डॉ अव्यक्त को पढ़िए

 

 महक सिंह तरार 

                         क्या हमारा मस्तिष्क ख़ुद दुख पैदा करता है ?

                                                        जवाब है - हाँ

यह सच है कि हमारा मस्तिष्क सुख की अनुभूति चाहता है। मस्तिष्क के hippocampus और amygdala हिस्से में हमारी सुखद और दुःखद अनुभूतियां एकत्र होती रहती हैं। दुःख-सुख का अहसास मस्तिष्क में स्त्रावित होने वाले रसायन जैसे डोपामिन,सेरोटोनिन,गाबा इत्यादि तय करते है। लेकिन, मस्तिष्क बीच बीच में दुःखी भी होना चाहता है।
ज़ी हाँ अपने आसपास के लोगों पर गौर करना व देखना की हम सबकुछ सही होने के बावजूद भी अनेकों बार काल्पनिक दुखों का निर्माण करते हैं।
 
मेरे एक मरीज़ के जीवन में सुख ही सुख थे। पैसा, सम्मान, पद स्वास्थ्य, मेहनती पति, प्यारे बच्चे, माता-पिता। लेकिन उसके मस्तिष्क ने एक काल्पनिक दुःख रचा हुआ था क़ि उसका पति उसे प्यार नहीं करता है। जबकि वह खुद मुझे कहती कि वो मुझे प्यार भी करता है, बहुत अच्छा है लेकिन वो कभी किसी और को चाहता था ये मेरे दिमाग से वर्षों बाद भी नहीं निकलता।
 
बिना वजह भी शक़, ईर्ष्या, भविष्य के प्रति असुरक्षा… जैसे मेरा बेटा कुछ न बन पाएगा, मेरा जॉब तो नहीं छूट जाएगा, लोग मेरे बारे में बुरा सोचते है, फ़लाना मुझे छोड़ तो नहीं जायेगा, लोग मुझे समझ नहीं पाते जैसे काल्पनिक दुःख मस्तिष्क ख़ुद बनाता है, जब सब सही हो तब भी बनाता रह सकता है।
 
बिना किसी कारण जब मन उदास हो या जब आप बात का बतंगड़ बना रहे हों तब समझ जाना हिप्पोकैम्पस में मौजूद कोशिकाएं और रसायन ऐसा करवा रहे हैं आपसे न कि आपका पति ,पत्नी, बॉस, दोस्त या सास।
सभी के मस्तिष्क ऐसे ही काम करते है, हर व्यक्ति के दुखी होने की ज़रूरत और प्रोग्रामिंग अलग अलग है। जब तक यह जीवन पर बहुत दुष्प्रभाव न डाले यह सामान्य है। हाँ महिलाओं में बार बार दुखी होने की आवश्यकता कुछ ज़्यादा है जिसके लिए वे छोटी छोटी बातों पर चिकचिक रच सकती हैं। जबकि पुरुष में बार बार की बनिस्पत एक बार में ही ज़्यादा दुखी हो जाने की संभावना ज्यादा होती है।
 
दुखी होने के कुछ लाभ भी है वो कमेंट-१ में डाल दिये है। पर बात-बेबात पर दुखी होना रिश्तों, सेहत, पर्सनालिटी और काम पर दुष्प्रभाव डालता है। दुख के रास्ते नेचर आपसे डीएनए की रक्षा करवाना चाहती है। अब सबके बैकग्राउंड, मोरल परिभाषा, संस्कर्तिक, धार्मिक माहोल से तय होता है की आप दुखी होकर, जलन से, क्रोधित रहकर डीएनए बचाते हो या फिर प्रेम, करुणा, देखभाल से बचाते हो। क्या इस दुःखी होने पर जीत हासिल की जा सकती है?
तो उत्तर है - हाँ।
 
मस्तिष्क की इस प्रवृत्ति पर बहुत हद तक जीत हासिल की जा सकती है। ब्रेन के फ्रंटल लोब में मौजूद विश्लेषणात्मक क्षमता का उपयोग कर इस पर विजय प्राप्त कर दुःख की गंभीरता को कम किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो अधिकांशतः खुश रहना बाहरी तत्वों की तुलना में आंतरिक तत्वों पर ज़्यादा निर्भर करता है। और इसलिए खुश रहने का सबसे प्रमुख कदम है यह निर्णय करना क़ि मैं खुश रहूँगा या खुश् रहूंगी। फिर इस लेख में दी गयी जानकारी को मस्तिष्क में बैठा लें। यह सच इन कोशिकाओं का आपको अपनी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को बेहतर ढंग से पहचानने में मदद करेगा। तीसरा जीवन को एवं स्वयं को खुद से ही अलग(detach) हो कर देखें मानो आपका जीवन एक मूवी है और आप खुद एक पात्र जिसका आनंद आप खुद अलग खड़े हो कर देख पा रहे हैं। जब आप फ़ालतू की ओवर रिएक्शन करते देख पायेंगे तो आप खुद उसे नियंत्रित कर पाएंगे।
 
इसे दर्शन की भाषा में आत्म चेतना (self awareness) कहते हैं जो कि जीवन के हर क्षेत्र में सफ़लता की बड़ी ज़रूरत है। मैं मैडिटेशन के समय मस्तिष्क के फ्रंटल लोब पर ध्यान केंद्रित करता हूँ इससे भी मदद मिलती है। दुख के स्वाभाविक फ़ायदे भी है जो कमेंट वन में डाले है।
 
तो आज ही अपनी दुःख की ज़रूरत वाली कोशिकाओं से कहिये बस, बस .....हमें तुम्हारा खेल समझ आ गया है। अब और नहीं। कोशिकाओं जाओ तुम लंबा आराम करो क्यूँकि मैने तय कर लिया की मुझे ख़ुश रहना है। दुखी होने में ख़ुद का सबसे बड़ा योगदान होता है। जबकि सुख एक निर्णय है। साभार- फेसबुक

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