलीय (Universal) गुरू घोषित कर देते थे। कुआँ का मेढक
कुआँ को ही ब्रह्माण्ड समझ लें तो हैरानी नहीं।
विश्व में सिर्फ एक ईश्वर होने के वर्चस्ववादी विचारों का
उत्पादन भी ऐसे ही घमंडी भावनाओं से हुआ था। इन विचारों के केन्द्रीय तत्व में सारी दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना ही था। ऐसे ही खतरनाक नकारात्मक चिंतन के
कारण कई राजाओं ने विश्व विजय अभियान में निकले और करोड़ों लोगों को हिंसा की आग
में झोंक दिए। Universal Kingdom,
Universal Religion आदि कई ऐसे नकारात्मक विचारधाराओं का जन्म इतिहास के
मध्यकाल में हुआ था, जिसका कुफल आज भी पूरी दुनिया भोग रही है।
ईसाई और इस्लाम धर्म को पूरे विश्व में छल-बल द्वारा
फैलाने का विचार भी ऐसे ही घमंडी विचारधारा से निकला था। दुनिया के तमाम स्थानीय कला-संस्कृति,
दर्शन, समाज को मटियामेट करने में यही घमंडी चिंतन ही पूरी तरह जिम्मेदार रहा है। पूरी दुनिया में एक ही धर्म और एक ही राजा का राज स्थापित
करने का खतरनाक चिंतन भी ऐसी ही वर्स्चवादी विचारधाराओं से उत्पन्न हुआ था।
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कई
धार्मिक किताबों के अनुसार, राजा या धार्मिक गुरू जिस शहर, घर-महल या बेडरूम में रहते थे, उसे ही यूनिवर्स का केन्द्र बिन्दु घोषित
कर देते थे। उसे ब्रह्मांड का महान पवित्रतम बेडरूप, घर या महल घोषित कर देते थे। उनके अधीनस्थ चमचे लेखक उनकी घमंडभरी
बौनी बातों को किताबें में लिख कर उसे अमर बनाने के मंसुबे पाल लेते थे। बाद में उन्हीं बातों को दुनिया के तमाम
तथाकथित धार्मिक किताबों का हिस्सा बनाया गया। दुनिया के किसी भी धर्म के तथाकथित
पवित्र किताबों को देखें, पढ़ें, उनमें ज्ञान की अंतिम सच्चाई की बातें जानने के
दावे मिल ही जाते हैं।
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यूनिवर्स
के इन बड़बोले "बिन्दुओं या केन्द्रों" पर हाडमांस के बने धार्मिक सत्ता
वाले यूनिवर्सल शासक और धर्म गुरू होते थे। वे अपने को सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञाता और सर्वकर्ता घोषित करते रहते
थे। तमाम धार्मिक और अधार्मिक किताबें इन महानुभावों के पाखण्डों और हस्यकर बौनी
बातों का बड़ी शान से बखान करते रहे हैं। क्योंकि उन्हें भविष्य में होने वाले
वैज्ञानिक उपकरण आधारित शोध (Scientific Equipment Based
Research) ज्ञान
का तनिक भी अभास नहीं था। उनकी बातों का कोई आधार नहीं है और वह कभी भी रेत के महल
की तरह भरभराकर कर गिर जाएगा, ऐसा वे कोई अनुमान ही लगा नहीं सके।
आत्मप्रशंसा आदमी के दिमाग को अंधा बना देता है।
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धरती
से 13 लाख
गुणा बड़ा सूरज को निगल लेना, जड़ी-बुटी लाने के लिए पहाड़ को हथेली पर
उठा लेना और आकाश में पंख बिना उड़ना, परमेश्वर द्वारा सात दिन में पृथ्वी और
आकाश का निर्माण करना, स्वर्ग में सुंदर परियों का होना, नर्क में गर्म तेल में पापियों का फ्राई
करना, क्षणभंगुरता
वाले मानव शरीर में मानवीय डीएनए के साथ जन्म लेने वालों का स्वर्ग के परमेश्वर, सृजनहार के साथ उठना बैठना और बातें करना
आदि बातें ऐसे ही घमंड और कल्पना में कही गईं बाते हैं। धार्मिक किताबों में इतने
गप्पबाजी लिखी हुई है कि उन पर आधुनिक ज्ञान ठहाके लगा कर हँसता है। मरने के बाद
आज तक कोई लेखक नहीं बना है। मृत्यु बाद जिंदगी का विस्तृत वर्णन कितना काल्पनिक
हो सकता है, इसका
अनुमान तर्कशक्ति से संपन्न एक अनपढ़ बच्चा भी कर सकता है।
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प्राचीन
बौने कल्पनाशील घमंडियों को जरा भी अनुमान नहीं था कि भविष्य के मानव मेधा नये विचारों
से पोषित होंगे। तर्कशास्त्र का विकास होगा। फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स, मनोविज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, राकेट साईंस आदि नये-नये विषय आएँगे और
लाखों प्रकार के शोध होंगे। चाँद, सूरज, तारों के शरीर को खँगालें जाएँगे।
यूनिवर्सल शिक्षा और तर्क-संस्कृति मानव को स्वतंत्र चिंतन का महौल देगा और सभी
मानव बुद्धिमान बनने के काबिल होंगे, यह घमंडियों ने कभी अनुमान ही नहीं लगा
पाया।
ब्रम्हांड की सब सच्चाईयों को अंतिम रूप
से जानने का दंभ भरने वाले किसी भी धार्मिक पोथी में प्राकृतिक की सबसे साधारण
लेकिन सबसे बड़ी सच्चाई के बारे नहीं लिखा गया है। पृथ्वी एक ग्रह है और सूरज एक
तारा। तारे में अणु, परमाणु
क्रियाशील होते हैं, लेकिन
ग्रह कई तरह के होते हैं। ग्रह तारे का चक्कर लगाते हैं और उपग्रह ग्रह का। चाँद
एक उपग्रह है और पृथ्वी का चक्कर लगाता है। खून के ग्रुप के बारे या बैक्टीरिया के
बारे भी किसी प्रकार का कोई जिक्र इन किताबों में नहीं है। पेड़ की पत्ती पर
क्रोलोफिल बनता है और वह ऊर्जा का स्रोत है, यह भी किसी तथाकथित ईश्वर लिखित किताब
में नहीं लिखा हुआ है। लेकिन उनकी चालाकी भी देखिए, जैसे ही नये वैज्ञानिक ज्ञान की बातें
बाहर आतीं, वे
चुपके से अपनी किताबों में एडिटिंग कर लेते हैं।
इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि जिन
किताबों में प्रकृति के सबसे बड़े सच्चाईयों का जिक्र नहीं है उन्हें आज भी
ईश्वरीय रचना कह कर प्रचारित किया जाता है। इन किताबों की रचना खुद ईश्वर ने किया
है यह कह कर खूब भ्रम फैलाया जाता है। आज भी धार्मिक स्थलों में इन्हीं
किताबों के सहारे तर्कहीन लोगों के दिमाग को पंगु बनाया जाता है। धार्मिक गुरू और उनका संगठन अनपढ़, तर्कहीन जनता को अवैज्ञानिक बातों पर विश्वास करने के
लिए हजारों प्रकार की चालाकियों का सहारा लेते हैं। लेकिन कोई भी शिक्षित व्यक्ति
जिन्हें वैज्ञानिक तथ्यों की ठीक-ठाक जानकारी है। जिनकी सोच तर्कपूर्ण और विश्लेषण
क्षमता से पूर्ण है, इन
पोंगापंथी धार्मिक किताबों को पढ़कर इनके पोपलेपन को जान सकता है।
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भला
इन ईश्वरीय रचित किताबों में प्राकृतिक रहस्यों की कौन सी सच्चाई का जिक्र असली हो
सकता है ?? धार्मिक
रूप से जिस स्वर्ग और नर्क के चारों और धार्मिक किताबें बारम्बार चक्कर लगाती है
उसमें कितनी सच्चाइयाँ होंगी ?? या जिन देवताओं, ईश्वरों, परमेश्वरों का जिक्र इन किताबों में है
उनमें कितनी वास्तविकता होंगी ??? जब मानवीय चिंतनधारा घमंडी और बौना होता
था, तब
कई दर्जन ईश्वरों का अविष्कार हुआ था। चिंतन करने, उसे समाज का अंग बनाने की असीम शक्ति राजा राजवाड़ों या धार्मिक
गुरूओं के मुट्ठी में कैद होंती थीं। ऐसे लोग समाज की चिंतनधारा को अपनी मुट्ठी
में कैद करके रखते थे। वे उन्हीं चिंतन धारा को सामने रखते थे जो उनके स्वार्थ और
हित सेजुड़े
हुए होते थे।
इन किताबों को लिखने वाले धाँसु लेखकों
को असली ब्रह्माण्ड, सौर
मण्डल, गैलेक्सी
या सामूहिक गैलेक्सियों के बारे किंचित भी ज्ञान नहीं था, न ही ग्रहों के ग्रेविटेशनल खिंचाव के
बारे कुछ भान था। इसलिए उन्होंने उन किताबों में ऐसी कोई बातों को जगह नहीं दी।
लेकिन मानना पड़ेगा कि वे धाँसू कल्पनाबाज जरूर थे। वे मानव मन को उत्सुक करने
वाले अलौकिक, रहस्यमय, न समझ में आने वाले मनोवैज्ञानिक भय, मानवीय सोच पर खूब लिखे। लेकिन वैकल्पिक
वैज्ञानिक शोध जिसे हजारों बार कार्य और परिणाम के रूप में सिद्ध किए जा सकते हैं, के बारे मार खा गए। अपनी किताबोंं को
मान्य बनाने के लिए वे उन किताबों में नैतिकता और नीति शास्त्र की बातों को खुब
जगह दीं। उन्हें मालूम था, कि नैतिकता के नियमों से ही समाज का संचालन होता है।
नैतिकता के नकाब पहना कर उनमें धार्मिकता भरा जाता था।
आम जनता को धर्म के नाम पर ठगने वालों ने
इन किताबों को ईश्वरीय कृति कहा है ताकि लोग बिना संदेह दिमाग को दिरखा में रख कर
इसे अपना लें और उनकी धार्मिक सत्ता का प्रभाव युगानुयुग तक चलती रहे। इन किताबों
में वे यह भी लिखना न भूले कि इन किताबों की सच्चाई पर कोई सवाल न किया जाए। हर खतरे
से इन्सुलेशन (बचाव) करने की चालाकी तो कोई इन शेखीबाजों से सीखे।
इन किताबों को ईश्वर द्वारा लिखे गए
घोषणा करने वालों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि भविष्य में उनकी चालाकियों को
विज्ञान का ज्ञान रखने वाले बच्चे-बच्चे तक पकड़ लेंगे और उनकी ब्रह्माण्डलीय परम
और सीमाहीन ज्ञान की हँसी उड़ाएंगे। इन किताबों के सहारे अपने हित साधने वाले
स्वार्थी तत्व आज भी नहीं चाहते हैं कि आम जनता उच्च शिक्षित बनें। वैज्ञानिकता को समझें और धार्मिक पोंपलों के बारे सार्वजनिक रूप से बहस करे और इनके धंधे को चोट
पहुँचाए।
धार्मिक किताबों में सभी घटनाओं को
प्राचीनता का लबादा ओढ़ाया जाता है। इन किताबों के अनुसार सभी घटनाएँ प्राचीन काल
में सिर्फ एक दो बार घटित हुईं होती हैं और भविष्य में उन घटनाओं का कोई दोहराव
नहीं होता है। दोहराव होने पर पोल खुलने का झंझट भी है।
अवार्चीन काल अर्थात् आज की दुनिया में
तो धार्मिक घटनाएं घटने का सवाल ही नहीं उठता है। प्राचीन काल में बड़े बड़े डैना
फैलाए, बिना
सांस लेते हुए दूसरी अन्जान दुनिया से पृथ्वी पर बार-बार आने वाले ईश्वर, ईश्वरीय दूत, भगवान आज कल पृथ्वी में बार-बार या सिर्फ
एक बार आने से या तो कतराते हैं या फिर वे करोड़ों लोगों के तमाम प्रार्थनाओं के
बाद भी आने से जानबूझकर अनाकानी करते हैं, शायद आलसी बन गए हैं या बुढ़े हो गए हैं।
या सार्वजनिक, सार्वभौमिक
शिक्षा और नॉलेज से डर गए हैं। ?
तमाम मौलिक तथ्यों से हीन, आधारहीन बातों के चैम्पियन तथाकथित रूप
से ईश्वरों के द्वारा लिखी गई किताबों से यदि नैतिक बातों को और नीति शास्त्र की
बातों को निकाल दिया जाएगा तो भला उसमें क्या बचेगा ??? न इतिहास बचेगा, न भूगोल बचेगा, न फिजिक्स बचेगा और न गणित बचेगा। सिर्फ
डब्बा रह जाएगा। हाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कुछ चाप्टर उखाड़ने से भी नहीं
उखड़ेगा।
कई लोग इसे पढ़ कर बे-सहारेपन में शांति
प्राप्त करने के दावे करते हैं । मतलब ये किताबें शांति सप्लायर है। लेकिन जो
इन्हें नहीं पढ़ते हैं उन्हें शांति और सहारा कहाँ से मिलती है ?? अर्थात् शांति और सांत्वना पाने के दावे
भी आधारहीन ही है। जबकि मनोविज्ञान कहता है आदमी अपनी मानसिक शाँति का सृजन खुद कर सकता है।
हर धर्म की अपनी पवित्र पुस्तक होती हैं।
सभी में एक दूसरे के विरोधी विचार होते हैं। लेकिन देखिए एक ईश्वर के द्वारा लिखित एक
किताब को अपना मान शान, सम्पत्ति समझने वाले महान पुस्तक प्रेमी दूसरे ईश्वर
के द्वारा लिखे गए किताबों को पढ़ने वाले महान प्रेमी के साथ धार्मिक दंगों, युद्धों में कितना गुथमगुत्था हो प्रेम
से लड़ते हैं।
अब आप जरूर कहेंगे कि ये किताबें कराटे
और कुश्ती के दाँव नहीं सिखाते हैं।
लेकिन आपको नहीं लगता है कि अलग अलग
ईश्वर अलग-अलग पोथियों के माध्यम से मुर्गा लड़ाई की तरह इंसानों को कैंती बाँध कर
लड़ा-लड़ा कर निरंतर रूप से आनंद प्राप्त करते हैं ????? आखिर इन किताबों में कौन सी बातें
निर्विवाद है ? कौन
सी बातों को पूरी दुनिया में वैज्ञानिक रूप से स्वयंसिद्ध माना गया है ? इन किताबों के पीछे अपना जीवन न्यौछावर
करना कितनी बुद्धिमानी का काम है ? नेह।


नगर ठिठाईटांगर, सिसई में सरकार द्वारा निर्मित अंतु भगत का पुतला। तस्वीर- नेह इंदवार[/caption]