तीन धर्मों का स्थापत्य एवं मूर्ति कला

डा. अंकित जयसवाल

 पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त पुराने वस्तुओं में मूर्तियाँ और चिन्हों को लेकर अक्सर धार्मिक विवाद देखने को मिलता है। आज हम इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्राचीन हिन्दू(ब्राह्मण धर्म), बौद्ध एवं जैन धर्म को पुरातत्व और कला की दृष्टि से उनकी प्राचीनता और इन तीनों धर्मों को स्थापत्य एवं मूर्ति कला के अंतर्गत इनकी आपसी समानता को देखेंगे।


भारत में हड़प्पा सभ्यता से ही पत्थरों पर बड़ी संरचना और उन पर उत्कृष्ट कला देखने को मिलती है। ऐसा साक्ष्य पहली बार धौलावीरा से मिला है(हड़प्पा सभ्यता के भी पहले के सैंकड़ों स्टोनएज़ वाले गुफा चित्र पर अलग से लेख है, जिसमें भीमबेटका और मिर्जापुर के चित्र बहुत महत्वपूर्ण हैं)। 


हड़प्पा सभ्यता से अनेक पशु, पक्षी, और मानव आकृतियां भी मिली हैं, सम्भवतः जिनका हड़प्पाई लोगों के धार्मिक-उपासना से संबंध था। उसके लगभग 2000 वर्षों के बाद मौर्यकाल से दुबारा पत्थर पर कला का विकसित रूप देखने को मिलता है,इन 2000 सालों में कलाकारों ने अपने कला को नित नए आयाम देने का कार्य किया होगा लेकिन उनकी कला पत्थर के जगह काठ(लकड़ी) पर शुरू हो गईं(कुछ पत्थरों पर भी मिल जाती हैं) इसलिये समय के साथ ये नष्ट हो गईं जिससे पुरातात्विक खुदाई में ये नहीं मिलीं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण पाटलिपुत्र के बुलंदीबाग और रामपुर नाम के जगहों पर देखने को मिलते हैं। 


बुलंदीबाग से लकड़ी के बने रथ का पहिया मिला है जिसका रिम लोहे का है। 1912 में D V स्पूनर ने कुम्रहार(पटना) की खुदाई से शतरंज के बोर्ड के आधार पर व्यवस्थित 72 स्तम्भों को खोजा जो चुनार के पत्थरों से बनाये गए थे और उनकी सतह पर भी अशोक के स्तम्भलेखों जैसा चमक और पालिश थी। स्तम्भों की इस संरचना को प्राचीन साहित्य में वर्णित चन्द्रगुप्त_मौर्य का राजमहल माना जाता है, जिसके छत को लकड़ी के ऊपर ईंट और चुने का प्लास्टर से बनाया गया,फर्श और सीढ़ियां लकड़ी के बने थे। 


इसके बाद अशोक के पत्थर के बने स्तम्भों का समय आता है जिस पर बनी मूर्तियाँ उसके धम्म सन्देश का प्रचार करतीं हैं। अशोक के स्तम्भों पर कमल या घण्टा, हँस,बैल,हाथी,घोड़ा,सिंह,चक्र आदि मूर्तियाँ बनाई गईं हैं जिनका सीधा संबंध बौद्ध मान्यताओं से है लेकिन इन प्रतीकों का इनसे कहीं व्यापक और गहरा सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र है क्योंकि अशोक कई मामलों में बुद्ध से भी एक कदम आगे निकल जाता है, जैसे बुद्ध का कथन है; "राजनीतिक हिंसा हिंसा नहीं होती", लेकिन अशोक के अनुसार "राजनीतिक हिंसा भी धर्म विरुद्ध है"। 


एक बात और कि पाली किसी भी शिलालेख की भाषा नहीं है, न तो अशोक की और न ही किसी और के शिलालेख में ही। प्राकृत के बाद संस्कृत और दक्षिण में तमिल के साथ कन्नड़ और तेलगू आदि भाषाएँ शिलालेखों में मिलती हैं।


सबसे महत्वपूर्ण बात है कि बौद्ध होते हुए भी अशोक के धम्म में बौद्ध धर्म के चार_आर्य_सत्य और अष्टांगिक_मार्ग की बात नहीं कि गयी है जबकि निर्वाण के बदले स्वर्ग की बात की गई है। इसीलिए कुछ विद्वानों ने अशोक के धम्म को सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति और उसका एक नया अविष्कार माना है। कुछ इसी प्रकार हम अकबर को भी देख सकते हैं; सुलह-कुल नीति के अंतर्गत। 


मतलब साफ है कि तत्कालीन दोनों शासकों ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने और राज्य में सामान्य स्थिति बनाये रखने के लिए धर्म की जगह एक सही आचरण वाले नीति का प्रचार किया जिसमें उनका व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता तो था ही, साथ ही उनके बहुसंख्यक प्रजा का धार्मिक उदार बातें शामिल थीं। बाकी इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध था। ध्यान देने लायक बात है कि अशोक के स्तम्भ प्रतीकों की आकृतियां हिन्दू और जैन धर्म की परम्पराओं में भी हैं। मौर्यकाल से ही चट्टानों को काटकर स्थापत्य-गुफा निर्माण का युग प्रारम्भ होता है जो कि उसके पहले काष्ठ-स्थापत्यकला(लकड़ियों से बनी आवासीय संरचनाएँ) के रूप में विद्यमान थीं। 


स्तूप  बुद्धकाल के पहले से प्रचलित थे क्योंकि पाली ग्रंथ महापरिनिर्वाणसूत्र में यह उल्लेख मिलता है कि बुद्ध के पहले भी चक्रवर्ती सम्राटों के अवशेषों पर स्तूप बनाये जाते थे इसलिये प्रारम्भिक दौर में स्तूपों को बौद्ध परम्परा का अनिवार्य तत्व नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में भी स्तूप शब्द मिट्टी के ढेर(थुहा बनाकर पूजने से)से सम्बंधित है, और अगर बात जैन धर्म के स्तुप की करें तो पहली सदी से ही मथुरा के कंकाली टीला से जैन स्तूप मिलते हैं लेकिन प्रमुख रूप से स्तूप बौद्ध कला के अभिन्न हिस्सा रहे हैं।


 बौद्ध धर्म ने स्तूपों को अपनाकर उसे उपासना का केंद्र बनाया और अशोक ने स्तूप निर्माण की प्रथा को लोकप्रिय बनाया। मौर्यकाल में पहली बार एक समृद्धशाली लोककथाओं का भी अस्तित्व पुरातात्विक खुदाई में सामने आता है जब पटना ,मथुरा और अन्य स्थानों से पत्थरों की तरासी गई अनेक विशालकाय मानवीय आकृतियों पाई गईं, जिनको यक्ष और यक्षी के नाम से जाना जाता है(इसके पहले के भी मिट्टी की बहुत सी मूर्तियाँ मिली हैं लेकिन उनमें वैसी सुंदरता नहीं है)।


ये यक्ष-यक्षियाँ, नाग-नागी हमारे लोकधर्म का प्रतिनिधित्व करतें हैं जिनकी उपासना हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में आज भी प्रचलित हैं। परखम से मिले यक्ष प्रतिमा( पहली/दूसरी सदी ई0पू0) , लोहानीपुर से मिला नग्न यक्ष प्रतिमा और दीदारगंज से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा इनमें प्रमुख हैं। परखम(मथुरा) से मिले यक्ष प्रतिमा पर लेख मिलता है जिसके आधार पर इसे मणिभद्र यक्ष नाम दिया गया। विभिन्न अभिलेखों और ग्रन्थों में इनका उल्लेख व्यापारियों और यात्रियों के रक्षक देवता के रूप में हुआ है। परखम गाँव में आज भी जखईया_मेला(यक्ष मेला) माघ महीने में लगता है जहाँ मंदिर में इस मूल यक्ष प्रतिमा की जगह एक नए वैकल्पिक कामचलाऊ प्रतिमा को रखा गया है। 


पुरातात्विक साक्ष्यों में मौर्यकाल से शुरू हुयी बुद्ध की पूजा उनके प्रतीक चिन्हों से होती आ रही है लेकिन

भारतीय उपमहाद्वीप के पूजा-आराधना के प्राचीनतम देवस्थान या मंदिर, खाली जगह अथवा वृक्ष को घेरकर बनाये गए स्थान थे, जो आज भी लोकसंस्कृति का हिस्सा हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीनतम देवस्थान यक्ष-यक्षी और नाग-नागी की स्थापना वाले मंदिर ही हैं इसमें अब कोई विवाद नहीं।


 आनंद कुमारस्वामी ने काफी प्रभावशाली ढंग से यह सिद्ध किया है कि भक्ति की धारा जिससे आज तमाम भारतीय धर्म जाने जाते हैं इसका स्वभाविक स्रोत यही यक्ष-यक्षी, नाग-नागी और मातृदेवीयों की भक्तिपूर्ण उपासना रही है जो कि भारतीय जनमानस में पाषाणकाल से ही चली आ रही है(इसके भरपूर पुरातात्विक सबूत मौजूद हैं)। इन्होंने यह भी तर्क दिया कि यक्ष-यक्षियों की उपासना में प्रारंभ से ही मंदिर पूजा और उपासना पद्धति का विकास सामान्य जनता में हो चुका था।


 यक्षों की पूजा, प्रजनन क्षमता में वृद्धि, वृक्ष, वन,जल,और एकांत से जुड़ी हैं(आज भी हर गाँव का अपना एक ग्रामदेवता होता है जो इसी से संबंधित है, और हिन्दू धर्म में ही ये शामिल कर ली गईं हैं क्योंकि हिन्दू-ब्राह्मण धर्म मे आत्मसात करने की प्रकिया बेहद सरल है)। हिन्दू ,बौद्ध और जैन ग्रन्थों में अधिकाँश यक्ष और यक्षी दानवी और डराने वाले चरित्रों के रूप में दिखलाए गए हैं जो कि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि इनका अस्तित्व इन तीनों प्रभावशाली धर्मों के बहुत पहले जनमानस में बहुत लोकप्रिय था। 


ये यक्षी की प्रतिमाएं ही हैं जिन्हें शालभंजिका के नाम से जाना जाता है, जो सबसे अधिक प्राचीन भरहुत और साँची बौद्ध कला से होते हुए जैन और हिन्दू मूर्ति-स्थापत्य कला में अपना स्थान बनाती हैं। बुद्ध की माया देवी का अंकन भी एक यक्षी या शालभंजिका जैसा ही दिखता है(बुद्ध की माँ माया देवी किस प्राचीन मातृदेवी की विशेषताओं को अपनाकर बनाई गईं इसपे अलग से लम्बा लेख आप मेरा प्रोफाईल खोलके पढ़ सकते हैं)।


 बाद में प्रभुत्वशाली धार्मिक परम्पराओं में इनको शामिल कर इनके अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया गया। इन्हीं यक्ष-यक्षीयों के मूर्तियों से प्रेरणा लेकर लगभग पहली सदी ई0पू0 से मथुरा_एवं_गांधार_कला के अंतर्गत पहली बार बुद्ध मूर्तियों और ब्राह्मण एवं जैन मूर्तियों का बनना बड़े स्तर पर शुरू हुआ(इसके पहले इनका कोई आर्कियोलॉजिकल सबूत नहीं मिलते)। इन यक्षियों की मूर्तियों के देखा-देखी ही हिन्दू धर्म में लक्ष्मी, बौद्ध धर्म मे तारा और जैन धर्म मे चक्रेश्वरी देवी की अवधारणा को विकसित किया गया, ऐसी कई देवियों के पीछे यूनानी और पारसी देवियों का भी प्रभाव देखा जा सकता है जैसे पहली सदी के कुछ पहले पारसी नाना देवी का देवी दुर्गा के रूप में सम्मिलन। यूरोपीय विद्वानों के गांधार कला के विपरीत भारतीय प्राचीन कला मर्मज्ञ वासुदेव शरण अग्रवाल ने बहुत ही तार्किक ढंग से यह सिद्ध किया है कि सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण मथुरा कला के अंतर्गत किया गया।


बाकी इन प्रभुत्वशाली धर्मों ने जो लोकपरम्परा की मूर्तियों का आत्मसातीकरण किया है उसे मैं "हड़पने" जैसा शब्द नहीं दूँगा जैसा कि आजकल धार्मिक विद्वेष के कारण खुद को प्राचीन साबित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।


सच्चाई इसमें भी है कि लोकपरम्परा की भक्तिधारा और विदेशी कला से प्रभावित होकर ही प्रभुत्वशाली धर्मों में बुद्ध मूर्तियाँ सबसे पहले और अधिक मात्रा में बनीं क्योंकि तत्कालीन समय में बौद्ध धर्म का प्रसार और लोकप्रियता अपने चरम पर था। 

बौद्ध धर्म में इसी मूर्तियों और जटिल-पूजा विधानों ने आगे चलकर बौद्ध धर्म को बुद्ध के विचारों से दूर किया, जो भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म के पतन के कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण है।


कभी लॉक डाउन के फुर्सत में लिखा था आप भी फुर्सत निकाल के पढ़ सकते हैं। साभार -फेसबुक। 

बदलता समाज और कमजोर होते रिश्ते

नेह इंदवार


 वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के भूगर्भ में निरंतर हलचल चलते रहती है। हर रोज कई दर्जन बहुत कम शक्ति के भूकंप आते रहते हैं। महीनों में कभी कभार धरती हिलती हैं और कभी-कभार दशकों या सदियों में बड़े भूकंप आते हैं और पुराने चीजों को तहस-नहस कर डालते हैं।

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इंसानी समाज में  भी कमोबेश ऐसा ही होता है। समाज के गर्भ में रोज हजारों प्रकार की हलचलें होती रहती हैं। इसका असर कहीं होता है तो कहीं बिल्कुल नहीं।

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देश की आजादी के पूर्व सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर समाज में बहुत अधिक हलचल नहीं हुआ करती थीं। ग्रामीण समाज अपने क्षेत्रीय अस्मिता के साथ शांतिमय कृषि आधारित जीवन जीता था। समाज के एकीकरण में या तो समुदाय या जाति या धर्म केन्द्रीय तत्व हुआ करता था। 

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लेकिन भारत की आजादी के बाद हलचलों की बाढ़ ही आ गईं। नयी औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण, सार्वभौमिक शिक्षा, सरकारी रोजगार, यातायात तथा अन्य प्रसारवादी संसाधनों का विस्तार से, हलचलहीन बंद समाज धीरे-धीरे  खुलने लगे और उसके साथ नये विचार भी समाज में प्रवेश करने लगे। 

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कई दशक पूर्व तक समाज परिवार केन्द्रित हुआ करता था, हर कार्य में परिवार और समाज ही केन्द्रीय भूमिका निभाता था। शिक्षा, रोजगार, सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यकलाप, शादी-विवाह,खुशियाँ गम, मृत्यु आदि शु्द्ध पारिवारिक और सामाजिक कार्यकलाप  हुआ करता था। 

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लेकिन देश की आजादी के बाद राजनैतिक और सामाजिक जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हुए। शिक्षा,रोजगार, संपत्ति का बँटवारा,लव मैरिज-कोर्ट मैरिज, बीमार व्यक्ति की तामीरदारी सरकारी अस्पतालों और एश्योरेंस के माध्यम से सरकारी और गैर-सामाजिक हो गए। यहाँ तक कि मृत्यु का क्रियाक्रम भी अब तो बाजार की एजेंसियाँ करने लगी हैं। 

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शहरों में आज ऐसा कोई समाज नहीं रहता है, जो गाँवों में समाज बनने के तत्वों के  संयोजन से बना हुआ होता है। शहरों में कमोबेश सुसंगठित समाज नहीं होता है, बल्कि सुविधाओं के जाल में बुना हुआ जनसंख्या का झूँड़ होता है। शहरी समाज सुविधाओं का उपभोग करने वाला एक ऐसा समूह होता है, जिसमें Sense of belonging का सर्वथा अभाव होता है। शहर मनोविज्ञानिक रूप से एक खंडहर होता है और तमाम शहरी सुख, सुविधा पैसों पर आधारित होते हैं।  

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शहरों में बसे आदिवासी और दलित समाज का आधार या तो धर्म है या जान पहचान के क्षेत्रीय-भाषाई आधार। समुदाय, जाति, संस्कृति, भाषा आदि आज द्वितीय श्रेणी के  ऐसे तत्व बन गए हैं, जो कभी-कभार  सामाजिक गुम्फन तत्व (stickiness) के काम आते हैं। 

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दूसरे कई समाज के मामले पर, वित्तीय स्थिति और कार्य वर्ग (एक ही तरह के कार्य करने वाले लोगों का समूह) आदि मुख्य समाज संगठक तत्व  बन गए  हैं।  कहने का मतलब है कि गाँव में युगों से जहाँ एक होमोजेनियस समाज का वजूद हुआ  करता था, वैसा समाज शहरों में नहीं है। 

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अंग्रेजों के समय और उसके बाद देश के आजादी के कुछ समय तक सरकार सिर्फ सार्वजनिक मुद्दों पर कार्य करने वाली एजेंसी हुआ करती थी। उसे गाँव समाज से कमोबेश कुछ लेना देना नहीं हुआ करता था।  लेकिन शनै-शनै सरकारी कानून के हाथ बेतहाशा लम्बे होने लगे और यह समाज और परिवार की सीमा को तोड़ कर असंगठित समाजों के सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों को भी प्रभावित करने लगा है। याद रखें जहाँ कहीं परिवार और समाज समाप्त होता है, वहीं से सरकारी नियम कायदे शुरू हो जाते हैं। 

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आजादी के कुछ दशक बाद बने कानूनों ने समाज और परिवार की भूमिका में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया और वह हर नागरिक के लिए क्या कर्तव्य और अधिकार होने चाहिए, उस पर वह बेरहम बॉस की भूमिका में आ गया है।  सामाजिक और पारिवारिक भूमिका को खत्म करके अपने लक्ष्योंं को कानून के डंडे पर कार्यन्वित करना शुरू कर दिया। आज बच्चे की शिक्षा, बच्चों की शादी की आयु, संपत्ति का बँटवारा, उसका रजिस्ट्रेशन, आय-व्यय और कर देयता आदि मामले में आप कानून का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं। भले ही परिवार और समाज का सोच कितना भी अलग क्यों न हो। 

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आज का भारतीय इंसान एक पारिवारिक और सामाजिक व्यक्ति से अधिक देश के कानूनों से बंधा एक इंसानी नागरिक है। पारिवार और समाज और उसके तमाम भूमिकाओं को सीमांकित करते हुए कानून हर व्यक्ति के अधिकार को सामाजिक और पारिवारिक से बदल कर व्यक्तिगत अधिकार में बदल दिया है। नये-नये कानूनों के द्वारा इसे और भी मजबूत किया जाएगा, क्योंकि परिवार और समाज की प्रभावी भूमिका नगण्य होने लगी है। 

आज एक वयस्क व्यक्ति अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए, अपने सुख और स्वार्थ के खातिर परिवार और सामाज की उपेक्षा कर सकता है। यदि व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वलंबित हो तो उसे परिवार और समाज की कोई परवाह नहीं हो सकती है। शहरों में हर परिवार, दुकानदार या कोई भी व्यक्ति अपने घर के चार दीवारी के बाहर सरकारी कानूनों से बंधा हुआ होता है। उसकी सुरक्षा, उनकी स्वतंत्रता की जिम्मेदारी परिवार नहीं उठाता है, बल्कि घर के बाहर वह सरकारी कार्य-व्यापार (affairs) कानून और व्यवस्था का अंग हो जाता है। 

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आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक-आत्मविश्वास उस व्यक्ति से अलग होता है, जो खुद आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होता है। लेकिन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्ति बौद्धिक रूप से आत्मनिर्भर न हो तो वह क्या कर बैठेगा, इसका अंदाजा किसी को भी नहीं होता है। व्यक्तिगत आबाध आजादी भी कभी-कभी व्यक्ति और समाज  के लिए जी का जंजाल बन जाता है।  

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जो समाज खुद विभिन्न आधारों पर छिन्न-भिन्न रहता है, उसके सदस्य उतने ही परालंबित होते हैं। व्यक्ति को दिशा निर्देश देने में ऐसे समाज अक्षम होते हैं। सांस्कृतिक रूप से ऐसे समाज का एकीकरण तत्व कमजोर होता है और उसके ऐसे सदस्य जो बौद्धिक रूप से चेतनाशील नहीं होते हैं,वे व्यक्तिगत मामलों में अपने सामाजिक और पारिवारिक नियमों से अधिक सरकारी नियमों के नजदीक होते हैं। सरकारी नियम कायदे दैनिक जीवन में निष्क्रिय होते हैं, और वे व्यक्ति के सर्वोच्च कल्याण के लिए उचित और नैतिक सलाह देने में सर्वथा असमर्थ होते हैं।  लेकिन कानून  समाज के ऐसे सदस्य के जीवन में सक्रिय रूप से भी अधिक नजदीक होते हैं। जो अपनी कानूनी प्रक्रिया से सुरक्षा देने से अधिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से अधिक परिशानी दे सकते हैं और उत्पीड़न कर सकते हैं। कानून यहां दुधारी तलवार बन जाती है। सुरक्षा भी देती है लेकिन घायल भी करती है।  

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देश में व्यक्ति, आज तक, न तो पूरी तरह सरकारी नागरिक बन सका है और न ही वह पूरी तरह से गैर-पारिवारिक और गैर-सामाजिक बन सका है। भारत में तमाम समाज एक संधि काल से गुजर रहे हैं। तमाम समाज न तो पूर्ण शिक्षित, आधुनिक प्रगतिशील विचारों से सुसज्जित और आर्थिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र बन सका है और न ही दूसरी ओर सरकार नागिरक का हर पल ख्याल रखने वाला सुख-दुख का पक्का अभिभावक बन पाया है। यहाँ व्यक्तिगत आजादी को यूरोपीय आजाद समाज तक पहुँचने में कम से और दो सौ साल लगेंगे। भारतीय उत्तर आधुनिक काल यूरोप के जागरण काल से आगे नहीं बढ़ पाया है। 

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व्यक्तिगत ख्वाहिशें, सुख, स्वार्थ आदि कुछ ऐसे विषय हैं जो निरंतर बदलते रहते हैं। आयु विशेष में वह सिर चढ़ कर बोलता है।   वहीं पारिवारिक ख्वाहिशें, सुख, दुख, स्वार्थ, कल्याण, प्रगतिशीलता के विषय रोज और निरंतर बदलने वाले विषय नहीं होते हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज की प्राथमिकताएँ हमेशा अलग-अलग होते हैं। व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सुख के लिए समाज को बदलने का आदेश नहीं दे सकता है और न ही पारिवार अन्य दूसरे सदस्यों की कीमत पर, किसी एक सदस्य को मनमानी करने की छूट दे सकती है। प्राचीन काल में विद्रोही सदस्य अपने विद्रोह से समाज और परिवार को तिलांजली दे कर साधु, सैनिक आदि बन जाते थे, क्योंकि अपने समाज का विद्रोही दूसरे समाज का सक्रिय खुशमिज़ाज सदस्य नहीं बन पाते थे। हर समाज में दूसरे समाज के सदस्यों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के अपने कारण विद्यामान हैं और उन कारणों को रातों रात किसी दो चार सदस्यों के सुख, स्वार्थ और कल्याण के नाम बदलते नहीं देखा गया है।  विद्रोह मानवीय स्वभाव है और इसे समाज का मुख्य धारा नहीं माना जाता है। इसे हमेशा अपवाद की श्रेणी में रखा गया है।    

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आजादी के बाद समाज का हर तबका का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है। बाजारवाद ने व्यक्तिवाद को हवा दिया। देश में जनसंख्या अधिक है और संसाधन कम ऐसे में व्यक्तिवाद के मनोविज्ञान को काम में लगा कर तेजी से बदलते महौल में संसाधनों को हड़पने का भी एक नया लेकिन गैर कानूनी  आंदोलन भी शुरू हो गया। पूँजीवाद की दुनिया में इसे क्रोनी कैपिटलइज्म कहा गया है। जबकि सामाजिक मामले में इसे ठगी, चालाकी और भ्रमित कार्य कहा गया है।  यह आंदोलन शुद्ध व्यक्तिवाद के आधार पर काम करता है। लेकिन जहाँ कहीं परिवार और समाज की सोच, विचारधारा, जागरूकता, चेतनाशीलता अपने शबाब पर होता है, वहाँ यह औंधेमुँह गिरता है। जर, जोरू और  जमीन की लूट कोई नयी बात नहीं है। इसके तह में जाने के लिए इतिहास पढ़ने की जरूरत भी नहीं है।

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आज का आदिवासी समाज और पचास वर्ष पूर्व के आदिवासी समाज में भारी अंतर है।  शिक्षा, आरक्षण, आय, सम्पत्ति, सम्पन्नता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नयी सोच के आंदोलन  ने एक नये आदिवासी समाज का गठन किया है।  सुख, खुशी और स्वार्थ के सारी इच्छाओं को पूर्ण करने की ख्वाहिशें भी समाज में भीतर-भीतर,  उसी तरह से मचलने लगी हैं,  जैसे पृथ्वी के अंदरूनी क्षेत्रों में ज्वलामुखी के माध्यम से बाहर आने के लिए भूगर्भीय शक्तियाँ मचाया करती हैं। लेकिन यह कम शक्तिशाली होने के कारण अपने सीमित एरिया को छोड़कर और कहीं प्रभाव नहीं डालती है।

लेकिन समाज में कब कोई बड़ी भूकंप आ जाए, इसे कोई नहीं जानता है। लेकिन यह तय है कि जब बड़े भूकंप आते हैं तो वह अनेक पुराने इमारतों को गिरा कर तहस नहस कर डालते हैं। लेकिन जापान में अब भूकंपरोधी इमारतें ही बनती है। वहाँ दूसरे गैर-भूकंपरोधी इमारतों के लिए कोई जगह नहीं होती है।

परग्रही निर्मित यूएफओ

 पेंटागन यूएफओ प्रोग्राम के एक भूतपूर्व वैज्ञानिक (Former Pentagon UFO Program Scientist) ने जुलाई 2020 में दावा किया था कि अमेरिकी सरकारी एजेंसी को "ऑफ-वर्ल्ड व्हीकल्स" (दूसरी दुनिया का यान अर्थात् जिसे इस दुनिया में नहीं बनाया गया है) मिला है।

पेंटागन के सलाहकार रहे वैज्ञानिक कहते हैं कि अनिर्धारित मूल (undetermined origin) की इस सामग्री को "हम इसे स्वयं नहीं बना सकते।"
25 जुलाई, 2020 को प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, एक खगोल भौतिकीविद् और पेंटागन के यूएफओ कार्यक्रम के पूर्व सलाहकार ने हाल ही में अमेरिकी सरकारी अधिकारियों के सामने खुलासा किया कि "इस धरती पर नहीं बनाए गए विश्व के अंतरिक्ष यान को "हासिल किया गया है।"
उस पूर्व सलाहकार, एरिक डब्ल्यू डेविस ने कहा है कि उन्होंने रक्षा विभाग की एक एजेंसी को पिछले मार्च में एक अनिर्धारित मूल की सामग्री के हासिल होने के बारे में बताया था। डेविस ने न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार कहा, "हम (इस दुनिया में) इसे खुद नहीं बना सकते हैं।"
डेविस ने पहले सीनेट सशस्त्र सेवा समिति और सीनेट खुफिया समिति के स्टाफ सदस्यों को 2019 के अंत में अज्ञात सामग्रियों की प्राप्ति के बारे में बताया था।
हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि टाइम्स की रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि इन अजीब (Strange) सामग्रियों को कैसे या कहां से प्राप्त किया गया था। "क्या हम पुरानी घटना रोज्वेल (न्यू मैक्सिको) में दुर्घटनाग्रस्त अंतरिक्ष यान (सामान) की बात कर रहे हैं? या Skrulls (अलौकिक आकार का एक परग्रही प्रजाति) जो 90 के दशक से ही शायद हमारे बीच धुलमिल गए हैं; के बारे ?"
शायद अमेरिकी सैन्य लड़ाकू विमानों ने उन्हें रूसी या चीनी उड़न विमान समझ कर मार गिराया हो। लेकिन यह पता चला कैसे चले कि कि उनके बजाय ये यूरेनस ग्रह से आया था? हम अभी नहीं जानते ... अभी तक।
इन सब बातों के केंद्र में अमेरिकी सरकार का एक कार्यक्रम, "अज्ञात एरियल फेनोमेनन टास्क फोर्स" (Unidentified Aerial Phenomenon Task Force) है जो राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के लिएसिनेट में आगामी वर्ष के लिए खर्च के ब्यौरे प्रस्तुत करने के क्रम में जिक्र में आया था। (नये सृजित टास्क फोर्स पहले के एक "गुप्त यूएफओ कार्यक्रम" का स्थान लिया है जिसे भंग कर दिया गया था।
वित्तीय वर्ष 2021 के लिए "इंटेलिजेंस ऑथराइजेशन एक्ट" के लिए एक अज्ञात एरियल फेनोमेनन टास्क फोर्स की आवश्यकता थी, जो "अज्ञात हवाई घटनों का संग्रहण और रिपोर्टिंग को मानकीकृत करने के साथ साथ उनका किसी भी दुश्मन विदेशी सरकारों से संबंध और अमेरिकी सेना की संपत्ति और प्रतिष्ठानों के लिए खतरा" पर काम करे और रिपोर्ट करे।
इस अधिनियम के तहत टास्क फोर्स को इसके पारित होने के 180 दिनों के भीतर अपने कुछ निष्कर्षों की सार्वजनिक रिपोर्ट बनाने की आवश्यकता है। जिसका यह अर्थ है कि हम जल्द ही इन सब के बारे में अधिकृत स्तर से अधिक जान सकते हैं।
हालांकि, एलियंस(परग्रही) के बजाय, टास्क फोर्स को सबसे अधिक चिंता हैं उन यूएफओ का है जो संभवतः विदेशी विमान, कोई भी नया विमानन तकनीक जो प्रतिद्वंद्वी देशों या संभावित दुश्मनों को फायदा देता है, या ऐसे विमान जो अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों की जासूसी करते हैं; से है।
हलांकि इनमें से कुछ अजीब जिज्ञासपूर्ण सामग्रियों के लिए पूरी तरह से तार्किकमय व्याख्या पहले ही कर ली गई है, लेकिन हर मामला हमेशा ऐसा नहीं होता है। सिनेट में बहुमत के नेता रहे भूतपूर्व सिनेट हैरी रीड सहित कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी जो इस पहल का हिस्सा थे, वे इस बात के प्रमाण पर विश्वास करते हैं कि कुछ सामग्री अंतरिक्ष मूल की अधिक लगती हैं।
रीड ने टाइम्स को बताया, "इस पर गौर करने के बाद, मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि कुछ ख़बरें थीं - कुछ ठोस थीं, कुछ बहुत ठोस नहीं थीं - वास्तविक "वस्तु" सरकार और निजी क्षेत्र के कब्जे में थीं।"--अनुवाद-नेह इंदवार।

पैरों में कुल्हाड़ी मारना

 नेह अर्जुन इंदवार

2018 के 22 जुलाई को गुजरे आज 5 वर्ष हो गए। तब पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री ने कहा था कि 2018 के 30 जुलाई तक चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन की घोषणा कर दी जाएगी। जुमलेबाजी, धोखेबाजी, अकर्मण्यता और ढीठ भरे व्यवहार में ये महान नेतागण कितने प्रवीण हैं, यह अपने आप ही जाहिर है। 

2023   भी आधा खत्म हो गया है। लेकिन न्यूनतम वेतन की कोई सुगबुगाहट नहीं है। चाय बागानियारों ने बड़े-बड़े कुल्हाड़ी, टांगा और मारतुल से अपने पैरों को लहुलहान करके तृणमूल कांग्रेस को पंचायत चुनाव में वोट दिया है। अब  सरकार और तृणमूल कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के पूर्व न्यूनतम वेतन देने की बात करने की भी जरूरत नहीं है। जो जनता बिना मांगे ही लात की मांग करता है। उन्हें दूध-भात देने की जरूरत ही क्या है ? चुनाव आने से बड़े-बड़े सूरमा नेताओं के दिमाग भी चुनाव के लिए उछल-कूद करने लगता है। वहाँ की जनता का भविष्य भला उज्जवल होगा भी तो कहाँ से ???


पढ़ें --- 22 जुलाई 2018 को  प्रकाशित लेख.... 

पश्चिम बंगाल सरकार ने 30 जूलाई तक चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन घोषणा करने का वादा किया है।

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लेकिन क्या सरकार यह वादा पूरी करेगी ?  यदि करेगी तो मजदूरों को कितना न्यूनतम वेतन मिलेगा ? क्या मजदूरों को आवास के लिए लीज का अधिकार भी मिलेगा ?

सबसे महत्वपूर्ण बात है, न्यूनतम वेतन मिलेगा तो वह कब से लागू होगा ? क्या वह पिछली तारीख अर्थात 2014 की जनवरी से मिलेगा ? क्योंकि 2014 से लागू होने वाले  वेतन समझौते के समय से ही मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी मांग रहे थे और तब उनके द्वारा तीन वर्षीय मजदूरी वेतन निर्धारण शर्तों को अपनी ओर से तोड़ कर, न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन किया गया, बागानों में हड़ताल किया गया और इसके समर्थन में सार्वजनिक बंद भी बुलाया गया था। तब मजदूरों ने किसी भी तरह से तत्कालीन समय में लागू तीन वर्षीय वेतन समझौते को मानने से इंकार कर दिया था। 

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तब सरकार ने मजदूरों से न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए एक समिति बना दी थी। उस समिति के निर्णय को जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। उल्लेखनीय है कि 2011 में हुए वेतन समझौता को 2011 के जनवरी महीने से लागू किया गया था। उस तीन वर्षीय समझौते की मियाद 31 दिसंबर 2013 को समाप्त हो गया था। नया वेतन समझौता अर्थात् नये फार्मेट में न्यूनतम वेतन को 1 जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। तब सरकार ने कहा था कि जब तक न्यूनतम वेतन का निर्धारण नहीं हो जाता है, तब तक मजदूरों को “अंतरवर्तीकालीन मजदूरी” दी जाएगी। मतलब अभी अर्थात् दिनांक 1 जनवरी 2014 से जो मजदूरी दी जा रही है, वह अंतरवर्तीकालीन मजदूरी है न कि स्थायी। अंतरवर्तीकालीन का मतलब होता है temporary or  for time being or interval time. मतलब अभी के वेतन को स्थायी नहीं माना जाना है। इसे तो 1जनवरी 2014 से लागू होने वाले वेतन की जगह अंतरवर्तीकालीन के रूप में दिया जा रहा है। 

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इसलिए न्यूनतम वेतन की गणना दिनांक 1 जनवरी 2014 से होनी चाहिए। अर्थात् 1 जनवरी 2014 को सरकार द्वारा नियमों के अधीन महंगाई की घोषणा (डीए) के साथ न्यूनतम वेतन के लिए निर्धारित मूल वेतन मजदूरों को मिलना चाहिए। जितनी मजदूरी मिल चुकी है उतना पैसे काट कर बाकी पैसों को Arrear के रूप में मजदूरों को मिलना चाहिए। 

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 चूँकि सरकार द्वारा गठित समिति अपना काम समय पर पूरा नहीं कर सकी थी, इसलिए तत्काल रूप से मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा सका था। अब जब सरकार इसे घोषित करने वाली है तो सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु इसके लागू किए जाने वाली तारीख ही है। यदि सरकार 2014 के जनवरी महीने से इसे लागू नहीं करती है तो यह मजदूरों के साथ धोखाधड़ी और ठगी होगी। 

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इसका मतलब यह होगा कि सरकार बागान मालिकों को अरबों रूपये का आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए जानबूझ इसे किसी बाद की तारीख से लागू करने के लिए समिति के कामकाज को आगे ठेलते रही और बागान मालिकों को आर्थिक लाभ पहुँचाने का कुचक्र रचती रही। इसका मतलब यह भी है कि सरकार मजदूरों के अरबों रूपयों का नुकसान पहुँचाने के लिए षड़यंत्र रचती रही है। 

यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी को 1 जनवरी 2014 से लागू नहीं करती है तो यह स्वतंत्र के बाद पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ी ठगी होगी। यह आशंका आधारहीन नहीं है। क्योंकि सरकार ने 17.50 पैसे की वृद्धि और राशन के 660 रूपये की देनदारी पर मजदूरों के साथ धोखाबाजी की है और उसे पिछली तारीख से लागू करने के बजाय बहुत बाद की तारीख से लागू किया है। इस बार सरकार को अपनी ईमानदारी दिखानी होगी। बेईमानी होने पर गेट मिटिंग का आंदोलन और बंद का अह्वान करने वाले ट्रेड यूनियन का अगला कदम क्या होगा ? यह जानना दिलचस्प होगा। क्या मजदूर गोदामों से तैयार माल को उठाने से रोकने के लिए आंदोलन करेंगे ? 

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1 जनवरी 2014 को न्यूनतम वेतन की गणना किस तरह की जाएगी। आईए इसे जानने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के श्रम विभाग द्वारा असंगठित क्षेत्र के लिए जारी नोटिफिकेशन की जाँच पड़ताल करते हैं। 

1 जनवरी 2014 में सरकार ने न्यूनतम वेतन के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया था, उसमें निम्नलिखित चार्ट के अनुसार मजदूरी निर्धारित किया गया था।

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कृषि क्षेत्र के लिए -

Unskilled लेबर को 5347.00 (206.00) (without food), 4966.00 (191.00) (with food) )                                                                    

जबकि Semi-skilled लेबर को 5882.00 (226.00)  (without food), 5486.00 (211.00) with food) 

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यह दर 30 जून 2014 तक के लिए मान्य था। 

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छह महीने के बाद 1 जुलाई 2014 से लागू होने वाले नोटिफिकेशन के अनुसार निम्नांकित दर से न्यूनतम वेतन लागू किया किया।

Unskilled लेबर को 5762.00.00 (222.00) (without food); 4966.00 (206.00) (with food) per day

Semi-skilled लेबर को 6339.00 (244.00) (without food); 5486.00 (228.00) (with food) per day

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उपरोक्त टेबल पर के राशि में छह महीने में हुई बदलाव को देखें। 

कृषि क्षेत्र में Unskilled को छह महीने पहले 5347.00 (206.00) (without food); और Semi-skilled को 5882.00 (226.00)  (without food) मिलता था। 

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छह महीने में के बाद उन्हें क्रमशः 5762.00.00 (222.00) (without food); और 6339.00 (244.00) (without food) मिलने लगा। 

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छह महीने में 206 रूपये की जगह 222 रूपये और 226 रूपये की जगह 244 रूपये मिलने लगा। यह बदलाव छह महीने में अखिल भारतीय स्तर पर होने वाले महंगाई सूचकांक के अनुसार होता है। ख्याल रखें कि वर्तमान समय में चाय मजदूरों के वेतन में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता है।

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यदि मजदूरों को 2014 से न्यूनतम मजदूरी दी जाएगी तो इसकी गणना कमोबेश इसी आधार पर की जाएगी। इसका मतलब है कि चाय मजदूरी को बढ़ोतरी प्रत्येक छह महीने में होगी।

 यदि चाय बागानों में मिलने वाले फ्रिंज बेनेफिट और Perquisites को इसमें मिलाया जाएगा तो इसकी गणना इससे भी अधिक होगी। चाय बागान प्रबंधन प्रति महीना मजदूरों से पीएफ राशि के साथ ग्रेज्युएटी राशि की भी कटौती करता है। ग्रेज्यूएटी की राशि की कटौती कानूनन अवैध है। यदि यह मजदूरों के वेतन से ही काट कर दिया जाता है तो इसका नाम ग्रेज्यूएटी क्यों होना चाहिए ?

इस कानून के अनुसार कुछ निश्चित मामलों के आधार पर मालिक कर्मचारी को ग्रेज्युएटी से वंचित भी कर सकता है। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि यदि मालिक कर्मचारी के वेतन से ही ग्रेज्युएटी की कटौती की है तो वह उस राशि से कर्मचारी को कैसे वंचित कर सकता है, क्योंकि वह तो Provident Fund की तरह ही उनके खून-पसीने की कमाई है। ग्रेज्युएटी पर मालिकों द्वारा मजदूरों के वेतन से कटौती गैर कानूनी है और एक अपराध है।

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इस पर यदि मजदूर सक्षम कोर्ट पर जाएँ तो मालिकों को बहुत भारी जुर्माना अदा करने होंगे और कईयों को जेल की सलाखों में भी बंद किया जा सकता है। इस मामले पर श्रम मंत्रालय के इंस्पेक्टर और कंपनी के चार्टर्ड एकांउटेंड भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रेड यूनियन इस विषय को सरकार के समक्ष उठाएगा या इसे लेकर कोर्ट में जाएगा ? इस मामले में ट्रेड यूनियन ने क्यों अब तक मजदूरों को अंधेरे में रखा है और उसका आर्थिक शोषण में सहमति की भूमिका निभाया है। 

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आज की तारीख में केरल में मजदूरों को 600 रूपये न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। दक्षिण के राज्यों में कहीं भी तमाम सुविधाओं के साथ 300 रूपये से कम की मजदूरी नहीं है।  पश्चिम बंगाल में भी चाय मजदूरों को महंगाई भत्ता अर्थात डीए को छोड़ कर 270 मिलना चाहिए। महंगाई भत्ते के साथ इसे 375 से 400 रूपयों के बीच होना चाहिए। 

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सरकारी क्षेत्र में न्यूनतम वेतन का निर्धारिण असंगठित क्षेत्र के लिए किया जाता है। असंगठित क्षेत्र का मतलब ऐसा मजदूरी का क्षेत्र जहाँ मजदूर संगठित नहीं होते हैं। मजदूरों का कोई यूनियन नहीं होता है और और उनके पास मोलतोल करने की शक्ति भी नहीं होती है। क्योंकि वे कहीं दो चार की संख्या में तो कहीं पाँच-दस की संख्या में अनियमित ढंग से मजदूरी करते हैं और अपनी मजदूरी अपनी ओर से तय नहीं कर पाते हैं। असंगठित होने के कारण उनके साथ नाइंसाफी और पक्षपात तथा शोषण होने की बहुत संभावना होती है। इसीलिए उनके लिए सरकार हर छह महीने में वेतन का निर्धारण नोटिफिकेशन के जरिए करती है।

चाय बागान क्षेत्र एक संगठित क्षेत्र है और यहाँ 20 से भी अधिक श्रमिक संगठन हैं। वे न्यूनतम वेतन से भी अधिक के लिए मोलतोल करने की शक्ति रखते हैं। इसलिए न्यूनतम वेतन से उन्हें अधिक वेतन मिलना चाहिए।  

बागान मालिक मजदूरों से अनेक सुविधाओं के लिए वेतन से पैसे कटौती करते हैं, लेकिन वे वेतन से राशि कटौती करके भी उन सुविधाओं को मुकम्मल ढंग से नहीं देते हैं। इसके लिए श्रम विभाग को कार्य करना चाहिए लेकिन वह मालिकों से पैसा लेकर मजदूरों के पक्ष में कोई कदम नहीं उठाते हैं और मजदूरों का भारी शोषण जारी रहता है। 

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अब बहुत सारी सुविधाओं को मालिक पक्ष ने देना बंद कर दिया है। कंबल, चप्पल, लकड़ी आदि सुविधाओं पर कोई नीति नहीं है।  वहीं तीन स्तरीय पंचायत सरकार के प्रावधानों को चाय बागानों में लागू किए जाने के कारण अधिकतर नागरिक सुविधाएँ मजदूरों को सरकार से मिल रही है। ऐसे में आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक कार्य आदि के पैसे चाय बागान प्रबंधन द्वारा वेतन से काटने का कोई मतलब नहीं है। इस तरह के लगातार कटौती मजदूरों से मजदूरों का आर्थिक शोषण ही जारी रहता है।

असम सरकार ने चाय मजदूरों के पक्ष में निर्णय लेते हुए प्रत्येक बागान में दो एकड़ जमीन लेकर प्रत्येक चाय बागान में एक उच्च विद्यालय और एक प्राईमरी हेल्थ सेटर की स्थापना कर रही है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा के लिए राज्य के प्रत्येक मेडिकल कालेज में तीन सीट चाय बागान के बच्चों के लिए आरक्षित रख रही है।

लेकिन पश्चिम बंगाल में मजदूरों के पक्ष में सरकार द्वारा सिर्फ प्रतीकात्मक कदम ही उठाए जा रहे हैं। चाहे वह टी टुरिज्म की नीति हो चाहे, लोक संस्कृति के माध्यम से दो तीन दर्जन लोगों को रोजगार देने की घोषणा या किसी पर्व त्यौहार में अवकाश की घोषणा।  

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मालबाजार में 2013 में ममता बनर्जी ने आदिवासियों के बच्चों के लिए यूपीएससी, मेडिकल, ईंजीनियरिंग आदि के लिए कोचिंग क्लास शुरू करने की घोषणा की थी। लेकिन वह अब तक जमीनी स्तर पर कहीं दिखाई नहीं दी है। न ही मजदूरों को आवास के लिए बागानों में पट्टा देने की घोषणा पूरी हुई। दो हिंदी कालेज बने लेकिन वहाँ कालेज भर्ती में आदिवासी या नेपाली बच्चों के छह प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। अब कुछ दिन पहले ममता ने कहा कि सरकार मजदूरों के बच्चों को रोजगारउन्मुख प्रशिक्षण देगी, लेकिन ममता ने ऐसी बातें 2013 में भी कहा था, और वे अब तक जुमला ही साबित हुई है।  ये तमाम कार्य सिर्फ आंख में धूल झोंकने के बराबर ही है। 

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चाय बागानों के मजदूरों और उनके साथ रहने वाले आदिवासी और नेपाली समाज का विकास आर्थिक और सामाजिक विकास की ठोस नीतियों के आधार पर होंगी न कि प्रतीकात्मक कदमों के द्वारा। ठोस नीति में श्रम के बदले कानूनन न्यायपूर्ण वेतन देना पहली बात होगी।  

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अक्सर मालिक पक्ष द्वारा कहा जाता है कि मजदूरों को न्यायपूर्ण वेतन देने से चाय बागान कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव पडेगा और कई बागान बंद हो सकते हैं। लेकिन केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में चाय मजदूरों को प्लानटेंशन लेबर एक्ट में उल्लेखित सुविधाओं के साथ 300-500 न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। नागरिक सुविधाएँ देने के लिए उन राज्यों में मजदूरी से कोई कटौती भी नहीं की जाती है।

चाय बागानों की चाय से होने वाली आय पर एक नजर देखने से हमें पता चल जाएगा कि पश्चिम बंगाल और दक्षिण राज्यों के चाय बागानों के चाय की कीमतों में कितना अंतर है।.

टी बोर्ड के द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 19 दिसंबर 2015 में नीलाम हुए सीटीसी चाय की कीमत निम्नांकित थी। 

सिलीगुड़ी में प्रति केजी 153, गुवाहाटी में 135,  वहीं उसी दिन कोचिन में 105 रूपये, कुन्नुर में 82 रूपये, कोयंबटूर 86 रूपये था। 

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दिनांक 26 सितंबर 2015 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 158 गुवाहाटी में 146,  वहीं उसी दिन कोचिन में 98 रूपये, कुन्नुर में 68 रूपये, कोयंबटूर 72 रूपये था। 

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दिनांक 2 दिसंबर 2017 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 157,  गुवाहाटी में 142,  वहीं उसी दिन कोचिन में 110 रूपये, कुन्नुर में 74 रूपये, कोयंबटूर 89 रूपये था।

यह देखा गया है कि पश्चिम बंगाल के सीटीसी चाय की कीमत असम और दक्षिण भारत के चाय से हमेशा अधिक रहा है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों को दक्षिण के चाय बागानों से हमेशा अधिक आय होता रहा है। लेकिन सबसे अधिक चाय की कीमत वसूल कर भी पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों को सबसे कम वेतन दिया जाता है। जबकि सबसे कम कीमत पाकर भी तमिलनाडु, केरल और कनार्टक में मजदूरों को 300 से 500 रूपये तक मजदूरी दी जाती है।

(TAN TEA  तमिलनाडु में चाय मजदूरों को Basic Wage के रूप में 183.50 रूपये और डीए के रूप में 117.70 रूपये कुल 301.20 पैसे मजदूरी दी जाती है। अधिक जानकारी के लिए लिंक पर क्लिक करें। http://tantea.co.in/org.html)

पश्चिम बंगाल में मजदूरों द्वारा अधिक मजदूरी की मांग किए जाने पर बागानों को बंद करने की धमकी दी जाती है। इस तरह की अनैतिक बातें दशकों से होता रहा है। इस प्रकार का व्यवहार अब तो बंद होना चाहिए। 

चाय बागानों के दूसरे अनेक समस्याओं पर भी एक मुश्त निर्णय होना चाहिए। चाय बागानों में केमिकल का छिड़काव करने वाले मजदूरों को न तो सुरक्षा दिया जाता है और न उनका मेडिकल जाँच की जाती है और न ही उन्हें अतिरिक्त वेतन और Insurance की सुविधा दी जाती है। The Insecticides Act, 1968  पर सरकार ने चाय मजदूरों के लिए क्या कदम उठाया है ? मजदूरों को इसकी जानकारी देना बहुत जरूरी है।

चाय मजदूर और फैक्टरी में काम करने वालों की अदला-बदली की जाती है। क्या बागानों में काम करने वालों पर भी फैक्टरी एक्ट लागू है ? दोनों जगह की मजदूरी एक जैसी क्यों होनी चाहिए ?

चाय बागानों में झोला छाप डाक्टरों की नियुक्ति से क्या सरकार मजदूरों की मौत को सुनिश्चित करना चाहती है। बागान अस्पतालों की हालत कैसी होती है यह सभी जानते हैं। ग्रुप अस्पताल की बातें हमेशा हवा-हवाई होती रहीं हैं। बाबु स्टाफ में शिक्षित युवाओं की कहीं भी निष्पक्ष भर्ती नहीं होती है। 

Company Social Responsibility  के तहत कंपनी कैसे अपना पैसा गैर बागान क्षेत्र या शहरों में खर्च करती है ????  क्या बागानों के निवासियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी सिर्फ पैसे कमाने की रह गई है। सरकार इस संबंध में क्या सोचती है, सरकार को स्पष्ट करनी चाहिए।

मजदूरों को राशन के बाबत 660 रूपये मिलने चाहिए। आखिर इस रूपये को कम करके दैनिक 9 रूपये करने के निर्णय के पीछे क्या औचित्य है? 

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30 जुलाई बहुत दूर नहीं है। इस दिन सरकार अपने वादे के अनुसार न्यूनतम मजदूरी की घोषणा करेगी तो मजदूरों को अन्य राज्यों के साथ इसकी तुलना करनी चाहिए। फ्रिंज बेनेफिट, परक्युजिट, नागरिक सुविधाओं की भी तुलना की जाए। 

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मजदूरी के साथ मजदूरों के आवास पट्टा, फ्रिंज बेनेफिट आदि बहुत सारे मामले हैं जिस पर सरकार को अपना रूख स्पष्ट करनी चाहिए। यदि सरकार मजदूरों के साथ न्याय करती है तो सच में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार माँ, माटी और मनुष्य की सरकार होने का सबूत देगी।

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यदि मजदूरों को न्याय पूर्ण मजदूरी नहीं मिलेगी तो मजदूरों को न्याय पाने के लिए सड़कों पर उतरना होगा और आवश्यकता के अनुसार कोर्ट का भी रास्ता चुनना होगा। प्लान्टेशन लेबर एक्ट 1951 में 2010 में एक संशोधन किया गया था, जिसके अनुसार यदि कोई असंतुष्ट मजदूर चाहे तो अपने साथ होने वाले अन्याय के विरूद्ध कोर्ट का रास्ता चुन सकता है। पहले यह सुविधा सिर्फ ट्रेड यूनियन को प्राप्त था। अब कोई भी मजदूर शोषण, वंचना, पक्षपात के आधार पर बिना किसी ट्रेड यूनियन के सहारे ही कोर्ट में जा सकता है और अपने लिए न्याय मांग सकता है। आखिर अन्याय और शोषण सहने की भी एक सीमा होती है।

"हम महामूर्ख हैं"


1980 के दशक में दुनिया को ग्रीनहाउस प्रभाव के प्रति सचेत करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक जेम्स हेन्सन के अनुसार, दुनिया अत्यधिक गर्म जलवायु की ओर बढ़ रही है, जो मानव के अस्तित्व में आने से पहले, पिछले दस लाख वर्षों में नहीं देखी गई थी, क्योंकि जलवायु संकट पर तमाम आंकड़ों, अध्ययनों और सबूतों सहित चेतावनियों जारी करने पर भी वैश्विक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करने पर यह जाहिर हो गया है कि मानव के रूप में "हम महामूर्ख हैं"।

 

हैनसेन, जिनकी 1988 में अमेरिकी सीनेट में दी गई गवाही को वैश्विक तापमान के पहले हाई-प्रोफाइल रहस्योद्घाटन के रूप में उद्धृत किया जाता है, ने दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ एक बयान में चेतावनी दी थी कि दुनिया एक "नई जलवायु सीमा" की ओर बढ़ रही है, जिसमें पिछले दस लाख वर्षों में किसी भी बिंदु से अधिक तापमान होगा, जिससे भयंकार तूफान, गर्म हवा और सूखे जैसे खतरनाक प्रभाव सामने आएंगे।

 

हैनसेन ने कहा कि बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के बाद से दुनिया पहले ही लगभग 1.2C गर्म हो चुकी है, जिससे उत्तरी गोलार्ध के कई हिस्सों में वर्तमान में देखे जाने वाले अत्यधिक गर्मी के तापमान की 20% संभावना है, जो 50 साल पहले 1% संभावना थी, हैनसेन ने कहा।

 

82 वर्षीय हैनसेन ने अमेरिकी अखबार गार्जियन से वार्ता करते हुए कहा  है, "जब तक हम ग्रीनहाउस गैस की मात्रा कम नहीं करते,  बहुत कुछ होने की संभावना है। ये विध्वंसात्मक तुफान मेरे पोते-पोतियों के जीवन के अनुभव हैं। हम सोच-समझकर नई ध्वंसात्मक वास्तविकता की ओर बढ़ रहे हैं - हमें पता था कि यह आ रही है।''

 

हैनसेन नासा के जलवायु वैज्ञानिक थे, जब उन्होंने सांसदों को बढ़ती वैश्विक गर्मी के बारे में चेतावनी दी थी और तब से उन्होंने दशकों से ग्रह-ताप उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्रवाई की कमी की निंदा करने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया है।

उन्होंने कहा कि हाल के सप्ताहों में अमेरिका, यूरोप, चीन और अन्य जगहों पर रिकॉर्ड गर्मी की लहरों ने "निराशा की भावना को बढ़ा दिया है कि हम वैज्ञानिकों ने अधिक स्पष्ट रूप से संवाद नहीं किया और हमने अधिक बुद्धिमान प्रतिक्रिया देने में सक्षम नेताओं को नहीं चुना"।

 

"इसका मतलब है कि हम शापित महामूर्ख हैं," हैनसेन ने जलवायु संकट के प्रति मानवता की कठिन प्रतिक्रिया के बारे में कहा। "इस पर विश्वास करने के लिए हमें इसका स्वाद चखना होगा।"

 

ऐसा लग रहा है कि चालू वर्ष वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया जाएगा, जून में पहले से ही सबसे गर्म गर्मी देखी जा रही है और, संभवतः, अब तक का सबसे गर्म सप्ताह विश्वसनीय रूप से मापा गया है। इसके विपरीत, 2023 को समय के साथ एक औसत या हल्का वर्ष भी माना जा सकता है, क्योंकि तापमान में वृद्धि जारी है। हैनसेन ने कहा, "चीजें बेहतर होने से पहले और भी बदतर हो जाएंगी।"

 

इसका मतलब यह नहीं है कि इस साल किसी विशेष स्थान पर अत्यधिक गर्मी हर साल दोहराई जाएगी और बढ़ेगी। मौसम में उतार-चढ़ाव चीजों को इधर-उधर कर देता है। लेकिन वैश्विक औसत तापमान बढ़ जाएगा और जलवायु परिवर्तन अधिक से अधिक बोझिल हो जाएगा, जिसमें अधिक चरम घटनाएं भी शामिल होंगी।''

 

 

हैनसेन ने एक नए शोध पत्र में तर्क दिया है, जिसकी अभी सहकर्मी-समीक्षा की जानी है, कि वैश्विक तापन की दर तेज हो रही है, तब भी जब प्राकृतिक विविधताएं, जैसे कि वर्तमान अल नीनो जलवायु घटना, जो समय-समय पर तापमान बढ़ाती है, के कारण होती है। इसका कारण यह है कि उन्होंने जो कहा वह सूर्य से ग्रह में आने वाली ऊर्जा बनाम पृथ्वी से परावर्तित ऊर्जा की मात्रा में "अभूतपूर्व" असंतुलन था।

 

 

जबकि जीवाश्म ईंधन के जलने के कारण वैश्विक तापमान निस्संदेह बढ़ रहा है, वैज्ञानिक इस बात पर विभाजित हैं कि क्या यह दर तेज हो रही है। पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक माइकल मान ने कहा, "जिम जो दावा कर रहा है उसका हमें कोई सबूत नहीं मिला है।" उन्होंने कहा कि जलवायु प्रणाली का ताप "उल्लेखनीय रूप से स्थिर" था। अन्य लोगों ने कहा कि यह विचार प्रशंसनीय है, हालाँकि निश्चित होने के लिए अधिक डेटा की आवश्यकता है।

 

यह कहना शायद जल्दबाजी होगी कि गर्मी बढ़ रही है, लेकिन यह निश्चित रूप से कम नहीं हो रही है। पर्ड्यू विश्वविद्यालय में पेलियोक्लाइमेटोलॉजी के विशेषज्ञ मैथ्यू ह्यूबर ने कहा, ''हम अभी भी गैस पर अपना पैर रखे हुए हैं।''

 

हेन्सन ने 1989 में सीनेट उपसमिति के सामने गवाही दी, उसके एक साल बाद इतिहास रचने वाली गवाही ने दुनिया को बताया कि ग्लोबल वार्मिंग यहाँ थी और यह और बदतर हो जाएगी।

वैज्ञानिकों ने बर्फ के टुकड़ों, पेड़ों के छल्लों और तलछट के जमाव के माध्यम से एकत्र किए गए सबूतों के आधार पर पुनर्निर्माण के माध्यम से अनुमान लगाया है कि हीटिंग में मौजूदा वृद्धि पहले से ही वैश्विक तापमान को उस स्तर पर ले आई है जो पृथ्वी पर नहीं देखा गया है। साभार-गार्जियन।

Photo- Vox


यूसीसी से क्यों आशंकित हैं आदिवासी समुदाय ?

समान नागरिक संहिता Uniform Civil Code (UCC) का विरोध देश भर के आदिवासी समुदाय कर रहे हैं।  पूर्वोत्तर सहित बंगाल, बिहार, झारखंड. छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान सहित देश के अन्य हिस्सों के आदिवासी समुदायों ने प्रस्तावित यूसीसी का विरोध किया है क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनकी पहचान और स्वायत्तता को खतरा होगा। जबकि आदिवासी समुदाय ज्यादातर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत, भूमि और संपत्ति के मामलों में अपने पारंपरिक कानूनों द्वारा शासित होते हैं, संविधान कुछ राज्यों में जनजातियों के स्थानीय रीति-रिवाजों की भी रक्षा करता है। यूसीसी पर अपने विचारों को सरकारी मशीनरी तक पहुँचाने की आखिरी तारीख कल यानी 13 जुलाई है। बताया जा रहा है कि कानू मंत्रालय को अब तक 19 लाख से अधिक प्रतिक्रियाएं मिलीं है और आखिरी तारीख तक एक लाख से अधिक प्रतिक्रियाएं मिलने की उम्मीद है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद और कानून एवं न्याय पर संसदीय समिति के अध्यक्ष सुशील कुमार मोदी ने कहा कि पूर्वोत्तर और देश के अन्य हिस्सों में बसी आदिवासी आबादी को समान नागरिक संहिता से दूर रखा जाना चाहिए। विपक्षी नेताओं और कुछ भाजपा नेताओं की आलोचना के बाद, मोदी ने सोमवार को यूसीसी पर एक पैनल बैठक के दौरान कहा कि पूर्वोत्तर भारत, जो अनुच्छेद 371 के प्रावधानों के तहत शासित है, और अनुसूची के तहत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों को कानून से छूट दी जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि इसका विरोध करने वाले तमाम समुदायों के साथ कई विपक्षी नेताओं और कुछ भाजपा नेताओं ने भी यूसीसी के कार्यान्वयन का विरोध किया है।

मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने यूसीसी पर कहा था कि उनके राज्य के रीति-रिवाजों और परंपराओं  को खारिज नहीं किया जा सकता है और सभी को एक नए नियम का पालन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस सांसदों ने सवाल किया है कि क्या यूसीसी लागू होने से देश में धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा ?  बताया जाता है कि वरिष्ठ वकील और कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने हवाला दिया कि यूसीसी के बारे में अब तक जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक शादी पर्सनल लॉ के तहत आती है, जिसमें यूसीसी लागू होने पर बदलाव हो सकता है। तन्खा ने बताया कि जब सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह की सुनवाई चल रही थी, तब सरकार ने तर्क दिया कि विवाह स्वाभाविक रूप से किसी के धर्म से जुड़ा होता है, इसलिए यूसीसी द्वारा विवाह कानूनों को लागू करने से नागरिकों की धार्मिक भावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

तन्खा और डीएमके सांसद पी विल्सन द्वारा प्रस्तुत दो अलग-अलग लिखित बयानों के माध्यम से विधि आयोग के सदस्य-सचिव के. बिस्वाल से पूछा गया है कि ये मामले सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए क्यों खुले हैं, जबकि पिछले विधि आयोग ने 2018 में कथित तौर पर यूसीसी को 'न तो' आवश्यक और न ही वांछनीय' बताया था।

 

इस पर भाजपा प्रतिनिधि महेश जेठमलानी ने तर्क दिया कि संविधान सभा की बहस के दौरान इसे हमेशा अनिवार्य माना जाता था।

पूर्वोत्तर राज्यों सहित भारत के विभिन्न हिस्सों के आदिवासी समुदायों के दबाव में, केंद्र प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के दायरे से आदिवासी समूहों को बाहर करने की संभावना है। एक उच्च पदस्थ सूत्र के अनुसार कि आदिवासी समुदायों के रीति-रिवाज और परंपराएं, जो संविधान के तहत संरक्षित हैं, उन्हें यूसीसी के तहत नहीं हटाया जाएगा, जिसे सरकार लाने का प्रस्ताव कर रही है।

यह घटनाक्रम पिछले हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 12 सदस्यीय नागा प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात के बाद हुआ है। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने कहा कि शाह ने उन्हें आश्वासन दिया कि विधि आयोग ईसाई समुदाय और कुछ आदिवासियों को कानून से बाहर करने पर विचार कर रहा है।

इन अटकलों के बीच कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को संसद के मानसून सत्र की शुरुआत में पेश किया जा सकता है, यह अचानक देश  में एक गर्म राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

वर्तमान में, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसियों के जीवन के विभिन्न पहलू जैसे विवाह, विरासत, उत्तराधिकार, गोद लेना और संरक्षकता उनके अपने व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं।

नीति निर्देशक सिद्धांत बनाम मौलिक अधिकार

 यूसीसी का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में मिलता है। यह राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है। अनुच्छेद 44 में कहा गया है, "राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।" हालाँकि, निर्देशक सिद्धांत अदालत में तब तक लागू नहीं किए जा सकते जब तक कि उन्हें कानून नहीं बना दिया जाता; वे नीति निर्माण के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। इसके विपरीत, मौलिक अधिकार लागू करने योग्य हैं। सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। नेह। 

गोपनीयता एक मौलिक अधिकार क्यों है?

गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह व्यक्तियों को अपनी व्यक्तिगत जानकारी को नियंत्रित करने और सरकार या अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप के डर के बिना अपना जीवन जीने की अनुमति देता है। यह व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। निजता के अधिकार की अवधारणा को शब्दों में बयां करना आसान नहीं है।

भारत में गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि गोपनीयता आंतरिक रूप से जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी हुई है, और इसका 140 करोड़ भारतीयों के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। निजता के अधिकार को अपकृत्य कानून, (Torts Act - a wrongful act or an infringement of a right (other than under contract) leading to civil legal liability. आपराधिक कानून के साथ-साथ संपत्ति कानून के तहत भी इसमें शामिल एक आवश्यक तत्व के रूप में मान्यता दी गई है।  इसलिए, गोपनीयता हमारे जीवन का एक अत्यंत कीमती और मूल्यवान पहलू है। तकनीकी प्रगति के कारण गोपनीयता हर व्यक्ति की चिंता बन गई है और डेटा की सुरक्षा पर भी जोर दिया जा रहा है।

यहां कुछ कारण बताए गए हैं कि निजता एक मौलिक अधिकार क्यों है:-

 

स्वायत्तता: गोपनीयता व्यक्तियों को दूसरों के हस्तक्षेप के बिना अपने जीवन के बारे में अपनी पसंद बनाने की अनुमति देती है। यह व्यक्तिगत स्वायत्तता के लिए आवश्यक है, जो हमारे जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता है।

गरिमा: गोपनीयता व्यक्तियों को अपनी गरिमा और आत्म-सम्मान बनाए रखने की अनुमति देती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह हमें अपनी व्यक्तिगत जानकारी को नियंत्रित करने और यह तय करने की अनुमति देता है कि उस तक किसकी पहुंच है।

स्वतंत्रता: गोपनीयता व्यक्तियों को अपना जीवन स्वतंत्र रूप से और हस्तक्षेप के डर के बिना जीने की अनुमति देती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह हमें देखे जाने या निगरानी किए जाने की चिंता किए बिना अपने जीवन के बारे में अपनी पसंद बनाने की अनुमति देता है।

गोपनीयता अन्य कारणों से भी महत्वपूर्ण है, जैसे:

 व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा: गोपनीयता व्यक्तिगत जानकारी को अनधिकृत उद्देश्यों, जैसे पहचान की चोरी या भेदभाव के लिए उपयोग किए जाने से बचाने में मदद करती है।

मुक्त भाषण को प्रोत्साहित करना: गोपनीयता लोगों को प्रतिशोध के डर के बिना अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति देकर मुक्त भाषण को प्रोत्साहित कर सकती है।

नवाचार को बढ़ावा देना: गोपनीयता व्यवसायों को उनके डेटा चोरी या दुरुपयोग के डर के बिना नए उत्पादों और सेवाओं को विकसित करने की अनुमति देकर नवाचार को बढ़ावा दे सकती है।

निष्कर्ष - गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा, स्वतंत्रता और अन्य महत्वपूर्ण मूल्यों के लिए आवश्यक है। यह सुनिश्चित करने के लिए गोपनीयता की रक्षा करना महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपना जीवन स्वतंत्र रूप से और हस्तक्षेप के डर के बिना जी सकें।


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