मंत्री जॉन बारला ने कहा- हमारे पुरखों ने बनाया है बागान की भूमि

 

शाबास !!  जॉन बारला जी शाबास!!!  

केन्द्रीय राज्य मंत्री जॉन बारला जी को शाबासी देना तो बनता है। कल दिनांक 21 अगस्त 2021 को पहली बार उन्होंने एक धाकड़ नेता की तरह बात करते हुए कहा है कि "वे जिस जमीन पर घर बना कर रह रहे हैं वह उनके पूर्वजों के द्वारा खून-पसीनों के द्वारा बनाया गया जमीन है। कानून के अधीन 30 साल एक ही जगह सरकारी जमीन पर रहने वालों को उस जमीन का मालिकाना हक दिया जाता है। बागान की जमीन पर उनका कानूनी और पारंपारिक हक है और उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है।"

मैं (नेह इंदवार) पिछले दस साल से इस विषय पर लिख रहा हूँ कि जिस जमीन पर चाय बगानियार रहता है, उसे उनके पूर्वजों ने जंगल साफ करके अपने गाँव के लिए Reclaim किया था। लेकिन Plantation Labour Act 1951 (PLA) बनने के बाद सरकार ने मजदूरों के गाँव की जमीन को हड़प कर वहाँ बागान क्वार्टर बनवा दिया, क्योंकि उसके लिए बागान में और जमीन उपलब्ध नहीं थी। बागान मालिकों ने कभी भी अंग्रेजों से बगानियारों को बसाने के लिए कोई जमीन सरकार नहीं ली थी।

युवाओं का संगठन उत्तर बंग चाय बागान श्रमिक संगठन ने इस बात को समझा और वे पिछले दो साल से इस विषय पर जन आंदोलन चला कर अपने दावों को जमीनी स्तर पर स्थापित कर रहे हैं। लेकिन कभी किसी राजनैतिक नेता ने खुले आम मीडिया में यह बात नहीं की थी। कारण चाहे जो भी हो, किसी मंत्री के मुख से यह बात मीडिया में आई और यह एक रिकार्ड बन गया है। सभी दोस्तों से अनुरोध है कि वे कृपया इस पेपर कटिंग को सुरक्षित रख लें।

चाय अंचल से इस बार दो मंत्री बनाए गए हैं। एक केन्द्रीय मंत्री ने तो पट्टे पर बगानियार के हक की बात को सार्वजनिक रूप से बयान देकर लाखों चाय बगानियारों के अधिकारों को स्थापित किया। अब दूसरे मंत्री श्री बुलु चिकबड़ाईक की बारी है कि वे कहें कि 155 वर्षों से एक ही जगह रहने वाले बगानियारों का हक अपने वर्तमान मकान और बारी पर है। श्री बुलु चिकबड़ाईक को आदिवासी मामलों का मंत्री बनाया गया है, उनका प्रथम कर्तव्य है कि वे चाय बागान के आदिवासियों के हक पर अपनी नीतियों को बताएँ। आदिवासियों को रोटी कपड़ा और मकान देना उनके मंत्रालय का कर्तव्य है।  

चाय बागान पृष्टभूमि से आने वाले राज्य की सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को मजदूरों की ओर से  मेरा चैलेंज है कि वे सार्वजनिक रूप से कहें कि चाय बगानियारों को अपने क्वार्टर और जमीन पर कानूनी, पारंपारिक और विरासत का अधिकार है और सरकार को उनके इस हक का सम्मान करना चाहिए। मेरा अनुमान है कि एक भी नेता इस तरह के बयान नहीं दे पाएँगे। जो नेता स्वतंत्र नहीं होते हैं, वे परतांत्रिक व्यवस्था का गुलाम होते हैं।

पिछले एक दशक से पट्टे की मांग करने के बावजूद राज्य सरकार बागान मालिकों के प्रभाव में आकर इसे नजरांदाज करती रही है। दूसरी ओर बाहर देशों से आए शर्णार्थियों को लगातार पट्टा वितरित कर रही है। उलटे चाय बागानों में पक्के मकान बनाने वालों को बागान प्रबंधन टारगेट करता है, लेकिन चाय बागानों में ही बसे बड़े-बड़े सेठ, साहुकारों, ठेकेदारों को मनमाफिक घर बनाने की न सिर्फ अनुमति देता है, बल्कि कई दर्जन बागानों में बागान के NOC के आधार पर उन्हें पट्टे भी दिए गए हैं। कालचीनी, हमिल्टनगंज, बीरपाड़ा, बंदरहाट, नागराकाटा, माल, डामडिम, उदलाबाड़ी, नक्सलबाड़ी, सिलीगुड़ी के कई भाग आदि विशुद्ध रूप से चाय बागानों की जमीन पर बसे हुए हैं। लेकिन सामंतवादी, शोषकवादी, रूलिंग क्लास सिर्फ बगानियार आदिवासी और गोर्खाओं को ही टारगेट करते हैं। मजदूरों के साथ लगातार भेदभाव, अन्याय करने के कारण डुवार्स में भी अलग राज्य की मांग उठ रही है, क्योंकि उन्हें पश्चिम बंगाल के सरकार से न्याय पाने की कोई उम्मीद नहीं है। 

 

1 comment:

निरंग पझरा के लेख

सरकारी भूमि कब्जे की भारी शिकायत के बाद पश्चिम बंगाल के सैकड़ों भूमि अधिकारियों का तबादला

पश्चिम बंगाल सरकार ने 12 जुलाई, 2024  तक भूमि एवं भूमि सुधार विभाग के 384 अधिकारियों और 15 जुलाई तक 72 और राजस्व अधिकारियों के तबादले का आदे...