सोनो और रूपो गिद्ध की दंत कथा

पन्ना करण 
उराँव समाज की दंत कथा के अनुसार-बहुत पुराने समय में एक ऊंचा पहाड़ (सारू  पहाड़) था जिसपर सेमल का विशाल पेड़ था. इस पेड़ पर सोनो और रूपो नाम के दो गिद्ध रहते थे. दोनों ही राक्षसी स्वभाव के थे, वे छोटे-छोटे बच्चों को अपना आहार बनाते थे. उनके कहर से परेशान लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए धर्मेश (ईश्वर) से प्रार्थना की. भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और गिद्धों को मारने के लिए लोहार से 12 मन का धनुष और 9 मन का तीर बनाने के लिए कहा. इसके बाद फागुन पूर्णिमा के दिन भगवान ने घोंसले में बैठे हुए दोनों गिद्ध को मारा और उस सेम्बल के पेड़ को भी काट गिराया और लोगों को भय मुक्त कर दिया. उसी दिन से फग्गू चंदो अर्थात् फागुन पूर्णिमा के दिन सेम्बल को काटकर त्योहार मनाया जाने लगा.
फगुआ काटने की है मान्यता
दंत कथा और सामाजिक मान्यता के अनुसार होली अर्थात् फागुन पूर्णिमा के एक दिन पूर्व फगुआ काट कर उसे आग में जलाने की परंपरा है. फगुआ काटने से यहां तात्पर्य सेमल की डाली काटने से है. कथा के अनुसार सोनो – रूपो की मौत के बाद उस सेमल पेड़ को भी पुआल लगाकर जला दिया गया था जिस पर गिद्धों का निवास था, ताकि फिर से कोई गिद्ध इस पर घोंसला न बना सके।
“आदिवासियों का “फागुन पर्व ” का मान्यता ” होली ” से बिल्कुल भिन्न है, होलिका, प्रहलद् व हिरण्यकशिपु से कोई मतलब नहीं है।”
आदिवासियों में फागुन के दिन रंग खेलना व लगाना जैसे फूहड़ रिवाज नहीं है।
फेसबुक से साभार

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