नगर सिसई के अंतु-फागु भगत

 अंतु भगत और फागु भगत 1919 के टाना आंदोलन के दौरान अपने इलाके के टाना भगत नेता थे। अंतु भगत नगर कटैयदमैर, जामपानी, नगर, सिसई के निवासी थे, जबकि उनके दोस्त और बचपन के साथी फागु भगत (-उराँव लकड़ा) नगर ठिठाईटांगर, जामपानी, नगर, सिसई के रहने वाले थे। वे दोनों टाना भगत थे और दिल दिमाग से बहुत धार्मिक थे। फागु भगत का जन्म ठिठाईटांगर से करीब पाँच-छह किलोमीटर दूर घखलपुर, नगर में हुआ था और वे जब जवान हुए तो ठिठाईटांगर के अपने जमीन पर घर बना कर वहीं बस गए। उन्होंने बंजर भूमि को मेहनत करके समतल किया और वहीं खेती बारी करने लगे।

जब तत्कालीन राँची (गुमला) जिले में अंग्रजों ने जमीन की मालगुजारी नहीं देने के लिए टाना भगतों की जमीन की कुर्की करना शुरू किया तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि ये अंग्रेज कौन हैं जो भूमि का लगान ले रहे हैं। सरकार लगान नहीं देने वाले किसानों को खेती करने से रोक रही थी। सरकारी पुलिस आते और फसलों को जला देते या खेती को रूकवाने के लिए गैरकानूनी ढंग से टाना भगतों पर अत्याचार करते। टाना भगत इससे बहुत परेशान हो गए थे। वे मानते थे कि अंग्रेज उनके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं और वे उन्हें भूखे मारना चाहते थे।  वे मानते थे कि भूमि का सृजन भगवान ने किया है और उनके सिवाय लगान लेने का किसी को कोई हक नहीं है। टाना आंदोलन गुमला से शुरू होकर पूरे इलाके में फैल गया था। ऊराँव आदिवासी टाना भगतों का आंदोलन में अंतु भगत और फागु शामिल हो गए। जब टाना भगत नेताओं ने राँची जाकर अंग्रेज सरकार (कलेक्टर) से इस विषय में बात करने के लिए राँची कूच किए तो मचियादमैर और ठिठाईटांगर के दोनों नौजवान भी चावल, दाल, थाली-कटोरा, बिस्तर आदि बाँध कर राँची के लिए प्रस्थान किए।

करीब 90 किलोमीटर की यात्री के बाद वे राँची पहुँचे और “कलेक्टर सरकार” मिलने की कोशिश करते रहे। वे रोज सुबह कलेक्टरेट के पास जाते और वहीं कलेक्टर से मिलने का इंतजार करते रहते। फिर कलेक्टर से न मिल पाने पर राँची में किसी पेड़ के नीचे बनाए अपने डेरे पर वापस चले आते और खाना-पीना करके सो जाते। फिर सुबह वे कलेक्टर से मिलने की आस लिए फिर से कलेक्टरेट जाते।  लेकिन टाना भगतों की भारी भीड़ को नजरांदाज  करते हुए कलेक्टर अपने कार्यालय आते और चले जाते। 6-7 दिन ऐसे ही बीत गए। एक दिन दोनों मित्र कलेक्टर के दफ्तर घुसने के ठीक रास्ते पर खड़े थे। कलेक्टर आए और अपने दफ्तर में जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, तब फागु भगत ने झट से उनका एक हाथ पकड़ लिया और आवाज लगाया – कलेक्टर साहेब आप हमसे बात क्यों नहीं करते ? अचानक हुए इस घटनाक्रम से कलेक्टर हतप्रभ था, वे हाथ छुड़ाने के प्रयास करने लगे, लेकिन छह फूट पहलवान फागु भगत का पंजा इतना बड़ा था और मजबूत था कि हाथ छुड़ाना कलेक्टर के बस की नहीं थी। उनके सिपाही दौड़ कर आए और हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगे। लेकिन एक पैला (केजी) का चावल एक बार में खाने वाला फागु भगत इतना मजबूत था कि सिपाहियों की शक्ति भी जवाब दे दिया। थक हार कर कलेक्टर ने फागु भगत से पूछा तूम क्या चाहते हो ? तब अंतु भगत ने कहा कि सरकार हम टाना भगत हैं और सिसई से आए हैं। आप हमलोगों से बात क्यों नहीं करते हैं?  आपने हमारे खेतों की कुर्की क्यों की है? हमारा अपराध क्या है? बिना खेतीबारी के हम कैसे जिएँगे?

कलेक्टर को बातें तुरंत समझ में आ गई और कहा मेरा हाथ छोड़ दीजिए और जाईए आपसे कोई लगान नहीं लिया जाएगा। फागु भगत ने तुरंत हाथ छोड़ दिया और दोनों हाथ को जोड़ते हुए उनसे माफी मांगी और लगान माफ करने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। कलेक्टर ने फागु के कंधे पर हाथ रखा और कहा तुम बहुत बलशाली हो। फिर वह अपने ऑफिस में घुस गया। कलेक्टर की बात टान भगतों तक पहुँची और फिर सारे लोग राँची से अपने-अपने घर गाँव के लिए निकल पड़े। (यह कहानी स्वयं फागु भगत ने 1970-71 में इन पंक्तियों के लेखक को सुनाई थी) फागु भगत के बारे कहा जाता है कि उन्होंने न तो कभी मांसाहारी भोजन किया और न ही कभी झूठ बोला।

नगर ठिठाईटांगर, सिसई में सरकार द्वारा निर्मित अंतु भगत का पुतला। तस्वीर- नेह इंदवार[/caption]

फागु भगत के तीन पुत्र थे। बड़े पुत्र खेतीबारी करता थे, जबकि मझला बाजार-हाट में घुम-घुम कर दुकानदारी करता थे। छोटा पुत्र घासी भगत नगर सिसकारी स्कूल में शिक्षक थे। सिसई बसिया रूट में नगर जामपानी से सटे हुए सड़क किनारे बसे नगर ठिठाईटांगर में सड़क से एक फर्लांग की दूरी पर सरकार की ओर से अंतु भगत की एक मूर्ति लगाई गई है। जो टाना भगत आंदोलन में अंतु भगत के आंदोलनकारी जीवन पर श्रद्धासुमन है। फागु भगत के साहस और ताकत की बात को आज जानने वाले कुछ लोग मिल भी सकते हैं। जब वे 109 वर्ष के थे तब भी इतने ताकतवार थे कि अपनी 3 साल की  नातीनी मनीर को गोद में उठाए पूरे खेत-गाँव का चक्कर लगाया करते थे।  फागु भगत का देहांत सन् 1973-74 वर्ष में 111 वर्ष की आयु में हो गया था। अंतु भगत कटैयदमैर, जामपानी  में रहते थे और उनके बुढ़ापे के दौर की बातें इस पंक्तियों के लेखक को नहीं है। यदि किसी पाठक को उनके बारे जानकारी हो तो वे कमेंट बॉक्स में लिखें या ईमेल के द्वारा जानकारी उपलब्ध कराएँ, जिसे यहाँ अपडेट किया जाएगा।

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