नेह अर्जुन इंदवार
जंगली हाथियों ने चमरा उरॉंव का घर दो साल पहले ही उजाड दिया था और घर में रखे चावल दाल तथा अन्य खाद्यपदार्थ भी वे खा गए। किसी तरह 65 वर्षीय वृ्द्ध चमरा उरॉंव ने भाग कर रात में अपनी जान बचायी थी। लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बावजूद अभी तक उन्हें वन विभाग ने कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी।
नियमानुसार वन विभाग ऐसे लोगों को तुरंत क्षतिपूर्ति देता है, जिन्हें जंगली हाथी नुकसान पहुँचाते हैं। अकेले जीवन गुजर बसर करने वाले गरीब चमरा पिछले दो वर्षों में अपने घर की मरम्मत नहीं करवा पाए हैं और आज वे भीषण सर्दी ठिठुरता हुआ रात काटते हैं। वीरपाडा के पास रंगालीबाजना, चापागुडी मौजा के डिपालाइन में रहने वाले श्री चमरा उरॉंव किसी तरह मजदूरी करके अपना पेट तो भर लेते हैं, लेकिन इतना पैसा नहीं बचा पाते हैं कि वे अपने मकान की मरम्मत करवा सकें।
श्री चमरा उरॉंव के पास बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) राशन कार्ड था जिसके आधार पर उसे सरकार से इंदिरा आवास के नाम पर एक रूम मिला हुआ था। लेकिन मकान बनने के दो महीने बाद ही हाथियों का झुंड गॉंव में आया और घरों को तहस नहस करके चला गया। विगत दो वर्षो तक उन्हें क्यों क्षतिपूर्ति नहीं दी गई इस विषय पर वन विभाग के अधिकारी सुरंजन सरकार कहते हैं वे यहॉं नये आए हैं वे देखेंगे कि क्यों चमरा उरॉंव को क्षतिपूर्ति नहीं मिली। इस गाँव में रहने वाले अधिकतर रहीवासी आदिवासी हैं और मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते हैं।
आदिवासी समाज बहुत बदल गया है। युग बीतने के साथ तो समाज बदलता ही है। लेकिन आदिवासी समाज में निरंतर हो रहे बदलाव प्राकृतिक और स्वभाविक बदलाव नहीं है। यह बदलाव देश में विकास के नाम पर हो रहे उथल-पथल का साइट इफेक्ट अधिक और समाज के द्वारा सहर्ष चुना गया कम है। आदिवासी समाज में व्यक्तिगत जीवन सुखमय जीवन का एक पहलू होता था। अर्थात व्यक्ति यदि सुखी है तो वह व्यक्तिगत जीवन में एकांतिक जीवन जी सकता था। लेकिन दुख में समाज हमेशा उसके दुख को बॉंटने के लिए तत्पर रहता था। समाज कौटोंबिक परिवारों में बॉंटा हुआ जरूर होता था लेकिन एकता और सामुहिकता की भावना उनमें स्वभाविक रूप से व्याप्त होती थी। चाहे फसल की कटाई हो चाहे फसल की बुआई। मदइत के सहारे पूरे गॉंव में हर तरह के पारिवारिक और सामाजिक कार्यो को सभी मिल कर पूरा कर लेते थे। बच्चों के पालन-पोषण और देखरेख अथवा युवक युवतियों के सामाजिक प्राशिक्षण की बातें हो, सभी मिल कर करते थे। किसी में यह भावना नहीं होती थी कि ये बच्चे फालना के हैं इसलिए हमें उसे नजरांदाज करने हैं। बडों की इज्जत गॉव समाज में सभी करते थे। एक बुजुर्ग सभी के बडा, आजा अथवा नाना होता था। एक आदमी के बीमार पडने पर सभी उसके दावा दारू में भले व्यकितगत रूप से हाथ नहीं बटा रहे होते लेकिन परोक्ष रूप से सभी उसके लिए दुखी होते थे और उसके खेती बारी को बारी-बारी से मदद करके फसल उगाने में सहायता करते थे।
किसी मजबूर आदमी की मजबूरी को समाज कभी भी न तो मजबूर आदमी की व्यक्तिगत मजबूरी समझता था न ही कभी उनकी मजबूरी का लाभ उठाने के लिए कोई नीचता के स्तर पर उतरता था। झारखण्ड के गॉंवों में गॉंव हमेशा स्वनिर्भर होते थे और बहुत कम चीजों के लिए वे गॉंव के बाहर निर्भर रहते थे। गॉंव बृहद रूप में एक परिवार ही होता था। किन्तु आज गॉंव और समाज की बात छोड दीजिए आज तो परिवार में ही एकता की भावना नहीं होती है। व्यक्ति केिन्द्रत स्वार्थ आधारित व्यक्तिवाद ने आज पूरे आदिवासी समाज को अपने आगोश में ले लिया है। आज हर चीज के लिए आदिवासी समाज दूसरे समाज पर निर्भर है। क्योंकि साम्यवाद की भावना दिलों से खत्म होती जा रही है। विकासवाद ने आदिवासी स्वनिर्भरता को खत्म कर दिया है और हम आज आदिवासीयत से दूर होते जा रहे हैं। आज समाज में लाखों चमरा उरॉंव हैं जिन्हें पढा-लिखा तबका जरा सी मदद पहॅुचा के उनके साधारण जीवन में सुख की दो घडी दे सकता है। लेकिन चमरा उरॉंवों को उनके आस पडोस में रहने वाले आदिवासी शिक्षित मदद पहुँचाने में तत्पर नहीं होते हैं और तमाम नियमों और कानूनों के बावजूद उन्हें सहज रूप से प्राप्त होने वाली सहायता नहीं पहॅुच पाती है। शिक्षा से समाज में सुबह के उजाले की किरण की जगह दोपहरी की ऐसी किरणे मिल रही है जिनकी तपीश हमें जला रही है।
रोज सुबह निकलने वाला सूरज हमेशा पुराना वाला सूरज नहीं होता है वह अपने साथ नयी रोशनी लेकर आता है। नयी सुबह की नई रोशनी से आदिवासी गॉंव भी अछूते नहीं रहे और गॉवों से ग्रामीण शहरों और कस्बों में जाने लगे और वहॉं से वापसी में वे अपने साथ कुछ रूपये पैसे और नये कपडे ही नहीं बल्कि नयी सोच, नयी विचारधारा, परंपरा और आचार-व्यवहार भी लाने लगे। सामूहिक जीवन पद्वति में जीवन जीने वाले आदिवासी कस्बों, शहरों और नगरों में जाकर व्यक्ति-केिन्द्रत, स्वकल्याण के विचारों से वाकिफ होने लगे, उसे अपनाने लगे और इसे वे अपने गॉंवों में भी परांपरा की तरह सींचने लगे। व्यक्ति-केिन्द्रत विचारधारा ने समाज को बुरी तरह से झकझोर दिया है।
आज सामुहिकता की भावना की जगह व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना ने ले लिया है। कभी छोटे-मोटे झगडे से लेकर बडी-बडी लडाईयों को गॉंव के पंचायत अथवा पडहा पंचायत आदि में सुलझाया जाता था, लेकिन आज मामूली कहासुनी भी पुलिस और कचहरी तक पहॅुचती है। शहरों में जा कर बस जाने वाले गॉंव वालों को भूलते जा रहे है। वहीं गॉंव वाले भी शहरों में बस जाने वालों के साथ न सिर्फ शहरी के रूप में ही व्यवहार करते हैं, बल्कि उन्हें खेती-बारी के हक से भी जुदा समझते हैं। पैसे आधारित सोच ने तमाम सामाजिक विचारों को स्वार्थ आधारित विचारों में बदल दिया है। आज कोई चमरा उरॉंव बुढापे में कष्ट का जीवन जीता है तो समाज में कहीं कोई हलचल नहीं मचता है। कोई पडोसी सामने आकर उन्हें न तो दिलासा दिलाता है न ही उन्हें अपनी सामर्थ्यता के अनुसार कोई मदद पहुँचाता है। जो पढे-लिखे हैं वे अपनी ही दुनिया में खोए हुए अपने जीवन स्तर को और उँचा उठाने में व्यस्त हैं। समाज को नेतृत्व देने का दावा करने वाले अपनी रूतबा को बढाने और अपने लक्ष्य को पाने में ही लगे हुए हैं।
आदिवासी समाज भारत के अन्य सम-सामयिक समाजों में सिर्फ आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछडी हुआ है। सामाजिक रूप से आदिवासी समाज अभी भी अनेक समाजों से आगे और समृद्व है। अभी भी आदिवासी समाज में समाज की कीमत पर अपनी झोली भरने, अपने धनबल पर अन्याय और अनैतिक कार्य करने वालों को मान्यता नहीं मिलता है। न ही अन्य भारतीय समाजों में व्याप्त कुरीतियों को अपने समाज में स्थान देता है। नारी जाति को आदिवासी समान में जितना सम्मान और अधिकार मिलता है उतना और कहीं भी नहीं। शादी में दहेज मांगने का साहस करने वाले उँगली में गिने जा सकते हैं। खेती की भूमि सामूहिक और सामाजिक मानी जाती है। जाति और धर्म के रूप में किसी भी व्यक्ति के साथ सामाजिक रूप से कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। एक ही घर में एक भाई सरना और एक भाई ईसाई हो सकते हैं। वर्ग भेद न के बराबर है। चाहे कोई धार्मिक हो चाहे कोई अधार्मिक समाज इसकी कोई परवाह नहीं करता है। धार्मिक कटटरता थोपने की तमाम कोशिशें बेकार हुई है। समाज को धार्मिक रूप से बॉंटने की कोशिशे भी सफल नहीं हुई है।
कुछ लोग आदिवासियों को दलितों से भी पिछडे और नीच साबित करने की बहुतेरे कोशिशें की लेकिन आदिवासी उच्च सामाजिक मूल्यों के कारण वे इस मामले में फिसडडी साबित हुए हैं। आदिवासी, समता स्वतंत्र और समरसता में प्राकृतिक रूप से विश्वास करता है। न तो किसी समाज को अपने से छोटा समझता है न ही किसी समाज को अपने से बडा। वर्तमान समय में जिन मूल्यों और विचारों को कानून और संविधान के द्वारा लोगों में प्रचारित किया जा रहा है वे तमाम बातें आदिवासी समाज में युगों से स्थापित हैं। चाहे वह पर्यावरण की बातें हो, प्रदुषण फैलाने की बाते हो या वह आदमी को अनचाहे आचार-व्यवहार और परांपराओं से बचाने की बातें हो। आदिवासी समाज हमेशा सर्वकल्याणकारी और सर्वजनहिताय बातों को ही अपने समाज में स्थान और मान्यता दिया है।
आदिवासी गॉंव जितने साफ-सुथरे और स्वच्छ होते हैं वैसे गॉंव भारत के और कौन से हिस्से में मिलते हैं इस बात की जानकारी पूरे भारत की यात्रा करने के बाद भी मुझे नहीं हुई। मेरे यह कहने से लोगों को आश्चर्य होता है कि आदिवासी परिवार तथाकथित ब्राहमण और तथाकथित दलित को एक ही नजर से न सिर्फ देखता है, बल्कि समान रूप से व्यवहार भी करता है। सामाजिक रूप से न तो वह किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर छोटा समझता है न ही बडा। भारतीय संविधान को लागू हुए साठ साल हो गए। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद लोगों की जातिवादी विचारों और परंपराओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन आदिवासी समाज इन्सान के बराबर होने की बातों को युगों से मान्यता देता आ रहा है।
इन तमाम अच्छाईयों के बावजूद आदिवासी समाज आज टूट रहा है। टूटन की गति समय बीतने साथ तीब्रतर होते जा रही है। हम दूसरे समाज की अच्छाईयों को तो नहीं अपना रहे हैं, लेकिन बुराईयों को जरूर अपना रहे हैं। आदिवासी समाज की सामाजिक मूल्यों पर हम कोई बहस नहीं करते हैं। हमारी सामाजिक धरोहर, मूल्यों, विचारधारा, अच्छी सामाजिक परंपराओं, स्वतांत्रिक विचारों, समता के मूल्यों, भाईचारा, सामाजिक और धार्मिक खुलेपन को बचाए रखने के कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं।
हम दूसरे समाज की घार्मिक और साम्प्रादयिक भावनों को अपना कर अपने ही समाज में विभेद पैदा कर रहे हैं। यद्यपि इस तरह की बुराईयॉ अभी गहरी रूप में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। लेकिन यदि हम सजग नहीं हुए तो दूसरे समाज में फैली व्यक्तिवादी परंपरा और विचारधारा आदिवासी समाज को खत्म कर देगी। समाज में दुख झेल रहे चमरा उरॉंवों ने हमें सोचने, विचार करने का एक मौका दिया है। यदि हम सामाजिक चेतना जगा कर विचार करेंगे तो हम अपने समाज को बचा सकते हैं। अपनी मूल्यों को बचा कर समाज में एकता और एक्य की भावना को बचा कर रख सकते हैं।
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