डा. अंकित जयसवाल
पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त पुराने वस्तुओं में मूर्तियाँ और चिन्हों को लेकर अक्सर धार्मिक विवाद देखने को मिलता है। आज हम इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्राचीन हिन्दू(ब्राह्मण धर्म), बौद्ध एवं जैन धर्म को पुरातत्व और कला की दृष्टि से उनकी प्राचीनता और इन तीनों धर्मों को स्थापत्य एवं मूर्ति कला के अंतर्गत इनकी आपसी समानता को देखेंगे।
भारत में हड़प्पा सभ्यता से ही पत्थरों पर बड़ी संरचना और उन पर उत्कृष्ट कला देखने को मिलती है। ऐसा साक्ष्य पहली बार धौलावीरा से मिला है(हड़प्पा सभ्यता के भी पहले के सैंकड़ों स्टोनएज़ वाले गुफा चित्र पर अलग से लेख है, जिसमें भीमबेटका और मिर्जापुर के चित्र बहुत महत्वपूर्ण हैं)।
हड़प्पा सभ्यता से अनेक पशु, पक्षी, और मानव आकृतियां भी मिली हैं, सम्भवतः जिनका हड़प्पाई लोगों के धार्मिक-उपासना से संबंध था। उसके लगभग 2000 वर्षों के बाद मौर्यकाल से दुबारा पत्थर पर कला का विकसित रूप देखने को मिलता है,इन 2000 सालों में कलाकारों ने अपने कला को नित नए आयाम देने का कार्य किया होगा लेकिन उनकी कला पत्थर के जगह काठ(लकड़ी) पर शुरू हो गईं(कुछ पत्थरों पर भी मिल जाती हैं) इसलिये समय के साथ ये नष्ट हो गईं जिससे पुरातात्विक खुदाई में ये नहीं मिलीं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण पाटलिपुत्र के बुलंदीबाग और रामपुर नाम के जगहों पर देखने को मिलते हैं।
बुलंदीबाग से लकड़ी के बने रथ का पहिया मिला है जिसका रिम लोहे का है। 1912 में D V स्पूनर ने कुम्रहार(पटना) की खुदाई से शतरंज के बोर्ड के आधार पर व्यवस्थित 72 स्तम्भों को खोजा जो चुनार के पत्थरों से बनाये गए थे और उनकी सतह पर भी अशोक के स्तम्भलेखों जैसा चमक और पालिश थी। स्तम्भों की इस संरचना को प्राचीन साहित्य में वर्णित चन्द्रगुप्त_मौर्य का राजमहल माना जाता है, जिसके छत को लकड़ी के ऊपर ईंट और चुने का प्लास्टर से बनाया गया,फर्श और सीढ़ियां लकड़ी के बने थे।
इसके बाद अशोक के पत्थर के बने स्तम्भों का समय आता है जिस पर बनी मूर्तियाँ उसके धम्म सन्देश का प्रचार करतीं हैं। अशोक के स्तम्भों पर कमल या घण्टा, हँस,बैल,हाथी,घोड़ा,सिंह,चक्र आदि मूर्तियाँ बनाई गईं हैं जिनका सीधा संबंध बौद्ध मान्यताओं से है लेकिन इन प्रतीकों का इनसे कहीं व्यापक और गहरा सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र है क्योंकि अशोक कई मामलों में बुद्ध से भी एक कदम आगे निकल जाता है, जैसे बुद्ध का कथन है; "राजनीतिक हिंसा हिंसा नहीं होती", लेकिन अशोक के अनुसार "राजनीतिक हिंसा भी धर्म विरुद्ध है"।
एक बात और कि पाली किसी भी शिलालेख की भाषा नहीं है, न तो अशोक की और न ही किसी और के शिलालेख में ही। प्राकृत के बाद संस्कृत और दक्षिण में तमिल के साथ कन्नड़ और तेलगू आदि भाषाएँ शिलालेखों में मिलती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात है कि बौद्ध होते हुए भी अशोक के धम्म में बौद्ध धर्म के चार_आर्य_सत्य और अष्टांगिक_मार्ग की बात नहीं कि गयी है जबकि निर्वाण के बदले स्वर्ग की बात की गई है। इसीलिए कुछ विद्वानों ने अशोक के धम्म को सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति और उसका एक नया अविष्कार माना है। कुछ इसी प्रकार हम अकबर को भी देख सकते हैं; सुलह-कुल नीति के अंतर्गत।
मतलब साफ है कि तत्कालीन दोनों शासकों ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और राज्य में सामान्य स्थिति बनाये रखने के लिए धर्म की जगह एक सही आचरण वाले नीति का प्रचार किया जिसमें उनका व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता तो था ही, साथ ही उनके बहुसंख्यक प्रजा का धार्मिक उदार बातें शामिल थीं। बाकी इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध था। ध्यान देने लायक बात है कि अशोक के स्तम्भ प्रतीकों की आकृतियां हिन्दू और जैन धर्म की परम्पराओं में भी हैं। मौर्यकाल से ही चट्टानों को काटकर स्थापत्य-गुफा निर्माण का युग प्रारम्भ होता है जो कि उसके पहले काष्ठ-स्थापत्यकला(लकड़ियों से बनी आवासीय संरचनाएँ) के रूप में विद्यमान थीं।
स्तूप बुद्धकाल के पहले से प्रचलित थे क्योंकि पाली ग्रंथ महापरिनिर्वाणसूत्र में यह उल्लेख मिलता है कि बुद्ध के पहले भी चक्रवर्ती सम्राटों के अवशेषों पर स्तूप बनाये जाते थे इसलिये प्रारम्भिक दौर में स्तूपों को बौद्ध परम्परा का अनिवार्य तत्व नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में भी स्तूप शब्द मिट्टी के ढेर(थुहा बनाकर पूजने से)से सम्बंधित है, और अगर बात जैन धर्म के स्तुप की करें तो पहली सदी से ही मथुरा के कंकाली टीला से जैन स्तूप मिलते हैं लेकिन प्रमुख रूप से स्तूप बौद्ध कला के अभिन्न हिस्सा रहे हैं।
बौद्ध धर्म ने स्तूपों को अपनाकर उसे उपासना का केंद्र बनाया और अशोक ने स्तूप निर्माण की प्रथा को लोकप्रिय बनाया। मौर्यकाल में पहली बार एक समृद्धशाली लोककथाओं का भी अस्तित्व पुरातात्विक खुदाई में सामने आता है जब पटना ,मथुरा और अन्य स्थानों से पत्थरों की तरासी गई अनेक विशालकाय मानवीय आकृतियों पाई गईं, जिनको यक्ष और यक्षी के नाम से जाना जाता है(इसके पहले के भी मिट्टी की बहुत सी मूर्तियाँ मिली हैं लेकिन उनमें वैसी सुंदरता नहीं है)।
ये यक्ष-यक्षियाँ, नाग-नागी हमारे लोकधर्म का प्रतिनिधित्व करतें हैं जिनकी उपासना हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में आज भी प्रचलित हैं। परखम से मिले यक्ष प्रतिमा( पहली/दूसरी सदी ई0पू0) , लोहानीपुर से मिला नग्न यक्ष प्रतिमा और दीदारगंज से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा इनमें प्रमुख हैं। परखम(मथुरा) से मिले यक्ष प्रतिमा पर लेख मिलता है जिसके आधार पर इसे मणिभद्र यक्ष नाम दिया गया। विभिन्न अभिलेखों और ग्रन्थों में इनका उल्लेख व्यापारियों और यात्रियों के रक्षक देवता के रूप में हुआ है। परखम गाँव में आज भी जखईया_मेला(यक्ष मेला) माघ महीने में लगता है जहाँ मंदिर में इस मूल यक्ष प्रतिमा की जगह एक नए वैकल्पिक कामचलाऊ प्रतिमा को रखा गया है।
पुरातात्विक साक्ष्यों में मौर्यकाल से शुरू हुयी बुद्ध की पूजा उनके प्रतीक चिन्हों से होती आ रही है लेकिन
भारतीय उपमहाद्वीप के पूजा-आराधना के प्राचीनतम देवस्थान या मंदिर, खाली जगह अथवा वृक्ष को घेरकर बनाये गए स्थान थे, जो आज भी लोकसंस्कृति का हिस्सा हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीनतम देवस्थान यक्ष-यक्षी और नाग-नागी की स्थापना वाले मंदिर ही हैं इसमें अब कोई विवाद नहीं।
आनंद कुमारस्वामी ने काफी प्रभावशाली ढंग से यह सिद्ध किया है कि भक्ति की धारा जिससे आज तमाम भारतीय धर्म जाने जाते हैं इसका स्वभाविक स्रोत यही यक्ष-यक्षी, नाग-नागी और मातृदेवीयों की भक्तिपूर्ण उपासना रही है जो कि भारतीय जनमानस में पाषाणकाल से ही चली आ रही है(इसके भरपूर पुरातात्विक सबूत मौजूद हैं)। इन्होंने यह भी तर्क दिया कि यक्ष-यक्षियों की उपासना में प्रारंभ से ही मंदिर पूजा और उपासना पद्धति का विकास सामान्य जनता में हो चुका था।
यक्षों की पूजा, प्रजनन क्षमता में वृद्धि, वृक्ष, वन,जल,और एकांत से जुड़ी हैं(आज भी हर गाँव का अपना एक ग्रामदेवता होता है जो इसी से संबंधित है, और हिन्दू धर्म में ही ये शामिल कर ली गईं हैं क्योंकि हिन्दू-ब्राह्मण धर्म मे आत्मसात करने की प्रकिया बेहद सरल है)। हिन्दू ,बौद्ध और जैन ग्रन्थों में अधिकाँश यक्ष और यक्षी दानवी और डराने वाले चरित्रों के रूप में दिखलाए गए हैं जो कि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि इनका अस्तित्व इन तीनों प्रभावशाली धर्मों के बहुत पहले जनमानस में बहुत लोकप्रिय था।
ये यक्षी की प्रतिमाएं ही हैं जिन्हें शालभंजिका के नाम से जाना जाता है, जो सबसे अधिक प्राचीन भरहुत और साँची बौद्ध कला से होते हुए जैन और हिन्दू मूर्ति-स्थापत्य कला में अपना स्थान बनाती हैं। बुद्ध की माया देवी का अंकन भी एक यक्षी या शालभंजिका जैसा ही दिखता है(बुद्ध की माँ माया देवी किस प्राचीन मातृदेवी की विशेषताओं को अपनाकर बनाई गईं इसपे अलग से लम्बा लेख आप मेरा प्रोफाईल खोलके पढ़ सकते हैं)।
बाद में प्रभुत्वशाली धार्मिक परम्पराओं में इनको शामिल कर इनके अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया गया। इन्हीं यक्ष-यक्षीयों के मूर्तियों से प्रेरणा लेकर लगभग पहली सदी ई0पू0 से मथुरा_एवं_गांधार_कला के अंतर्गत पहली बार बुद्ध मूर्तियों और ब्राह्मण एवं जैन मूर्तियों का बनना बड़े स्तर पर शुरू हुआ(इसके पहले इनका कोई आर्कियोलॉजिकल सबूत नहीं मिलते)। इन यक्षियों की मूर्तियों के देखा-देखी ही हिन्दू धर्म में लक्ष्मी, बौद्ध धर्म मे तारा और जैन धर्म मे चक्रेश्वरी देवी की अवधारणा को विकसित किया गया, ऐसी कई देवियों के पीछे यूनानी और पारसी देवियों का भी प्रभाव देखा जा सकता है जैसे पहली सदी के कुछ पहले पारसी नाना देवी का देवी दुर्गा के रूप में सम्मिलन। यूरोपीय विद्वानों के गांधार कला के विपरीत भारतीय प्राचीन कला मर्मज्ञ वासुदेव शरण अग्रवाल ने बहुत ही तार्किक ढंग से यह सिद्ध किया है कि सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण मथुरा कला के अंतर्गत किया गया।
बाकी इन प्रभुत्वशाली धर्मों ने जो लोकपरम्परा की मूर्तियों का आत्मसातीकरण किया है उसे मैं "हड़पने" जैसा शब्द नहीं दूँगा जैसा कि आजकल धार्मिक विद्वेष के कारण खुद को प्राचीन साबित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
सच्चाई इसमें भी है कि लोकपरम्परा की भक्तिधारा और विदेशी कला से प्रभावित होकर ही प्रभुत्वशाली धर्मों में बुद्ध मूर्तियाँ सबसे पहले और अधिक मात्रा में बनीं क्योंकि तत्कालीन समय में बौद्ध धर्म का प्रसार और लोकप्रियता अपने चरम पर था।
बौद्ध धर्म में इसी मूर्तियों और जटिल-पूजा विधानों ने आगे चलकर बौद्ध धर्म को बुद्ध के विचारों से दूर किया, जो भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म के पतन के कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण है।
कभी लॉक डाउन के फुर्सत में लिखा था आप भी फुर्सत निकाल के पढ़ सकते हैं। साभार -फेसबुक।
