सोहराई नेग की मुण्डा लोक कथा

 

महादेव मुण्डा

भारत देश के मुण्डा हो या भूमिज मुण्डा, सोहराई को तीन चरणों में मनाते हैं। सभी विधान एवं दस्तूरों का एक खास मकसद होते हैं।

1. गोंड़ा पेरे गोशाला की सफाई एवं भराई। गाँव का हाटिया यानि कच्ची सड़क की सफाई एवं मरम्मत।

2. जागोवर  यानि अमावस्या की रात जागरण। सोहराई गाना गाते हूए मवेशियों के सिंग पर 03 दिन तक गूँजा या करंज तेल मखना।

3.  सोहराई बोंगा  के दिन पहली बेला में गाना गाते हुए मावेशियों की धुलाई फिर दोपहर बाद पूजा अनुष्ठान और मावेशियों को साज श्रृंगार करके नचाना।

 सोहराई नेग की मुण्डा लोक इतिहास

मुण्डाओं की शुरुआती जीवन तो घुमंतु और आखेट की थीं। लेकिन सिन्धुघाटी और राखीगढ़ी में जब प्राचीन होड़ो सभ्यता का विकास हुआ तो मूख्य पेशा  पशुपालन और कृषि  के साथ-साथ शिकार करना ही था।

 

पूर्व पाषाण काल (नंगपरिया) में  मागे परब  एवं  मागेबुरु 

पाषाण काल में  बाः नेग  यानि सरहुल परब एवं जन्म-मरण संस्कारों की शुरुआत।

तम्रयुग, कांस्ययुग, लौहयुग में  पागु बोंगा  एवं  सेन्देरा यानि होली की शुरुआत हुई।

सिन्धुघाटी, राखीगढ़ी और काशी बनारस में आर्यों से लड़ाई के बाद  सोहराई की शुरुआत हुई।

आर्यों से लड़ाई का मुख्य कारण तो मावेशियों की चोरी एवं गंगा किनारे की उपजाऊ भूमि की लूट एवं अच्छे चारागाह क्षेत्रों पर कब्जा ही थीं।

वास्तव में जिसको देवता और असुरों की लड़ाई बताई जाती हैं। वह आर्य और कोल आदिवासी यानि  होड़ो समुदाय  भारत की धरती पर महायुद्ध थीं।

दासाञ और सोहराई त्योहार में घटनाक्रमों की विशिष्ट कड़ी है।

आर्यों से लड़ाई तो सिन्धुघाटी, राखीगढ़ी, काशी-बनारस में और कश्मीर में शुरु हुई थीं। यह लड़ाई आर्यों की पीछा करने और बनी बनाई हुई खेत खलिहानों की लूट के कारण निरान्तर चलते रही।

अन्त में आदिम मुण्डाओं के एक  महाबली चरवाहा  महिषासुर की षड़यंत्रकारी हत्या आर्यों द्वारा पारसनाथ पहाड़ी और पुरुलिया क्षेत्र में हुई। फिर लड़ते-लड़ते आदिम मुण्डाओं ने पारसनाथ पहाड़ी क्षेत्रों से मावेशियों के साथ पलायन शुरु किए। रात के अन्धेरे में मावेशियों की चोरी होती थीं। इसलिए मशाल जलाकर पहरा करते थे। जो कालांतर में विधान का नाम जगोवर हुआ। जिसमें लाठी, फरसा और ढोलक नगाड़े लेकर गाँव के घर-घर जाकर सभी मावेशियों के सिंग पर सोहराई गाना गाते हूए गूँजा और करंज का तेल माखे जाते हैं।

 जागोवर गीत

1.एको कोसो चो लोली

दुईयो कोसो चो लोली रे

ओह..रे...हो....

लचिमी कर घोरो कोतो दूरो रे।

2.गोटा सुरुगुंजा

गोटा तिलीमिंग

ओह..रे..हो....

आईजो तो माह खोली

कोरोंजो का तेलो रे।

(मुण्डाओं के गैर मुण्डा माहरा चरवाहों ने यह गीत गया था)

मतलब यही कि अमावस्या की रात में अधिक चोरी होती थीं।

शुक्लपक्ष नवामी को महिषासुर की हत्या से भयभीत थे। इसलिए पारनाथ का मैदानी भाग से धीरे-धीरे पलायन करके पहाड़ी क्षेत्र  लुकुबुरु और ओमेडंडा के लिए कूच किए थे।

मावेशियों के साथ  पलायन  की विधान से गाँव में  उरी कुदाव  की रिवाज शुरु हुई। जिसमें सोहराई बोंगा के बाद, रोटी और हाड़ियाँ का सेवन, पशुओं को हरी घास खिलाने, साज श्रृंगार के बाद काड़ा और गाय-बैलों को ढोलक, नगाड़े, टुईला और सारंगी जैसे वद्ययंत्रों को बजाकर, नचाते हैं।

 श्रृंगार सोहराई गीत

बारो मासो रे कड़ोवा

मारोली पिटोली रे...

ओहरे...हो....

आईजो तो सोलो रे सिंगारो रे।

कोनो सिंगे लेबे बोरोदा

तेले सिन्दुरा हो

कोनो लेबे बोरोदा

धानो का फूलो रे..!

पशुओं को हाटिया में नचाने के बाद शाम को थोड़ा लोकनृत्य करते हैं। दूसरे दिन सोहराई करम गाड़ते हैं और दो दिनों तक मुण्डा लोक नृत्य चलता है।

 सोहराई पर्व मनाने का उदेश्य 

धरती को मानवों द्वारा कोड़ना सरल नहीं है। लेकिन बैल और काड़ा की मदद से जोत सकते हैं। दौंरी कर सकते हैं। लिपाई और खाद के लिए गोबर की प्राप्ति होती थी। दूध और माँस भी पालतु मावेशियों से मिलते थे।

इसलिए साल में एक बार पशुओं के लिए परब मनाकर, गाना गाते हूए धुलाई करना, मावेशियों की खुशहाली के लिए पूजा करना। अच्छी हरी घास और गोटा उरद की खिचड़ी खिलाना, साज श्रृंगार करना फिर गाँव का हाटिया में नचाना एक प्रकार से मावेशियों को खुशियाली में मानवों का एक अभिन्न सहयोगी समझ कर पूर्ण भक्ति भाव से  माफीनामा  है।

 

सोहराई गानों में मावेशियों के प्रति आभार प्रकट किए जाते हैं। माफी माँगे जाते हैं। क्योंकि कृषि कार्य के दौरान मारना-पीटना पड़ता है। जो कि एक प्रकार से महापाप है। किसी भी जीव को प्रताड़ित करना एक गुनाह है।

 

मुण्डा समाज में गौहत्या के लिए एक विशिष्ट दंड प्रणाली है। यदि भूल से भी किसी के हाथों गौहत्या हो जाए तो, उसको गले में रस्सी की माला लगाकर, सात गाँवों में भिक्षाटन कराए जाते थे। फिर उसका मुंडन करके, शुद्धिकरण पूजा किए जाते थे।

सामान्यतः सोहराई के दिन शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण किए जाते हैं। यहाँ तक की पूजा में चढ़ाए जाने वाली रोटी को बिना नमक, बिना चीनी और बिना पलटे पकाए जाते हैं।

हाँ बासी रोज माँसाहारी भोजन की प्रथा है।

 गोशाला में गोरेया पूजा का उदेश्य 

गोरेया राजा वास्तव में महिषासुर का एक प्रतिमूर्ति है। मुण्डाओं के लिए मावेशियों का चरवाहा और वफादार रखवाला था।

सोहराई पूजा में सिङबोंगा, ओतेएंगा एवं मुण्डा पुरखों के साथ-साथ महिषासुर की भी पूजा की जाती हैं। लेकिन मुण्डा लोग गोरेया राजा या गोरेया देवता नाम से ही अधिकतर सम्बोधित करते हैं।

 किन स्थानों में दीया अनिवार्य है 

1.  आदिङ यानि पूजा घर

2.  दुबी यानि गोबर गाढ़ा

3.  चौखट पर, घर के प्रवेशद्वार पर

4.  गोंणा या गोशालाओं में

5.  खलिहान का चिन्हित स्थल में

6.  डाड़ी या कुँवा के पास

7.  सरना स्थलों में

 जागरण एवं पशुओं को नचाना 

मावेशियों को आर्य ब्राह्मणों की चोरी एवं लूट से बचाने के लिए अमावस्या की रात में मसाल जलाकर पहरेदारी किए थे। फिर दुसरे दिन से मावेशियों को लेकर पलायन किए थे। उसी की एक पहले दुखद एवं अन्त में सुखद स्मृति है।

दीया जलाने का उदेश्य तो सिर्फ दुश्मनों और मावेशियों चोरों की रोकथाम और पहरेदारी में सरल एवं सुगमता ही थीं।

नोट:- मुण्डाओं का दीपावली या फिर काली पूजा, लक्ष्मी पूजा से कोई सरोकार नहीं है।

मुण्डाओं के लिए पशु पक्षी और अनाज ही लाचमी है।

 - महादेव मुण्डा, खूँटी, झारखंड के फेसबुक वाल से साभार। 

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