धार्मिक ग्रंथों में कौन सा ज्ञान है पवित्र ?

नेह इंदवार 

सन् 1609 ईस्वी में गैलीलियो गैलीली (1564-1642) के दूरबीन के अविष्कार के पूर्व पूरा ब्रह्माण्ड मानव के नंगी आंखों से दिखने वाली सीमा तक ही सीमित था। तब ब्राह्मांड का मतलब था, सूरज, चाँद, टिमटिमाते तारे और दिन का नीला आकाश।  मानवीय आंखों ने तब कोई गैलेक्सी नहीं देखा। न तो अपना वाला Milky way गैलेक्सी को देखा न पड़ोसी Andromeda गैलेक्सी को देखा। ब्लैकहोल की बातें तो बहुत दूर की बात थीं। 

रात में दिखने वाले Milky way को अधिकतर सभ्यताओं में आकाशीय नदी कहा जाता था। भारत में इसे आकाशगंगा कहा गया।   गैलीलियो ने ही प्रथम बार 1610 में Milky way  को देखा और बताया कि यह कोई नदी नहीं है, बल्कि खरबों तारों का समूह है।  यहाँ तक कि रोज छोटे बड़े रूप में पृथ्वी से टकराने वाले उल्कापिंड, ठोस और गैसीय ग्रहों (Jupiter, Saturn, Uranus and Neptune.) के बारे में भी कोई निश्चित बात नहीं कही गई। ग्रह ठोस (पृथ्वी, मंगल, शुक्र ग्रह) और गैसीय (बृहस्पति, शनि यूरेनस)  होते हैं, यह बात बहुत दिनों के बाद पता चला। 

आकाश के खरबों चमकते तारों के बीच अपनी स्थिति तेजी से बदलने के कारण प्राचीन काल से ही आकाश में नौ ग्रह होने की बात कही जाती रही थी। लेकिन सौरमंडल में 8 ग्रह हैं, प्लूटो को वैज्ञानिकों ने 2006 में ही ग्रह से पदच्यूत करके बौना ग्रह के पद पर बैठा दिए हैं। नौ ग्रह के स्वरूप (आकार- प्रकार) के बारे किसी भी सभ्यता को किंचित भी कोई जानकारी नहीं थी। किसी भी धार्मिक किताबों में इसके बारे कहीं कोई विवरण उपलब्ध नहीं है।

कहते हैं जहाँ न जाए रवि, वहाँ जाए कवि। अर्थात् कवि की कल्पनाएँ सूरज की रोशनी से भी तीक्ष्ण और तेज होता है। लेकिन प्राचीन और मध्य काल के किसी भी कवि की कल्पना ब्लैक होल तक न पहुँचा। न ही गैलेक्सी के मध्य में खरबों सूरज के पदार्थ को अपने भीतर समाए Sagittarius A तक किसी कवि या धार्मिक किताबों के किसी लेखक की दृष्टि और कल्पना गयी। यदि धार्मिक किताबों का निर्माण लेखन और उत्पादन हर धर्म के ईश्वर ही किए होते तो इन बातों की कोई जिक्र तो कहीं होती। 

यह स्पष्ट हो गया है कि नंगी आंखों की सीमा के आगे मानवीय कल्पनाएं ठोस रूप में काम करने में फेल हो जाया करती हैं। विज्ञान के रहस्यों के बारे प्रचण्ड मानवीय मेधा भी मशीनोॆ की सहायता के बिना भौतिक शोध या चिंतन करने में फिसड्डी था। जब धर्मो का उत्पादन हुआ तब भौतिकी शोधयोग्य उपकरणों की बातें कल्पनातीत थीं। प्राचीन दुनिया में हर विषय में सोच-चिंतन की सीमा अत्यंत सीमित थी। तब चिंतन का आकार प्रकार ही संकीर्ण, बौना और पूरी तरह स्थानीय था। लेकिन दुनिया और अंतरिक्ष की हर बात की अंतिम सच्चाई  को जान लेने का घमंड और शेखी बघारने की कला अत्यंत विकसित थी। 
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हर बात की अंतिम सच्चाई के ज्ञान से वाकिफ होने का घमंडी-चिंतन और उस पर टिकी विचारधारा के कारण ही दुनिया के तमाम समाजों में पृथ्वी को यूनिवर्स का केन्द्र बिन्दु माना जाता था। धर्म गुरू, राजे महाराजे और ताकतवर, प्रभावशाली लोग भोले भाले अनपढ़ और तर्कशक्ति से अन्जान जनता के बीच स्वंय को दुनिया और ब्रह्मांड के सबसे शक्तिमान राजा-महाराजा या ब्रह्मांडलीय-धर्म ब्रह्मांडलीय (Universal) गुरू घोषित कर देते थे। कुआँ का मेढक कुआँ को ही ब्रह्माण्ड समझ लें तो हैरानी नहीं।  

विश्व में सिर्फ एक ईश्वर होने के वर्चस्ववादी विचारों का उत्पादन भी ऐसे ही घमंडी भावनाओं से हुआ था। इन विचारों के केन्द्रीय तत्व में सारी दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना ही था।  ऐसे ही खतरनाक नकारात्मक चिंतन के कारण कई राजाओं ने विश्व विजय अभियान में निकले और करोड़ों लोगों को हिंसा की आग में झोंक दिए। Universal Kingdom, Universal Religion आदि कई ऐसे नकारात्मक विचारधाराओं का जन्म इतिहास के मध्यकाल में हुआ था, जिसका कुफल आज भी पूरी दुनिया भोग रही है।

ईसाई और इस्लाम धर्म को पूरे विश्व में छल-बल द्वारा फैलाने का विचार भी ऐसे ही घमंडी विचारधारा से निकला था। दुनिया के तमाम स्थानीय कला-संस्कृति, दर्शन, समाज को मटियामेट करने में यही घमंडी चिंतन ही पूरी तरह जिम्मेदार रहा है। पूरी दुनिया में एक ही धर्म और एक ही राजा का राज स्थापित करने का खतरनाक चिंतन भी ऐसी ही वर्स्चवादी विचारधाराओं से उत्पन्न हुआ था।   
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कई धार्मिक किताबों के अनुसार, राजा या धार्मिक गुरू जिस शहर, घर-महल या बेडरूम में रहते थे, उसे ही यूनिवर्स का केन्द्र बिन्दु घोषित कर देते थे। उसे ब्रह्मांड का महान पवित्रतम बेडरूप, घर या महल घोषित कर देते थे।  उनके अधीनस्थ चमचे लेखक उनकी घमंडभरी बौनी बातों को किताबें में लिख कर उसे अमर बनाने के मंसुबे पाल लेते थे।  बाद में उन्हीं बातों को दुनिया के तमाम तथाकथित धार्मिक किताबों का हिस्सा बनाया गया। दुनिया के किसी भी धर्म के तथाकथित पवित्र किताबों को देखें, पढ़ें, उनमें  ज्ञान की अंतिम सच्चाई की बातें जानने के दावे मिल ही जाते हैं। 
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यूनिवर्स के इन बड़बोले "बिन्दुओं या केन्द्रों" पर हाडमांस के बने धार्मिक सत्ता वाले यूनिवर्सल शासक और धर्म गुरू होते थे। वे अपने को सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञाता और सर्वकर्ता घोषित करते रहते थे। तमाम धार्मिक और अधार्मिक किताबें इन महानुभावों के पाखण्डों और हस्यकर बौनी बातों का बड़ी शान से बखान करते रहे हैं। क्योंकि उन्हें भविष्य में होने वाले वैज्ञानिक उपकरण आधारित शोध  (Scientific Equipment Based Research)  ज्ञान का तनिक भी अभास नहीं था। उनकी बातों का कोई आधार नहीं है और वह कभी भी रेत के महल की तरह भरभराकर कर गिर जाएगा, ऐसा वे कोई अनुमान ही लगा नहीं सके। आत्मप्रशंसा आदमी के दिमाग को अंधा बना देता है। 
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धरती से 13 लाख गुणा बड़ा सूरज को निगल लेना, जड़ी-बुटी लाने के लिए पहाड़ को हथेली पर उठा लेना और आकाश में पंख बिना उड़ना, परमेश्वर द्वारा सात दिन में पृथ्वी और आकाश का निर्माण करना, स्वर्ग में सुंदर परियों का होना, नर्क में गर्म तेल में पापियों का फ्राई करना, क्षणभंगुरता वाले मानव शरीर में मानवीय डीएनए के साथ जन्म लेने वालों का स्वर्ग के परमेश्वर, सृजनहार के साथ उठना बैठना और बातें करना आदि बातें ऐसे ही घमंड और कल्पना में कही गईं बाते हैं। धार्मिक किताबों में इतने गप्पबाजी लिखी हुई है कि उन पर आधुनिक ज्ञान ठहाके लगा कर हँसता है। मरने के बाद आज तक कोई लेखक नहीं बना है। मृत्यु बाद जिंदगी का विस्तृत वर्णन कितना काल्पनिक हो सकता है, इसका अनुमान तर्कशक्ति से संपन्न एक अनपढ़ बच्चा भी कर सकता है।
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प्राचीन बौने कल्पनाशील घमंडियों को जरा भी अनुमान नहीं था कि भविष्य के मानव मेधा नये विचारों से पोषित होंगे। तर्कशास्त्र का विकास होगा। फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स, मनोविज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, राकेट साईंस आदि नये-नये विषय आएँगे और लाखों प्रकार के शोध होंगे। चाँद, सूरज, तारों के शरीर को खँगालें जाएँगे। यूनिवर्सल शिक्षा और तर्क-संस्कृति मानव को स्वतंत्र चिंतन का महौल देगा और सभी मानव बुद्धिमान बनने के काबिल होंगे, यह घमंडियों ने कभी अनुमान ही नहीं लगा पाया।

ब्रम्हांड की सब सच्चाईयों को अंतिम रूप से जानने का दंभ भरने वाले किसी भी धार्मिक पोथी में प्राकृतिक की सबसे साधारण लेकिन सबसे बड़ी सच्चाई के बारे नहीं लिखा गया है। पृथ्वी एक ग्रह है और सूरज एक तारा। तारे में अणु, परमाणु क्रियाशील होते हैं, लेकिन ग्रह कई तरह के होते हैं। ग्रह तारे का चक्कर लगाते हैं और उपग्रह ग्रह का। चाँद एक उपग्रह है और पृथ्वी का चक्कर लगाता है। खून के ग्रुप के बारे या बैक्टीरिया के बारे भी किसी प्रकार का कोई जिक्र इन किताबों में नहीं है। पेड़ की पत्ती पर क्रोलोफिल बनता है और वह ऊर्जा का स्रोत है, यह भी किसी तथाकथित ईश्वर लिखित किताब में नहीं लिखा हुआ है। लेकिन उनकी चालाकी भी देखिए, जैसे ही नये वैज्ञानिक ज्ञान की बातें बाहर आतीं, वे चुपके से अपनी किताबों में एडिटिंग कर लेते हैं। 

इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि जिन किताबों में प्रकृति के सबसे बड़े सच्चाईयों का जिक्र नहीं है उन्हें आज भी ईश्वरीय रचना कह कर प्रचारित किया जाता है। इन किताबों की रचना खुद ईश्वर ने किया है यह कह कर खूब भ्रम फैलाया जाता है। आज भी धार्मिक स्थलों में इन्हीं किताबों के सहारे तर्कहीन लोगों के दिमाग को पंगु बनाया जाता है।  धार्मिक गुरू और उनका संगठन अनपढ़, तर्कहीन जनता  को अवैज्ञानिक बातों पर विश्वास करने के लिए हजारों प्रकार की चालाकियों का सहारा लेते हैं। लेकिन कोई भी शिक्षित व्यक्ति जिन्हें वैज्ञानिक तथ्यों की ठीक-ठाक जानकारी है। जिनकी सोच तर्कपूर्ण और विश्लेषण क्षमता से पूर्ण है, इन पोंगापंथी धार्मिक किताबों को पढ़कर इनके पोपलेपन को जान सकता है।
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भला इन ईश्वरीय रचित किताबों में प्राकृतिक रहस्यों की कौन सी सच्चाई का जिक्र असली हो सकता है ??  धार्मिक रूप से जिस स्वर्ग और नर्क के चारों और धार्मिक किताबें बारम्बार चक्कर लगाती है उसमें कितनी सच्चाइयाँ होंगी ?? या जिन देवताओं, ईश्वरों, परमेश्वरों का जिक्र इन किताबों में है उनमें कितनी वास्तविकता होंगी ??? जब मानवीय चिंतनधारा घमंडी और बौना होता था, तब कई दर्जन ईश्वरों का  अविष्कार हुआ था। चिंतन करने, उसे समाज का अंग बनाने की  असीम शक्ति राजा राजवाड़ों या धार्मिक गुरूओं के मुट्ठी में कैद होंती थीं। ऐसे लोग समाज की चिंतनधारा को अपनी मुट्ठी में कैद करके रखते थे। वे उन्हीं चिंतन धारा को सामने रखते थे जो उनके स्वार्थ और हित  सेजुड़े हुए होते थे।

इन किताबों को लिखने वाले धाँसु लेखकों को असली ब्रह्माण्ड, सौर मण्डल, गैलेक्सी या सामूहिक गैलेक्सियों के बारे किंचित भी ज्ञान नहीं था, न ही ग्रहों के ग्रेविटेशनल खिंचाव के बारे कुछ भान था। इसलिए उन्होंने उन किताबों में ऐसी कोई बातों को जगह नहीं दी। लेकिन मानना पड़ेगा कि वे धाँसू कल्पनाबाज जरूर थे। वे मानव मन को उत्सुक करने वाले अलौकिक, रहस्यमय, न समझ में आने वाले मनोवैज्ञानिक भय, मानवीय सोच पर खूब लिखे। लेकिन वैकल्पिक वैज्ञानिक शोध जिसे हजारों बार कार्य और परिणाम के रूप में सिद्ध किए जा सकते हैं, के बारे मार खा गए। अपनी किताबोंं को मान्य बनाने के लिए वे उन किताबों में नैतिकता और नीति शास्त्र की बातों को खुब जगह दीं। उन्हें मालूम था, कि नैतिकता के नियमों से ही समाज का संचालन होता है। नैतिकता के नकाब पहना कर उनमें धार्मिकता भरा जाता था। 

आम जनता को धर्म के नाम पर ठगने वालों ने इन किताबों को ईश्वरीय कृति कहा है ताकि लोग बिना संदेह दिमाग को दिरखा में रख कर इसे अपना लें और उनकी धार्मिक सत्ता का प्रभाव युगानुयुग तक चलती रहे। इन किताबों में वे यह भी लिखना न भूले कि इन किताबों की सच्चाई पर कोई सवाल न किया जाए। हर खतरे से इन्सुलेशन (बचाव) करने की चालाकी तो कोई इन शेखीबाजों से सीखे।

इन किताबों को ईश्वर द्वारा लिखे गए घोषणा करने वालों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि भविष्य में उनकी चालाकियों को विज्ञान का ज्ञान रखने वाले बच्चे-बच्चे तक पकड़ लेंगे और उनकी ब्रह्माण्डलीय परम और सीमाहीन ज्ञान की हँसी उड़ाएंगे। इन किताबों के सहारे अपने हित साधने वाले स्वार्थी तत्व आज भी नहीं चाहते हैं कि आम जनता उच्च शिक्षित बनें। वैज्ञानिकता को समझें और धार्मिक पोंपलों के बारे सार्वजनिक रूप से बहस करे और इनके धंधे को चोट पहुँचाए।

धार्मिक किताबों में सभी घटनाओं को प्राचीनता का लबादा ओढ़ाया जाता है। इन किताबों के अनुसार सभी घटनाएँ प्राचीन काल में सिर्फ एक दो बार घटित हुईं होती हैं और भविष्य में उन घटनाओं का कोई दोहराव नहीं होता है। दोहराव होने पर पोल खुलने का झंझट भी है।

अवार्चीन काल अर्थात् आज की दुनिया में तो धार्मिक घटनाएं घटने का सवाल ही नहीं उठता है। प्राचीन काल में बड़े बड़े डैना फैलाए, बिना सांस लेते हुए दूसरी अन्जान दुनिया से पृथ्वी पर बार-बार आने वाले ईश्वर, ईश्वरीय दूत, भगवान आज कल पृथ्वी में बार-बार या सिर्फ एक बार आने से या तो कतराते हैं या फिर वे करोड़ों लोगों के तमाम प्रार्थनाओं के बाद भी आने से जानबूझकर अनाकानी करते हैं, शायद आलसी बन गए हैं या बुढ़े हो गए हैं। या सार्वजनिक, सार्वभौमिक शिक्षा और नॉलेज से डर गए हैं। ?

तमाम मौलिक तथ्यों से हीन, आधारहीन बातों के चैम्पियन तथाकथित रूप से ईश्वरों के द्वारा लिखी गई किताबों से यदि नैतिक बातों को और नीति शास्त्र की बातों को निकाल दिया जाएगा तो भला उसमें क्या बचेगा ???  न इतिहास बचेगा, न भूगोल बचेगा, न फिजिक्स बचेगा और न गणित बचेगा। सिर्फ डब्बा रह जाएगा। हाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कुछ चाप्टर उखाड़ने से भी नहीं उखड़ेगा।

कई लोग इसे पढ़ कर बे-सहारेपन में शांति प्राप्त करने के दावे करते हैं । मतलब ये किताबें शांति सप्लायर है। लेकिन जो इन्हें नहीं पढ़ते हैं उन्हें शांति और सहारा कहाँ से मिलती है ?? अर्थात् शांति और सांत्वना पाने के दावे भी आधारहीन ही है। जबकि मनोविज्ञान कहता है आदमी अपनी मानसिक शाँति का  सृजन खुद  कर सकता है।

हर धर्म की अपनी पवित्र पुस्तक होती हैं। सभी में एक दूसरे के विरोधी विचार होते हैं।  लेकिन देखिए एक ईश्वर के द्वारा लिखित एक किताब को अपना मान शान, सम्पत्ति समझने वाले महान पुस्तक प्रेमी दूसरे ईश्वर के द्वारा लिखे गए किताबों को पढ़ने वाले महान प्रेमी के साथ धार्मिक दंगों, युद्धों में कितना गुथमगुत्था हो प्रेम से लड़ते हैं।

अब आप जरूर कहेंगे कि ये किताबें कराटे और कुश्ती के दाँव नहीं सिखाते हैं।

लेकिन आपको नहीं लगता है कि अलग अलग ईश्वर अलग-अलग पोथियों के माध्यम से मुर्गा लड़ाई की तरह इंसानों को कैंती बाँध कर लड़ा-लड़ा कर निरंतर रूप से आनंद प्राप्त करते हैं ?????  आखिर इन किताबों में कौन सी बातें निर्विवाद है ? कौन सी बातों को पूरी दुनिया में वैज्ञानिक रूप से स्वयंसिद्ध माना गया है इन किताबों के पीछे अपना जीवन न्यौछावर करना कितनी बुद्धिमानी का काम है ? नेह।


Our language and conference

 

On one hand, we are developing ourselves in the modern era by receiving modern education, getting good govt. and public sector's services, and accessing reasonably better amenities in our life. On the other way, at the same time, we are also losing our social heritage and legacy like our songs, dances, lands, languages, etc. It is really a painful affair that we are not able to support our underprivileged brethren continuously at village levels as we are so busy with our personal life and goals.

However, there are few people, who are investing their priceless time, energy, and hard-earned money to preserve our social and ancestral heritage. They have been striving to organize a social gathering at certain regularities and bringing awareness in our sleepy society for our collective responsibility. I really appreciate Shri Ashok Kumar Baxla, Dr. Cecil Xaxa, and all their associates of New Delhi in this Herculean missionary voyage.

Last year I went to Siliguri in the month of October to participate in the All India Kurukh Conference at Pradhan Nagar, Siliguri. I was very glad to see and witness the enthusiasm and passion among our new generation youth about the Kurukh language. Many Kurukh scholars were present at the conference and presented their brainpower for the preservation and development of Kurukh.

This year i,e, 2009, the same conference is scheduled on 10th and 11th October in Raipur, the capital city of Chhattisgarh state. Many people from different parts of India are planning to participate in the conference. It is really a heartening happening that our energetic youth are very much prepared to wage a full-fledged war against the downtrend syndrome in our society about our own mother tongue. Anyway, we have to be prepared for preserving our fast-dwindling language which is perhaps the most ancient language of India.

Keeping good hopes for the future, without a doubt, is only one aspect. However, the real challenge lies in the use of language in our day-to-day life and handing over the same heritage to our younger ones in town and city where we interact in languages other than our own mother tongue. -Neh Arjun Indwar, September, 30, 2009

मंत्री जॉन बारला ने कहा- हमारे पुरखों ने बनाया है बागान की भूमि

 

शाबास !!  जॉन बारला जी शाबास!!!  

केन्द्रीय राज्य मंत्री जॉन बारला जी को शाबासी देना तो बनता है। कल दिनांक 21 अगस्त 2021 को पहली बार उन्होंने एक धाकड़ नेता की तरह बात करते हुए कहा है कि "वे जिस जमीन पर घर बना कर रह रहे हैं वह उनके पूर्वजों के द्वारा खून-पसीनों के द्वारा बनाया गया जमीन है। कानून के अधीन 30 साल एक ही जगह सरकारी जमीन पर रहने वालों को उस जमीन का मालिकाना हक दिया जाता है। बागान की जमीन पर उनका कानूनी और पारंपारिक हक है और उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है।"

मैं (नेह इंदवार) पिछले दस साल से इस विषय पर लिख रहा हूँ कि जिस जमीन पर चाय बगानियार रहता है, उसे उनके पूर्वजों ने जंगल साफ करके अपने गाँव के लिए Reclaim किया था। लेकिन Plantation Labour Act 1951 (PLA) बनने के बाद सरकार ने मजदूरों के गाँव की जमीन को हड़प कर वहाँ बागान क्वार्टर बनवा दिया, क्योंकि उसके लिए बागान में और जमीन उपलब्ध नहीं थी। बागान मालिकों ने कभी भी अंग्रेजों से बगानियारों को बसाने के लिए कोई जमीन सरकार नहीं ली थी।

युवाओं का संगठन उत्तर बंग चाय बागान श्रमिक संगठन ने इस बात को समझा और वे पिछले दो साल से इस विषय पर जन आंदोलन चला कर अपने दावों को जमीनी स्तर पर स्थापित कर रहे हैं। लेकिन कभी किसी राजनैतिक नेता ने खुले आम मीडिया में यह बात नहीं की थी। कारण चाहे जो भी हो, किसी मंत्री के मुख से यह बात मीडिया में आई और यह एक रिकार्ड बन गया है। सभी दोस्तों से अनुरोध है कि वे कृपया इस पेपर कटिंग को सुरक्षित रख लें।

चाय अंचल से इस बार दो मंत्री बनाए गए हैं। एक केन्द्रीय मंत्री ने तो पट्टे पर बगानियार के हक की बात को सार्वजनिक रूप से बयान देकर लाखों चाय बगानियारों के अधिकारों को स्थापित किया। अब दूसरे मंत्री श्री बुलु चिकबड़ाईक की बारी है कि वे कहें कि 155 वर्षों से एक ही जगह रहने वाले बगानियारों का हक अपने वर्तमान मकान और बारी पर है। श्री बुलु चिकबड़ाईक को आदिवासी मामलों का मंत्री बनाया गया है, उनका प्रथम कर्तव्य है कि वे चाय बागान के आदिवासियों के हक पर अपनी नीतियों को बताएँ। आदिवासियों को रोटी कपड़ा और मकान देना उनके मंत्रालय का कर्तव्य है।  

चाय बागान पृष्टभूमि से आने वाले राज्य की सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को मजदूरों की ओर से  मेरा चैलेंज है कि वे सार्वजनिक रूप से कहें कि चाय बगानियारों को अपने क्वार्टर और जमीन पर कानूनी, पारंपारिक और विरासत का अधिकार है और सरकार को उनके इस हक का सम्मान करना चाहिए। मेरा अनुमान है कि एक भी नेता इस तरह के बयान नहीं दे पाएँगे। जो नेता स्वतंत्र नहीं होते हैं, वे परतांत्रिक व्यवस्था का गुलाम होते हैं।

पिछले एक दशक से पट्टे की मांग करने के बावजूद राज्य सरकार बागान मालिकों के प्रभाव में आकर इसे नजरांदाज करती रही है। दूसरी ओर बाहर देशों से आए शर्णार्थियों को लगातार पट्टा वितरित कर रही है। उलटे चाय बागानों में पक्के मकान बनाने वालों को बागान प्रबंधन टारगेट करता है, लेकिन चाय बागानों में ही बसे बड़े-बड़े सेठ, साहुकारों, ठेकेदारों को मनमाफिक घर बनाने की न सिर्फ अनुमति देता है, बल्कि कई दर्जन बागानों में बागान के NOC के आधार पर उन्हें पट्टे भी दिए गए हैं। कालचीनी, हमिल्टनगंज, बीरपाड़ा, बंदरहाट, नागराकाटा, माल, डामडिम, उदलाबाड़ी, नक्सलबाड़ी, सिलीगुड़ी के कई भाग आदि विशुद्ध रूप से चाय बागानों की जमीन पर बसे हुए हैं। लेकिन सामंतवादी, शोषकवादी, रूलिंग क्लास सिर्फ बगानियार आदिवासी और गोर्खाओं को ही टारगेट करते हैं। मजदूरों के साथ लगातार भेदभाव, अन्याय करने के कारण डुवार्स में भी अलग राज्य की मांग उठ रही है, क्योंकि उन्हें पश्चिम बंगाल के सरकार से न्याय पाने की कोई उम्मीद नहीं है। 

 

डुवार्स के प्रथम अनशनकारी टोडरमल ख़लख़ो

 

श्री टोडरमल खलखो, नागराकाटा चाय बागान के मजदूर नेता हैं। मजदूर अधिकारों और अपने साथ हुए अन्याय का विरोध करने के लिए वे अगस्त 2021 के दूसरे सप्ताह में नागराकाटा बागान के फैक्ट्री के सामने अनशन करने बैठ गए।
वे मजदूरों के अधिकारों के लिए नागराकाटा चाय बागान के प्रबंधन से हमेशा लड़ते रहे हैं। उनके मजदूरों के प्रति समर्पण और ईमानदारी से बागान प्रबंधन खुश नहीं था। आमतौर से बागान प्रबंधन मजदूर नेताओं को कई सुविधा देकर उन्हें अपने पक्ष में करके रखते हैं, ताकि श्रमिक नेतागण मजदूरों के मद्दों पर अधिक मुखर न हों।
घटनाक्रम के कुछ दिन पहले एक मजदूर के साथ बागान प्रबंधन का गरमा-गरम बहस चल रहा था। तब टोडरमल खलखो ने वहाँ पहुँच कर मामले को सुलझाने का प्रयास किया। लेकिन बागान प्रबंधन ने उलझने वाले मजदूर को तो छोड़ दिया लेकिन टोडरमल को इसके लिए दोषी ठहराया । कुछ दिनों के बाद एकतरफा कार्रवाई करके उन्हें बागान कार्य से निकाल दिया साथ ही उन्हें उनके बागान क्वार्टर को छोड़ने का नोटिस दिया। इन सबको टोडरमल ने अपने साथ अन्याय माना और घर छोड़ने के नोटिस को अपने निवास करने के हक पर हमला माना और इसके विरोध में वे अनशन पर बैठ गए।
उनके अनशन पर बैठने से चाय अंचल में एक नयी परंपरा का आगाज हुआ। इससे पहले तमाम अन्याय, पक्षपात और भेदभाव के बावजूद कोई मजदूर ने अनशन का रास्ता नहीं चुना था। 1980 के दशक में कालचीनी ग्रुप्स के बागान बंद हो जाने पर स्व. खुदीराम पहान ने बागान खोलने के लिए कालचीनी थाना मैदान में अमरण अनशन किया था। लेकिन अपने साथ व्यक्तिगत रूप से हुए अन्याय के लिए किसी ने अनशन का रास्ता नहीं चुना था।
अनशन अपने अधिकारों के लिए एक रास्ता और हथियार है और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इसे हथियार के रूप में खूब इस्तेमाल किया गया था। चाय बागान में अन्याय के खिलाफ अनशन करके विरोध किया जा सकता है,  यह उन्होंने चाय बागान के बगानियारों को बताया। उनके अनशन पर क्षेत्र के तमाम युवा और अन्य संगठन उनके समर्थन में साथ में खड़े हो गए। उत्तरबंग चाय श्रमिक संस्था, उलगुलान भारत आदिवासी एकता मंच तथा पीपीपी आदि मजदूर संघ उनके समर्थन में आगे आए और अपना समर्थन व्यक्ति किया।
श्री टोडरमल खलखो को चाय अंचल में पहली बार व्यक्तिगत न्याय प्राप्ति के लिए अनशन का रास्ता चुनने के लिए याद किया जाएगा।

फोटे-फेसबुक से साभार

प्राकृतिक तोहफा है विचारों की भिन्नता

 

नेह इंदवार

मैं जैसे सोचता हूँ, जरूरी नहीं कि आप भी वैसे ही सोचें। आप जैसे सोचते हैं जरूरी नहीं कि आपके परिवार के अन्य सदस्य और आपके पड़ोसी भी एक्जैट्क्ली वैसा ही सोचें।

आपकी आँखें चीजों को जिस कोण और दृष्टिकोण से देखती हैं, वैसा मैं नहीं देख पाता। मेरा "अंदाज" आपके "अंदाज" का जिगरी दोस्त बनने में हमेशा फिस्सड्डी रहा है। आपके अंदाज़-ए-बयाँ पर इतिहास बन जाता है और मेरे बयान पर कोई "चेहरा-किताब" में पोस्ट तक नहीं होते। जाहिर है कि आपकी मानसिक दुनिया और मेरी सोच की दुनिया में मुट्ठी भर से लेकर दिन और रात का फर्क है। यही फर्क हमारे सपने, सपनों के संसार और अनुभव की दुनिया में भी हमेशा मौजूद रहता है।

हम दोनों कितना भी बैठें साथ और अपनी-अपनी सोच को एक दूसरे के ढाँचे और सांचे में बिठाने की कोशिश करें। लेकिन जैसे दुपहिया साइकिल का पहिया रॉल्स रॉयस में फिट नहीं हो सकता है, वैसे ही तुम्हारे बुगाटी कार से मेरी पैदल चाल कभी आगे नहीं निकल सकती है। भले ही हम दोनों अपने वाहन की सर्वोच्च गति पर चलने की कोशिश करें। इसका यह मतलब भी नहीं कि बुगाटी के सामने मेरी चाल बेकार है या वजूदहीन है। भई मेरी चाल का अपना स्वतंत्र वजूद तो मौजूद है ही न इस पृथ्वी में ! जाहिर है कि तुम्हारे वजूद की महानता के सामने मेरी वजूद जरूर क्षुद्र है, मगर अस्तित्वहीन तो नहीं न है। तुम्हारी सोच एक सोच ही तो है, वह पत्थर पर लिखी जीवन की अंतिम सत्य तो नहीं। आखिर तुम्हारी सोच भी कहीं से सीखा-सिखाया होगा, तुम्हारे अनुभव और जीवन-यात्रा में कहीं मिला होगा और तुमने उसे बेहतर समझ कर अपना लिया होगा, या फिर तुम्हारे दिमागी सोच चिंतन से सार बन के निकला होगा। लेकिन तुम्हारे से अलग विचार व्यक्त करने का अधिकार भी तो सामने वाले का है। उनका भी विचारों का अपना एक अलग संसार रहा है।  

भई जीवन में सबसे बड़ी चीज विचार जरूर है, लेकिन जीवन से बड़ी तो नहीं ?हर विचार का अपना जीवन होता है। किसी दिन कहीं उसका जन्म होता है। कभी वह बहुत नन्हा सा होता है। फिर वह खाते पीत स्वस्थ रहते हुए खेलते हुए जवान होता है। जवानी में वह बहुत बलशाली हो सकता है। हो सकता है कि वह अपने बल के बल पर इलाके या दुनिया के किसी इलाके का मालिक बन गया हो, या हो सकता है पूरी दुनिया का सबसे अधिक स्वीकार्य विचार बन गया हो, और बहुत सफल कहलाता हो।

लेकिन दोस्त दुनिया में जितने इंसान हैं उतने ही विचार भी है। संसार में उन्हें फलने फूलने का अवसर भी मिलता है। जाहिर है कि कोई विचार चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, उसकी प्रतिक्रिया या प्रतिस्पर्धा में दूसरे विचार भी करोड़ों दिमाग में बादलों की तरह उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। हो सकती है वह पुराने शक्तिशाली विचारों से भी अधिक शक्तिशाली बन कर मानव समाज को मानसिक क्रांति करने के लिए मजबूर कर दे।

इसलिए एक विचार को पकड़ कर इतना इतराना किस बात की ? विचारों की दुनिया भी अजीब होती है। यह रोज बनती है और रोज बिगड़ती है। अधितर विचार और विचारधारा अलग-अलग जानकारियों, अनुभव और पृष्टभूमियों पर आधारित होती है। इसीलिए दुनिया की हर संस्कृति और आचार-व्यवहार में अंतर होता है। हमें बचपन से जो सिखाया जाता है, उसे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ और व्यावहारिक समझने की मानसिकता दुनिया में नई नहीं है। किसी विचार या सोच पर जानकारी जैसे ही बदलती है, विचार और सोच भी बदल जाता है। पूँजीवाद का भी कहीं न कहीं जन्म हुआ और वह लोगों में फैल गया। वैसे ही उसके काट के लिए समाजवाद, साम्यवाद आया और वह भी चारों ओर फैल गया। धर्म का जन्म तो कितने युगों से थोक में भाव में हो रहा है। जो धर्म अधिक फैल गया, उसे लोग असली समझने के विचार भी पाल लिए। आज धर्म की काट के लिए पूरी दुनिया में नास्तिकता का आंदोलन चल रहा है। कितने ही देशों में किसी धार्मिक स्थलों में लोग जाते ही नहीं है। यह भी विचारों में हुए परिवर्तन का ही एक रूप है।

जहाँ दो व्यक्ति होंगे, वहाँ दो विचार मौजूद होगा। यही विचार ही पति-पत्नी, भाई-भाई, बहन-बहन, राज्य और देश को अलग-अलग करता है। लंगोटिया यारों के भी विचार एक नहीं होते हैं न ही एक ही कार्य स्थल में कार्य करने वालों के विचार एक होते हैं। विचारों में भिन्नता, मतभिन्नता दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई है। जो इसे समझ नहीं सकता है, उनके दिल में मनमुटाव घर कर जाता है। यह मनमुटाव व्यक्ति के सोच के स्तर को दिखाता और कहता है कि बेटा तुम्हें अभी और परिवक्व बनना है।

विचारों के फर्क से ही कोई जानी प्यारा, जानी दुश्मन बन जाता है और कोई नफरती कीड़ा से मनरूबा और दिलरुबा। कल तक जो दिल के नजदीक रहते थे। वे आज चाईनीज माल हो गए। और हम जो कभी क्रिकेटटर हुआ करते थे, विचार से बॉलीबाल के खिलाड़ी बन गए हैं। 

 

विचारों की भिन्नता कृत्रिम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति का ही एक भाग है। प्राकृतिक ने ही हर व्यक्ति को अलग तरह से चीजों को देखने, अनुभव करने, उसका सार निकालने के लिए बौद्धिक क्षमता दिया है। इसीलिए दुनिया की हर कविता और कर कहानी अलग होती है। ये सभी दिमाग के विचारों से सृजित रचनाएँ हैं और स्वाभाविक है कि उनके बयान भी  अलग होंगे। विचारों की भिन्नता का सम्मान करना वयस्क सोच की निशानी है। 

रटाए गए और सीखे हुए विचारों से उन्हें है प्यार इतना, कि वे दुश्मन बन बैठे हैं यार के। नेह।

नगर सिसई के अंतु-फागु भगत

 अंतु भगत और फागु भगत 1919 के टाना आंदोलन के दौरान अपने इलाके के टाना भगत नेता थे। अंतु भगत नगर कटैयदमैर, जामपानी, नगर, सिसई के निवासी थे, जबकि उनके दोस्त और बचपन के साथी फागु भगत (-उराँव लकड़ा) नगर ठिठाईटांगर, जामपानी, नगर, सिसई के रहने वाले थे। वे दोनों टाना भगत थे और दिल दिमाग से बहुत धार्मिक थे। फागु भगत का जन्म ठिठाईटांगर से करीब पाँच-छह किलोमीटर दूर घखलपुर, नगर में हुआ था और वे जब जवान हुए तो ठिठाईटांगर के अपने जमीन पर घर बना कर वहीं बस गए। उन्होंने बंजर भूमि को मेहनत करके समतल किया और वहीं खेती बारी करने लगे।

जब तत्कालीन राँची (गुमला) जिले में अंग्रजों ने जमीन की मालगुजारी नहीं देने के लिए टाना भगतों की जमीन की कुर्की करना शुरू किया तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि ये अंग्रेज कौन हैं जो भूमि का लगान ले रहे हैं। सरकार लगान नहीं देने वाले किसानों को खेती करने से रोक रही थी। सरकारी पुलिस आते और फसलों को जला देते या खेती को रूकवाने के लिए गैरकानूनी ढंग से टाना भगतों पर अत्याचार करते। टाना भगत इससे बहुत परेशान हो गए थे। वे मानते थे कि अंग्रेज उनके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं और वे उन्हें भूखे मारना चाहते थे।  वे मानते थे कि भूमि का सृजन भगवान ने किया है और उनके सिवाय लगान लेने का किसी को कोई हक नहीं है। टाना आंदोलन गुमला से शुरू होकर पूरे इलाके में फैल गया था। ऊराँव आदिवासी टाना भगतों का आंदोलन में अंतु भगत और फागु शामिल हो गए। जब टाना भगत नेताओं ने राँची जाकर अंग्रेज सरकार (कलेक्टर) से इस विषय में बात करने के लिए राँची कूच किए तो मचियादमैर और ठिठाईटांगर के दोनों नौजवान भी चावल, दाल, थाली-कटोरा, बिस्तर आदि बाँध कर राँची के लिए प्रस्थान किए।

करीब 90 किलोमीटर की यात्री के बाद वे राँची पहुँचे और “कलेक्टर सरकार” मिलने की कोशिश करते रहे। वे रोज सुबह कलेक्टरेट के पास जाते और वहीं कलेक्टर से मिलने का इंतजार करते रहते। फिर कलेक्टर से न मिल पाने पर राँची में किसी पेड़ के नीचे बनाए अपने डेरे पर वापस चले आते और खाना-पीना करके सो जाते। फिर सुबह वे कलेक्टर से मिलने की आस लिए फिर से कलेक्टरेट जाते।  लेकिन टाना भगतों की भारी भीड़ को नजरांदाज  करते हुए कलेक्टर अपने कार्यालय आते और चले जाते। 6-7 दिन ऐसे ही बीत गए। एक दिन दोनों मित्र कलेक्टर के दफ्तर घुसने के ठीक रास्ते पर खड़े थे। कलेक्टर आए और अपने दफ्तर में जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, तब फागु भगत ने झट से उनका एक हाथ पकड़ लिया और आवाज लगाया – कलेक्टर साहेब आप हमसे बात क्यों नहीं करते ? अचानक हुए इस घटनाक्रम से कलेक्टर हतप्रभ था, वे हाथ छुड़ाने के प्रयास करने लगे, लेकिन छह फूट पहलवान फागु भगत का पंजा इतना बड़ा था और मजबूत था कि हाथ छुड़ाना कलेक्टर के बस की नहीं थी। उनके सिपाही दौड़ कर आए और हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगे। लेकिन एक पैला (केजी) का चावल एक बार में खाने वाला फागु भगत इतना मजबूत था कि सिपाहियों की शक्ति भी जवाब दे दिया। थक हार कर कलेक्टर ने फागु भगत से पूछा तूम क्या चाहते हो ? तब अंतु भगत ने कहा कि सरकार हम टाना भगत हैं और सिसई से आए हैं। आप हमलोगों से बात क्यों नहीं करते हैं?  आपने हमारे खेतों की कुर्की क्यों की है? हमारा अपराध क्या है? बिना खेतीबारी के हम कैसे जिएँगे?

कलेक्टर को बातें तुरंत समझ में आ गई और कहा मेरा हाथ छोड़ दीजिए और जाईए आपसे कोई लगान नहीं लिया जाएगा। फागु भगत ने तुरंत हाथ छोड़ दिया और दोनों हाथ को जोड़ते हुए उनसे माफी मांगी और लगान माफ करने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। कलेक्टर ने फागु के कंधे पर हाथ रखा और कहा तुम बहुत बलशाली हो। फिर वह अपने ऑफिस में घुस गया। कलेक्टर की बात टान भगतों तक पहुँची और फिर सारे लोग राँची से अपने-अपने घर गाँव के लिए निकल पड़े। (यह कहानी स्वयं फागु भगत ने 1970-71 में इन पंक्तियों के लेखक को सुनाई थी) फागु भगत के बारे कहा जाता है कि उन्होंने न तो कभी मांसाहारी भोजन किया और न ही कभी झूठ बोला।

नगर ठिठाईटांगर, सिसई में सरकार द्वारा निर्मित अंतु भगत का पुतला। तस्वीर- नेह इंदवार[/caption]

फागु भगत के तीन पुत्र थे। बड़े पुत्र खेतीबारी करता थे, जबकि मझला बाजार-हाट में घुम-घुम कर दुकानदारी करता थे। छोटा पुत्र घासी भगत नगर सिसकारी स्कूल में शिक्षक थे। सिसई बसिया रूट में नगर जामपानी से सटे हुए सड़क किनारे बसे नगर ठिठाईटांगर में सड़क से एक फर्लांग की दूरी पर सरकार की ओर से अंतु भगत की एक मूर्ति लगाई गई है। जो टाना भगत आंदोलन में अंतु भगत के आंदोलनकारी जीवन पर श्रद्धासुमन है। फागु भगत के साहस और ताकत की बात को आज जानने वाले कुछ लोग मिल भी सकते हैं। जब वे 109 वर्ष के थे तब भी इतने ताकतवार थे कि अपनी 3 साल की  नातीनी मनीर को गोद में उठाए पूरे खेत-गाँव का चक्कर लगाया करते थे।  फागु भगत का देहांत सन् 1973-74 वर्ष में 111 वर्ष की आयु में हो गया था। अंतु भगत कटैयदमैर, जामपानी  में रहते थे और उनके बुढ़ापे के दौर की बातें इस पंक्तियों के लेखक को नहीं है। यदि किसी पाठक को उनके बारे जानकारी हो तो वे कमेंट बॉक्स में लिखें या ईमेल के द्वारा जानकारी उपलब्ध कराएँ, जिसे यहाँ अपडेट किया जाएगा।

कैसी और कितनी स्वतंत्रता

 

नेह अर्जुन इंदवार

स्वतंत्रता के लाखों रूप और स्वरूप होते हैं। लाखों तरह की स्वतंत्रता होती है। सामूहिक स्वतंत्रता से लेकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की एक लम्बी फेरहिस्त होती है। यदि स्वतंत्र देश में दिमाग ही स्वतंत्र नहीं रहेगा तो बाकी स्वतंत्रता महत्वहीन हो जातीं हैं।

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जाहिरी तौर पर हम भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता की जश्न मनाते हैं। लेकिन भारत में आम जनता को आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।  मनपसंद प्रथम स्तर की शिक्षा और मनभर स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने की स्वतंत्रता नहीं है। मनपसंद शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में कुछ खास वैचारिक झूकाओं वाली माफिया तत्वों का एकाधिकार है। उनकी एकाधिकारी प्रवृत्ति से देश को स्वतंत्र कराने की कोई इच्छा किन्ही भी सरकार या व्यवस्था को नहीं है। शिक्षा सत्र् के दौरान भी कुछ खास तरह के धार्मिक पोंगापंथी पाठ और कुछ खास वर्ग के इतिहास पढ़ने की परतंत्रता से हम जकड़े हुए हैं। हमारे इतिहास में गरीब, अशिक्षित मेहनतकश आमजन की कोई इतिहास कहीं पढ़ाई नहीं जाती  हैं।  जितनी शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की आजादी एक पूँजीपति और कुछ सम्पन्न वर्णवादी वर्ग को भारत में प्राप्त है, उतनी आजादी आम भारतीयों को कभी नसीब नहीं होती है।

पूरे शिक्षा सत्र् में और शिक्षा समाप्ति पर भी देश में स्थापति संचार साधनों के तहत हमारे देश में “कैसे चिंतन करें” की आजादी नहीं है, बल्कि “क्या-क्या चिंतन करें” के वातावरण बनाने की पूरी कोशिश की जा जाती है। विभिन्न प्रकार से जोर और दबाव देकर “क्यों”, “कैसे” की स्वभाविक मानसिक चिंतन प्रक्रिया को दमन करने की कोशिश की जाती है। आम जनता जिस मीडिया को भारतीय मीडिया के रूप में पहचानता है, वह मीडिया कुछ खास वर्ग, वर्ण, सामाजिक क्षेत्र का माफिया संगठन है। वह आम जनता के हित और कल्याण के लिए संघर्ष नहीं करता है, बल्कि आम जनता के संघर्ष को पलीता लगाने और उनकी सोच को विशेष धारा में मोड़ कर विशेष वर्ग के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रयासरत रहता है। इन मीडिया केन्द्रों में आम जनता का प्रवेश पूरी तरह निषेध है। इनमें प्रवेश करने के लिए विशेष वर्ग और वर्ण का होना आवश्यक है।

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आम जनता के हितों का दमन मीडिया के माध्यम से होता है। दमन करने के लिए साम-दाम-भेद सब तरह की चाल चली जाती है। आप के सवालों को, आपकी चिंतन को, आपकी उत्सुकता, जिज्ञाषा को समाज, संस्कृति, जाति, वर्ण, राजनीति और आर्थिक स्वार्थ के हितों के हवाले देकर दबाया जाता है। आप धर्म और जाति, संस्कृति और उनके दुर्गुणों के वर्चस्व को तोड़ नहीं सकते हैं। वे आपको इन्हें तोड़ने या मोड़ने की इजाजत नहीं देंगे। क्योंकि आपके विचारों और चिंतन धारा को नियंत्रित करने के ये बहुत कारगार उपकरण है। इन्हीं के माध्यम से आपकी मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और वैचारिकी शोषण किया जाता है। आप गरीब और साधनहीन हैं, तो भारत की स्वतंत्रता कुछ वर्ग को आपका शोषण करने का अलिखित विशेषाधिकार देता है। आप शोषण की जड़ को अपने वर्तमान वैचारिकी के बूते नहीं तोड़ सकते हैं।

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आपको हमेशा एक खास तरह की सोच, चिंतन और विधारधारा की ओर मोड़ने की कोशिश की जाती है यह कोशिश तब से की जाती है, जब आप अबोध होते हैं और संसार को अपनी अबोध आँखों से देखने और उसे समझने की कोशिश करना शुरू करते हैं।

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एक छोटा बच्चा को जब माँ अपनी गोद में लेकर घर से बाहर निकलती है, तो बच्चा हर चीजों को बहुत उत्सुकता से आँखें फाड़-फाड़ कर देखता है। यदि कोई व्यक्ति बच्चा को माँ की गोद से अपने कंधे पर लेना चाहे तो बच्चा सबसे पहले उनकी आँखों और चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता है और अन्जाने से दीखने वाले के गोद में जाने से साफ इंकार कर देता है। कुछ बड़े होकर बच्चा अधिक गहराई से अपने आसपास के वातावरण का निरीक्षण करता है और उसे गहराई से समझने की कोशिश करता है। लेकिन बच्चा जैसे ही कुछ और बड़ा होता है, वह पढ़ना लिखना सीखता है तो उसे कुछ विशेष प्रकार की शिक्षा दी जाती है। उसे सिखाया जाता है कि वह “#खास_तरह से” ही सोचे। घोड़ा गाड़ी में जोते गए घोड़ा सीधा रास्ता को ही देखे, इधर-उधर न देखे इसके लिए उसकी आँखों के सामने एक पट्टी रखी जाती है। ऐसी ही पट्टी बच्चों के दिमाग पर लगाई जाती है और वह #कैसे_सोचें की जगह #क्या_सोचें के निर्देशन उनपर लगाई जाती है। बचपन से ही स्वतंत्रता पूर्ण सीमाहीन सोच विकसित करने की कोई स्वतंत्रता देश में नहीं है।

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देश की आजादी का आज कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनैतिक आजादी की जश्न एक दिन मनाई जाती है। लेकिन वह राजनैतिक आजादी क्या है ? राजनैतिक आजादी के नाम पर नेताओं, सरकारों, सरकारी व्यवस्थाओं, नीतियों, पूँजीपतियों को मनमानी करने की आजादी मिली हुई है। आम जनता इनलोगों के रहमो करम पर एक दिन की आजादी की छुट्टिया मनाने के लिए विवश है। एक पूँजीपति बैंकों से, सरकार से अपनी पूँजी के सौ गुणा अधिक पूँजी और सुविधाएँ हासिल कर सकता है, लेकिन एक मजदूर, किसान, क्लर्क, गृहिणी अपनी पूँजी के 2 गुणा तक पूँजी और सुविधाएँ हासिल नहीं कर सकते हैं। देश की वास्तविक आजादी आम-गरीब और साधनहीन नागरिकों के लिए नही है।

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देश कभी कागजों और कागज आधारित नीतियों के बल चलता था। लेकिन कागजों की जगह जब से इलेक्ट्रोनिक व्यवस्था आई है, तब से वोट से लेकर देश के जनमत और आपके सोचने तक को मैनेज करने की आजादी कुछ मुट्ठी भर लोगों को मिल गई है। कागज से यह सुविधा हासिल नहीं थी। इलेक्ट्रोनिक और इलेक्ट्रिक व्यवस्था आज पूरे देश को अपनी मुट्ठी में रखने का रिमोट कंट्रोल बन गया है। इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रोनिक और पेट्रोल पर आधारित समाज को कोई भी सिरफिरा कहीं से भी कभी भी अपनी मुट्ठी में जकड़ कर त्राहि-त्राहि मचा सकता है। एक सप्ताह के लिए आप इन नियंत्रकों को बंद कर दें। आपको सांस लेने तक दुभर हो जाएगा।

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आज ये तीनों तत्व दोधारी तलवार बन गए हैं और सबसे चिंतनीय बात यह है कि आज देश की कथाकथित आजादी के नाम पर इन्हें कुछ धनपशुओं के हाथों में सिमटाए जा रहे हैं। ऐसे धनपशु जिन्हें पूरे देश की धन संपत्ति, संसाधन और लोगों के चिंतन को अपनी मुट्ठी में जकड़ने की हवस है। वे आपको अपने नियंत्रणाधीन एक खिलौने से अधिक कुछ नहीं समझते हैं।

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आज देश में स्वाधीन चिंतन की धारा को कुंद करने की कोशिश की जा रही है। आलोचना, समालोचना, वैचारिक असहमति, लोकतांत्रिक विरोध को दुश्मन, देशद्रोही और गद्दारी का तमगा देकर नई पीढ़ी के वैचारिक उर्वरता को बांझ बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। कुछ खास तरह के विचारों को संचार साधनों के बल पर अवयस्क दिमागों पर डाले जा रहे हैं और उन्हें "क्या चिंतन" करना है का अभ्यास कराया जा रहा है। #कैसे_स्वतंत्र_चिंतन_की जाती है, इसका अभ्यास अमेरिका और यूरोप में कराया जाता होगा, लेकिन आपको इसकी आजादी भारत में नहीं है। आप आजाद नहीं है। बस नीचले और साधारण स्तर की  कुछ आजादियाँ आपको हासिल है। पूर्ण स्वतंत्रता पाने के लिए आपको भारत में नेता, सत्ताधारी, पूँजीपति या नौकरशाह बनने की आवश्यता होगी।

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आपक की स्वतंत्रता संबंधी स्वतंत्र सोच के दायरे को सीमित करने की कोशिशें की जा रही है। विविधता भरे भारतीय चिंतन धारा को एकपक्षीय चिंतन धारा में बदली जा रही है। जो इन मानव विरोधी गैरकानूनी प्रक्रिया का विरोध करते हैं, उन्हें अलग-थलग करने की कोशिशें इसी इलेक्ट्रोनिक हथियार के बल किया जा रहा है। आपको एक मशीनी मानव में तब्दिली करने की प्रक्रिया जारी है। इसे देखने के लिए आपको डोमेस्टिकेशन प्रक्रिया से बाहर आने की जरूत होगी।

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नयी पीढ़ी को युगों तक जाँचे परखे गए मूल्यों से संबंध विच्छेद करने के लिए प्रेरित किए जा रहे हैं। इंसानियत, न्याय, अन्याय, सामाजिक मूल्यों की परिभाषाओं को विकृत किए जा रहे हैं। मनुष्य के प्राकृतिक मौलिक स्वतंत्रता को सरकार और सरकारी नीतियों पर आधारित कृत्रिम स्वतंत्रता के रूप और स्वरूप में बनाए जा रहे हैं। नयी पीढ़ी उन्हीं कृत्रिम स्वतंत्रता को प्राकृतिक स्वतंत्रता समझेगा और आँखों में पट्टी बाँधे, गाड़ी में जुते हुए घोड़े की तरह सरपट दौड़ेगा। जॉर्ज अर्वेल के उपन्यास में उल्लेखित ईस्वी सन् 1984 भले गुजर गया हो, लेकिन उपन्यास में वर्णित पटकथा कमोबेश शनै-शनै भारतीयों की पटकथा बनते जा रही है।

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उदारमय समाज को राजनैतिक निरंकुशता के साए में जीने वाला इलेक्ट्रोनिक नियंत्रित समाज में बदलने पर अमादा परिणाम भारत को निरंकुश खूँखार हिटलर का भारत बना देगा या गृहयुद्ध में बर्बाद होने वाला सीरिया और अफगनिस्तान । तब आजादी का जश्न एक नियंत्रित विद्रप जश्न से अधिक कुछ नहीं रह जाएगा।

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दिमाग खोलिए, भारतीयों की यह आजादी कहीं मुट्ठी भर सत्तासीन और पूँजीआबाद लोगों का उत्सवी दिन बन कर न रहा जाए। नेह

निरंग पझरा के लेख

सरकारी भूमि कब्जे की भारी शिकायत के बाद पश्चिम बंगाल के सैकड़ों भूमि अधिकारियों का तबादला

पश्चिम बंगाल सरकार ने 12 जुलाई, 2024  तक भूमि एवं भूमि सुधार विभाग के 384 अधिकारियों और 15 जुलाई तक 72 और राजस्व अधिकारियों के तबादले का आदे...