परग्रही निर्मित यूएफओ

 पेंटागन यूएफओ प्रोग्राम के एक भूतपूर्व वैज्ञानिक (Former Pentagon UFO Program Scientist) ने जुलाई 2020 में दावा किया था कि अमेरिकी सरकारी एजेंसी को "ऑफ-वर्ल्ड व्हीकल्स" (दूसरी दुनिया का यान अर्थात् जिसे इस दुनिया में नहीं बनाया गया है) मिला है।

पेंटागन के सलाहकार रहे वैज्ञानिक कहते हैं कि अनिर्धारित मूल (undetermined origin) की इस सामग्री को "हम इसे स्वयं नहीं बना सकते।"
25 जुलाई, 2020 को प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, एक खगोल भौतिकीविद् और पेंटागन के यूएफओ कार्यक्रम के पूर्व सलाहकार ने हाल ही में अमेरिकी सरकारी अधिकारियों के सामने खुलासा किया कि "इस धरती पर नहीं बनाए गए विश्व के अंतरिक्ष यान को "हासिल किया गया है।"
उस पूर्व सलाहकार, एरिक डब्ल्यू डेविस ने कहा है कि उन्होंने रक्षा विभाग की एक एजेंसी को पिछले मार्च में एक अनिर्धारित मूल की सामग्री के हासिल होने के बारे में बताया था। डेविस ने न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार कहा, "हम (इस दुनिया में) इसे खुद नहीं बना सकते हैं।"
डेविस ने पहले सीनेट सशस्त्र सेवा समिति और सीनेट खुफिया समिति के स्टाफ सदस्यों को 2019 के अंत में अज्ञात सामग्रियों की प्राप्ति के बारे में बताया था।
हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि टाइम्स की रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि इन अजीब (Strange) सामग्रियों को कैसे या कहां से प्राप्त किया गया था। "क्या हम पुरानी घटना रोज्वेल (न्यू मैक्सिको) में दुर्घटनाग्रस्त अंतरिक्ष यान (सामान) की बात कर रहे हैं? या Skrulls (अलौकिक आकार का एक परग्रही प्रजाति) जो 90 के दशक से ही शायद हमारे बीच धुलमिल गए हैं; के बारे ?"
शायद अमेरिकी सैन्य लड़ाकू विमानों ने उन्हें रूसी या चीनी उड़न विमान समझ कर मार गिराया हो। लेकिन यह पता चला कैसे चले कि कि उनके बजाय ये यूरेनस ग्रह से आया था? हम अभी नहीं जानते ... अभी तक।
इन सब बातों के केंद्र में अमेरिकी सरकार का एक कार्यक्रम, "अज्ञात एरियल फेनोमेनन टास्क फोर्स" (Unidentified Aerial Phenomenon Task Force) है जो राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के लिएसिनेट में आगामी वर्ष के लिए खर्च के ब्यौरे प्रस्तुत करने के क्रम में जिक्र में आया था। (नये सृजित टास्क फोर्स पहले के एक "गुप्त यूएफओ कार्यक्रम" का स्थान लिया है जिसे भंग कर दिया गया था।
वित्तीय वर्ष 2021 के लिए "इंटेलिजेंस ऑथराइजेशन एक्ट" के लिए एक अज्ञात एरियल फेनोमेनन टास्क फोर्स की आवश्यकता थी, जो "अज्ञात हवाई घटनों का संग्रहण और रिपोर्टिंग को मानकीकृत करने के साथ साथ उनका किसी भी दुश्मन विदेशी सरकारों से संबंध और अमेरिकी सेना की संपत्ति और प्रतिष्ठानों के लिए खतरा" पर काम करे और रिपोर्ट करे।
इस अधिनियम के तहत टास्क फोर्स को इसके पारित होने के 180 दिनों के भीतर अपने कुछ निष्कर्षों की सार्वजनिक रिपोर्ट बनाने की आवश्यकता है। जिसका यह अर्थ है कि हम जल्द ही इन सब के बारे में अधिकृत स्तर से अधिक जान सकते हैं।
हालांकि, एलियंस(परग्रही) के बजाय, टास्क फोर्स को सबसे अधिक चिंता हैं उन यूएफओ का है जो संभवतः विदेशी विमान, कोई भी नया विमानन तकनीक जो प्रतिद्वंद्वी देशों या संभावित दुश्मनों को फायदा देता है, या ऐसे विमान जो अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों की जासूसी करते हैं; से है।
हलांकि इनमें से कुछ अजीब जिज्ञासपूर्ण सामग्रियों के लिए पूरी तरह से तार्किकमय व्याख्या पहले ही कर ली गई है, लेकिन हर मामला हमेशा ऐसा नहीं होता है। सिनेट में बहुमत के नेता रहे भूतपूर्व सिनेट हैरी रीड सहित कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी जो इस पहल का हिस्सा थे, वे इस बात के प्रमाण पर विश्वास करते हैं कि कुछ सामग्री अंतरिक्ष मूल की अधिक लगती हैं।
रीड ने टाइम्स को बताया, "इस पर गौर करने के बाद, मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि कुछ ख़बरें थीं - कुछ ठोस थीं, कुछ बहुत ठोस नहीं थीं - वास्तविक "वस्तु" सरकार और निजी क्षेत्र के कब्जे में थीं।"--अनुवाद-नेह इंदवार।

पैरों में कुल्हाड़ी मारना

 नेह अर्जुन इंदवार

2018 के 22 जुलाई को गुजरे आज 5 वर्ष हो गए। तब पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री ने कहा था कि 2018 के 30 जुलाई तक चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन की घोषणा कर दी जाएगी। जुमलेबाजी, धोखेबाजी, अकर्मण्यता और ढीठ भरे व्यवहार में ये महान नेतागण कितने प्रवीण हैं, यह अपने आप ही जाहिर है। 

2023   भी आधा खत्म हो गया है। लेकिन न्यूनतम वेतन की कोई सुगबुगाहट नहीं है। चाय बागानियारों ने बड़े-बड़े कुल्हाड़ी, टांगा और मारतुल से अपने पैरों को लहुलहान करके तृणमूल कांग्रेस को पंचायत चुनाव में वोट दिया है। अब  सरकार और तृणमूल कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के पूर्व न्यूनतम वेतन देने की बात करने की भी जरूरत नहीं है। जो जनता बिना मांगे ही लात की मांग करता है। उन्हें दूध-भात देने की जरूरत ही क्या है ? चुनाव आने से बड़े-बड़े सूरमा नेताओं के दिमाग भी चुनाव के लिए उछल-कूद करने लगता है। वहाँ की जनता का भविष्य भला उज्जवल होगा भी तो कहाँ से ???


पढ़ें --- 22 जुलाई 2018 को  प्रकाशित लेख.... 

पश्चिम बंगाल सरकार ने 30 जूलाई तक चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन घोषणा करने का वादा किया है।

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लेकिन क्या सरकार यह वादा पूरी करेगी ?  यदि करेगी तो मजदूरों को कितना न्यूनतम वेतन मिलेगा ? क्या मजदूरों को आवास के लिए लीज का अधिकार भी मिलेगा ?

सबसे महत्वपूर्ण बात है, न्यूनतम वेतन मिलेगा तो वह कब से लागू होगा ? क्या वह पिछली तारीख अर्थात 2014 की जनवरी से मिलेगा ? क्योंकि 2014 से लागू होने वाले  वेतन समझौते के समय से ही मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी मांग रहे थे और तब उनके द्वारा तीन वर्षीय मजदूरी वेतन निर्धारण शर्तों को अपनी ओर से तोड़ कर, न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन किया गया, बागानों में हड़ताल किया गया और इसके समर्थन में सार्वजनिक बंद भी बुलाया गया था। तब मजदूरों ने किसी भी तरह से तत्कालीन समय में लागू तीन वर्षीय वेतन समझौते को मानने से इंकार कर दिया था। 

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तब सरकार ने मजदूरों से न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए एक समिति बना दी थी। उस समिति के निर्णय को जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। उल्लेखनीय है कि 2011 में हुए वेतन समझौता को 2011 के जनवरी महीने से लागू किया गया था। उस तीन वर्षीय समझौते की मियाद 31 दिसंबर 2013 को समाप्त हो गया था। नया वेतन समझौता अर्थात् नये फार्मेट में न्यूनतम वेतन को 1 जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। तब सरकार ने कहा था कि जब तक न्यूनतम वेतन का निर्धारण नहीं हो जाता है, तब तक मजदूरों को “अंतरवर्तीकालीन मजदूरी” दी जाएगी। मतलब अभी अर्थात् दिनांक 1 जनवरी 2014 से जो मजदूरी दी जा रही है, वह अंतरवर्तीकालीन मजदूरी है न कि स्थायी। अंतरवर्तीकालीन का मतलब होता है temporary or  for time being or interval time. मतलब अभी के वेतन को स्थायी नहीं माना जाना है। इसे तो 1जनवरी 2014 से लागू होने वाले वेतन की जगह अंतरवर्तीकालीन के रूप में दिया जा रहा है। 

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इसलिए न्यूनतम वेतन की गणना दिनांक 1 जनवरी 2014 से होनी चाहिए। अर्थात् 1 जनवरी 2014 को सरकार द्वारा नियमों के अधीन महंगाई की घोषणा (डीए) के साथ न्यूनतम वेतन के लिए निर्धारित मूल वेतन मजदूरों को मिलना चाहिए। जितनी मजदूरी मिल चुकी है उतना पैसे काट कर बाकी पैसों को Arrear के रूप में मजदूरों को मिलना चाहिए। 

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 चूँकि सरकार द्वारा गठित समिति अपना काम समय पर पूरा नहीं कर सकी थी, इसलिए तत्काल रूप से मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा सका था। अब जब सरकार इसे घोषित करने वाली है तो सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु इसके लागू किए जाने वाली तारीख ही है। यदि सरकार 2014 के जनवरी महीने से इसे लागू नहीं करती है तो यह मजदूरों के साथ धोखाधड़ी और ठगी होगी। 

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इसका मतलब यह होगा कि सरकार बागान मालिकों को अरबों रूपये का आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए जानबूझ इसे किसी बाद की तारीख से लागू करने के लिए समिति के कामकाज को आगे ठेलते रही और बागान मालिकों को आर्थिक लाभ पहुँचाने का कुचक्र रचती रही। इसका मतलब यह भी है कि सरकार मजदूरों के अरबों रूपयों का नुकसान पहुँचाने के लिए षड़यंत्र रचती रही है। 

यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी को 1 जनवरी 2014 से लागू नहीं करती है तो यह स्वतंत्र के बाद पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ी ठगी होगी। यह आशंका आधारहीन नहीं है। क्योंकि सरकार ने 17.50 पैसे की वृद्धि और राशन के 660 रूपये की देनदारी पर मजदूरों के साथ धोखाबाजी की है और उसे पिछली तारीख से लागू करने के बजाय बहुत बाद की तारीख से लागू किया है। इस बार सरकार को अपनी ईमानदारी दिखानी होगी। बेईमानी होने पर गेट मिटिंग का आंदोलन और बंद का अह्वान करने वाले ट्रेड यूनियन का अगला कदम क्या होगा ? यह जानना दिलचस्प होगा। क्या मजदूर गोदामों से तैयार माल को उठाने से रोकने के लिए आंदोलन करेंगे ? 

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1 जनवरी 2014 को न्यूनतम वेतन की गणना किस तरह की जाएगी। आईए इसे जानने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के श्रम विभाग द्वारा असंगठित क्षेत्र के लिए जारी नोटिफिकेशन की जाँच पड़ताल करते हैं। 

1 जनवरी 2014 में सरकार ने न्यूनतम वेतन के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया था, उसमें निम्नलिखित चार्ट के अनुसार मजदूरी निर्धारित किया गया था।

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कृषि क्षेत्र के लिए -

Unskilled लेबर को 5347.00 (206.00) (without food), 4966.00 (191.00) (with food) )                                                                    

जबकि Semi-skilled लेबर को 5882.00 (226.00)  (without food), 5486.00 (211.00) with food) 

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यह दर 30 जून 2014 तक के लिए मान्य था। 

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छह महीने के बाद 1 जुलाई 2014 से लागू होने वाले नोटिफिकेशन के अनुसार निम्नांकित दर से न्यूनतम वेतन लागू किया किया।

Unskilled लेबर को 5762.00.00 (222.00) (without food); 4966.00 (206.00) (with food) per day

Semi-skilled लेबर को 6339.00 (244.00) (without food); 5486.00 (228.00) (with food) per day

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उपरोक्त टेबल पर के राशि में छह महीने में हुई बदलाव को देखें। 

कृषि क्षेत्र में Unskilled को छह महीने पहले 5347.00 (206.00) (without food); और Semi-skilled को 5882.00 (226.00)  (without food) मिलता था। 

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छह महीने में के बाद उन्हें क्रमशः 5762.00.00 (222.00) (without food); और 6339.00 (244.00) (without food) मिलने लगा। 

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छह महीने में 206 रूपये की जगह 222 रूपये और 226 रूपये की जगह 244 रूपये मिलने लगा। यह बदलाव छह महीने में अखिल भारतीय स्तर पर होने वाले महंगाई सूचकांक के अनुसार होता है। ख्याल रखें कि वर्तमान समय में चाय मजदूरों के वेतन में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता है।

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यदि मजदूरों को 2014 से न्यूनतम मजदूरी दी जाएगी तो इसकी गणना कमोबेश इसी आधार पर की जाएगी। इसका मतलब है कि चाय मजदूरी को बढ़ोतरी प्रत्येक छह महीने में होगी।

 यदि चाय बागानों में मिलने वाले फ्रिंज बेनेफिट और Perquisites को इसमें मिलाया जाएगा तो इसकी गणना इससे भी अधिक होगी। चाय बागान प्रबंधन प्रति महीना मजदूरों से पीएफ राशि के साथ ग्रेज्युएटी राशि की भी कटौती करता है। ग्रेज्यूएटी की राशि की कटौती कानूनन अवैध है। यदि यह मजदूरों के वेतन से ही काट कर दिया जाता है तो इसका नाम ग्रेज्यूएटी क्यों होना चाहिए ?

इस कानून के अनुसार कुछ निश्चित मामलों के आधार पर मालिक कर्मचारी को ग्रेज्युएटी से वंचित भी कर सकता है। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि यदि मालिक कर्मचारी के वेतन से ही ग्रेज्युएटी की कटौती की है तो वह उस राशि से कर्मचारी को कैसे वंचित कर सकता है, क्योंकि वह तो Provident Fund की तरह ही उनके खून-पसीने की कमाई है। ग्रेज्युएटी पर मालिकों द्वारा मजदूरों के वेतन से कटौती गैर कानूनी है और एक अपराध है।

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इस पर यदि मजदूर सक्षम कोर्ट पर जाएँ तो मालिकों को बहुत भारी जुर्माना अदा करने होंगे और कईयों को जेल की सलाखों में भी बंद किया जा सकता है। इस मामले पर श्रम मंत्रालय के इंस्पेक्टर और कंपनी के चार्टर्ड एकांउटेंड भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रेड यूनियन इस विषय को सरकार के समक्ष उठाएगा या इसे लेकर कोर्ट में जाएगा ? इस मामले में ट्रेड यूनियन ने क्यों अब तक मजदूरों को अंधेरे में रखा है और उसका आर्थिक शोषण में सहमति की भूमिका निभाया है। 

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आज की तारीख में केरल में मजदूरों को 600 रूपये न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। दक्षिण के राज्यों में कहीं भी तमाम सुविधाओं के साथ 300 रूपये से कम की मजदूरी नहीं है।  पश्चिम बंगाल में भी चाय मजदूरों को महंगाई भत्ता अर्थात डीए को छोड़ कर 270 मिलना चाहिए। महंगाई भत्ते के साथ इसे 375 से 400 रूपयों के बीच होना चाहिए। 

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सरकारी क्षेत्र में न्यूनतम वेतन का निर्धारिण असंगठित क्षेत्र के लिए किया जाता है। असंगठित क्षेत्र का मतलब ऐसा मजदूरी का क्षेत्र जहाँ मजदूर संगठित नहीं होते हैं। मजदूरों का कोई यूनियन नहीं होता है और और उनके पास मोलतोल करने की शक्ति भी नहीं होती है। क्योंकि वे कहीं दो चार की संख्या में तो कहीं पाँच-दस की संख्या में अनियमित ढंग से मजदूरी करते हैं और अपनी मजदूरी अपनी ओर से तय नहीं कर पाते हैं। असंगठित होने के कारण उनके साथ नाइंसाफी और पक्षपात तथा शोषण होने की बहुत संभावना होती है। इसीलिए उनके लिए सरकार हर छह महीने में वेतन का निर्धारण नोटिफिकेशन के जरिए करती है।

चाय बागान क्षेत्र एक संगठित क्षेत्र है और यहाँ 20 से भी अधिक श्रमिक संगठन हैं। वे न्यूनतम वेतन से भी अधिक के लिए मोलतोल करने की शक्ति रखते हैं। इसलिए न्यूनतम वेतन से उन्हें अधिक वेतन मिलना चाहिए।  

बागान मालिक मजदूरों से अनेक सुविधाओं के लिए वेतन से पैसे कटौती करते हैं, लेकिन वे वेतन से राशि कटौती करके भी उन सुविधाओं को मुकम्मल ढंग से नहीं देते हैं। इसके लिए श्रम विभाग को कार्य करना चाहिए लेकिन वह मालिकों से पैसा लेकर मजदूरों के पक्ष में कोई कदम नहीं उठाते हैं और मजदूरों का भारी शोषण जारी रहता है। 

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अब बहुत सारी सुविधाओं को मालिक पक्ष ने देना बंद कर दिया है। कंबल, चप्पल, लकड़ी आदि सुविधाओं पर कोई नीति नहीं है।  वहीं तीन स्तरीय पंचायत सरकार के प्रावधानों को चाय बागानों में लागू किए जाने के कारण अधिकतर नागरिक सुविधाएँ मजदूरों को सरकार से मिल रही है। ऐसे में आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक कार्य आदि के पैसे चाय बागान प्रबंधन द्वारा वेतन से काटने का कोई मतलब नहीं है। इस तरह के लगातार कटौती मजदूरों से मजदूरों का आर्थिक शोषण ही जारी रहता है।

असम सरकार ने चाय मजदूरों के पक्ष में निर्णय लेते हुए प्रत्येक बागान में दो एकड़ जमीन लेकर प्रत्येक चाय बागान में एक उच्च विद्यालय और एक प्राईमरी हेल्थ सेटर की स्थापना कर रही है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा के लिए राज्य के प्रत्येक मेडिकल कालेज में तीन सीट चाय बागान के बच्चों के लिए आरक्षित रख रही है।

लेकिन पश्चिम बंगाल में मजदूरों के पक्ष में सरकार द्वारा सिर्फ प्रतीकात्मक कदम ही उठाए जा रहे हैं। चाहे वह टी टुरिज्म की नीति हो चाहे, लोक संस्कृति के माध्यम से दो तीन दर्जन लोगों को रोजगार देने की घोषणा या किसी पर्व त्यौहार में अवकाश की घोषणा।  

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मालबाजार में 2013 में ममता बनर्जी ने आदिवासियों के बच्चों के लिए यूपीएससी, मेडिकल, ईंजीनियरिंग आदि के लिए कोचिंग क्लास शुरू करने की घोषणा की थी। लेकिन वह अब तक जमीनी स्तर पर कहीं दिखाई नहीं दी है। न ही मजदूरों को आवास के लिए बागानों में पट्टा देने की घोषणा पूरी हुई। दो हिंदी कालेज बने लेकिन वहाँ कालेज भर्ती में आदिवासी या नेपाली बच्चों के छह प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। अब कुछ दिन पहले ममता ने कहा कि सरकार मजदूरों के बच्चों को रोजगारउन्मुख प्रशिक्षण देगी, लेकिन ममता ने ऐसी बातें 2013 में भी कहा था, और वे अब तक जुमला ही साबित हुई है।  ये तमाम कार्य सिर्फ आंख में धूल झोंकने के बराबर ही है। 

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चाय बागानों के मजदूरों और उनके साथ रहने वाले आदिवासी और नेपाली समाज का विकास आर्थिक और सामाजिक विकास की ठोस नीतियों के आधार पर होंगी न कि प्रतीकात्मक कदमों के द्वारा। ठोस नीति में श्रम के बदले कानूनन न्यायपूर्ण वेतन देना पहली बात होगी।  

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अक्सर मालिक पक्ष द्वारा कहा जाता है कि मजदूरों को न्यायपूर्ण वेतन देने से चाय बागान कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव पडेगा और कई बागान बंद हो सकते हैं। लेकिन केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में चाय मजदूरों को प्लानटेंशन लेबर एक्ट में उल्लेखित सुविधाओं के साथ 300-500 न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। नागरिक सुविधाएँ देने के लिए उन राज्यों में मजदूरी से कोई कटौती भी नहीं की जाती है।

चाय बागानों की चाय से होने वाली आय पर एक नजर देखने से हमें पता चल जाएगा कि पश्चिम बंगाल और दक्षिण राज्यों के चाय बागानों के चाय की कीमतों में कितना अंतर है।.

टी बोर्ड के द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 19 दिसंबर 2015 में नीलाम हुए सीटीसी चाय की कीमत निम्नांकित थी। 

सिलीगुड़ी में प्रति केजी 153, गुवाहाटी में 135,  वहीं उसी दिन कोचिन में 105 रूपये, कुन्नुर में 82 रूपये, कोयंबटूर 86 रूपये था। 

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दिनांक 26 सितंबर 2015 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 158 गुवाहाटी में 146,  वहीं उसी दिन कोचिन में 98 रूपये, कुन्नुर में 68 रूपये, कोयंबटूर 72 रूपये था। 

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दिनांक 2 दिसंबर 2017 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 157,  गुवाहाटी में 142,  वहीं उसी दिन कोचिन में 110 रूपये, कुन्नुर में 74 रूपये, कोयंबटूर 89 रूपये था।

यह देखा गया है कि पश्चिम बंगाल के सीटीसी चाय की कीमत असम और दक्षिण भारत के चाय से हमेशा अधिक रहा है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों को दक्षिण के चाय बागानों से हमेशा अधिक आय होता रहा है। लेकिन सबसे अधिक चाय की कीमत वसूल कर भी पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों को सबसे कम वेतन दिया जाता है। जबकि सबसे कम कीमत पाकर भी तमिलनाडु, केरल और कनार्टक में मजदूरों को 300 से 500 रूपये तक मजदूरी दी जाती है।

(TAN TEA  तमिलनाडु में चाय मजदूरों को Basic Wage के रूप में 183.50 रूपये और डीए के रूप में 117.70 रूपये कुल 301.20 पैसे मजदूरी दी जाती है। अधिक जानकारी के लिए लिंक पर क्लिक करें। http://tantea.co.in/org.html)

पश्चिम बंगाल में मजदूरों द्वारा अधिक मजदूरी की मांग किए जाने पर बागानों को बंद करने की धमकी दी जाती है। इस तरह की अनैतिक बातें दशकों से होता रहा है। इस प्रकार का व्यवहार अब तो बंद होना चाहिए। 

चाय बागानों के दूसरे अनेक समस्याओं पर भी एक मुश्त निर्णय होना चाहिए। चाय बागानों में केमिकल का छिड़काव करने वाले मजदूरों को न तो सुरक्षा दिया जाता है और न उनका मेडिकल जाँच की जाती है और न ही उन्हें अतिरिक्त वेतन और Insurance की सुविधा दी जाती है। The Insecticides Act, 1968  पर सरकार ने चाय मजदूरों के लिए क्या कदम उठाया है ? मजदूरों को इसकी जानकारी देना बहुत जरूरी है।

चाय मजदूर और फैक्टरी में काम करने वालों की अदला-बदली की जाती है। क्या बागानों में काम करने वालों पर भी फैक्टरी एक्ट लागू है ? दोनों जगह की मजदूरी एक जैसी क्यों होनी चाहिए ?

चाय बागानों में झोला छाप डाक्टरों की नियुक्ति से क्या सरकार मजदूरों की मौत को सुनिश्चित करना चाहती है। बागान अस्पतालों की हालत कैसी होती है यह सभी जानते हैं। ग्रुप अस्पताल की बातें हमेशा हवा-हवाई होती रहीं हैं। बाबु स्टाफ में शिक्षित युवाओं की कहीं भी निष्पक्ष भर्ती नहीं होती है। 

Company Social Responsibility  के तहत कंपनी कैसे अपना पैसा गैर बागान क्षेत्र या शहरों में खर्च करती है ????  क्या बागानों के निवासियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी सिर्फ पैसे कमाने की रह गई है। सरकार इस संबंध में क्या सोचती है, सरकार को स्पष्ट करनी चाहिए।

मजदूरों को राशन के बाबत 660 रूपये मिलने चाहिए। आखिर इस रूपये को कम करके दैनिक 9 रूपये करने के निर्णय के पीछे क्या औचित्य है? 

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30 जुलाई बहुत दूर नहीं है। इस दिन सरकार अपने वादे के अनुसार न्यूनतम मजदूरी की घोषणा करेगी तो मजदूरों को अन्य राज्यों के साथ इसकी तुलना करनी चाहिए। फ्रिंज बेनेफिट, परक्युजिट, नागरिक सुविधाओं की भी तुलना की जाए। 

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मजदूरी के साथ मजदूरों के आवास पट्टा, फ्रिंज बेनेफिट आदि बहुत सारे मामले हैं जिस पर सरकार को अपना रूख स्पष्ट करनी चाहिए। यदि सरकार मजदूरों के साथ न्याय करती है तो सच में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार माँ, माटी और मनुष्य की सरकार होने का सबूत देगी।

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यदि मजदूरों को न्याय पूर्ण मजदूरी नहीं मिलेगी तो मजदूरों को न्याय पाने के लिए सड़कों पर उतरना होगा और आवश्यकता के अनुसार कोर्ट का भी रास्ता चुनना होगा। प्लान्टेशन लेबर एक्ट 1951 में 2010 में एक संशोधन किया गया था, जिसके अनुसार यदि कोई असंतुष्ट मजदूर चाहे तो अपने साथ होने वाले अन्याय के विरूद्ध कोर्ट का रास्ता चुन सकता है। पहले यह सुविधा सिर्फ ट्रेड यूनियन को प्राप्त था। अब कोई भी मजदूर शोषण, वंचना, पक्षपात के आधार पर बिना किसी ट्रेड यूनियन के सहारे ही कोर्ट में जा सकता है और अपने लिए न्याय मांग सकता है। आखिर अन्याय और शोषण सहने की भी एक सीमा होती है।

"हम महामूर्ख हैं"


1980 के दशक में दुनिया को ग्रीनहाउस प्रभाव के प्रति सचेत करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक जेम्स हेन्सन के अनुसार, दुनिया अत्यधिक गर्म जलवायु की ओर बढ़ रही है, जो मानव के अस्तित्व में आने से पहले, पिछले दस लाख वर्षों में नहीं देखी गई थी, क्योंकि जलवायु संकट पर तमाम आंकड़ों, अध्ययनों और सबूतों सहित चेतावनियों जारी करने पर भी वैश्विक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करने पर यह जाहिर हो गया है कि मानव के रूप में "हम महामूर्ख हैं"।

 

हैनसेन, जिनकी 1988 में अमेरिकी सीनेट में दी गई गवाही को वैश्विक तापमान के पहले हाई-प्रोफाइल रहस्योद्घाटन के रूप में उद्धृत किया जाता है, ने दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ एक बयान में चेतावनी दी थी कि दुनिया एक "नई जलवायु सीमा" की ओर बढ़ रही है, जिसमें पिछले दस लाख वर्षों में किसी भी बिंदु से अधिक तापमान होगा, जिससे भयंकार तूफान, गर्म हवा और सूखे जैसे खतरनाक प्रभाव सामने आएंगे।

 

हैनसेन ने कहा कि बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के बाद से दुनिया पहले ही लगभग 1.2C गर्म हो चुकी है, जिससे उत्तरी गोलार्ध के कई हिस्सों में वर्तमान में देखे जाने वाले अत्यधिक गर्मी के तापमान की 20% संभावना है, जो 50 साल पहले 1% संभावना थी, हैनसेन ने कहा।

 

82 वर्षीय हैनसेन ने अमेरिकी अखबार गार्जियन से वार्ता करते हुए कहा  है, "जब तक हम ग्रीनहाउस गैस की मात्रा कम नहीं करते,  बहुत कुछ होने की संभावना है। ये विध्वंसात्मक तुफान मेरे पोते-पोतियों के जीवन के अनुभव हैं। हम सोच-समझकर नई ध्वंसात्मक वास्तविकता की ओर बढ़ रहे हैं - हमें पता था कि यह आ रही है।''

 

हैनसेन नासा के जलवायु वैज्ञानिक थे, जब उन्होंने सांसदों को बढ़ती वैश्विक गर्मी के बारे में चेतावनी दी थी और तब से उन्होंने दशकों से ग्रह-ताप उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्रवाई की कमी की निंदा करने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया है।

उन्होंने कहा कि हाल के सप्ताहों में अमेरिका, यूरोप, चीन और अन्य जगहों पर रिकॉर्ड गर्मी की लहरों ने "निराशा की भावना को बढ़ा दिया है कि हम वैज्ञानिकों ने अधिक स्पष्ट रूप से संवाद नहीं किया और हमने अधिक बुद्धिमान प्रतिक्रिया देने में सक्षम नेताओं को नहीं चुना"।

 

"इसका मतलब है कि हम शापित महामूर्ख हैं," हैनसेन ने जलवायु संकट के प्रति मानवता की कठिन प्रतिक्रिया के बारे में कहा। "इस पर विश्वास करने के लिए हमें इसका स्वाद चखना होगा।"

 

ऐसा लग रहा है कि चालू वर्ष वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया जाएगा, जून में पहले से ही सबसे गर्म गर्मी देखी जा रही है और, संभवतः, अब तक का सबसे गर्म सप्ताह विश्वसनीय रूप से मापा गया है। इसके विपरीत, 2023 को समय के साथ एक औसत या हल्का वर्ष भी माना जा सकता है, क्योंकि तापमान में वृद्धि जारी है। हैनसेन ने कहा, "चीजें बेहतर होने से पहले और भी बदतर हो जाएंगी।"

 

इसका मतलब यह नहीं है कि इस साल किसी विशेष स्थान पर अत्यधिक गर्मी हर साल दोहराई जाएगी और बढ़ेगी। मौसम में उतार-चढ़ाव चीजों को इधर-उधर कर देता है। लेकिन वैश्विक औसत तापमान बढ़ जाएगा और जलवायु परिवर्तन अधिक से अधिक बोझिल हो जाएगा, जिसमें अधिक चरम घटनाएं भी शामिल होंगी।''

 

 

हैनसेन ने एक नए शोध पत्र में तर्क दिया है, जिसकी अभी सहकर्मी-समीक्षा की जानी है, कि वैश्विक तापन की दर तेज हो रही है, तब भी जब प्राकृतिक विविधताएं, जैसे कि वर्तमान अल नीनो जलवायु घटना, जो समय-समय पर तापमान बढ़ाती है, के कारण होती है। इसका कारण यह है कि उन्होंने जो कहा वह सूर्य से ग्रह में आने वाली ऊर्जा बनाम पृथ्वी से परावर्तित ऊर्जा की मात्रा में "अभूतपूर्व" असंतुलन था।

 

 

जबकि जीवाश्म ईंधन के जलने के कारण वैश्विक तापमान निस्संदेह बढ़ रहा है, वैज्ञानिक इस बात पर विभाजित हैं कि क्या यह दर तेज हो रही है। पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक माइकल मान ने कहा, "जिम जो दावा कर रहा है उसका हमें कोई सबूत नहीं मिला है।" उन्होंने कहा कि जलवायु प्रणाली का ताप "उल्लेखनीय रूप से स्थिर" था। अन्य लोगों ने कहा कि यह विचार प्रशंसनीय है, हालाँकि निश्चित होने के लिए अधिक डेटा की आवश्यकता है।

 

यह कहना शायद जल्दबाजी होगी कि गर्मी बढ़ रही है, लेकिन यह निश्चित रूप से कम नहीं हो रही है। पर्ड्यू विश्वविद्यालय में पेलियोक्लाइमेटोलॉजी के विशेषज्ञ मैथ्यू ह्यूबर ने कहा, ''हम अभी भी गैस पर अपना पैर रखे हुए हैं।''

 

हेन्सन ने 1989 में सीनेट उपसमिति के सामने गवाही दी, उसके एक साल बाद इतिहास रचने वाली गवाही ने दुनिया को बताया कि ग्लोबल वार्मिंग यहाँ थी और यह और बदतर हो जाएगी।

वैज्ञानिकों ने बर्फ के टुकड़ों, पेड़ों के छल्लों और तलछट के जमाव के माध्यम से एकत्र किए गए सबूतों के आधार पर पुनर्निर्माण के माध्यम से अनुमान लगाया है कि हीटिंग में मौजूदा वृद्धि पहले से ही वैश्विक तापमान को उस स्तर पर ले आई है जो पृथ्वी पर नहीं देखा गया है। साभार-गार्जियन।

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यूसीसी से क्यों आशंकित हैं आदिवासी समुदाय ?

समान नागरिक संहिता Uniform Civil Code (UCC) का विरोध देश भर के आदिवासी समुदाय कर रहे हैं।  पूर्वोत्तर सहित बंगाल, बिहार, झारखंड. छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान सहित देश के अन्य हिस्सों के आदिवासी समुदायों ने प्रस्तावित यूसीसी का विरोध किया है क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनकी पहचान और स्वायत्तता को खतरा होगा। जबकि आदिवासी समुदाय ज्यादातर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत, भूमि और संपत्ति के मामलों में अपने पारंपरिक कानूनों द्वारा शासित होते हैं, संविधान कुछ राज्यों में जनजातियों के स्थानीय रीति-रिवाजों की भी रक्षा करता है। यूसीसी पर अपने विचारों को सरकारी मशीनरी तक पहुँचाने की आखिरी तारीख कल यानी 13 जुलाई है। बताया जा रहा है कि कानू मंत्रालय को अब तक 19 लाख से अधिक प्रतिक्रियाएं मिलीं है और आखिरी तारीख तक एक लाख से अधिक प्रतिक्रियाएं मिलने की उम्मीद है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद और कानून एवं न्याय पर संसदीय समिति के अध्यक्ष सुशील कुमार मोदी ने कहा कि पूर्वोत्तर और देश के अन्य हिस्सों में बसी आदिवासी आबादी को समान नागरिक संहिता से दूर रखा जाना चाहिए। विपक्षी नेताओं और कुछ भाजपा नेताओं की आलोचना के बाद, मोदी ने सोमवार को यूसीसी पर एक पैनल बैठक के दौरान कहा कि पूर्वोत्तर भारत, जो अनुच्छेद 371 के प्रावधानों के तहत शासित है, और अनुसूची के तहत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों को कानून से छूट दी जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि इसका विरोध करने वाले तमाम समुदायों के साथ कई विपक्षी नेताओं और कुछ भाजपा नेताओं ने भी यूसीसी के कार्यान्वयन का विरोध किया है।

मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने यूसीसी पर कहा था कि उनके राज्य के रीति-रिवाजों और परंपराओं  को खारिज नहीं किया जा सकता है और सभी को एक नए नियम का पालन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस सांसदों ने सवाल किया है कि क्या यूसीसी लागू होने से देश में धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा ?  बताया जाता है कि वरिष्ठ वकील और कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने हवाला दिया कि यूसीसी के बारे में अब तक जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक शादी पर्सनल लॉ के तहत आती है, जिसमें यूसीसी लागू होने पर बदलाव हो सकता है। तन्खा ने बताया कि जब सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह की सुनवाई चल रही थी, तब सरकार ने तर्क दिया कि विवाह स्वाभाविक रूप से किसी के धर्म से जुड़ा होता है, इसलिए यूसीसी द्वारा विवाह कानूनों को लागू करने से नागरिकों की धार्मिक भावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

तन्खा और डीएमके सांसद पी विल्सन द्वारा प्रस्तुत दो अलग-अलग लिखित बयानों के माध्यम से विधि आयोग के सदस्य-सचिव के. बिस्वाल से पूछा गया है कि ये मामले सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए क्यों खुले हैं, जबकि पिछले विधि आयोग ने 2018 में कथित तौर पर यूसीसी को 'न तो' आवश्यक और न ही वांछनीय' बताया था।

 

इस पर भाजपा प्रतिनिधि महेश जेठमलानी ने तर्क दिया कि संविधान सभा की बहस के दौरान इसे हमेशा अनिवार्य माना जाता था।

पूर्वोत्तर राज्यों सहित भारत के विभिन्न हिस्सों के आदिवासी समुदायों के दबाव में, केंद्र प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के दायरे से आदिवासी समूहों को बाहर करने की संभावना है। एक उच्च पदस्थ सूत्र के अनुसार कि आदिवासी समुदायों के रीति-रिवाज और परंपराएं, जो संविधान के तहत संरक्षित हैं, उन्हें यूसीसी के तहत नहीं हटाया जाएगा, जिसे सरकार लाने का प्रस्ताव कर रही है।

यह घटनाक्रम पिछले हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 12 सदस्यीय नागा प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात के बाद हुआ है। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने कहा कि शाह ने उन्हें आश्वासन दिया कि विधि आयोग ईसाई समुदाय और कुछ आदिवासियों को कानून से बाहर करने पर विचार कर रहा है।

इन अटकलों के बीच कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को संसद के मानसून सत्र की शुरुआत में पेश किया जा सकता है, यह अचानक देश  में एक गर्म राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

वर्तमान में, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसियों के जीवन के विभिन्न पहलू जैसे विवाह, विरासत, उत्तराधिकार, गोद लेना और संरक्षकता उनके अपने व्यक्तिगत कानूनों द्वारा शासित होते हैं।

नीति निर्देशक सिद्धांत बनाम मौलिक अधिकार

 यूसीसी का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में मिलता है। यह राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है। अनुच्छेद 44 में कहा गया है, "राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।" हालाँकि, निर्देशक सिद्धांत अदालत में तब तक लागू नहीं किए जा सकते जब तक कि उन्हें कानून नहीं बना दिया जाता; वे नीति निर्माण के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। इसके विपरीत, मौलिक अधिकार लागू करने योग्य हैं। सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। नेह। 

गोपनीयता एक मौलिक अधिकार क्यों है?

गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह व्यक्तियों को अपनी व्यक्तिगत जानकारी को नियंत्रित करने और सरकार या अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप के डर के बिना अपना जीवन जीने की अनुमति देता है। यह व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। निजता के अधिकार की अवधारणा को शब्दों में बयां करना आसान नहीं है।

भारत में गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि गोपनीयता आंतरिक रूप से जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी हुई है, और इसका 140 करोड़ भारतीयों के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। निजता के अधिकार को अपकृत्य कानून, (Torts Act - a wrongful act or an infringement of a right (other than under contract) leading to civil legal liability. आपराधिक कानून के साथ-साथ संपत्ति कानून के तहत भी इसमें शामिल एक आवश्यक तत्व के रूप में मान्यता दी गई है।  इसलिए, गोपनीयता हमारे जीवन का एक अत्यंत कीमती और मूल्यवान पहलू है। तकनीकी प्रगति के कारण गोपनीयता हर व्यक्ति की चिंता बन गई है और डेटा की सुरक्षा पर भी जोर दिया जा रहा है।

यहां कुछ कारण बताए गए हैं कि निजता एक मौलिक अधिकार क्यों है:-

 

स्वायत्तता: गोपनीयता व्यक्तियों को दूसरों के हस्तक्षेप के बिना अपने जीवन के बारे में अपनी पसंद बनाने की अनुमति देती है। यह व्यक्तिगत स्वायत्तता के लिए आवश्यक है, जो हमारे जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता है।

गरिमा: गोपनीयता व्यक्तियों को अपनी गरिमा और आत्म-सम्मान बनाए रखने की अनुमति देती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह हमें अपनी व्यक्तिगत जानकारी को नियंत्रित करने और यह तय करने की अनुमति देता है कि उस तक किसकी पहुंच है।

स्वतंत्रता: गोपनीयता व्यक्तियों को अपना जीवन स्वतंत्र रूप से और हस्तक्षेप के डर के बिना जीने की अनुमति देती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह हमें देखे जाने या निगरानी किए जाने की चिंता किए बिना अपने जीवन के बारे में अपनी पसंद बनाने की अनुमति देता है।

गोपनीयता अन्य कारणों से भी महत्वपूर्ण है, जैसे:

 व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा: गोपनीयता व्यक्तिगत जानकारी को अनधिकृत उद्देश्यों, जैसे पहचान की चोरी या भेदभाव के लिए उपयोग किए जाने से बचाने में मदद करती है।

मुक्त भाषण को प्रोत्साहित करना: गोपनीयता लोगों को प्रतिशोध के डर के बिना अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति देकर मुक्त भाषण को प्रोत्साहित कर सकती है।

नवाचार को बढ़ावा देना: गोपनीयता व्यवसायों को उनके डेटा चोरी या दुरुपयोग के डर के बिना नए उत्पादों और सेवाओं को विकसित करने की अनुमति देकर नवाचार को बढ़ावा दे सकती है।

निष्कर्ष - गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा, स्वतंत्रता और अन्य महत्वपूर्ण मूल्यों के लिए आवश्यक है। यह सुनिश्चित करने के लिए गोपनीयता की रक्षा करना महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपना जीवन स्वतंत्र रूप से और हस्तक्षेप के डर के बिना जी सकें।


अमेरिकी खुफिया जासूस एडवर्ड स्नोडेन

 एडवर्ड स्नोडेन एक अमेरिकी कंप्यूटर इंटेलिजेंस सलाहकार और पूर्व CIA कर्मचारी थे, जिन्होंने 2013 में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (NSA) से पत्रकारों को अत्यधिक वर्गीकृत जानकारी लीक की थी। उनके खुलासे से कई वैश्विक निगरानी कार्यक्रमों का पता चला, जिनमें से कई एनएसए National Security Agency (NSA) और फाइव आइज़ खुफिया गठबंधन (Five Eyes intelligence alliance) द्वारा दूरसंचार कंपनियों और यूरोपीय सरकारों के सहयोग से चलाए गए थे।

स्नोडेन के कार्यों ने उन्हें एक विवादास्पद व्यक्ति बना दिया। कुछ लोगों ने सरकारी निगरानी की सीमा को उजागर करने के लिए उन्हें एक नायक के रूप में सराहा, जबकि अन्य ने वर्गीकृत जानकारी का खुलासा करने के लिए उन्हें देशद्रोही के रूप में निंदा की।

 स्नोडेन वर्तमान में रूस में निर्वासन में रह रहे हैं, जहां उन्हें 2013 में शरण दी गई थी। उन्होंने कहा है कि अगर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी दी जाती है तो वह संयुक्त राज्य अमेरिका लौटने को तैयार हैं।

 

स्नोडेन की मुखबिरी का व्यापक निगरानी के बारे में बहस पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। उनके खुलासों से इस मुद्दे के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी है और सरकारी निगरानी कार्यक्रमों में सुधार की मांग उठी है।

यहां कुछ कारण दिए गए हैं कि एडवर्ड स्नोडेन इतने प्रसिद्ध क्यों हैं:

 उन्होंने एनएसए के व्यापक निगरानी कार्यक्रमों के बारे में वर्गीकृत जानकारी लीक की।

उनके लीक ने राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी।

वह एक विवादास्पद व्यक्ति हैं, कुछ लोग उन्हें हीरो कहते हैं और कुछ लोग उन्हें गद्दार कहते हैं।

वह फिलहाल रूस में निर्वासन में रह रहे हैं।

उनकी मुखबिरी का व्यापक निगरानी के बारे में बहस पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है।

चाहे आप उनके कार्यों से सहमत हों या नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि एडवर्ड स्नोडेन सामूहिक निगरानी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। उनके लीक ने गोपनीयता और सुरक्षा के बारे में हमारे सोचने के तरीके को बदल दिया है, और आने वाले वर्षों में उन पर बहस जारी रहेगी।

 

2013 में एडवर्ड स्नोडेन के सनसनीखेज खुलासे ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) और सरकारी संचार मुख्यालय (Government Communications Headquarters (GCHQ)) द्वारा चलाए जा रहे बड़े पैमाने पर निगरानी कार्यक्रमों की सीमा को उजागर कर दिया। इन कार्यक्रमों ने अमेरिकियों सहित दुनिया भर के लाखों लोगों के संचार पर भारी मात्रा में डेटा एकत्र किया।

 

स्नोडेन के लीक से कुछ सबसे महत्वपूर्ण खुलासे में शामिल हैं:

 

एनएसए बिना वारंट के लाखों अमेरिकियों के फोन रिकॉर्ड इकट्ठा कर रहा था।

एनएसए संयुक्त राज्य अमेरिका के माध्यम से गुजरने वाले सभी इंटरनेट ट्रैफ़िक का मेटाडेटा भी एकत्र कर रहा था, जिसमें देखी गई वेबसाइटें, भेजे गए ईमेल और किए गए फ़ोन कॉल शामिल थे।

एनएसए इस डेटा को यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों के साथ साझा कर रहा था।

एनएसए इस डेटा का इस्तेमाल जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल समेत विदेशी नेताओं की जासूसी करने के लिए भी कर रहा था।

स्नोडेन के खुलासे ने राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी। कुछ लोगों ने तर्क दिया कि देश को आतंकवाद से बचाने के लिए एनएसए के कार्यक्रम आवश्यक थे, जबकि अन्य ने तर्क दिया कि वे सरकारी शक्ति का अतिक्रमण थे।

 

बड़े पैमाने पर निगरानी पर बहस आज भी जारी है। हालाँकि, स्नोडेन के खुलासों का लोगों की गोपनीयता और सुरक्षा के बारे में सोचने के तरीके पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है।

स्नोडेन की मुखबिरी के कुछ परिणाम इस प्रकार हैं:

बड़े पैमाने पर निगरानी के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी: स्नोडेन के खुलासे ने बड़े पैमाने पर निगरानी को जनता के ध्यान में इस तरह ला दिया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। इससे इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक बहस छिड़ गई और सरकारी निगरानी कार्यक्रमों की जांच बढ़ गई।

सरकारी निगरानी कार्यक्रमों में बदलाव: स्नोडेन के खुलासे के मद्देनजर, कुछ सरकारों ने अपने निगरानी कार्यक्रमों में बदलाव किए हैं। उदाहरण के लिए, एनएसए ने बिना वारंट के लाखों अमेरिकियों के फोन रिकॉर्ड एकत्र करना बंद कर दिया है।

नए कानून और नियम: कुछ देशों ने सरकारी निगरानी को नियंत्रित करने वाले नए कानून और नियम भी पारित किए हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ ने जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (DGPR) पारित किया, जो व्यक्तियों को उनके व्यक्तिगत डेटा पर अधिक नियंत्रण देता है।

एन्क्रिप्शन का बढ़ा उपयोग: स्नोडेन के खुलासे से एन्क्रिप्शन का उपयोग भी बढ़ा है। इससे सरकारों के लिए लोगों के संचार की जासूसी करना और अधिक कठिन हो जाता है।

स्नोडेन की मुखबिरी का असर आज भी महसूस किया जा रहा है। संभावना है कि उनके खुलासे आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर निगरानी के बारे में बहस को आकार देते रहेंगे। प्रस्तुति ः नेह 

दुनिया के नास्तिक देश

 

नेह इंदवार 

यद्यपि दुनिया में नास्तिकों की निश्चित संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन कई देशों के राजनैतिक, धर्मनिरपेक्ष सामाजिक महौल, शिक्षा और स्वतंत्र चिंतनधारा के कारण नास्तिक (अर्थात् ऐसे लोग जो किसी भी धर्म से नहीं जुड़े हैं और अपने को किसी भी पारंपारिक धर्म के अनुयायी के रूप में चिह्नित होने से इंकार करते हैं) की जनसंख्या विश्व में निरंतर बढ़ कही है। नास्तिकों के बढ़ने के कई कारण और कारक हैं।

धर्म के आर्थिक और राजनैतिक लाभ लेने वाले लोग नास्तिकता के विस्तार को अपने आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक वर्चस्व के लिए खतरनाक मानते हैं और वे आस्तिकता को वैश्विक स्तर पर बनाए रखने के लिए विभिन्न तरह की योजनाएँ बनाते हैं और नास्तिकता का विरोध करके उन्हें हतोत्साहित करते हैं। धर्म के नाम पर स्थापित शासन इसके लिए विशेष नीतियाँ बनाती हैं और नास्तिकता के विरूद्ध में गलत प्रचार करके उनके विरूद्ध महौल बनाने की हरचंद कोशिश करती हैं। हालाँकि, कुछ अनुमान बताते हैं कि आने वाले वर्षों में नास्तिकों की संख्या बढ़ सकती है।

 प्यू रिसर्च सेंटर के 2012 के एक अध्ययन में पाया गया कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो किसी भी धर्म से नहीं जुड़े हैं, और यह वृद्धि विशेष रूप से दुनिया के कुछ हिस्सों, जैसे यूरोप और पूर्वी एशिया में देखी गई है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि नास्तिक के रूप में पहचान करने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है, हालांकि उतनी तेजी से नहीं जितनी तेजी से उन लोगों की संख्या बढ़ रही है जो किसी भी धर्म से अपनी पहचान नहीं रखते हैं।

यदि ये प्रवृत्तियाँ जारी रहीं, तो संभव है कि 21वीं सदी के अंत तक दुनिया में नास्तिकों की संख्या 10% या उससे अधिक तक पहुँच जाये। हालाँकि, यह भी संभव है कि नास्तिकता की वृद्धि धीमी हो जाएगी या स्थिर हो जाएगी। यह निश्चित रूप से कहना जल्दबाजी होगी कि भविष्य में क्या होगा।

कुछ कारक ऐसे हैं जो दुनिया में भविष्य में नास्तिकों की संख्या को प्रभावित कर सकते हैं:

राजनीतिक और सामाजिक माहौल: राजनीतिक और सामाजिक माहौल नास्तिकता की व्यापकता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। उदाहरण के लिए, जिन देशों में स्वतंत्रता प्रतिबंधित है, वहां नास्तिकों द्वारा अपनी धार्मिक मान्यताओं को छिपाने या यहां तक ​​कि सताए जाने की संभावना अधिक हो सकती है। इसके विपरीत, जिन देशों में स्वतंत्रता की गारंटी है, और आधुनिक विचारों से प्रेरित शिक्षा व्यवस्था और मीडिया है वहां नास्तिकों के अपने विश्वासों के बारे में खुले रहने की अधिक संभावना हो सकती है। धर्म के नाम पर गरीब और अशिक्षित जनता का शोषण और दमन भी धर्म के प्रति अरूचि का एक कारण है। विश्व में रंगभेद, जातिभेद, वर्णभेद आदि कुछ ऐसे कारक रहे हैं, जिसके पीछे धर्म के सिद्धांत मुख्य कारक रहे हैं। इसलिए धर्म को त्यागने की और इससे मुक्ति की चाहत से नास्तिक विचारों को बल मिला है। मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में ईशनिंद कानून लागू होने के कारण नास्तिक अपने परिचय में अपने नास्तिक विश्वास को व्यक्त नहीं कर पाते हैं। वहीं जब वे पश्चिमी देशों में जाते हैं तो वे खुद को एक्स मुस्लिम या भूतपूर्व मुस्लिम कहते हैं। माना जाता है कि सन् 2000 के आसपास अपने धर्म को त्यागने और  खुद को भूतपूर्व धार्मिक व्यक्ति कहने का आंदोलन शुरू हुआ था। अनेक देशों में एक्स मुस्लिम और एक्स क्रिश्चियन बने हुए हैं। कई देशों में खुद को एक्स हिन्दू या एक्स बौद्ध कहने वाले भी मीडिया में अपनी भावनाओं को व्यक्ति करते पाए गए हैं।  

धर्मनिरपेक्षता का उदय: धर्मनिरपेक्षता यह विश्वास है कि धर्म को सरकार या सार्वजनिक जीवन में कोई भूमिका नहीं निभानी चाहिए। जैसे-जैसे धर्मनिरपेक्षता और तर्क आधारित स्वतंत्र सोच की व्यापकता बढ़ती जाएगी, संभावना है कि नास्तिकों की संख्या भी बढ़ेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता अक्सर धार्मिक विश्वास में गिरावट का कारण बनती है, क्योंकि लोग जीवन के सवालों के जवाब के लिए धर्म पर कम निर्भर हो जाते हैं। धार्मिक किताबों में अतार्किकता की बातें भी धर्मनिरपेक्षता के उदय में अपनी भूमिका निभाती है।

शिक्षा का प्रसार: नास्तिकता के विकास में शिक्षा भी भूमिका निभा सकती है। जैसे-जैसे लोग अधिक शिक्षित होते जाते हैं, उनमें धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाने और स्वयं के बारे में सोचने की संभावना अधिक होती है। इससे धार्मिक आस्था में कमी आ सकती है और नास्तिकों की संख्या में वृद्धि हो सकती है।

बेशक, ये कुछ ऐसे कारक हैं जो भविष्य में दुनिया में नास्तिकों की संख्या को प्रभावित कर सकते हैं। यह निश्चित रूप से कहना असंभव है कि भविष्य में क्या होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि दुनिया के कई हिस्सों में नास्तिकता एक बढ़ती प्रवृत्ति है। कभी कम्युनिष्ट के जनक कार्ल मार्क्स ने धर्म को आफीम बताया था और कम्युनिष्ट आंदोलन में धर्म के बारे इन्हीं सुक्तियों को प्रमुखकता से चिह्नित किया जाता था। लेकिन अब दुनिया में कम्युनिष्टों से अधिक नयी पीढ़ी धर्म को आफीम मानती है। कई देशों में आर्थिक शोषण और भेदभाव में धर्म ने प्रमुख भूमिका निभाया है। इंटरनेट की दुनिया में धार्मिक भेदभाव और अन्याय से युवाओं में धर्म के प्रति विस्तृष्णा बढ़ते जा रही है। 

दुनिया में कई देश ऐसे हैं जिन्होंने आधिकारिक तौर पर खुद को नास्तिक राज्य घोषित किया है। अल्बानिया के कम्युनिस्ट नेता एनवर होक्सा ने सन् 1967 में अल्बानिया को नास्तिक राज्य घोषित कर दिया था। उनका मानना ​​था कि धर्म कम्युनिस्ट सरकार के लिए खतरा था और एक धर्मनिरपेक्ष समाज बनाने के लिए यह आवश्यक था।  चीनी सरकार आधिकारिक तौर पर नास्तिक है, और धार्मिक गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण है। धार्मिक समूहों को सरकार के साथ पंजीकरण कराना आवश्यक है, और वे कई प्रतिबंधों के अधीन हैं।

यद्यपि उत्तर कोरिया की सरकार ने कभी भी आधिकारिक तौर पर देश को नास्तिक घोषित नहीं किया है, लेकिन इसने कई ऐसी नीतियां लागू की हैं जिससे धार्मिक गतिविधि होना मुश्किल हो गया है। उदाहरण के लिए, धार्मिक नेताओं पर सरकार द्वारा कड़ी निगरानी रखी जाती है और धार्मिक सभाओं पर अक्सर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये देश एकमात्र ऐसे देश नहीं हैं जहां नास्तिकता प्रचलित है। दरअसल, ऐसे कई देश हैं जहां की बहुसंख्यक आबादी किसी भी धर्म से जुड़ी नहीं है। हालाँकि, ये देश ही ऐसे हैं जिन्होंने आधिकारिक तौर पर खुद को नास्तिक राज्य घोषित किया है। रूस के कम्युनिष्ट शासन ने रूस को धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया था और उनके शासन में धार्मिक कार्यों का प्रचार-प्रसार पूरी तरह बंद कर दिए गए थे। वियतनामी सरकार आधिकारिक तौर पर धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन इसका धार्मिक गतिविधियों को दबाने का एक लंबा इतिहास है। धार्मिक समूहों को सरकार के साथ पंजीकरण कराना आवश्यक है, और वे कई प्रतिबंधों के अधीन हैं। पश्चिम यूरोप के अधिकांश देशों में नास्तिकों की संख्या हर साल बढ़ रही है।

2019 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 40% फ्रांसीसी जनता ने खुद को नास्तिक Agonistic अनीश्वरवादी  बताया था।

 2018 में नास्तिकों के बारे हुए एक सर्वेक्षण में यूरोप के कई देशों की जनता ने खुद को नास्तिक या अनीश्वरवादी बताया था। जिसका प्रतिशत निम्नलिखित था।

चेक गणराज्य के 37%, स्वीडन के  34%, नीदरलैंड के  30%, एस्टोनिया के  29% जर्मनी के 27%, बेल्जियम के 27% स्लोवेनिया के 26%  लोगों ने खुद को नास्तिक या अनीश्वरवादीके रूप में घोषित किया था।

2021 की कनाडाई जनगणना के अनुसार  34.6% कनाडाई नागरिक किसी भी धर्म से संबद्ध नहीं थे। जबकि  2011 की कनाडाई जनगणना में नास्तिकों की जनसंख्या  23.9% थी। जबकि  2001 की कनाडाई जनगणना में agonistics या अनिश्वरवादी जनसंख्या महज 16.5% था। 20 सालों में कनाडा की नास्तिक जनसंख्या दुगुणी से भी अधिक हो गया है। 

प्यू रिसर्च सेंटर के 2020 के सर्वेक्षण के अनुसार, 26% अमेरिकी नास्तिक या अनिश्वरवादी के रूप में खुद की पहचान बताते हैं। 

इंग्लैंड में नास्तिकों का प्रतिशत संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में कम है, लेकिन यह अभी भी महत्वपूर्ण है। 2011 की जनगणना के अनुसार, इंग्लैंड में 14.1% लोग नास्तिक या अनिश्वरवादी के रूप में पहचाने गए। 

 अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि एक मुस्लिम बहुल देश अल्बानिया ने नास्तिक देश बनना क्यों चुना?

अल्बानिया के नास्तिक देश बनने के कई कारणों में शामिल हैं:-

एनवर होक्सा का प्रभाव- होक्सा 1944 से 1985 तक अल्बानिया के नेता थे और वह कट्टर नास्तिक थे। उनका मानना ​​था कि धर्म साम्यवादी राज्य के लिए खतरा है और उन्होंने धार्मिक गतिविधियों को दबाने के लिए कई नीतियां लागू कीं थीं।

अल्बानिया में धार्मिक संघर्ष का इतिहास. अल्बानिया में धार्मिक संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है, जो ओटोमन साम्राज्य से जुड़ा है। इस संघर्ष के कारण विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच बहुत अधिक अविश्वास और शत्रुता पैदा हो गई, जिससे अल्बानिया में धर्म का पनपना मुश्किल हो गया।

एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने की इच्छा। होक्सा और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं का मानना ​​था कि पश्चिम के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अल्बानिया को एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष राज्य बनने की आवश्यकता है। उन्होंने धर्म को एक पिछड़ी और अंधविश्वासी संस्था के रूप में देखा जो अल्बानिया को पीछे धकेल रही थी।

इन कारकों के परिणामस्वरूप, 1967 में अल्बानिया दुनिया का पहला नास्तिक राज्य बन गया। इस नीति को कई अल्बानियाई लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकार द्वारा इसे बड़ी गंभीरता से लागू किया गया। धार्मिक नेताओं को जेल में डाल दिया गया, चर्चों और मस्जिदों को नष्ट कर दिया गया और धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

1991 में अल्बानिया में साम्यवाद के पतन के कारण धार्मिक गतिविधियों का पुनरुत्थान हुआ। हालाँकि, अल्बानिया के नास्तिक अतीत की विरासत बनी हुई है, और आज भी यह देश दुनिया के सबसे धर्मनिरपेक्ष देशों में से एक है।

ऊपर उल्लिखित कारणों के अलावा, कुछ अन्य कारक भी हैं जिन्होंने अल्बानिया के नास्तिक राज्य बनने के निर्णय में योगदान दिया होगा। उदाहरण के लिए, अल्बानिया की आबादी अपेक्षाकृत कम है, और इससे सरकार के लिए अपनी नास्तिक नीतियों को लागू करना आसान हो गया होगा। इसके अतिरिक्त, अल्बानिया एक ऐसे क्षेत्र में स्थित है जो ऐतिहासिक रूप से इस्लाम से प्रभावित रहा है, और इसने सरकार को धार्मिक संघर्ष की संभावना के बारे में अधिक चिंतित किया होगा।

अल्बानिया के नास्तिक राज्य बनने के निर्णय के कारण जो भी हों, इस नीति की विरासत आज भी दिखाई देती है। अल्बानिया दुनिया के सबसे धर्मनिरपेक्ष देशों में से एक है, और धार्मिक गतिविधि अभी भी अपेक्षाकृत कम है। हालाँकि, देश भी अधिक विविध होता जा रहा है, और इससे भविष्य में धार्मिक गतिविधियों का पुनरुत्थान हो सकता है।

क्यूबा और वेनेज़ुएला की सरकारों पर धार्मिक गतिविधियों के ख़िलाफ़ होने का आरोप लगाया गया है। क्यूबा में सरकार का धार्मिक स्वतंत्रता को दबाने का एक लंबा इतिहास रहा है। कैथोलिक चर्च पर 1961 से 1991 तक आधिकारिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, और धार्मिक नेताओं को अक्सर कैद या परेशान किया जाता था। हालाँकि सरकार ने हाल के वर्षों में धर्म पर अपने कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है, फिर भी वह धार्मिक गतिविधियों पर कड़ी नज़र रखती है। पिछले साल जापान ने एक कानून बनाया था, जिसमें बच्चों को धार्मिक कार्यकलापों में शामिल करने से प्रतिबंधित किया गया  था।

क्यूबा और वेनेजुएला के अलावा, अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों, जैसे बोलीविया, इक्वाडोर और निकारागुआ में धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की खबरें आई हैं। हालाँकि, इन देशों की सरकारों ने इन आरोपों से इनकार किया है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी दक्षिण अमेरिकी सरकारें धार्मिक गतिविधियों के खिलाफ नहीं हैं। वास्तव में, इस क्षेत्र के कई देशों में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए मजबूत संवैधानिक सुरक्षा है। उदाहरण के लिए, ब्राज़ील, चिली और पेरू के संविधान सभी धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देते हैं।

दक्षिण अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति जटिल है और लगातार बदलती रहती है। क्षेत्र में धार्मिक समूहों के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने के लिए नवीनतम घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करते रहना महत्वपूर्ण है।

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