खुद को धर्मभारू घोषित करने वाले लोग

 नेह इंदवार 

आमतौर से लोग अपने को सार्वजनिक या सामाजिक रूप से धार्मिक घोषित करते हैं या धार्मिक के रूप में परिचय देते हैं। इसके कई कारण और कारक हैं। ऐसे लोगों को कारणों और कारकों के बारे उथली या ठोस जानकारी हो यह अनिवार्य नहीं है। आम सामाजिक और पारंपरिक धारणा है कि धार्मिक लोग सुशील, सज्जन, दूसरों के प्रति प्रेम की भावना उढ़ेलने वाले, गैर कानूनी, असामाजिक कार्यों से दूर रहने वाले धर्मभीरु लोग होते हैं। कुल मिला कर वे एक सामाजिक प्राणी होते हैं और व्यवहार और सोच से भले व्यक्ति होते हैं। लेकिन हजारों बार ऐसे लोग मिलते ही रहते हैं, जो कहते  हैं कि वह एक गोडफियरिंग (धर्मभीरू) व्यक्ति है। लेकिन वास्तविक रूप से वे ऐसे बिल्कुल नहीं होते हैं। 

व्यक्ति के धार्मिक होने से माना जाता है कि व्यक्ति का सज्जनता से एक सहज नाता है। धर्म के प्रति ऐसी परंपरागत विश्वास का व्यावहारिक लाभ लेने या अपनी दिखावटी मुखौटा को प्रस्तुत करने के लिए भी धार्मिक शब्द या विश्वास का उपयोग या दुरूपयोग किया जाता है। अधिकतर लोग ऐसे परिचय को सहज गारंटीड मानते हैं।  इस विषय पर दर्जनों उदाहरण देकर पन्ने काले किए जा सकते हैं। धर्म के नाम पर व्यक्ति अपने तन-मन-धन को न्यौछावर कर दिया है, ऐसे किस्स, कहानियाँ या तथ्यों की कोई कमी नहीं है। इसका एक सहज धारणा यही बनती है कि धार्मिक लोग गलत कार्यों से दूर रहते  हैं।  बाहरहाल हम फोकस रखते हैं पार्ट टाईम भावना पर। सवाल यह है कि  धार्मिक और आस्तिक होने के दावे आमतौर से कितने सही होते हैं ??

.आज तक के तमाम अनुभव यही कहते हैं कि आस्तिक या धार्मिक होने का दावा एक छलावा से अधिक नहीं होता है। ऐसी भावनाएँ आम इंसान को एक छलावे की जिंदगी जीने के लिए प्ररित करता है। वास्तविक रूप में, आस्तिकता एक पार्ट टाईम, हाशिये की भावना होती है। पार्ट टाईम की भावनाएँ ऐसी भावनाएँ होती है जो टाईम-टाईम पर परिवर्तित होती है। व्यक्ति विशेष में यह कम या ज्यादा होती है या जिसे किसी विशेष परिस्थितियों पर त्यागा जा सकता है या किसी विशेष परिस्थितियों पर किसी दूसरी भावनाओं से उसकी आदला-बदली की जा सकती है।  किसी देवी, देवता, भगवान, ईश्वर आदि पर  या कहें किसी आलौकिक  शक्तियों पर कभी भी किसी का पूर्ण आस्था या विश्वास नहीं होता है। ऐसे विश्वास की नींव पोपली होती है जो किसी भी तरह की सटीक जाँच में कमजोर साबित हो जाती हैं।

.आलौकिक शक्तियों को मनुष्य को बचाने वाले सिद्ध करने के तमाम कारक, कारण और किस्से मुख्य धारा के बाहर हाशिये की कहानियां होती हैं। विभिन्न संकटों से बचने की घटनाओं को अपने विश्वास और आस्था से सहज ही जोड़ दिया जाता है। धार्मिक कहे जाने वाले लोग ऐसी घटनाओं का श्रेय किसी और को न तो देना चाहते हैं और न देते हैं। बल्कि नमक मिर्ची लगातार कर उसे अपने आस्था के केन्द्र बिन्दुओं से जोड़ कर प्रस्तुत किए जाते हैं, ताकि माने जा रहे अपने आस्था के देवता या भगवान की महिमा या प्रसिद्धि को बढ़ाया जा सके और अपनी आस्था के लिए  समर्थन जुटाया जा सके और उसकी बड़ाई की जा सके। ऐसी घटनाओं के सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक लाभ और मुनाफा इसके बाई प्रोडक्ट होते हैं। यदि कोई किसी दुर्घटना से बच जाता है तो उसे वह अपने आस्था, भगवान या किसी देवी-देवता को समर्पित करता है। मतलब पहाड़ से गिरने पर बच जाए तो उसे आस्था की जीत बताते हैं।

.यदि आस्था वास्तविक रूप से हाशिये की भावना या विश्वास नहीं है और वह मनुष्य के प्राकृतिक मुख्य धारा की भावना और विश्वास है,  तो ऐसे लोगों को पहाड़ से दस बार छलांग लगाना चाहिए। यदि दसों बार बच जाए तो उनकी आस्था और विश्वास की जाँच पूरी होगी और उस पर कानूनी, सामाजिक, वैज्ञानिक मोहर भी लग जाएगी। ऐसी बातें सिद्ध कर देगी कि धार्मिक भावना सत्यता की पृष्ठभूमि पर टिकी हुई है। लेकिन अफसोस !! कोई भी आस्थावान ऐसी जाँच का सामना करने के लिए सामने नहीं आते हैं। अब तक ऐसी बात साबित करने की कोई मान्य घटनाएं भी सामने नहीं आई हैं। कोई किसी भी शक्ति पर कितना भी आस्थावान हो, वह उन पर कभी भी आंख बंद करके खतरे नहीं उठाता है। सभी खतरे उठाने के लिए अपनी क्षमता और विवेक पर ही विश्वास करते हैं। 

.इसलिए फिलहाल आस्था की बात को पार्ट टाईम आस्था का नाम दिया जा सकता है। किसी के आस्था की जाँच करने के बहुतेरे उपाय हो सकते हैं। लेकिन आमतौर पर लोग अपनी आस्था को किसी तर्क, विश्लेषण से परे बताते हैं और उन कर किसी भी तरह के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पद्धति से जाँच की मांग को अस्वीकार कर देते हैं। फिलहाल विवेकशील और समझदार और अनुभवी लोग किसी के धार्मिक होने के दावे पर बहुत जल्दी विश्वास करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। आधुनिक काल में संसाधनों की कमी और संसाधनों को प्राप्त करने की जीतोड़ प्रतिस्पर्धा ने लोगों को जिंदगी में बहुत जल्द अनुभवी बना देता है। जीवन संघर्ष में प्रतियोगी परिस्थितियों के साथ दो-चार होते लोग बहुत जल्दी कटु यथार्थ से परिचित हो जाते हैं और वे संसाधनों को प्राप्त करने के भागदौड़ में लोगों के धार्मिक छलावे से बहुत जल्दी परिचित हो जाते हैं।

इसीलिए आज की दौर में जब कोई अपने को गोडफेयरिंग धार्मिक व्यक्ति बताता है तो सामने वाले को उनके दावों के खोखले होने का एहसास बहुत जल्दी हो जाता है। फिलहाल आज के युग में किसी के धार्मिक होने के दावे अधिकतर खोखले ही होते हैं। यदि कोई सचमुच धर्मभीरू है तो यह समाज के लिए अच्छी बात है। लेकिन अधिकतर लोग वास्तविक रूप में धर्मभीरू नहीं होते  हैं।  समझदार लोग ऐसे दावों को दिलबहलाव, हाशिये की भावना मानते हैं। इसे किसी धर्म के नाम से जोड़ कर न देखें, बल्कि जटिल जीवन संग्राम में एक व्यावहारिक शिक्षा के रूप में लोगों के स्वभाव को पहचानने के उपकरण के रूप में देखें। 

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