दुनिया के किसी भी धर्म में या कहें तो दुनिया के सभी धर्मों में माँ-बाप अपने धार्मिक कर्मकांडों में अपने अबोध बच्चों को शामिल करते हैं और वे चाहते हैं कि उनका बच्चा भी उन्हीं की तरह धर्म की वेदी पर दिमाग को बलिदान कर दें।
माँ-बाप बच्चों के दिमाग में पड़ने वाले एक तरफा मनोवैज्ञानिक प्रभाव से अनजान होते हैं और ऐसे बच्चे बड़े होकर धार्मिक कट्टता का शिकार होते हैं और वे दिमागी रूप से संतुलित विचारों से वंचित हो जाते हैं। कुल मिला कर यह माँ-बाप की बेवकूफी भरा सोच और कार्य होता है।
एक दो बार फोटो सेशन के लिए बच्चों को धार्मिक भेष देना या धार्मिक पुरूष स्त्री बनाना नुकसानदेय नहीं है। यह मनोरंजक या शिक्षाप्रद भी हो सकता है। लेकिन धर्म के बलिवेदी पर अनवरत रूप से बच्चों के इस्तेमाल का प्रभाव बच्चों के बाल मन पर गहरा होता है। बाल मनोवैज्ञानिकता से अक्सर माँ-बाप या परिवार वाले अनजान होते हैं। दिमाग के गहरे केन्द्रों में बचपन से ही अनेक बाते स्थायी रूप से केन्द्रित हो जाती है। प्रगतिशील बातों की शिक्षा से बच्चा प्रगतिशील बनता है। जबकि पोंगापंथी शिक्षण से बच्चा पोंगापंथी बनता है।
अक्सर परिवार वाले धर्म के नाम पर अपना धार्मिक वर्चस्व कायम किए हुए व्यक्तियों या संगठनों के हाथों की कठपुतली बन कर, उनकी बातों में आकर अपने खानदान के चिरागों के मानसिक स्वतंत्रता को परतंत्रता में बदलने का काम करते हैं।
पूरी सभ्यता नवोन्मेषी विचारों (innovative thoughts) के विकास के बल पर ही विकसित हुआ है। दुनिया की सारी सृजनात्मक क्लासिकल और कालजयी साहित्य का केन्द्र ही विकासवादी है। विचारों की अबाध स्वतंत्रता, निरपेक्ष महौल विवेकशीलता को सुदृढ़ करता है।
लेकिन यदि बच्चों को एकपक्षीय और पक्षपातीय विचारों, दैनिक आदतों, धार्मिक कर्मकांडों का गुलाम बना दिया जाए तो बच्चा कभी भी स्वतंत्र विचारों और अनुसंधानात्मक मानसिकता का मालिक नहीं होगा।
धर्म वैज्ञानिक सभ्यता के विकास के पथ पर ब्रेक लगाने का काम करता रहा है। दुनिया का कमोबेश हर धर्म आधुनिकता और प्रगतिशीलता से डरता रहा है। वह हर क्रांतिकारी स्वतंत्र विचारों का विरोधी रहा है। पूरे मानवीय इतिहास में कट्टर धर्मी व्यक्ति कभी भी क्रांतिकारी विचारों का जन्मदाता नहीं हुआ है।
धर्म अपनी सदियों प्राचीन पुरातनपंथी सड़ी हुई विचारों का गुलाम बनाने के लिए अपने विवेकहीन, अंधानुगामी अनुयाईयों का इस्तेमाल करता है और उन्हें हमेशा के लिए अपना गुलाम बना कर जिज्ञासुहीन बना डालता है। वह तमाम वैश्विक विचारों को अपने धार्मिक विश्वास के खूँटे से बाँध कर रखना चाहता है। जिस धर्म में स्वतंत्र विचारों के लिए कोई गुंजाईश नहीं होती है, वह किसी नाले में पड़ा हुआ सड़ा पानी सा गंधाता है।
ऐसे धर्म के लोग दिमागी स्वतंत्रता की शक्ति से हमेशा के लिए अपरिचित हो जाते हैं। ऐसे समाजों की बौद्धिकता ऊँची छलाँग लगाने में असमर्थ हो जाते हैं। वे अंतरिक्ष की ऊँचाईयों को नापने के बजाय अपनी दिमागों के चारों ओर चारदिवारी बनाने में जिंदगी खपा देते हैं।
कृपया अपने बच्चों को प्रगतिशीलता के ऊँचाईयों को छूने के लिए तैयार करें। किसी अंधेरी गली में जाने के लिए मजबूर न करें। यह सभी धर्मों के बच्चों के लिए। (यहाँ नीचे की) तस्वीर तो बस किसी एक धर्म की हो सकती है। लेकिन बच्चे पूरी सभ्यता के अनमोल हीरे ही होते हैं। वे ही भविष्य के निर्माता हैं और उनके संतुलित विकास पर ही सभ्यता की संतुलित विकास भी आधारित है।
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