चाँदमुनी चाय बागान से पूँजीपतियों की टी टूरिज़्म यात्रा

 

 रूपम देब

चांदमुनी चाय बागान 1920 करीबन स्थापित हुआ, जो ठीक  सिलीगुड़ी शहर के बगल में स्थित है।  सिलीगुड़ी शहर के मौसम को नियंत्रित करने में चांदमुनी बागान का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस बागान पर बुरी नजर तब पड़ा जब  दीपंकर चटर्जी नामक एक पूंजीपति ने 1992 में इस बगान को खरीद लिया और मंत्री, MLA के साठगांठ से चाय बागानों के खराब हालत एवं सिलीगुड़ी की बढ़ते जनसंख्या नाम पर चांदमुनी चाय बागान में टाउनशिप का प्रस्ताव पास किया गया।

लेकिन 1953 टी स्टेट एक्ट के कारण बागानों में प्लांटेशन के अलावा दूसरा कुछ करना सम्भव नही था ।

1953 टी स्टेट एक्ट के 14 , 16 ,17 नंबर धारा के अनुसार चाय बागान के  प्लांटेशन और री-प्लान्टेशन के बारे में सिर्फ टी बोर्ड ही निर्णय ले सकता है। इसलिए वामफ्रंट सरकार ने 1995 मैं एक संसोधन लेकर आया कि राज्य सरकार सामाजिक सुधार कामों के लिए चाय बागानों का जमीन अधिग्रहण कर सकता है, इसी कानून ने चांदमुनी बागान को टाऊनशिप होने का रास्ता दिखाया क्योंकि सामाजिक काम का मतलब कानून में स्पष्ट नही था।

1991 में चांदमुनी चाय बागान का उत्पादन 5 लाख किलोग्राम ग्रीन टी था, जो 1996-97 में उत्पादन बढ़कर 5 लाख 81 हजार 926 किलोग्राम हो गया। फिर भी बागान मालिक घटा का रोना रोने लगा कहने लगा की बागान घाटे में चल रहा है। पूरा बागान 664 एकड़ में फैला हुआ था। मालिक ने  सरकार को 404 एकड़ जमीन वापस दे दिया। फिर सरकार ने वही जमीन मालिक को फिर से 13 करोड़ 92 लाख 87 हजार 947 रु अर्थात 14 करोड़ में 99 वर्षो के लिए लीज पर दे दिया।  इसका मतलब 6000 रु प्रति कट्ठा जमीन, लेकिन  लैंड डेवलपमेंट के अनुसार उस समय का सरकारी मूल्य उस जमीन का लगभग 140 करोड़ रु था और बाज़ार मूल्य 250 करोड़ के आसपास था ।

समझ ये आ रहा था कि इतना सारा कलाधन अगर कोई प्रॉजेक्ट से निकल रहा है तो कितना बड़ा गिरोह इसमे सामिल हो सकता है। नेवटिया, तोडी, दुग्गर जैसे बड़ा बड़ा कॉरपोरेट गठजोड़ टाऊनशिप कंपनी के पीछे छुपा हुआ था और इस प्रोजेक्ट के बनाने के विरोध में जब श्रमिक रास्ते पर उतरे तब 2002 के 25 जून से पुलिस द्वारा श्रमिको के ऊपर अत्याचार होने लगा।

26 जून को कुछ श्रमिक चाय के पौधे काटने का विरोध करने लगे तभी दो श्रमिकों को गोली मारा गया, 18 बर्ष की लड़की के साथ और 5 लोगो को बुरी हालात में हॉस्पिटल में भर्ती किया गया, 32 श्रमिकों की ग्रिफ्तारी हुई, और वामफ्रंट सरकार ने ये कह प्रचार किया कि "चांदमुनी में कोई श्रीमक नही मारा, जो मारा वो नक्सली थे ।

सरकार के साथ मालिक ने नया एग्रीमेंट किया जहाँ 150 एकड़ में प्लांटेशन रहेगा ये कहा गया लेकिन कुछ ही दिनों में सब जान गए कि ये सब ढकोसला है। उसके बाद श्रमिको को सताने का खेल आरंभ हुआ, बहुत सारे मजदूरों को मालिक द्वारा सुबोल्बभीठा डिवीजन फूलबाड़ी में भेजा गया। इसके साथ मजदूरों पर जबरन रिटायर होने के लिए दबाव डाला गया। एग्रीमेंट में ये कहा गया कि टाउनशिप होने के बाद प्रत्येक मजदूरों को रोजगार मिलेगा। लेकिन टाउनशिप जब हुआ तब बताया गया कि चाय मजदूरों में काम करने की क्षमता नही है।  बहुत ही कम लोगो को सेक्युरिटी गार्ड की नौकरी दी गई और कुछ को झाड़ू लगाने का काम मिला लेकिन काम का कोई सुरक्षा नही रहा।

आज चांदमुनी के सीने में जो उत्तरायन बना है उसमें सिलीगुड़ी के मिडल क्लास के लोग भी नही रह सकते। लेकिन हां बॉलीवुड एक्टर डेनी से लेकर बड़े बड़े सितरा और महाजनों का महल वहाँ है।  जो जमीन सरकार ने 6000 रु कट्ठा दिया था आज उसका मार्केट वैल्यू 60-80 लाख रु पर कट्ठा है।

ये टाउनशिप अवैध होने के बाबजूद भी दुख की बात ये है कि हाइकोर्ट ने इसको मंजूरी दी लेकिन 1995 का एक्ट सिलीगुड़ी के आस पास डागापुर, मोहरगाँव-गुलमा, माटीगढ़ा के बागान में टाऊनशिप करने का रास्ता नही दिखा पाए।

फिर 2005 में राज्यसरकार ने टी टूरिज्म करने के लिए केंद्र सरकार से परमिशन मांगा तो प्राइवेट कंपनी धारा चलित टी टूरिजम के लिए 80 करोड़ रु भी दिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि टी टूरिज्म में गोल्फकोर्स भी रहेगा, लेकिन उस समय सिंगुर और नंदीग्राम जैसे आंदोलन के कारण ये खेल को कुछ दिनों को लिए स्थगित कर दिया गया था।  जो फिर से समकालीन सरकार लेकर आयी है।

हम सभी को एक बात ज़ोर देकर समझना जरूरी है कि चाय बागानों में काम तो है पर काम का कोई दाम नही है। लेकिन टी टूरिज्म शुरु होने से वो काम भी नही रहेगा, क्योंकि टाऊनशिप या टी टूरिज़्म जैसे बिजनेस मॉडल मजदूरों को काम से निकालने की एक प्रक्रिया है, जो हमलोगों को समझना पड़ेगा।  आज हमलोग दैनिक मजदूरी के लिए संघर्ष कर रहे है लेकिन टी टूरिज्म जैसे पॉलिसी को रोक नही पाए, तो कल फिर से अन्य जगहों पर नये कामो के लिए आंदोलन करना पड़ेगा और वो भी एकले क्योंकि श्रमिको को इधर-उधर तीतर-बितर किया जा रहा है।

डुआर्स और पहाड़ के क्षेत्रों में मालिक का अब एक नया पॉलिसी की शुरुआत होगी, जहाँ मालिक बागान तो खोलेगा, लेकिन कोई कंपनी को 150 एकड़ जमीन टी टूरिज्म के लिए लीज़ में देकर भाग जाएगा। परिणामस्वरूप बागान तो बंद रहेगा लेकिन टी टूरिज्म चलता रहेगा जहाँ गोल्फ कोर्स, स्विमिंग पूल, कैसिनो में खेलने के लिए बड़े बड़े लोग आया करेंगे।

इसलिए अब सबसे बढ़िया वक़्त है  हमलोग अपनी जमीन का अधिकार की माँग को और भी जोरो से उठाए और जहाँ पर खाली जमीन है। वहाँ छोटा छोटा कारखाना अथवा खेतीबाड़ी हो जहाँ पर चाय मजदूरों और उनके बच्चे को रोजगार का अवसर प्राप्त होगा। यदि टी टूरिज्म करना ही है तो होमस्टे बने जो जिसका निर्णय बागान के मजदूर वर्ग, SHGs या कोऑपरेटिव करेगा, कोई महाजन नही।                                         अनुवादक Rahul Kumar सिंतबर 6, 2019

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