बदलती_दुनिया - भाग 1

 

                                                                                                                                  नेह अर्जुन इंदवार 


💐राजनैतिक और आर्थिक शक्ति तथा सांस्कृतिक और दार्शनिक  अधिपत्य (Cultural, Religious Hegemony) में अनेक अन्योश्रित संबंध होते हैं। ये चारों एक दूसरे के रिश्तेदार होते हैं या कहें ये एक ही खानदान से संबंध रखते हैं। इन्हें अच्छी तरह जाने बिना राजनैतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक और इनसे जुड़े दार्शनिक बातों को समझना मुश्किल है। 

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आर्थिक महाशक्ति अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैण्ड, जापान, चीन आदि की तूती विश्व राजनीति में भी आर्थिक शक्ति के कारण ही चलती है। भुटान, म्यान्मार, यमन, युगाण्डा जैसे देश न आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं और न विश्व राजनीति में इनकी कोई आवाज़ कहीं सुनी जाती है। इन देशों को किसी अन्य देशों के पिछलग्गू के रूप में चलना पड़ता है। जिस समाज के पास आर्थिक शक्ति नहीं होती है, उसके पास राजनैतिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक शक्ति भी नहीं होती है। वैचारिक शक्ति से ऐसा समाज न सिर्फ कमजोर रहता है, बल्कि वे दूसरों के दार्शनिकता पर जिंदगी को निर्भरशील बना कर रहते हैं। 

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अमेरिकी, यूरोपीय या पाश्चत्य संस्कृति की अधिपत्य पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा चुकी है। इन्हीं आर्थिक सम्पन्न देशों में नये दार्शनिक सिद्धांत करवटें ले रही है। मुख्य बात यह है कि दुनिया की सोच और दर्शन जो कुछ हद तक धर्म से जुड़ी हुई होती है,  में दूरगामी और वास्तविक बदलाव ऐसे ही केन्द्रों से आता रही है। 

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पश्चिमी एशिया से निकली ईसाई मत यूरोपीय साम्राज्यों के आर्थिक घोड़े पर सवार होकर दुनिया की आधी आबादी तक पहुँची। लेकिन आर्थिक शक्तियों के देश में पहुँच कर वह कई टुकड़ों में बँट चुकी है।  सोहलवीं-उन्नीसवी सदी की यूरोप में यह महज आधा दर्जन रूप में विभाजित हुआ था, लेकिन विश्व शक्ति के देश अमेरिका में पहुँच कर यह निरंतर विभाजित होते हुए 38 हजार से भी अधिक अलग-अलग डिनोमिनेशन में बँट चुका है। ये सारे डिनोमिनेशन एक दूसरे से पूरी तरह अलग हैं और एक दूसरे से कंपिटिटर के रूप में पहचान कायम कर चुके हैं। इनकी अपनी अलग धार्मिक किताबें हैं और इनके नेगाचार भी एक दूसरे से अलग हैं। 

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भारत में जन्में बौद्ध धर्म पूर्वी देशों से होते हुए आज अमेरिकी, यूरोपीय, अस्ट्रेलिया आदि में अपने पैर जमाने में लगा हुआ है, और हर एशियाई देशों के पृष्टभूमि में अपनी जड़े तलाश करता हुआ एक दूसरे से पूरी तरह अलग शख्शियत कायम कर चुका हैं। सिर्फ चीन और जापान में ही बौद्ध धर्म के सौ से अधिक अलग-अलग संप्रदाय हैं और निरंतर इसमें इजाफा होते जा रहा है। ये एक दूसरे से कमोबेश अलग सिद्धांतों और पद्धतियों पर विश्वास करते हैं और इनकी पहचान ही अलग और एक दूसरे से जुदा हैं। बस नाम एक है।  

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आमतौर से मुस्लिम धर्म को शिया और सुन्नी के रूप में हम जानते हैं। लेकिन हर देश में इसके चेहरे अलग-अलग हैं। भारतीय मुस्लिम चेहरे को अरब में मुस्लिम मानने से इंकार किया जाता है। अरब, इंडिनेशिया, मलेशिया, भारत सीरिया, तुर्की, तुर्केमिनिस्तान आदि में इस्लाम के विभिन्न-भिन्न रूप देखने को मिलते हैं। इनकी इन रूपों में सिर्फ नाम की एकरूपता है। साउदी पेट्रो डॉलर कभी शियाओं को नहीं मिलते हैं तो ईरानी पेट्रो डॉलर भूल कर भी सुन्नी सम्प्रदाय को नहीं मिल सकते हैं। भारत के दरगाह-मजार के दर्शन साउदी अरब उपमहाद्वीप में  कहीं नहीं दिखते हैं।  आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक गठबंधन पूरी दुनिया में इसी तरह विभाजित रूप से कार्य करते हैं। जितनी आप इनके भीतर में जाएँगे, हर बार नये परत आपको दिखाई देंगे।

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भारत में हर राज्य और क्षेत्र में अलग-अलग आदिवासी पूजा-पाठ की परंपरा है। आदिवासी विश्वास हिंदू धर्म से 80 फीसदी तक अलग है। सबसे प्राचीन पूजा परंपरा आदिवासियों की ही है। लेकिन दो आदिवासी समुदायों के धर्म-विधि कहीं एक सा सदृष्य नहीं हैं। हर आदिवासी घर में अपने समुदाय और गोत्र के अनुसार अलग-अलग विधि से पूजा-पाठ प्रार्थना करने की चलन है।  वहीं हिंदू धर्म में कितने मत और मतांतर है इसके बारे भी सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। हर आश्रम और मंदिर में अलग-अलग देवता और परंपरा होते हैं। 33 कोटी देवताओं का हिसाब-किताब आमतौर से शायद ही कोई रखता है। हरजोत ओबेराय के अनुसार, उदासी, निर्मल, नानकपन्थी, खालसा, सहजधारी, नामधारी कूका, निरंकारी, और सरवरिया आदि प्रमुख सिख सम्प्रदाय है।   जैन धर्म में दिगम्बर और श्वेतांबर सम्प्रदाय सहज रूप से दृष्यात हैं जो एक दूसरे से पूरी तरह असंबद्ध है। इन धर्मों के अलग-अलग सम्प्रदायों में रोटी बेटी के संबंध तक नहीं होते हैं। भारत में रोटी-बेटी के संबंध नहीं होने का एक कारण शादी में दहेज प्रथा है, जिसमें धन-सम्पदा को सम्प्रदाय, जाति और समुदाय से बाहर जाने से रोकने की भरसक नीतियाँ बनाई जाती हैं। 

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एक ही यूनिवर्सल केन्द्रिय ईश्वरीय प्रभुसत्ता के बारे विभाजित मतों से कहें या अलग-अलग देवीय ईश्वरीय प्रभुसत्ता की बात करें, पृथ्वी पर कितने मत और मतांतर है, इस पर कोई अध्ययन शायद ही पूरी हो सकेगी। हर आदमी का दिमाग सोच और विचार सैकड़ों अंतर से विभिन्न प्रक्रिया से संचालित होता है। हर व्यक्ति की संवेदनशीलता, सहृदयता, ध्यान करने की सामर्थ्य, मानसिक समझ कॉमन सेंस  की मात्रा आदि अलग-अलग होती है। सैकड़ों व्यतिरेक जन्मजात, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, अमीर-गरीब की पृष्टभूमीय हो सकती है।  ईश्वरीय, देवीय, या आध्यात्मिकता पर हर व्यक्ति के विचारों में कितनी विविधता और विभिन्नता होगी, यह बताना शायद सुपर कम्प्यूटर के बस की ही बात होगी। आदमी की तो नहीं। किस धर्म को आप सच्चे कहेंगे और किसे सच्चाई से दूर ? धर्म की आवधारणा और सिद्धांत भी हर जगह अलग-अलग होती है। सबसे बड़ी तथ्य यह है कि कौन से धर्म के अनुयायी अपने धर्म के सभी आज्ञाओं का को सिर माथे पर लेते हैं और अपने धर्म की बातों को अक्षरशः पालन करते हैं ? 

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मनुष्य जन्म लेता है तो वह जन्म के साथ अपनी जिंदगी को अलग अनुठे ढंग से जीने के लिए अपना अलग पारिवारिक और सामाजिक लाईफ-टूल (Life tools/equipments) लेकर नहीं आता है न ही उसका वह ईजाद कर सकता है। लाईफ टूल का अर्थ दूसरों से अलग अपनी व्यक्तिगत भाषा, संस्कृति, दर्शन, सिद्धांत सरकार, अर्थ व्यवस्था, राजनीति वगैरह है। अपने लिए अपने पसंद की अनुठी भाषा, संस्कृति, समाज, सरकार का ईजाद करना किसी आदमी के बस की बात नहीं। उसे अपने आसपास उपलब्ध लाईफ टूल्स से ही काम चलाना  पड़ता है। यदि वह उसे नहीं वरण नहीं करता  है और अलग-थलग रहता है या जंगल आदि का शरण लेता  है तो उसकी मानसिक विकास सीधे रूप से प्रभावित होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज एक अविच्छेद्य आवश्यकता है।  

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हर व्यक्ति दुनिया में पहले से ही मौजूद चीजों का उपभोग और Copy  करके दुनिया को समझने का प्रयास करता है। अपनी क्षमता, खास आदत, वातावरण के अनुसार चीजों को अपने दिमाग में बैठाता है और जीवन जीने के उपलब्ध टूल को आवश्यतानुसार उपभोग करने की कोशिश करता है। भाषा सीखना, शिक्षा प्राप्त करना सभी चीजें प्राथमिक स्तर पर सिर्फ Copy करना और दिमाग में इकट्ठा करना ही होता है। मनुष्य प्रथम स्तर पर Copy Cat होता है। 

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सूचना, जानकारी, ज्ञान, शिक्षा, विशेष आदत आदि तमाम बातों का कोई न कोई स्रोत और आधार होता है। अनेक चीजें व्यक्ति के एकांगी अनुभव से भी जुड़ जाती है। यह अनुभवगत प्राप्त टूल होता है। लेकिन इनका प्रतिशत नगण्य होता है। अधिकतर आमलोग समाज में प्रचलित जिंदगी को ही अपने तरीके से जीते हैं और इसमें उन्हें कोई बुराई नज़र नहीं आती है। 

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लेकिन प्राकृतिक उत्पाद के रूप में हर व्यक्ति अनुठा (Unique) होता है। वह अपने सहोदरों का शत-प्रतिशत कॉपी नहीं होता है। जुड़वाँ बच्चों में भी अंतर होता ही है। उनके पास जीवन यात्रा में प्राप्त सूचनाओं (डेटा) को विश्लेषण करने की क्षमता से परिपूर्ण एक अनुठा दिमाग भी होता है। हर व्यक्ति चीजों को अलग एंगल से देखता है। हर चीज हर व्यक्ति को अलग ढंग से प्रभावित करता है और हर दिमाग उसे अपनी बौद्धिक और अनुभव या प्रशिक्षित दिमागी क्षमता के अनुसार चीजों को अपने दिमाग में प्रोसेस करता है। इसी प्रक्रिया में सर्जनात्मक बौद्धिकता अपनी विद्वता, क्षमता और कर्मठता से वह कुछ नयी चीजों का अविष्कार करता है या पुरानी चीजों का परिष्कार करता है। 

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सभ्यता का विकास का क्रम यूँ ही चलता रहता है। पिछले 20 हजार वर्षों में जाने कितने करोड़ लोगों ने अपनी दिमागी क्षमता से सभ्यता में कितने परिवर्तन लाए हैं, इसकी कोई गिनती कभी नहीं की जा सकेगी। इसी क्षमता और प्रक्रिया को स्थायी बनाने के लिए कॉपीराईट जैसे कानूनों को बनाया गया। ऐसे ही लोगों को जिनियस या युग प्रवर्तक कहा गया है। 

 

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लेकिन इन सबसे हट कर आप एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें कि दुनिया के किसी शक्ति द्वारा यदि मनुष्य को अपनी या सामाजिक आवश्यकताओं का अविष्कार और परिष्कार करने की इजाजत ही न मिले और अविष्कार और परिष्कार करने पर उसे किसी शक्ति या  वर्चस्ववादी सत्ता  द्वारा अविष्कारक और परिष्कारक के लिए भयानक सजा दी जाए तो क्या होगा ? 

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यदि ऐसी स्थिति वकई में पूरी दुनिया में लागू हो जाए तो नवीन सोच-विचार, विश्लेषण, अविष्कार-परिष्कार बंद हो जाएगा और दुनिया ठहर जाएगी। फिर एक ऐसी स्थिति पैदा होगी, जहाँ दिमागी सोच शक्ति की प्रक्रिया बंद हो जाएगी। पूरी दुनिया के विकास का रथ रूक जाएगा। यदि यह कई पीढ़ियों तक लागू रह जाए तो मनुष्य पशुओं की उन गतियों को प्राप्त करने लगेंगे, जहाँ कोई रचनात्मक, सृजनात्मक कार्य नहीं होते हैं। बस दिन निकलने पर घास चरते हैं। पेट भरने पर बैठ कर मुँह चला कर पगुराना शुरू करते हैं। फिर अगले दिन की शुरूआत होने तक नींद लेने की कोशिश करते हैं। ऐसी स्थिति में दुनिया वापस कहाँ पहुँच जाएगी, इसकी कल्पना करना बहुत मुश्किल नहीं है।  

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कई झक्की राजाओं, बादशाहों के अधीन ऐसी कोशिशें भूतकाल में अनेक बार हुई थीं। लेकिन मनुष्य आंतरिक रूप से स्वतंत्रता सोच का होता है। इसलिए ऐसी कोशिशें हर बार असफल सिद्ध हुई है। दुनिया में अविष्कार-परिष्कार करने की सीमा बांधने की कोई कोशिश कभी सफल नहीं हुई। मनुष्य का दिमाग उत्सुक और जिज्ञासु होता है, यह इसकी अनुठा चारित्रिक विशेषतयः है। 

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राजाओं, राजपूरोहितों, धार्मिक ठेकेदारों के द्वारा धर्म के क्षेत्र में कई सिद्धांतों पर अविष्कार-परिष्कार की सीमा बांधने की बहुतेरे कोशिश लगातार की गई और यह कोशिश आज भी जारी है। धार्मिक किताबें लिख कर दर्शन और सामाजिक नीतियाँ (एथिक्स) को मार्यादित और सीमांकित करने की कोशिशें हुई। इन किताबों को ज्ञान की अंतिम पराकाष्ठा कहा गया और नये ज्ञान और सृजनात्मक विचारों को हतोत्साहित करने की कोशिशें की गईं। अधिकतर धर्म कुछ बातों में भयानक रूप से अपरिवर्तनशील है। उन्होंने कुछ परंपराओं, सोच, दर्शन को हमेशा के लिए बाँध कर रखने की कसम खा लिया था। उनके भगवान, ईश्वर आदि की परिकल्पना, अवधारणा में किसी नये मोड़, नये अविष्कार और परिष्कार की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी गई। जिस धर्म ने जिसे एक बार ईश्वर मान लिया, उसका रूप परिचय और वजूद स्थिर कर दिया। उस पर किसी बहस, टीका-टिप्पणी की कोई गुंजाईश नहीं होती है। अनेक देशों में ईशनिंदा तक के कानून बना कर इसे स्थिर और जड़ बनाने की कोशिशें की गईं। उपरी तौर से यह अटल प्रतीत होता है। लेकिन लेकिन क्या ऐसा संभव है?  दुनिया के आर्थिक और राजनैतिक शक्ति केन्द्रों में नये विचारों और दर्शनों के सृजन के लिए हमेशा गुंजाईश बनी रही और मनुष्य का दिमाग अन्जाने क्षेत्र में अपना दिमाग लगाता रहा। जहाँ मनुष्य के शरीर और दिमाग को गुलाम बनाने की अतिरेक की गई, वहाँ मनुष्य विद्रोही हो गया। विद्रोही दिमाग हर बंधन को तोड़ने के लिए कसमें खा लेता है।   लेख का अंतिम भाग दूसरे भाग में पढ़ें। नेह। 💐 


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