अनार्य जातियों का संक्षिप्त इतिहास और हिन्दू अवधारणाएं

 

राजू मुर्मू
किसी भी समाज और समुदाय कें इतिहास को समझने के लिए उनके कल्चर औऱ कस्टम क़ो समझना बहूत जरूरी होता है। उसकॆ जीवनशैली भाषा-संस्कृति क़ो नजरंदाज नही किया जा सकता। भारत के कबीलाई समाज में 'टोटेम' यानी गोत्र-प्रथा का अपना अलग महत्व है। आदिवासी कबीला समाज की पहचान उसके टोटेम (गोत्र-प्रथा) से होता है। यह टोटेम प्रकृति कें जीवों और वनस्पति के नामों से जुड़ा हुआ है। क्योंकि हर एक आदिवासी कबीला में प्रकृति के उन सभी जीवों एवं वनस्पति के नाम को वे लोग टोटेम के रूप मे कहीं ना कहीं उनके पूर्वजो के कारण जीवित रखा। इसी कारण आदिवासियों क़ो प्रकृति के संरक्षक कें रूप मे जाना जाता है । इस तरह की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था औऱ किसी अन्य समाज में नही पाया जाता है ।
टोटेम Totemism (गोत्र-प्रथा) आदिवासी कबीलाई समुदाय के पूर्वजों द्वारा हज़ारों वर्ष पूर्व से चली आ रही वह प्रथा है, जिससे उस कबीला के ' गण ' या ' कुल ' की पहचान का पता चलता था । हरेक आदिवासी कबीला समूह का अपना अलग अलग टोटम होता है जिससे उसके 'कुल' या 'गण' का पता चलता था ।
'टोटेम' शब्द की परिभाषा क़ो समझने के लिये हमे थोड़ी गहराई से अध्ययन करने की जरूरत है, क्योंकि मूलतः ' टोटेम प्रथा ' (गोत्र-प्रथा) विश्व के सभी महादेश के मूल आदिवासियों में पाई जाती है । 'टोटेम प्रथा' भारत के ' संताल ' आदिवासी के 'परिस', 'मुंडा' आदिवासी के 'किली' औऱ 'ओजिब्वे' मूल अमरीकी आदिवासी कबीला के 'ओतोतमन' शब्द जिसका अर्थ भाई-बहन या रिश्तेदार होता है, यानी एक ही माता पिता की संतान जिसमें खून का रिश्ता होता है और जो एक दूसरे से वैवाहिक संबंध बनाना निषेध करता है ।
आदिवासी कबीलाई समुदाय मे 'टोटेम प्रथा' का संबंध इस पृथ्वी के सभी जीव प्राणी औऱ पेड़-पौधों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है की कबीलाई समुदाय क़ो 'प्रकृति का संरक्षक' कहा गया है। इस तरह की टोटेम प्रथा किसी भी गैर आदिवासी समाज में नही पाया जाता।
हाँ भारत में हिन्दुओं के विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा गाय, बैल, सर्प, मोर, हाथी, शेर, चूहा पशु-पक्षी आदि क़ो उनके देवताओं के वाहक के रूप मे पूजते हैं। लेकिन उसे उनका टोटेम कहना गलत होगा। ऐसा इसलिये गलत होगा क्योंकि इनमें न तो टोटेम पर गण का नाम ही रखा जाता है और न गण के सदस्य टोटेम के पितृ ही मानते हैं।
टोटेम प्रथा में उन विशेष पशु-पक्षी पेड़ पौधे आदि को नुकसान पहुँचाना या हानि पहुँचाने पर प्रतिबंध होता है या उन जीवों क़ो किसी ख़ास दिन पर विशेष विधि द्वारा उसे समर्पित कर उसकी बलि दी जाती है। कबीलाई समुदाय में अलग-अलग कबीलों का अपना अलग-अलग टोटेम होता है जिसे ख़ास गणचिन्ह के रूप मे चिन्हित किया जाता है। मूल अमरीकी आदिवासी कबीले के लोग अपना गणचिन्ह लकड़ी के खम्बों मे चिन्हित करते हैं।
जिस प्रकार वेद एवं पुराण, रामायण, महाभारत आदि पुस्तको में कपि, वानर, रीछ, नाग, बाघ, गिद्ध, कछुआ, गरुड़, मीन (मछली) आदि का वर्णन पाया गया है। कहीं ना कहीं बड़ी चालाकी से उन लेखकों ने उन टोटेम क़ो छुपा कर उन्हें प्रतीकात्मक रूप से वैसे ही उनको प्रस्तुत कर दिया औऱ कलान्तर में यह टोटेम के धारक कबीलाई आदिवासी (अनार्य जातियों) की पहचान ही मिटा दी गई ताकि लोगों के मन मे वानर, रीछ, नाग, कच्छप (कछुआ) मीन (मछली) गिद्ध, गरुड़ जैसे टोटेमधारी प्राचीन अनार्य जातियों की कोई पहचान ना हो पाए। वे लोग कोई काल्पनिक वन्य जीव या पशु नहीं थे, परंतु भारत के सबसे प्राचीन अनार्य जातियाँ थी, जिनकें अपने अपने शक्तिशाली साम्राज्य थे।
शक्तिशाली अनार्य साम्राज्य के संबंध में भी मुझे यही धारणा लगता है की प्राचीन वैदिक युग के पूर्व भारत में कई अनार्य जातियाँ रहती थीं जो बहुत ही शक्तिशाली थे। उनके अपने साम्राज्य थे। लेकिन भारत में आर्य ब्राह्मणो के आगमन औऱ वर्ण व्यवस्था जैसी सामाजिक व्यवस्था बनने के पूर्व उन अनार्य जातियों से जो भारत के मूल समुदाय थीं. अनार्यों और आर्यो की लंबी लड़ाई हुई थीं । उनको छल-प्रपंच से आर्यों ने हराया औऱ उनका संहार किया गया। अगर भाषा के आधार पर जैसे असुर, मुंडा, संताल, हो, खड़िया, गोंड, आदि अनार्य जातियो के भाषाओं का अध्ययन किया जाए तो इससे भी भारत के विभिन्न अनार्य जातियों के इतिहास को समझने में मदद मिलेगी औऱ हमें यह मालूम चलेगा की उसकी उत्पत्ति कब औऱ कैसे हुई थी ? भारत में बहुत सारी भाषाएँ बोली जाती हैं। भाषा के आधार पर भी भारत के उन जातियों के प्राचीनतम इतिहास को समझने मे मदद मिल सकती है।
जैसा की आर्य ब्राह्मणो ने अपने पुस्तकों में दर्ज किया, वे कोई मॉन्सटर या भूत पिचाश या राक्षस नही थे, बल्कि वे लोग भारत कें प्रथम शक्तिशाली अनार्य जातियाँ थीं। यह एक साजि़श थी, उस बड़े शक्तिशाली सभ्यताओ क़ो समाप्त करने की। बल्कि यह बड़ी सोची समझी साजि़श के तहत किया गया था। अपनी कुटिलता चल-कपट क़ो छुपाने के लिए भारत के मूल निवासियों के संहार की गाथा किसी खलनायक की तरह की गई थी। लिखने वाला अपनी विजय गाथा मॆ आखिर अपनी कुटिलता का परिचय क्यों देता ?
भारत मॆ सभ्यताओं को जन्म देने का श्रेय आदिवासियों अनार्य जातियो को दिया जाना चाहिये। अनार्य आदिवासियों ने जीवों एवं पर्यावरण को बचाया। समाजवाद, स्त्री-पुरुष में समानता, समतामूलक समाज की अवधारणा एवं लोकतांत्रिक ग्राम व्यवस्था (परगना व्यवस्था, मुंडा मानकी, पड़हा राजा व्यवस्था, दोकलो शोहोर) आदिवासियों की ही देन थी।
आज इसे प्रमाणित करने कें लिऐ हमारे पास कोई मजबूत साक्ष्य नही है, लेकिन उनकी भाषा, कल्चर एवं वेदों औऱ पुराणों के माध्यम से उस युग के इतिहास को समझा जा सकता है, जिनको उनके लेखको ने अलंकृत और विभिन्न चरित्रो के रूप में जैसे देत्य, राक्षस, असुर, गंधर्व, यति, वानर, रीछ, नाग, आदि कें रूप में प्रस्तुत किया था। अगर आदिवासियों के सामाजिक जीवन को अध्ययन किया जाए तो एक बात यहाँ स्पष्ट हो जायेगी कि वे लोग वैदिक जीवन पद्दति को नहीं मानते थे। उनका अपना अलग पारम्परिक सामाजिक जीवन शैली है। उनकी अपनी भाषा है। उनका अलग खानपान है। उनके अलग रीति-रिवाज है जो प्रकृति से जुड़ा हुआ है। यह अलग बात है कि विभिन्न सभ्यताओं एवं धर्म का प्रभाव आदिवासी समाज में भी हुआ है और कालांतर में भारत के आदिवासियों ने उनको अपनाया भी है। लेकिन अगर धर्म कॆ आधार पर उन्हें बांटा गया तो यह अनुचित और अप्रासंगिक होगा। क्योंकि कहीं ना कहीं आदिवासी समाज विभिन्न धर्मो क़ो अपनाने कॆ बावजूद भी अपने संस्कृति और भाषाओ क़ो जीवित रखा है। यह उनके जीवनशैली में दिखता भी है ।
इसके विपरीत वैदिक संस्कृति के लोगों में वेदों के अनुसार उनका संस्कार औऱ जीवन पद्दति विवाह संस्कार, बच्चों का संस्कार, मृत्यु के पश्चात का संस्कार एवं उनकी धार्मिक मान्यताएं औऱ उनके नाम ऋषि मुनियों औऱ चक्रवर्ती राजाओ के नाम पर रखा जाना भारत कें आदिवासियों को उनसे अलग करता है। लेकिन आदिवासियों में उनके नाम का टाइटल उनके टोटेम पर ही आधारित है ना की किसी वैदिक ऋषिमुनियों या राजाओ कें नाम पर। मानवशास्त्र एवं समाजशास्त्र के ज्ञाता भी इस बात का इंकार नही कर सकते कि वैदिक काल के उपरांत भारत में दो तरह की विशेष संस्कृतियों का प्रभाव भारत में रहा है। एक नदियो के किनारे विकसित हुई सभ्यता और दूसरी गुफाओं औऱ जंगलो में विकसित हुई सभ्यता जो वैदिक सभ्यता से बिल्कुल इतर या भिन्न था जिसे भारत के मूल अनार्य जातियों की सभ्यता कहा गया। भारत में आर्य लोगों के आगमन और उनके साम्राज्य स्थापित करने के उपरांत उस समयकाल में भारत का नाम आर्यवर्त था। बौद्ध विचारक औऱ अध्ययनकर्ता भारत का सबसे प्राचीन नाम जम्बूद्वीप के नाम से भी जानते है ।
लेकिन विद्वान इतिहासकार यह भूल गए की आर्यो के भारत में आगमन के पूर्व यानी नव पाषाण काल में यहाँ अति विकसित सभ्यता थी और इस देश की अपनी अलग पहचान थी जिसे कोयामुरी द्वीप कहा जाता था अर्थात कोया वंशी लोगो का देश जो गुफा मे रहते थे और माता कॆ गर्भ से उत्पन्न हुए । संताली, मुंडारी, हो, खड़िया आदि अनार्य भाषा में होड़ या होड़ो शब्द का प्रयोग 'मनुष्य' के लिए किया जाता है ।
गोंडी संस्कृति और उनका इतिहास अपने अतीत से पर्दा उठाता है और एक ठोस अवधारणा क़ो स्थापित भी करता है ।
उनके अनुसार नव पाषाण युग में सतपुड़ा जिसका अर्थ (सत्ता का केंद्र) पेंकमेड़ी यानी (पेंचमेड़ी) कोट के गण्ड प्रमुख कुलीतरा के पुत्र कोसोडूम ने सर्वप्रथम अपनी महान साम्राज्य गोंडवाना के पंच द्वीपों में स्थापित किया। इस लिए उन्हें गोंडवाना के गण्ड जीवों ने अनार्य महा सम्राट ''शंभूशेक'' याने पंच दीपों के स्वामी की उपाधि से संबोधित किया। वह ''शंभू मा-दाव'' की संज्ञा से भी जाना जाता था, जिसका अर्थ पंच दीपों का स्वामी होता है। इसी शंभू मा-दाव का अपभ्रंश रूप बाद मॆ आर्य ब्राह्मणों ने विकृत करके 'शंभू महादेव' बना है। कुलीतरा के पुत्र कोसोडूम यानी शंभू मादाव के पश्चात इस पंच खंड दीप (गण्डोदीप) पर सतपुड़ा (सत्ता का केंद्र) के पेंकमेड़ी (पेंचमेड़ी) कोट से अपनी अधिसत्ता चलाने वाले कुल अरुरू (अट्ठाशी) शंभू मादाव हुए। उक्त शंभू मादाव के जमाने में अर्थात शंभू गवरा की जो मध्य की जोड़ी थी उसके कार्यकाल में पूर्वाकोट के गण्ड प्रमुख पुलशिव - हीरबा के परिवार में रूपोलंग पहान्दी पारी कुपार लिंगो ने जन्म लिया। उसने अपने जीवन काल में संपूर्ण कोयामूरी दीप के कोया वंशीय कोयतुर आदि गण्डजीवों को सगा गोत्र जीवन पध्दति में एक गोंडोला में संरचित किया। सभी कोया वंशीय गण्डजीवों ने गोंडोला व्यवस्था के सगावेनों की जीवन पद्धति को स्वीकार किया और वे गोंडोला के निवासी ''गोंडी सगा वेन'' (गोंडी सगा गोत्रज) बने। इस तरह गोंडोला के सगावेनों की व्यवस्था जिस भू-भाग में फली-फूली वह भूभाग गोंडी सगावेनों का गोंडवाना बना।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अतिक्रमण के बावजूद भारत के आदिवासियों ने विषम परिस्थितियों के बावजूद अपनी विशिष्ट सभ्यता भाषा-परंपरा औऱ संस्कृति को अपने आने वाले पीढ़ियों के लिए मौखिक रूप से संभाल कर रखा है ।
आज हमें आदिवासियों के विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाजों एवं उनके जीवनशैली को गहन शोध करने की जरूरत है। ताकि भारत के प्रथम मूल अनार्य जातियों के खोए हुए इतिहास से पर्दा उठाया जा सके। आदिवासियों का इतिहास उनके कल्चर औऱ कस्टम में ही कहीं छिपा हुआ है क्योंकि उनके पास लिखित रूप में कुछ भी नही है, बल्कि ओरल कल्चर औऱ कस्टम हिस्ट्री कॆ रूप मे यह उनके जीवनशैली में कही समाहित है औऱ दूसरा प्रमाण वैदिक पुस्तकों मे दर्ज है एक बार उनको बड़ी सावधानी से डीकोड करने की जरूरत है। इतिहास कोई नई चीज नहीं है लेकिन इतिहास को समझने के लिऐ उन छूटे हुए कड़ियों को ढूंढ़ने या उसे खोजने करने की जरूरत है।

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