कैसी और कितनी स्वतंत्रता

 

नेह अर्जुन इंदवार

स्वतंत्रता के लाखों रूप और स्वरूप होते हैं। लाखों तरह की स्वतंत्रता होती है। सामूहिक स्वतंत्रता से लेकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की एक लम्बी फेरहिस्त होती है। यदि स्वतंत्र देश में दिमाग ही स्वतंत्र नहीं रहेगा तो बाकी स्वतंत्रता महत्वहीन हो जातीं हैं।

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जाहिरी तौर पर हम भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता की जश्न मनाते हैं। लेकिन भारत में आम जनता को आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।  मनपसंद प्रथम स्तर की शिक्षा और मनभर स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने की स्वतंत्रता नहीं है। मनपसंद शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में कुछ खास वैचारिक झूकाओं वाली माफिया तत्वों का एकाधिकार है। उनकी एकाधिकारी प्रवृत्ति से देश को स्वतंत्र कराने की कोई इच्छा किन्ही भी सरकार या व्यवस्था को नहीं है। शिक्षा सत्र् के दौरान भी कुछ खास तरह के धार्मिक पोंगापंथी पाठ और कुछ खास वर्ग के इतिहास पढ़ने की परतंत्रता से हम जकड़े हुए हैं। हमारे इतिहास में गरीब, अशिक्षित मेहनतकश आमजन की कोई इतिहास कहीं पढ़ाई नहीं जाती  हैं।  जितनी शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की आजादी एक पूँजीपति और कुछ सम्पन्न वर्णवादी वर्ग को भारत में प्राप्त है, उतनी आजादी आम भारतीयों को कभी नसीब नहीं होती है।

पूरे शिक्षा सत्र् में और शिक्षा समाप्ति पर भी देश में स्थापति संचार साधनों के तहत हमारे देश में “कैसे चिंतन करें” की आजादी नहीं है, बल्कि “क्या-क्या चिंतन करें” के वातावरण बनाने की पूरी कोशिश की जा जाती है। विभिन्न प्रकार से जोर और दबाव देकर “क्यों”, “कैसे” की स्वभाविक मानसिक चिंतन प्रक्रिया को दमन करने की कोशिश की जाती है। आम जनता जिस मीडिया को भारतीय मीडिया के रूप में पहचानता है, वह मीडिया कुछ खास वर्ग, वर्ण, सामाजिक क्षेत्र का माफिया संगठन है। वह आम जनता के हित और कल्याण के लिए संघर्ष नहीं करता है, बल्कि आम जनता के संघर्ष को पलीता लगाने और उनकी सोच को विशेष धारा में मोड़ कर विशेष वर्ग के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रयासरत रहता है। इन मीडिया केन्द्रों में आम जनता का प्रवेश पूरी तरह निषेध है। इनमें प्रवेश करने के लिए विशेष वर्ग और वर्ण का होना आवश्यक है।

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आम जनता के हितों का दमन मीडिया के माध्यम से होता है। दमन करने के लिए साम-दाम-भेद सब तरह की चाल चली जाती है। आप के सवालों को, आपकी चिंतन को, आपकी उत्सुकता, जिज्ञाषा को समाज, संस्कृति, जाति, वर्ण, राजनीति और आर्थिक स्वार्थ के हितों के हवाले देकर दबाया जाता है। आप धर्म और जाति, संस्कृति और उनके दुर्गुणों के वर्चस्व को तोड़ नहीं सकते हैं। वे आपको इन्हें तोड़ने या मोड़ने की इजाजत नहीं देंगे। क्योंकि आपके विचारों और चिंतन धारा को नियंत्रित करने के ये बहुत कारगार उपकरण है। इन्हीं के माध्यम से आपकी मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और वैचारिकी शोषण किया जाता है। आप गरीब और साधनहीन हैं, तो भारत की स्वतंत्रता कुछ वर्ग को आपका शोषण करने का अलिखित विशेषाधिकार देता है। आप शोषण की जड़ को अपने वर्तमान वैचारिकी के बूते नहीं तोड़ सकते हैं।

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आपको हमेशा एक खास तरह की सोच, चिंतन और विधारधारा की ओर मोड़ने की कोशिश की जाती है यह कोशिश तब से की जाती है, जब आप अबोध होते हैं और संसार को अपनी अबोध आँखों से देखने और उसे समझने की कोशिश करना शुरू करते हैं।

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एक छोटा बच्चा को जब माँ अपनी गोद में लेकर घर से बाहर निकलती है, तो बच्चा हर चीजों को बहुत उत्सुकता से आँखें फाड़-फाड़ कर देखता है। यदि कोई व्यक्ति बच्चा को माँ की गोद से अपने कंधे पर लेना चाहे तो बच्चा सबसे पहले उनकी आँखों और चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता है और अन्जाने से दीखने वाले के गोद में जाने से साफ इंकार कर देता है। कुछ बड़े होकर बच्चा अधिक गहराई से अपने आसपास के वातावरण का निरीक्षण करता है और उसे गहराई से समझने की कोशिश करता है। लेकिन बच्चा जैसे ही कुछ और बड़ा होता है, वह पढ़ना लिखना सीखता है तो उसे कुछ विशेष प्रकार की शिक्षा दी जाती है। उसे सिखाया जाता है कि वह “#खास_तरह से” ही सोचे। घोड़ा गाड़ी में जोते गए घोड़ा सीधा रास्ता को ही देखे, इधर-उधर न देखे इसके लिए उसकी आँखों के सामने एक पट्टी रखी जाती है। ऐसी ही पट्टी बच्चों के दिमाग पर लगाई जाती है और वह #कैसे_सोचें की जगह #क्या_सोचें के निर्देशन उनपर लगाई जाती है। बचपन से ही स्वतंत्रता पूर्ण सीमाहीन सोच विकसित करने की कोई स्वतंत्रता देश में नहीं है।

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देश की आजादी का आज कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनैतिक आजादी की जश्न एक दिन मनाई जाती है। लेकिन वह राजनैतिक आजादी क्या है ? राजनैतिक आजादी के नाम पर नेताओं, सरकारों, सरकारी व्यवस्थाओं, नीतियों, पूँजीपतियों को मनमानी करने की आजादी मिली हुई है। आम जनता इनलोगों के रहमो करम पर एक दिन की आजादी की छुट्टिया मनाने के लिए विवश है। एक पूँजीपति बैंकों से, सरकार से अपनी पूँजी के सौ गुणा अधिक पूँजी और सुविधाएँ हासिल कर सकता है, लेकिन एक मजदूर, किसान, क्लर्क, गृहिणी अपनी पूँजी के 2 गुणा तक पूँजी और सुविधाएँ हासिल नहीं कर सकते हैं। देश की वास्तविक आजादी आम-गरीब और साधनहीन नागरिकों के लिए नही है।

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देश कभी कागजों और कागज आधारित नीतियों के बल चलता था। लेकिन कागजों की जगह जब से इलेक्ट्रोनिक व्यवस्था आई है, तब से वोट से लेकर देश के जनमत और आपके सोचने तक को मैनेज करने की आजादी कुछ मुट्ठी भर लोगों को मिल गई है। कागज से यह सुविधा हासिल नहीं थी। इलेक्ट्रोनिक और इलेक्ट्रिक व्यवस्था आज पूरे देश को अपनी मुट्ठी में रखने का रिमोट कंट्रोल बन गया है। इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रोनिक और पेट्रोल पर आधारित समाज को कोई भी सिरफिरा कहीं से भी कभी भी अपनी मुट्ठी में जकड़ कर त्राहि-त्राहि मचा सकता है। एक सप्ताह के लिए आप इन नियंत्रकों को बंद कर दें। आपको सांस लेने तक दुभर हो जाएगा।

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आज ये तीनों तत्व दोधारी तलवार बन गए हैं और सबसे चिंतनीय बात यह है कि आज देश की कथाकथित आजादी के नाम पर इन्हें कुछ धनपशुओं के हाथों में सिमटाए जा रहे हैं। ऐसे धनपशु जिन्हें पूरे देश की धन संपत्ति, संसाधन और लोगों के चिंतन को अपनी मुट्ठी में जकड़ने की हवस है। वे आपको अपने नियंत्रणाधीन एक खिलौने से अधिक कुछ नहीं समझते हैं।

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आज देश में स्वाधीन चिंतन की धारा को कुंद करने की कोशिश की जा रही है। आलोचना, समालोचना, वैचारिक असहमति, लोकतांत्रिक विरोध को दुश्मन, देशद्रोही और गद्दारी का तमगा देकर नई पीढ़ी के वैचारिक उर्वरता को बांझ बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। कुछ खास तरह के विचारों को संचार साधनों के बल पर अवयस्क दिमागों पर डाले जा रहे हैं और उन्हें "क्या चिंतन" करना है का अभ्यास कराया जा रहा है। #कैसे_स्वतंत्र_चिंतन_की जाती है, इसका अभ्यास अमेरिका और यूरोप में कराया जाता होगा, लेकिन आपको इसकी आजादी भारत में नहीं है। आप आजाद नहीं है। बस नीचले और साधारण स्तर की  कुछ आजादियाँ आपको हासिल है। पूर्ण स्वतंत्रता पाने के लिए आपको भारत में नेता, सत्ताधारी, पूँजीपति या नौकरशाह बनने की आवश्यता होगी।

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आपक की स्वतंत्रता संबंधी स्वतंत्र सोच के दायरे को सीमित करने की कोशिशें की जा रही है। विविधता भरे भारतीय चिंतन धारा को एकपक्षीय चिंतन धारा में बदली जा रही है। जो इन मानव विरोधी गैरकानूनी प्रक्रिया का विरोध करते हैं, उन्हें अलग-थलग करने की कोशिशें इसी इलेक्ट्रोनिक हथियार के बल किया जा रहा है। आपको एक मशीनी मानव में तब्दिली करने की प्रक्रिया जारी है। इसे देखने के लिए आपको डोमेस्टिकेशन प्रक्रिया से बाहर आने की जरूत होगी।

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नयी पीढ़ी को युगों तक जाँचे परखे गए मूल्यों से संबंध विच्छेद करने के लिए प्रेरित किए जा रहे हैं। इंसानियत, न्याय, अन्याय, सामाजिक मूल्यों की परिभाषाओं को विकृत किए जा रहे हैं। मनुष्य के प्राकृतिक मौलिक स्वतंत्रता को सरकार और सरकारी नीतियों पर आधारित कृत्रिम स्वतंत्रता के रूप और स्वरूप में बनाए जा रहे हैं। नयी पीढ़ी उन्हीं कृत्रिम स्वतंत्रता को प्राकृतिक स्वतंत्रता समझेगा और आँखों में पट्टी बाँधे, गाड़ी में जुते हुए घोड़े की तरह सरपट दौड़ेगा। जॉर्ज अर्वेल के उपन्यास में उल्लेखित ईस्वी सन् 1984 भले गुजर गया हो, लेकिन उपन्यास में वर्णित पटकथा कमोबेश शनै-शनै भारतीयों की पटकथा बनते जा रही है।

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उदारमय समाज को राजनैतिक निरंकुशता के साए में जीने वाला इलेक्ट्रोनिक नियंत्रित समाज में बदलने पर अमादा परिणाम भारत को निरंकुश खूँखार हिटलर का भारत बना देगा या गृहयुद्ध में बर्बाद होने वाला सीरिया और अफगनिस्तान । तब आजादी का जश्न एक नियंत्रित विद्रप जश्न से अधिक कुछ नहीं रह जाएगा।

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दिमाग खोलिए, भारतीयों की यह आजादी कहीं मुट्ठी भर सत्तासीन और पूँजीआबाद लोगों का उत्सवी दिन बन कर न रहा जाए। नेह

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